Daily Archives: July 21, 2015

राखायत जी, व्याघ्रदेवजी. Rakhayat ji, Vyaghradevji

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बहु उठे गरजण, जेने गोकीरे गजब थयो,
हवे हैडा हाल ने रण, रण जोवा राखायतनु…
( रण मेदान मे युद्ध की भयंकर चींखे सुनाइ दे रही है, और जीसके प्रकोप से यह गात्र थीजा देने वाली अावाजे आ रही है वो राखायत के अलावा और कोइ हौ नही शकता, इस िलए लोककिव राखायत का युद्ध देखने को उत्सुक हो रहे है.)
तो बात कुछ यु थी की महाराजा राज सोलंकी और कच्छ के राजा जाम लाखा फुलाणी की बहन का विवाह बडे धूम धाम से हुआ,
राज सोलंकी लाखाजी के वहा ही रहने लगे, एक दिन दोनो चोपाट खेल रहे थे, किंतु खेल युद्ध में पिरवर्तीत हो गया, क्रोध मे आ के लाखाजी होश खो बेठे और बहनोइ का ही वध कर दिया, राज सोलंकी का शीष धड से अलग कर िदया, पर बहन के पित को मार के बहुत पछता रहे थे, अपनी बहन का बहुत ख्याल रखने लगे, भांजे को बडे लाड-प्यार से बडा करने लगे, मामा भांजे मे बडा लगाव था, किंतु भांजे राखायत को यह बात मालुम ना थी की उसके पिता का काितल उसका मामा है,

राखायत अब बडा हो गया था, युवान हो गया, एक ही मुिष्टका के प्रहार से हाथी कुम्भास्थल को तोड दे एसा बलवान वीर योद्धा तैयार हो गया था,

लेकिन एक िदन जब वह अपनी माता के कक्ष में गया तो देखा माता रो रही थी, दुनिया में एसा कोई बेटा नही हो सकता जो अपनी मां के आंख मे आंसु देख शके, मा से कारण पुछा,
मां ने कहा “बेटा राखायत, आज तुजे देख कर ही मुजे रोना आ रहा है, तु जिसकी गोद मे खेल के बडा हुआ वही तेरे पिता के कातिल है, आज मुजे इसी बात का रोना आ रहा की उनके बदले का क्या?, और बेटा, बदला केसे लेगा, अपने पेट मे उनका ही अनाज है, इस लिये बेटा, धर्म को ध्यान मे रखके तु वैर कर.

अब राखायत बदले की आग मे तडपने लगा था, क्योकी मां ने कहा था लाखाजी के बहोत उपकार भी थे, तो बदला लुं भी तो कैसे???
तभी उन्हे एक मार्ग दिखाइ दिया, अपने भाइ मुलराज सोलंकी ( राज सोलंकी की दुसरी पत्नी जो पाटण के सामंतिसंह चावडा की बहन थी उनका पुत्र ) को पत्र िलखा, ” हे भाइ, गादी तो आपने पा ली पर क्या िपताजी के खुन का बदला लेना आप भुल रहे है? पिताजी के खुनी मेरे मामाजी जाम लाखा ही है, ये पत्र पा के आप ये मत समजना की युद्धमे में आप का साथ दुंगा, में मेरे मामा ेसे विस्वासघात नही कर सकता, आप चडाइ लेकर आओ, लेकिन मेरा भी आपको सामना करना पडेगा”

और फिर घोर भयंकर सेना के साथ पाटणपति मुलराज सोलंकी ने चडाइ की आटकोट के िकल्ले पर घेरा लग गया, वही पर जुनागढ के रा’ ग्रहिरपु, जाम लाखा फुलाणी और राखायत जी के सामने मुलराज सोलंकी की फौज ने हमला बोल िदया, घमासाण युद्ध हुअा, पर आज राखायत जी के युद्ध को देख कर मुलराज के सैनीक थर थर कांपने लग रहे है, भगवान शंकर का गण वीरभद्र जेसे प्रजापित दक्श के हवन का जैसे नाश करता है वैसे राखायत जी आज मुलराज की फौज पर टुट पडे है, अदभूत पराक्रम और साहस का प्रदर्शन वे करा रहे थे,
तभी दोनो भाइ आमने सामने आ गये,
दोनो मे कडी टक्कर हुइ, राखायत ने पुरी ताकात से सांग का प्रहार िकया, िकंतु मुलराज स्फुिर्त से घा चुका िलया, और सांग पीछे के मोटे पेड के आर पार हो के नीकल गइ, पर मुलराज के भाले के अचुक िनशाने से राखायत विर गति को प्राप्त हुए, उस युद्ध मे लाखाजी की उम्र सो वर्ष से भी अधिक थी, फीर भी मुलराज के िलये उन्हे परािजत करना बहोत कठीन काम हो गया था.
उस युद्ध मे रा’ग्रहिरपु, लाखा फुलाणी और राखायत तीनो वीर गित को प्राप्त हुए…

राखायत के पुत्र हुये व्याघ्रदेवजी, जिन से उनके वंशज ‘वाघेला’ कहेलाए…

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Maharaja-dhiraj Raj Solanki
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Shri Rakhayat ji
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Maharana Vyaghradev ji (Mukhya-purush of Vaghela Vansh, after Him we are known as Vaghelas)
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Maharana Suratdevji Vaghela (King of Viratnagari)
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Maharana Dhvaldevji Vaghela (after him Viratnagar known as Dhavallak, later became Dholka)
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Maharana Arnorajdevji
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Maharana Lavanya-prasadji
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Maharana Virdhavaldevji (also known as Virdhaval Rano, he defeated Mhmd Ghori near Abu)
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Maharana Vishaldev ji ( 1st Vaghela King of Gujarat, after defeated Tribhuvan pal Solanki 2nd)
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Maharana Arjundev ji (king of Patan-Gujarat)
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Maharana Sarangdev ji (defeted yadavraj Ramchandra of devgiri and Malavraj Bhojdev (2nd) both )
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Maharana Karandev ji (Last Rajput king who ruled over whole Gujarat, unbending Hero, Fought with khilji’s huge army and Lost but did not bow down)
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Maharana Veersinh ji ( he came to his maternal uncle Rao deshalji of kutch and become king of Sardhar, 650 village )
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Maharana Dhavaldev ji (king of Sardhar)
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Maharana Vishaldev ji
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Maharana Nodhandev ji
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Maharana Vijaypal ji
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Maharana Sursinh ji
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Maharana Ajabsinh ji
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Maharana Devkaran ji
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Maharana Pratapsinh ji
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Maharana Mandaldev ji
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Maharana Dhamankar ji (He gave throne of Sardhar to his younger brother and became King of Kalol)
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Maharana Jeetsinh ji ( He was younger son, came to Sanand and became king of Sanand & Koth)
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Maharana Gopalsinh ji (King of Sanand & Koth)
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Maharana Naysinh ji
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Maharana Nondhandev ji
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Maharana Varah ji
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Maharana Bhimsinh ji
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Maharana Dudhmal ji
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Maharana Virdhaval ji
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Maharana Sarangdev ji
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Maharana Maldeo ji
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Maharana Jaysinh ji
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Maharana Annraa ji
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Maharana Sarandev ji
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Maharana Bhimsinh ji
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Melo ji Vaghela (He was killed by his elder brother Karandevji Vaghela, King of Sanand & koth. After that shri Sanghji Vaghela of Kavitha killed Karandevji and whole state of sanand & koth was devided into two parts between Son of Karandev ji and Melo ji. Melo ji’s sons got Gangad state)
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Thakur saheb shri Pruthvirajsinh ji (king of gangad)

and Sons of karandev ji came on the throne of Sanand.

Source from: Divyrajsinh Sarvaiya & Satyapalsinh Vaghela

Jay Vagheshwari Ma,
Jay Mataji

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

उग्रसेन वाळा (उगा वाळा) Uga Vala

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->   ई.स.788 मे शीलादित्य 7 के समय मे ‘वलभीभंग’ हुआ. उस वक्त उसके पुत्र धरसेन (धीरसेन-धारादित्य-शीलादित्य 8) (794-830) मेवाड मे महाराणा खुमान के पास थे. उन्होने सौराष्ट्र मे आकर ¼ सौराष्ट्र जीत लिया और उसकी राजधानी वळा(वलभी के पास) बनाई. तब से मैत्रक कुल वाळा कुल के नाम से जाना गया. जो ‘वाळाकक्षेत्र’ के नाम से जाना गया और चालु हुआ मैत्रक वंश का दुसरा अध्याय ‘वाळावंश’…

-> धीरसेन के पश्चात उनके पुत्र वृतकेतु उर्फ वजेदित्य (830-860) हुए. जिन्होने तलाजा-महुआ-शिहोर-पालीताना, धंधुका के आसपास का भाल प्रदेश और घोघा तक राज्य विस्तार किया. तलाजा को राज्य का मुख्य केन्द्र बनाया. उनके बाद-
झांझरशी 1 (860-890)
जसाजी (890-910) (अपुत्र)
मुलराजजी (910-938) (अपुत्र)
मानाजी (938-960) (जसाजी-मुलराजजी-मानाजी=भाई)

मानाजी के दो पुत्र धर्मोजी और उगाजी और एक पुत्री साँयकुँवरबा थे. पुत्री का विवाह वंथली के रा’ग्रहरिपु के साथ हुआ था. जिनके पुत्र रा’कवाट हुए.

धर्मोजी (960-979) ई.स.979 मे आटकोट के युद्ध मे (रा’ग्रहरिपु/लाखा फुलानी और मुलराज सोलंकी के बीच) विरगती को प्राप्त हुए.

–> वीर उगाजी वाळा :- (979-1001)
                    एक और भाई धर्मोजी अपुत्र होने की वजह से तलाजा की गद्दी पर उगाजी आये. दुसरी और अपने पिता की हार का बदला लेने के लिए रा’कवाट सैन्य सज्ज करने लगे. सौराष्ट्र के वीरो को ईकठ्ठा कर सेना बनाने लगे. सेना की अगुवाई करने उसने मामा उगाजी को बुलाया और सोरठी सेना का सेनापति बनाया.

        सब से पहले आटकोट के युद्ध मे मुलराज सोलंकी को मदद करने वाले आबुराज कृष्नराज परमार पर आक्रमण कर उगाजी वाला ने उसे सोरठ के दरबार मे हाजिर किया. रा’कवाट ने उसे माफ कर के छोड दिया.

      उगाजी वाळा का मान-सन्मान दरबार मे और बढ गया. ईससे कुछ दरबारी ईष्या भाव रखने लगे. एक दिन दरबार मे उगाजी वाळा की शूरवीरता और सामर्थ्य की बाते चल रही थी तब किसी दरबारी ने कहा कि, “अगर रा’कवाट की सेना न हो तो उगाजी अकेले क्या कर शकते है? दोनो हाथो के बगैर ताली थोडी बजेगी?”
उगाजी ने यह बात सुन गर्व से कहा, “उगाजी एक हाथ से भी ताली बजा शकता है.”

        रा’ ने मामा की बात को ‘मिथ्याभिमान’ बताया. उगाजी ने सेनापतिपद का त्याग किया और वापस तलाजा लौट आये.

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         उस समय शियाल बेट मे अनंतदेव चावडा का राज था. वह काफी पराक्रमी था. उसने 36 कुलो के राजाओ को अपने यहा बंदी बना के रखा था. सिर्फ एक यादवकुल के राजा को बंदी बनाना बाकी था. उसने रा’कवाट को धोखे से बंदी बनाकर काष्ठ के पिंजरे मे केद कर लिया.

        रा’कवाट ने अपने दशोंदी चारन के जरीये उगाजी को संदेश भेजा. उनके दुहे –

  || छाती उपर शेरडो, माथा माथे वाट,
    भणजो वाला उगला, कट पांजरे कवाट,
     तुं नी के तुं तक आव्ये ताली तलाजा धणी,
    वाळा हवे वगाड्य एकल हाथे उगला ||

– हे उगाजी ! आज सोरठपति रा’कवाट कठपिंजरे मे केद है. तुम एक दिन कह रहे थे ना कि उगा वाला एक हाथ से ताली बजा शकता है तो आज मौका है. बजाओ एक हाथ से ताली |

–> उगाजी ने अनंतदेव को रा’ को छोडने का संदेश भेजा, अनंददेव ने कहा –

|| अनंत भाखे उगला, जो मुजरो करे कवाट,
   पत खोवे गरनारपत, तो पाछो मेलु कवाट. ||

– उगाजी ! अगर रा’कवाट मुजरा(सलाम) करे तो मै उसे छोड दुंगा. |

       इस बात को सुन क्रोधीत हो कर  उगाजी ने अनंतदेव पर आक्रमण किया. उसे हराया और अनंतदेव की माँ के कहने पर उसे जीवतदान दीया.
     इधर रा’कवाट को छुडाने के लिये उगाजी ने पिंजरे को लात मारकर तोड दिया, तब उसका पैर रा’ को लग गया. ईससे रा’ को बुरा लगा और अपने अपमान का बदला लेने का प्रण लिया |

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–> उगाजी वाला का घर संसार :-

        जब उगाजी ने आबु पर आक्रमण कर जीता तब एक राजवंशी सरदार ने अपने पुत्री का विवाह उगाजी से किया. उनसे एक पुत्र हुआ जिसका नाम शीलाजित/शीलादित्य रखा. एक दिन जब तलाजा की कचेरी मे कविओ, दरबारीओ, भायातो और प्रजाजनो के साथ दरबार भरा हुआ था तब समाचार मिला की ‘रा’कवाट अपने अपमान का बदला लेने के लिये सेना लेकर तलाजा आ रहे है’ |

      उगाजी ने हाजर दरबारी और भायातो को कहा, “तलाजा का पादर भांजे के खुन के रंग से नही रंगना चाहिये, वरना तलाजा के नाम पर कालिक पोंत जायेगी. हम अभी चलेंगे और सोरठी सेना का स्वागत छाती ठोंककर करेंगे.” |

       जब उगाजी के युद्धगमन के समाचार उनकी रानी को मिले तब उनहोने उगाजी को संदेश भेजा,  शृंगाररस के ये कुछ दोहे श्री मोरारीदान महियरिया के “रा’कवाट दरबार विलास” मे मिलते है-

|| पीय चालण प्यारी सूण्यो अंग ईसो अंगुलाई,
  ज्युं मच्छली जल ब्हावरी, तडफ तडफ जीजाई ||

– प्रियजन के विदाय समाचार प्रियतमा(रानी) ने सुने तो वह ऐसे व्यथित हुई जैसे जल बिन मछली तडप तडप अपना जीवन खो देती है |

|| नीर झरणां नैणांह, समणां विण अवै सरस;
   रात दिन  रहणांट,  मयणां  बाणां  मारसी ||

– प्रिय बिना मेरे नेत्रो से विपुल जल बह रहा है. आपके बगैर रात-दिन कामदेव बाणो से मुझे छल्ली कर देंगे ||

|| पिया विण लागे प्रगट, अत खारा आवास,
   जीव हमारा जल मरे, पिव प्यारा नह पास ||

– प्रिय बिन यह गृह मुझे विषमय लगता है. मेरी आत्मा वेदना मे सुलग रही है |

–> ऐसी प्रिया की विरहवेदना लिये उगाजी रा’कवाट की सेना से युद्ध करने निकल पडता है, अपनी सेना नही ली सिर्फ कुछ भायातो और सरदारो को लेकर ही जाता है. उना के पास चित्रासर गांव के पादर मे युद्ध होता है, उगाजी के साथी कम थे लेकिन अप्रतिम शौर्य दिखाने लगे, युद्ध के तीसरे दिन उगाजी और रा’कवाट सामने आये, उगाजी ने प्रहार किया नही बल्कि भांजे का प्रहार अपनी छाती पे लिया. ई.स.1001 मे वे वीरगति को प्राप्त हुए.

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–> जब उगाजी की बहन साँयकुँवरबा (रा’कवाट की माता) अपने भाई की खांभी (पालीया-मृत्यु के बाद वीर की याद मे खडा पथ्थर- छत्री) को पुजने आई तब युद्ध भूमि मे कई खांभी को देख उन्हे पता नही चला की अपने भाई की खांभी कौन सी है?… तब वे वीरवियोग मे मरसियां(मरे हुए को याद कर गाते गीत) गाने लगती है. वेरान भूमि के वायु मे वेदना के वमल सर्जित होते है, पथ्थर की खांभी का ह्रदय भी पिगल जाता है. सब खांभीओ मे से एक खांभी झुकती है और बहन उसको पुजती है |

         आज भी वह खांभी 45° कोण से झुकी हुई है.

      वाळा राजपुत राजवंश के सूर्य जैसे प्रकाशित और प्रभावी वीर उगाजी वाळा ई.स.१००१ मे चित्रासर के पास वीरगति को प्राप्त हुए ||

ऐसे वीर को शत शत नमन _/\_

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

रा’ नवघण Ra Navghan

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       सौराष्ट्र मे कइ शासकोने अपने नेक टेक और धर्म से शासन कर प्रजामे अपने नाम को अमर किया है,
एक एसे शासक हुए पुरे सौराष्ट्र पर जीनकी सत्ता चलती थी, जुनागढ के उपरकोट के किल्ले मे जिनकी राजगद्दी थी, वो थे चुडासमा राजवी रा’ डियास.
        पाटणपति राजा दुर्लभसेन सोलंकी ने जुनागढ पर आक्रमण कीया. कइ साल घेरा रखने के बावजुद भी जब उस से उपरकोट का किल्ला जीत नही शका, सोलंकीने अपने दशोंदी चारण को बुलाया, दुर्लभसेन सोलंकी यह जानता था की रा’ डियास बहुत बडा दानी है, वे कीसी याचक को कभी निराश नही करेगा. अपने चारण को कीसी भी तरह से रा’ डियास का सर दान मे ले आने को कहा.
            उस समय युद्ध गंभीर कीतना हो लेकिन चारण कीसी भी पक्ष मे बिना रोकटोक जा शकते थे.
रा’ डियास सोलंकी ओ का सामना करने हेतु सभा भर कर बेठे थे, वहां चारण आया, राजपुत सभा को रंग देकर दुहा-छंद की बिरदावली शुरु की, राजपुतो की प्रशस्ति के छप्पय छंद का आह्वान किया.
          “धरा शीश सो धरे मरे
             पण टेक ना मुके
        भागे सो नही लडे शुरपद
               कदी ना चुके
          निराधार को देख दिये
            आधार आपबल
          अडग वचन उच्चार
         स्नेह में करे नही छल
       परस्त्रीया संग भेटे नही
        धरत ध्यान अवधूत को
       कवि समज भेद पिंगल कहे
          यही धर्म राजपुत को”
    
        एक एक दुहे पर रा’ डियास को शुरातन चडता जा रहा है, चारण की प्रशस्ति पुरी होते ही रा’ कुछ भी मांगने को कहते है, और चारण उसी समय का लाभ लेते हुए रा’ से उनका सिर दान में मंाग लेता हे, सारी सभा चकित हो जाती है, लेकिन रा’ के मुख पर एक दिव्य तेज सा स्मित रहता है, रा’ डियास एक पल का भी विलंब कीये बीना कमर पर बांधी ताती तलवार को छोड, गरदन पर तलवार चलाने से पहेले कहेते है, ” आज इस चारणने मुजे इतिहास मे अपना नाम अमर रखने का मोका दीया है, आज अगर मेरे हजार सर होते तो में हजारो सर का दान करता” और रा’ डियास ने  चारण को अपने सर का दान दिया.
          रा’ डियास की रानीयो ने जौहर कीया, लेकीन सोमलदे परमार नामकी रानी सगर्भा थी, इस लीए वे किल्ले से भाग जाती है, एक पुत्र को जन्म देती है, और उस पुत्र को जीवीत रखने हेतु अपनी वालबाइ नामकी दासी को पुत्र “नवघण” को सोंपकर कहेती है, ” आडीदर बोडिदर गांव मे जाकर वहा देवायत बोदर को कहना ये बालक को बडा करे और जुनागढ की गद्दी पर बीठाये”  रानी सोमलदे ने देवायत बोदर को धर्म भाइ बनाया था,
दासी छुपते-छुपाते बाल नवघण को आडीदर बोडिदर के आहीर देवायत के यहां ले आती है और सोमलदे का संदेशा देती देती है.
           देवायत बोदर नवघण को आहीराणी को सोंपां और कहा: भगवान मुरलीधरने आज अपने को राजभक्ति दीखाने का अवसर दीया है, और आज से अपने तीन बालक है.
आहीराणी ने अपनी बेटी जाहल का दुध छुडा दीया और नवघण को स्तनपान कराया, तीनो बच्चे नवघण, देवायत का बेटा उगा और बेटी जाहल को आहीराणी सोनबाइ मां का प्यार देने लगी,
          तीनो बच्चे एक साथ बडे होने लगे, पांच साल के हो गये, लेकिन एक देवायत से जलने वाला आहीर सोलंकीओ के पास जाकर फरियाद कर देता है: आपके दुश्मन रा’डियास का बेटा अभी जीवीत है, और देवायत के यहां बडा हो रहा है.
           सोलंकीओ की समुद्र जेसी फोज ने आडीदर बोडीदर को घेर लीया. आहीर समाज को इकट्ठा कर एक एक आहीर से कठोरता से पुछा गया : सच बताओ ! क्या डियास का बेटा नवघण देवायत के घर मे पाला जा रहा है?
           लेकिन स्वामीभ्कती के रंग मे रंगा पुरा आहीर समाज सिर्फ इतना जवाब देता है की: हमे पता नही है.
           देवायत बोदर के पास सोलंकी आते है, देवायत से कहेते है: राज के सामने तुम पटेलो ने उठकर दुश्मन बन रहे हो यह अच्छी बात नही, सच सच बताओ क्या नवघण तुम्हारे यहां बडा हो रहा है?
           देवायत समज गया की जरुर कोइ आदमी दगा कर गया है, इस लीए देवायतने कबुल कर लीया, देवायत ने कहा : हां राजन! नवघण मेरे ही घर पर है, मेरे ही घर बडा हो रहा है.
       वहां बेठे सारे आहीरो को एकबार तो देवायत का सर धड से अलग कर देने को तैयार हो गये, लेकीन चारो तरफ सोलंकी की समशेरोने उन्हे घेर रखा था.
       सोलंकी सरदार: तो आपा देवायत, सोलंकीओ की शक्ति से क्या आप परिचित नही हो? क्या आप जानते नही हो की राज के शत्रु को शरण देने से आप का क्या हाल हो शकता है?
        देवायत: राजन, में तो आप लोगो के प्रति मेरी राजभक्ति दिखाने के लीए नवघण को मेरे घर पाल रहा हुं, जब वो बडा हो जाता तो में खुद आकर उसे आपके पास छोड जाता, अब आप आ गये हो तो में घर पर पत्र लीख देता हु, आहीराणी को पत्र देते ही वे आपको नवघण सोंप देगी.
        देवायत ने पत्र लीखा, आहीराणी, सोलंकीओ का जो शत्रु अपने घर पर इतने दिनो से पल रहा है, उसे इन आये हुए राजसैनीको के साथ भेज देना, रा’ रखकर बात करना,
         सौराष्ट्र और गुजरात की भाषा एक है किंतु उनकी बोलने की शैली अलग है. पत्र के अंत मे जो लीखा था “रा’ रखकर बात करना” उसका मतलब सैनीको के साथ खुद देवायत का बेटा उगा को भेजना है, नवघण को नही भेजना है. सोलंकीओने पत्र पढा पर उन्हे उस बात का पता नही चला.
          आहीराणी ने अपने बेटे उगा को राजसी वस्त्र पहनाये, आभूषणो से सुसज्ज कर के सैनीको के साथ भेज दीया. सोलंकी सरदारो ने देवायत के सामने ही उगा को नवघण समज कर सर धड से अलग कर दीया. कींतु देवायत के मुख पर एक भी दु:ख का भाव नही आया. देवायत के इर्षालुने फीर से सोलंकीओ को सुचना दी, ये अभी जो मरा वो नवघण नही बल्की उगा है, खुद देवायत ने अपनी ही संतान उगा को नवघण बनाकर आप से धोखा कीया है. सोलंकी ओने उस बात की पुष्टि करने हेतु आहीराणी को म्रुतक की आंखो पर से चलने को कहा, अगर आहीराणी की आंखोसे एक भी आंसु गीरा या चहेरे हावभावमें कोइ भी परिवर्तन आया तो मरने वाला उगा था, नही तो मरने वाला नवघण ही था एसा मानते.
        आहीराणी को सभामें बुलाया गया. और आहीराणी सोनबाइने आंखमें से एक भी आंसु गीराये बीना आंखो पर से चली गइ. साबीत हो गया की मरने वाला नवघण ही था. सोलंकी ओ ने देवायत को सन्मान दीया.
         जब नवघण बीस साल का हो गया, एक ही मुष्टीका के प्रहार से हाथी के कुंभास्थल को तोड दे एसा जवांमर्द बन गया.
         देवायतने अपनी बेटी जाहल का विवाह सासतीया नाम के आहीर से कीया. विवाह मे पुरे सौराष्ट्र के आहीर समाज को आमंत्रीत कीया. और देवायतने आये हुए सभी महेमानो से देवायत ने सत्य बताया की: उस दीन जो सोलंकीओ के हाथो मारा गया वो मेरा बेटा था, असली नवघण अभी जीवीत है. नवघण की मां, मेरी धर्मबहन रोज मुजे सपनो में पुछती है की नवघण को गद्दी पर बीठाने में अभी कीतना समय है?
     लेकीन आहीरो आज समय आ गया है, आज जुनागढ का तख्त पलटेगा, आप सभी की सहायता से में अपने पुत्र की म्रुत्यु का प्रतिशोध लुंगा.
     वहां उपस्थित सभी आहीरोने जाहल की शादी का आमंत्रण देने आये है एसा कहकर उपरकोट किल्ले मे प्रवेश कर गये, और योजना के मुताबीक अंदर जाते ही सोलंकीओ को संहार करने लगे. नवघण अपने ‘झपडा’ नाम के घोडे पर बैठ कर उपरकोट की दीवालो पर से तीरदांजी कर रहे सोलंकी सैनीको का नाश करने लगा. सोलंकी ओ को हार माननी पडी.
         देवायत ने नवघण (इ.स. १०२५-१०४४) को गद्दी पर बीठाकर अपने रक्त से तीलक कीया.
बहन जाहल के विवाहमें एक भाइ हर फर्ज अदा की, और बहन को कुछ भी मांगने को कहा, जमीन चाहीये तो जमीन, पुरा राज्य ताहीये तो पुरा राज्य और अगर बहन को सर चाहीये तो सिर दान भी दुंगा.
          मगर जाहल ने कहा: नही भाइ, मुजे अभी कुछ नही चाहीये, कभी जरुरत पडी तो आप से मांग लुंगी…

         बहन को विदा कर नवघण को गद्दी पर बीठाने के लीए जीतने भी आहीरोने सहायता की उनको योग्य भेट-सोगाद देकर नवघण ने आभार वियक्त कीया. फिर इतने अरसे मे कइ रजवाडे जुनागढ से जुदा हो गये थे, नवघण ने उन पर चडाइ कर के प्रथम उन्हे फिर से अपने राज्य विस्तारमे समा लीया, और पुन: पुरे सौराष्ट्र प्रांत को एक कर अपना राज्य विस्तार बनाया. प्रजा के हित के काम कीये.
         कींतु सौराष्ट्र में अकाल पडा. बारीश हुइ नही, सारे नदि नाळे सुख गये. सारे मालधारी अपने गाय-भेंसो को लेकर सिंध आदि प्रांतोमे बसने चले गये.
          रा’ नवघण पच्चीस साल का युवान, दोनो भुजाओ में अद्भुत बल, उसे अपने बल का प्रयोग कीये बीना रात को नींद नही आती एसा रणप्रेमी बन गया. सौराष्ट्र प्रांत में अपने दुश्मनो को एक एक करके खत्म कीये, गीर के जंगल में जाकर शेर का शीकार करता…

          एक दिन एक भीखारी जेसा दीखने वाला आदमी उपरकोट के मुख्यद्वार पर बार बार आ रहा है, उसने पहेरेगीर से कहा : मुजे अंदर जाने दो, मुजे रा’ से मीलना है, मुजे उनका काम है.
       लेकिन पहेरेदारो ने पागल समज कर भगा दीया. वो आदमी बहुत चिंतीत था. तुरंत वो रावल और हीरण नदी के संगमस्थान के पास गया, और वहां से घास तोडकर उसकी गठरी बांध ले आया, रा’ की घोडार के पास आ खडा हुआ, रा’ नवघण के घोडो का ध्यान रखने वाले आकर उस से घास खरीदने लगे, वो आदमी जानता था की रा’ को अपने सभी घोडो मे ‘झपडा’ नामका घोडा अति प्रीय है. और सप्ताह में एक दिन रा’ नवघण झपडा को देखने आते है, उस दीन रा’ से मुलाकात हो शकती है. इस लीये वो आदमी हररोज घास लाकर वहां बैठता था.
        रा’ नवघण अपने पसंदीदा झपडा घोडे को देखने आये, तभी वो आदमी आगे आकर रा’ के हाथ मे एक खत देता है. खत पढते ही रा’ की आंखोमें आसु आ जाते.
        वो व्यक्ति जीसने रा’ को खत दीया, और जीसे पहेरेदारोने किल्लेमे प्रवेश नही करने दीया था, वो जाहल का पति सासतीया था.
        खत मे लीखा था,
“मांडव अमारे म्हालतो बांधव दीधेल बोल,
आज कर कापडानी कोर जाहल ने जुनाणाधणी.”
( हे बांधव, मेरे विवाह समय आपने मुजे वचन दीया था, कुछ भी मांगने को कहा था लेकीन हे जुनागढ के पति, मेने उस समय कुछ नही मांगा था लेकीन आज आप अपना वचन पुरा कर मेरी रक्षा करो.)

“नवघण तमणे नेह थानोरव ठरीया नही,
बालक बाळ्यप ले अणधाव्या उझर्या अमे.”
( हे वीर, आप पर प्रेम होने से मेरी माता ने मुजे स्तनपान छुडाकर, मेरे भाग का दुध आपको पीलाया था, और मे बीना दुध पीये ही बडी हुइ, आज उस दुध की खातिर मेरी रक्षा करो.)

“तु आडो में आपियो उगा मायलो वीर,
समज्यो मांय शरीर नवघण नवसोरठधणी.”
( हे सौराष्ट्र के भुप, आपके प्राणो की खातीर, मेरे पिता ने मेरे भाइ उगा का बलीदान दीया, पर आप अपने पुरे अंग को समज कर मेरी रक्षा करो)

“कुवे कादव आवीया नदीये खुट्या नीर,
सोरठ सडताणो पड्यो वरतवा आव्या वीर.”
( हे वीर, सोरठ(सौराष्ट्र) में कुए खाली हो गये है, नदीओ का पानी सुख गया है, अकाल होने के कारण मे परिवार के साथ सोरठ से बाहर हु, मेरी रक्षा करो)

“नही मोसाळे मावलो नही माडीजायो वीर,
सिंधमां रोकी सुमरे हालवा नो दे हमीर.”
( भाइ, मेरे मात्रुपक्ष में मेरी सहायता कोइ नही कर शकता, और मेरा कोइ भाइ भी नही है, एसी स्थितीमे में सिंध मे हु, और सिंध का राजा हमीर सुमरा मुज पर मोहीत है, वो मुजे अपनी रानी बनाना चाहता है, मुजे उससे बचाओ)

         रा’ नवघण सासतीया से पुछते है, बात क्या हे ? मुजे पुरी बताओ.
सासतीया: सोरठ मे अकाल होने के कारण हम सिंधमें चले गये. वहां जाहल नदी से पानी भरने गइ थी, और उसी वक्त वहां से सिंध का राजा हमीर सूमरा ने जाहल को देखा, जाहल का सौंदर्य देखकर वह जाहल पर मोहीत हो गया है, जाहल को प्राप्त करने की उसकी इच्छा है, कामवासना में वह अंधा हो गया है, जाहल ने उस से छ: महीनो के व्रत का बहाना बनाया है, मुजे ये पत्र ले कर आपके पास जाहल ने भेजा. अब केवल एक महीना बचा है, अगर समय रहेते नही पहुंचे तो जाहल आत्महत्या कर लेगी लेकीन हमीर की इच्छा पुरी नही होने देगी.
         रा’ नवघण ने तुरंत ही अपनी अस्वसेना तैयार की. पुरे सोरठ के नवयुवान शस्त्रो से सुसज्ज होकर रा’ की धर्मबहन जाहल की लाज बचाने हेतु जुनागढ पहुंच गये.

जेम राणो जेठवो, तेड वाढेर बलाखो,
कनक तेड केसुर, तेड झालो गोपाळो,
सोलंकी अइब, तेड शीलाजीत वाळो,
बाबरीयो रणधीर, तेड गोहील डाढाळो,
वाघेर तेड वीरमदे, काठी हरसुर करणो,
धाखडोने तेड बाळीण, पोहसेन नवघण समधरणा…
       रा’ ने सोरठ में उंटसवार दोडाया ओर युद्धमे वीरो को आमंत्रीत कीया.
     किरपाण मरदा कसी कम्मर
     बदन भीडी बख्तरा
     भुजदंड वेगे प्रचंड भाला
     तीर बरछी तोमरा
     हेमरा नवलाख हुकडे
     खंत थी अरी खोडवा
     नरपति सजीयो सैन्य नवघण
     धरा सिंध धमरोळवा…

समंदर जेसी सेना के साथ नवघण नीकल पडा सिंध को पराजीत कर के बहन जाहल को बचाने…
       मार्ग मे एक नेस आता है, रा के पुछने पर साथी बताता हे सांखडा नरा नामके चारण का नेस है.
       इतने में एक दिव्य बालीका आकर रा’ के झपडा की लगाम पकड लेती हे, रा’ उन्हे समजाते की आप लगाम छोड दीजीये, घोडा आपको चोट पहुंचा देगा, तब वह बालीका कहती है, ” मे. वरुडी हुं, यह नेस मेरे पिता का है, और आज आप यहां से एसे ही नही जा शकते, आप हमारे महेमान हे, मे आपको सेना सहीत भोजन करा के ही विदाय करुंगी,”
        रा’ नवघण: आइ, में आज मेरी पुरी सेना के साथ हुं, आपका नेस छोटा हे, मेरी सेना बहुत बडी हे.

आइ के कहना मानकर नवघण को आइ वरुडी पास भोजन के लीए रुकना पडा. लेकीन आइ वरुडी के चमत्कार से रा’ अनजान थे.
        आइ वरुडी ने रा’ और पुरी सेना को पंगत में बीठाया. इतनी बडी सेना के लीये थाली थी नही. वरुडी की बहन शव्यदेव पास के बरगद के पेड पर चड गये, और बरगद के पत्तो की थालीया बना दी. आइ वरुडी ने अपनी एक ही कुलडी(एक पात्र) से ३२ पकवान रा’ नवघण को खीलाये. पुरी सेना को एक ही कुलडी से भोजन कराया. पुरी सेना ने कभी इतना स्वादिष्ट भोजन नही खाया था. सभी त्रुप्त हुये.
रा’ नवघण ने आइ वरुडी को हाथ जोडकर नमन कीया.
आइ वरुडी ने कहा: रा’ अगर आप सिंध जाते समय समुद्र के किनारे किनारे चलोगे तो समय पर नही पहुंच पाओगे.
रा’ ने मार्गद्शन मांगा.
आइ वरुडी: रा’ आप समुद्र के कीनारे जाकर मां खोडीयार का स्मरण करना. ओर जब आपके भाले पर काली देवचकली आकर बेठे तो मानना आइ खोडीयार आपके साथ है, और आप समुद्र मे अपने घोडे को उतारना, आपको मां खोडीयार सहाय करेगी.

और नवघण ने अपनी सेना के साथ वहां से प्रस्थान कीया सिंध की ओर.
कच्छ प्रदेश की सीमा पुरी हुयी, आगे समुद्र आ गया.
रा’नवघण ने मनोमन आइ खोडीयार का स्मरण कीया, उनसे समुद्र पार करने के लीए सहायता मांगी.
इतने मे एक काले रंग की चीडीया जीसे देवचकली कहेते है, कहीं से आइ और रा’ के भाले की नोक पर बैठ गइ.
सारी सेना ने एक साथ मां खोडीयार का जयघोष कर गगन को भर दीया.
रा’ ने अपने झपडा को पानी मे चलाया, और पुरी सेना ने भी आस्चर्य के साथ समुद्र मे घोडे उतारे. लेकीन मां खोडीयार ने अपनी शक्ति से समुद्र मे भी मार्ग बना दिया. दोनो तरफ पानी की दीवार हो गइ बीच मे से पुरी सेना पसार हो रही थी.

        उस तरफ जाहल बार बार सोरठ से आने वाले रास्ते पर नजर कर रही थी, मेरा धर्म भाइ आता होगा. क्युंकी आज हमीर सूमरा की दी गइ अवधी का अंतिम दिवस था. जाहल जगदंबा से प्रार्थना करने लग गइ, सुर्य अस्त होने वाला था.
       हमीर सुमरा रात का आनंद लेने उतावला हुआ जा रहा था. नये वस्त्र पहेने, नये आभुषण सजे, कइ प्रकार के अत्तर का छंटकाव कीया.
       जाहलने अंतिम बार सोरठ से आते रास्ते पर नजर की, कुछ नही था वहां, बीलकुल शांत वातावरण था उस मार्ग का, जाहलने निराश होकर समंदर की ओर देखा, और खुशी से उस की आंखे भर आयी, समंदर के पानी की दीवाल, बीचमें असंख्य अस्वदल आ रहा हे, ध्यान से जाहल ने देखा, पताका, उस के मुंह से उद्गार नीकले: घणी खम्मा मेरे वीर, वही पताका हे! मेरे देश सोरठ की ही पताका है! मेरा भाइ मेरी आबरु बचाने आ पहुंचा…
         रा’ नवघण के सैन्य ने सुमरा हमीर के नगर में प्रवेश पा लीया…
रा’ का सैन्य सिंध के मुसलमानो को गाजर-मुली की तरह काटने लगा…
एसा लग रहा था जेसे भगवान सूर्यनारायण भी इस युद्ध देखने रुक गये हो, और आज जेसे वे भी सुमरा पर क्रोधित हुए हो इस तरह अपने क्रोध को दीखाकर धरती पर सांज का लाल प्रकाश गीराने लगे….
ढाल, तलवार, भाले के खनखनाट चारो और सुनाइ देने लगे, रण के देवता काल भैरव रक्त के पात्र भरने लगे, मारो मारो के हाहाकार चारो तरफ बोलने लगे, रा’ नवघण पुरे रण घुमने लगे, रक्त की धाराए बहने लगी, एक जगह हमीर सुमरा रा’ के सामने आ गया, दोनो बलवान योद्धा थे, एक एक कर दोनो तलवार के प्रहार कर रहे थे, हमीर सुमरा घोडे से गीर गया, रा’ नवघण भी घोडे से उतरकर जमीन पर आ गये, नवघण ने अपने बल का प्रयोग कीया तलवार से जनोइवढ घा कीया, और हमीर सुमरा का शीरच्छेद हुआ.
रा’ नवघण की विजय हुइ, हमीर सुमरा मारा गया, बहन जाहल को लेकर जुनागढ वापस आये…

तारीख 08-05-2009 को रा’ वंशज चुडासमा, सरवैया, रायजादा राजपुत समाजने आहीर समाज की हाजरी मे आपा देवायत और आइ सोनबाइ का भव्य मंदीर बनवाया.
– दिव्यराजसिंह सरवैया (देदरडा)

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

चित्तोड़ का युद्ध और जौहर Battle of chittorgarh

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          चित्तोड़ का तीसरा जौहर
३० अगस्त १५६७ के रोज अकबर ‘बारी’ नामक स्थान पर शिकार के कयास से आ पहुंचा। बादशाह के वहा आ पहुँचने से अकबर के बहुत से दरबारी वहा आ पहुंचे। अबुल फजल के मुताबिक वहा इतने सारे सैनिक इक्कठा हो चुके थे के वह किसी राज्य को आसानी से फ़तेह कर सकते थे। फजल आगे लिखता है -मालवे के सुल्तान मिर्ज़ा के बेटे ने उपद्रव मचा रखा था, इस उपद्रव को दबाने के खातर बादशाह ने कुछ सिपासलारो को मालवे की ओर कुच करने का हुकम दिया।
आगे जब धौलपुर में अकबर ने अपनी सेना का पड़ाव डाला तब शक्ति सिंह के साथ इक रोज बातचीत के दौरान अकबर ने चित्तोड़ फ़तेह करने की मंशा जताई,जिसके चलते शक्ति सिंह रातो रात चित्तोड़ आ पहुंचे और उन्होंने राणा उदय सिंह को अकबर द्वारा आक्रमण होने की पूर्व सुचना दी।

१९ सितम्बर १५६७ के रोज,अकबर ने अपना मेवाड़ अभियान शुरू किया।इससे पहले अकबर ने बयाना का परगाना हाजी मुहम्मद खान सिस्तानी से लेकर असफ खां को जागीर में दे दिया।मांडलगढ और वजीरपुर भी आसफ खान को दे दिया गया ताकि वह सेना के लिए सामग्री इक्कट्ठा कर सके।
इधर जैसे ही शक्ति सिंह ने चित्तोड़ पहुँच कर महाराणा उदय सिंह को खबर दी,उदयसिंह ने भी अपनी तय्यरियाँ आरम्भ कर दी। फ़ौरन भावी रणनीती तय करने के लिए सभा बुलाई गई।
राणा उदयसिंह,रावत साहीदास चुण्डावत,रावत नेतसी सारंगदेवोत,राव जयमल राठोड,कुंवर प्रतापसिंह,कुंवर शक्तिसिंह,राव बल्लू सोलंकी,इसरदास चौहान,रावत पत्ता चुण्डावत,रावत साहिब खान चौहान आदि इस सभा में मौजूद थे।मेड़ता के राव जयमल राठोड को किलेदार नियुक्त किया गया,राव बल्लू सोलंकी को मांडलगढ़ की किलेदारी सौंपी गई,कुँवर प्रताप को कुम्भलगढ़ की रक्षा का दाइत्व सौंपकर राणाजी उदयपुर में तैनात रहे।
उदयपुर की ओर रवाना होने से पहले,उदयसिंह ने चित्तोड़ के किले को भारी रसद सामग्री से भर दिया,तथा चित्तोड़ की रक्षा के लिए ८००० राजपूतो को दाइत्व सौंपा गया और बाकी सभी अपने अपने सेना नायको के साथ अन्यत्र ऊपर दिए गये स्थानों पर निकल गए।
चित्तोड़ में मौजूद सरदारों की सूची इस प्रकार है:-
१)राठोड राव जयमल सिंह मेडतिया
२)रावत पत्ता चुण्डावत केलवा
३)रावत नेतसी सारंगदेवोत
४)रावत साईंदास चुण्डावत सलुम्बर
५)इसरदास चौहान
६)साहिबखान चौहान
दूसरी ओर अकबर को उदयसिंह के चित्तोड़ से निकलने की खबर मिलते ही उसने हुसैन कुली खान को उदयसिंह के पीछे भेज दिया।लाख कोशिश के बावजूद उदयसिंह को पकड़ने में हुसैन कुली खान नाकाम रहा और हारकर लौट आया।उदयपुर होते हुए उदयसिंह कुम्भलगढ़ आ पहुंचे।
मांडलगढ़ में राव बल्लू सोलंकी के पीछे अकबर ने असफ खान और वजीर खान को भेजा था,वहाँ युद्ध में बल्लू सोलंकी अपने साथियों समेत काम आया और मांडलगढ़ अकबर ने फ़तेह कर लिया।
मंडलगढ़ से आसफ खान और वजीर खान रामपुर की ओर बढे और रामपुर फ़तेह कर चित्तोड़ लौट आये।
वही दूसरी ओर कुम्भलगढ़ में कई दिनों तक पड़ाव डालने के बाद उदयसिंह वहा से राजपिपला(गुजरात) की ओर निकल पड़े।वहाँ के गुहिल राजा ने उन्हें आश्रय दिया।और कुंवर प्रताप अरावली की पहाडियों में निकल गए जहा से उन्होंने आगे चलकर चावंड को अपनी अस्थायी राजधानी बनाई।
२० अक्तूबर १५६७ के दिन अकबर चित्तोड़ पहुँच चूका था।उस दिन चित्तोड़ में तूफानी बरसता रही।बरसात के रुकने पर अकबर ने वहा अपना पड़ाव डाला।उसने किले के मुआयने का काम कुछ आदमियों को सौंपकर बक्षियो को तोपखाने तैनात करने के आदेश दिए। किले के तीन बाजुओ पर तोपखाने तैनात किये गए।
लखौटा द्वार पर एक तोपखाना तैनात किया गया जो अकबर के सीधे निरिक्षण में था।इस तोपखाने का काम हसन खान चगताई,पत्तर दास,काजी अली बगदादी,इख्तियार खान फौजदार,कबीर खान को सौंपा गया।
दूसरा तोपखाने पर शुजात खान,टोडरमल,कासिम खान और तीसरे तोपखाने पर वजीर खान, असफ खान और कुछ अन्य सीपासलार तैनात किये गए।चित्तोडी पहाड़ी पर वजीर खान और असफ खान का तोपखाना तैनात था।मोहर मगरी पर दूसरा तोपखाना तैनात किया गया।
तीनो ओर से बमबारी शुरू होने पर किले की ओर से भी तीरों,बन्दूको,पत्थरो और तोपों से जवाब दिया गया।चित्तोड़ के किले में इससे पूर्व ही कालपी से पहुँच चुके इस्माइल खान और उसके १००० बंदूकचीयो ने प्रत्युत्तर दिया।कई दिनों तक सफलता न पाने पर अकबर ने बहादुरशाह की तरकीब के बारे में एक मुग़ल सैनिक से पूछा जो हुमायूँ के साथ गुजरात में रह चुका था। वहा से उसने सबात बनाने की तरकीब को जाना और भारी मुआवजा देकर लगबघ ५००० कारगिरो से दो सबाते बनाई गई।
जानवरों की खालो से ढँककर इन विशाल सबातो से कई आक्रमण के प्रयास किये गए फिर भी वह सफल नहीं हुए।
किले से होते आक्रमणों से बादशाही सेना के लगबघ २०० आदमी प्रति दिन मारे जाते थे।
अकबर के सभी प्रयास विफल होने के बाद उसने फुट डालने के लिए जयमल जी को अपना राज्य मेड़ता वापस देने का प्रलोभन देना चाहा,जिसपर वीरवर जयमल ने निम्न उत्तर भिजवाया
है गढ़ म्हारो म्है धणी,असुर फिर किम आण।
कुंच्यां जे चित्रकोट री दिधी मोहिं दीवाण।।
जयमल लिखे जवाब यूँ सुनिए अकबर शाह।
आण फिर गढ़ उपराँ,पड़ीयो धड बादशाह।।
अर्थात अकबर ने कहा जयमल मेडतिया तू क्यों अपने प्राण चित्तोड़ और महाराणा के लिए देना चाहता है?तू मेरा कब्ज़ा होने दे मै तुझे तेरा मूल प्रदेश मेड़ता वापस लौटा दूँगा।इसपर जयमल ने जवाब भिजवाया हे तुर्क!मेरे जीते जी तू यहाँ प्रवेश नहीं कर सकता मुझे महाराणा यहाँ की जिम्मेदारी सौंपकर सेनापति बना गए है।
काफी दिन बीत चुके थे,किले की रसद सामग्री ख़त्म होने को थी,यह देख सेनाध्यक्ष जयमल जी ने अकबर से संधि करने का विचार किया तथा सालाना कर देने का प्रलोभन देकर इसरदास चौहान और साहिबखान चौहान को दूत बनाकर अकबर के पास भेजा। अंतिम निर्णय दोनों चौहान सिरदारो पर रखा गया था।
जिसे सुन अकबर ने कहा के अगर राणा उदयसिंह खुद आकर मेरी ताबेदारी करे तो ही ये संधि होगी अन्यथा नहीं। इसपर दोनों चौहान वीर भड़ककर वापस लौट आये।
दूसरी ओर दो सुरंगे जो बनाई गई थी उनमे प्रत्येकी १२० मन और ८० मन बारूद भरा गया।कुल मिलाकर ये बारूद ७५०० किलोग्राम के लगबघ होता है।१७ दिसंबर १५६७ के दिन दोनों सुरंगों के बारूद से एक के बाद एक विस्फोट किये गए। पहले विस्फोट से किले की दिवार में दरार आ गई जिसे देखकर कई सारे मुग़ल सैनिक किले की ओर बढे और दुसरे विस्फोट के कारण वे मारे गए।इन विस्फोटो की आवाज ५ कोस के लगबघ सुनाई दि गई। बादशाही सेना के लगबघ २०० आदमी मारे गए। किले पर मौजूद ४० लोग इस विस्फोट की चपेट में आ गए।
बादशाही सेना के मरने वालो में से कुछ सिपाहसलार निम्न थे:-
सय्यद जमालुद्दीन,मिरक बहादुर,मुहमद सिलाह,यजदान कुली,हयात सुलतान,शाह अली इशक आका,मुहम्मद बिलक,जान बेग,यार बेग,शेर बेग येसावल और मीराक बहादुर के भाई।
उसी दिन दूसरी सुरंग जो चित्तोडी के सामने से गुजरती थी उसके विस्फोट में किले की सेना के ३० आदमी मारे गए। बादशाही सेना के कितने आदमी इस विस्फोट में मारे गए इस बारे में अबुलफजल ने कुछ लिखने से किनारा किया है।
एक दिन अकबर लखौटा द्वार के सामने वाले तोपखाने से जायजा ले रहा था,तभी उसके कान के करीब से एक गोली गुजरी जिसमे उसके साथ खड़े उसके एक सिपासलार की जान गई।किले से ये गोली ईस्माल खान पठान द्वारा चलाई गई थी,जिसके प्रत्युत्तर में अकबर ने अपनी बन्दुक निकाल कर इस्माईल खान पर निशाना साधकर गोली चलाई। इस हमले इस्माईल खान शाहेद हुए। इससे पुर्व इस्माईल खान की तोप से ही अकबर के तंबू पर हमला हुआ था जिसमें लगबघ ४० बादशाही सैनिक मारे गए थे।
उसी दिन खान आलम जो बादशाह के नजदीक खड़ा था पर एक गोली चली जो उसके अंगरखे के नीचे से गुजर गई और दुसरे दिन एक गोली मुज्ज्फर खान को लगी पर इस हमले में भी मुजफ्फर खान को ज्यादा चोट नहीं आई।
सबातो का पुनरुद्धार का काम टोडरमल और कासिम खान मीर की देख रेख में पूर्ण हुआ। सबात के उपरी भाग पर बादशाह के लिए आसन बनाया गया।इस आसन पर बैठे बैठे अकबर ने पुरे दो दिन और दो रात कारवाई पर नजर रखी और तोपखाने को आदेश देकर लखौटा द्वार पर बमबारी शुरू की,जिससे दरार बड़ी हो गई थी।
दूसरी ओर किले में राव जयमल जो उस रात नीले रंग का अंगरखा पहने हुएऔर हजार मीखी धारण किये हुए थे किले की दरार को भरवाने के कार्य का जायजा ले रहे थे। किले की दरार भरने के लिए मरे हुए मुग़ल सैनिको की लाशो,रुई,लकडिया आदी का इस्तेमाल कर आग जलाई जाती थी ताकि मुग़ल सैनिको को किले में प्रवेश करने से रोका जाए।
२१ फ़रवरी १५६८ की रात थी,अकबर की संग्राम नामक बन्दुक से राव जयमल राठोड को पैर में गोली लगी।जिसे देखकर किले में मौजूद सरदारों ने जौहर और शाका का निर्णय लिया।दुसरे दिन २२ फ़रवरी को प्रातः दुर्ग से आग की भीषण लपटे दिखाई देने लगी,जिसका कयास अकबर को राजा भगवानदास आमेर से लगा की ये जौहर की लपटे है। किले में तीन स्थानों पर जौहर की आग लगी थी।
सुबह तक घुसपैठ इतनी बढ़ गई थी के किले में जौहर कुंड में जौहर न होकर अलग अलग थानों पर जौहर किया गया।जिनमे से तीन मुख्य स्थान पत्ता की हवेली,इसरदास चौहान की हवेली और सहिबखान चौहान की हवेली थे।कई सतियो ने जलसमाधि लेकर अपने शील के रक्षण किये।
श्यामलदास वीर विनोद में लिखते है:-
” रावत पत्ता अपनी माँ सज्जन्बाई सोंनगरी और ठकुरानियो में से सामंतसी की बेटी जीवाबाई सोलंकिनी,सहसमल्ल की बेटी मदालसाबाई कच्छवाही ,इसरदास की बेटी भागवती बाई चहुवान,पद्मावती बाई झाली,रतनबाई राठोड,बालेसाबाई चहुवान,परमार डूंगरसी की बेटी बाग़डेची आसाबाई,वगैरह और दो बेटे व् पांच बेटियाँ आदि सबको आगमे जलाकर,तय्यार हो आया ”
पत्ता की ९ पत्नियाँ,५ बेटिया और ३ पुत्र थे। उसकी माता सज्जन बाई सोंगरी,स्नुषा जीवा बाई सोलंकी और एक बहन ने हाथो में भाला लेकर कवच कुण्डल धारण कर लिया। अतः वे लढ़ने के लिए तैयार हो आई।
दुर्ग के किवाड़ खोल दिए गए। राजपूतो के प्रहार से मुग़लो के पैर उखड़ने लगे। इसे देख अकबर ने हाथियों को किले की ओर बाढा दिया।
अबूल फजल लिखता है अकबर ने अपने दो जंगी हाथी मधुकर और जंगिया किले की ओर बढ़ा दिए थे।
बादशाह अकबर ने मुगल सेना को रणक्षेत्र से पीछे हटते देख राजपूतों पर मतवाले खूनी हाथियों को छोड़ दिया। अकबर ने अपने विशाल हाथियों की सूंड़ो में तलवारें की झालरें और दुधारे खांडे बंधवाई। मधुकर हाथी को सर्वप्रथम आगे बढ़ा कर पीछे जकिया, जगना, जंगिया, अलय, सबदलिया, कादरा आदि हाथी को बढ़ा दिया। इन हाथियों ने राजपूतों का घोर संहार करना आरम्भ कर दिया, लेकिन वीर क्षत्रिय राजपूतों कहा मानने वाले थे। वे भीषण गर्जना कर विशालकाय हाथियों पर खड्ग लेकर टूट पड़ते।
“बढ़त ईसर बाढ़िया बडंग तणे बरियांग
हाड़ न आवे हाथियां कारीगरां रे काम”

इस बीच कई राजपूतों ने मतवाले हाथियों से लड़ते – लड़ते वीरगति प्राप्त की। जिसमे से वीर ईश्वरदास ने असंख्य हाथियों का संहार कर मातृभूमि के चरणों में बलिदान दिया। इससे पहले इसरदास ने ‘मधुकर’ हाथी के महावत से हाथी का नाम पूछा और कहा के बादशाह को मेरा पैगाम देना और तलवार से हाथी की सुंड काट दी।गजब का जोश और अजब सी दीवानगी थी।
वही महापराक्रमी पत्ता सिसोदिया रामपोल पर एक हाथी ने उन्हें पकड़ कर जमीन पर जोर से पटक दिया। वही पत्ता सिसोदिया ने वीरगति प्राप्त की।
“सर्वदलन” नामक हाथी जो एक राजपूत सैनिक को सूंड में पकड़ उठा लिया यह देख सुर शिरोमणी कल्लाजी ने तलवार के एक भीषण प्रहार से उस विशालकाय हाथी की सूंड काट दी। हाथी वही धराशायी हो गया। वह राजपूत सैनिक भी उठ खड़ा हुआ।
इधर जयमल जी को पैर में गोली लगने के कारण उन्हें कल्ला जी ने अपने कंधो पर बैठाकर दोनों हाथो में तलवारे धारण कर शत्रु पर प्रहार शुरू कर दिया,घूसपैठ में सैनिको की संख्या बढती ही जा रही थी । मुगल सेना पुरे जोश के साथ राजपूतों का मुकाबला कर रही थी। इस भंयकर युद्ध में सैकडों घाव लगने पर राव जयमल का शरीर निश्चेष्ट हो गया। उनको भैरोंपोल के पास ही भूमि पर रख कर राठौड़ कल्ला पूरे वेग से शत्रुओं की और झपटा। तभी वीर कल्ला तलवारें चलाता हुआ युद्ध कर रहा था की एक मुगल ने पीछें से तलवार चला कर वीर कल्ला का सिर काट दिया। अब बिना सिर के कल्लाजी का कंबध (कमधज) घोर संग्राम करता हुआ दोनों हाथों से तलवार लिये मुगलों की फौज को चीरता जा रहा था।
आखिर कर जयमल जी और कल्ला जी दोनों ही वीरगति को प्राप्त हुए।
दूसरी ओर सूरजपोल पर रावत साहिदास चुण्डावत मुघल सैनिको के साथ हो रही मुठभेड़ में कई सैनिको को काटने के पश्चात वीरगति को प्राप्त हुए ।किले में वीरो लड़ते देख सामन्य नागरिको ने भी गोफन,भाले,तलवारे उठाकर लड़ना शुरू कर दिया,कुछ लोग समधिश्वर महादेव मंदिर के चौराहे पर युद्ध कर रहे थे,उन्हें देख बादशाह अकबर ने किले की दिवार पर खड़े होते हुए क़त्ल ए आम का फरमान जारी कर दिया।लगबघ ३०००० नागरिको की नृशंस हत्या कर दी गई। अगले तीन दिन तक बादशाह चित्तोड़ के किले पर मौजूद रहा,इस दौरान किले के किवाड़ तोड़े गए,मंदिर तथा अन्य स्थानों पर तोड़ फोड़ की गई।

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

गजानन गणपती वंदना

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गुणों ने गणोना पती, गणता गामो गाम।
गौरीपुत दिव्य गुणेशा, नित नरणा लइ नाम॥
               छंद – कवित
पारवती पूत शिव सूत हे अनेक नामी,
कर फरसी ज धारी ग्यानी गुण गात हे,
विघन वारण देव भगता को भार तारी
रंगे रिधसिध संगे मोदक मों खात हे,
बुद्धि बलमें प्रचंड पंड फांद अति भारी,
मूषक सवार एवो मोढ़े मलकात हे,
दिव्यराज वंदन हे उमा के नंदन को,
फंदन से तार वसुधा में विखयात हे,
– दिव्यराजसिंह सरवैया कृत