राखायत जी, व्याघ्रदेवजी. Rakhayat ji, Vyaghradevji

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बहु उठे गरजण, जेने गोकीरे गजब थयो,
हवे हैडा हाल ने रण, रण जोवा राखायतनु…
( रण मेदान मे युद्ध की भयंकर चींखे सुनाइ दे रही है, और जीसके प्रकोप से यह गात्र थीजा देने वाली अावाजे आ रही है वो राखायत के अलावा और कोइ हौ नही शकता, इस िलए लोककिव राखायत का युद्ध देखने को उत्सुक हो रहे है.)
तो बात कुछ यु थी की महाराजा राज सोलंकी और कच्छ के राजा जाम लाखा फुलाणी की बहन का विवाह बडे धूम धाम से हुआ,
राज सोलंकी लाखाजी के वहा ही रहने लगे, एक दिन दोनो चोपाट खेल रहे थे, किंतु खेल युद्ध में पिरवर्तीत हो गया, क्रोध मे आ के लाखाजी होश खो बेठे और बहनोइ का ही वध कर दिया, राज सोलंकी का शीष धड से अलग कर िदया, पर बहन के पित को मार के बहुत पछता रहे थे, अपनी बहन का बहुत ख्याल रखने लगे, भांजे को बडे लाड-प्यार से बडा करने लगे, मामा भांजे मे बडा लगाव था, किंतु भांजे राखायत को यह बात मालुम ना थी की उसके पिता का काितल उसका मामा है,

राखायत अब बडा हो गया था, युवान हो गया, एक ही मुिष्टका के प्रहार से हाथी कुम्भास्थल को तोड दे एसा बलवान वीर योद्धा तैयार हो गया था,

लेकिन एक िदन जब वह अपनी माता के कक्ष में गया तो देखा माता रो रही थी, दुनिया में एसा कोई बेटा नही हो सकता जो अपनी मां के आंख मे आंसु देख शके, मा से कारण पुछा,
मां ने कहा “बेटा राखायत, आज तुजे देख कर ही मुजे रोना आ रहा है, तु जिसकी गोद मे खेल के बडा हुआ वही तेरे पिता के कातिल है, आज मुजे इसी बात का रोना आ रहा की उनके बदले का क्या?, और बेटा, बदला केसे लेगा, अपने पेट मे उनका ही अनाज है, इस लिये बेटा, धर्म को ध्यान मे रखके तु वैर कर.

अब राखायत बदले की आग मे तडपने लगा था, क्योकी मां ने कहा था लाखाजी के बहोत उपकार भी थे, तो बदला लुं भी तो कैसे???
तभी उन्हे एक मार्ग दिखाइ दिया, अपने भाइ मुलराज सोलंकी ( राज सोलंकी की दुसरी पत्नी जो पाटण के सामंतिसंह चावडा की बहन थी उनका पुत्र ) को पत्र िलखा, ” हे भाइ, गादी तो आपने पा ली पर क्या िपताजी के खुन का बदला लेना आप भुल रहे है? पिताजी के खुनी मेरे मामाजी जाम लाखा ही है, ये पत्र पा के आप ये मत समजना की युद्धमे में आप का साथ दुंगा, में मेरे मामा ेसे विस्वासघात नही कर सकता, आप चडाइ लेकर आओ, लेकिन मेरा भी आपको सामना करना पडेगा”

और फिर घोर भयंकर सेना के साथ पाटणपति मुलराज सोलंकी ने चडाइ की आटकोट के िकल्ले पर घेरा लग गया, वही पर जुनागढ के रा’ ग्रहिरपु, जाम लाखा फुलाणी और राखायत जी के सामने मुलराज सोलंकी की फौज ने हमला बोल िदया, घमासाण युद्ध हुअा, पर आज राखायत जी के युद्ध को देख कर मुलराज के सैनीक थर थर कांपने लग रहे है, भगवान शंकर का गण वीरभद्र जेसे प्रजापित दक्श के हवन का जैसे नाश करता है वैसे राखायत जी आज मुलराज की फौज पर टुट पडे है, अदभूत पराक्रम और साहस का प्रदर्शन वे करा रहे थे,
तभी दोनो भाइ आमने सामने आ गये,
दोनो मे कडी टक्कर हुइ, राखायत ने पुरी ताकात से सांग का प्रहार िकया, िकंतु मुलराज स्फुिर्त से घा चुका िलया, और सांग पीछे के मोटे पेड के आर पार हो के नीकल गइ, पर मुलराज के भाले के अचुक िनशाने से राखायत विर गति को प्राप्त हुए, उस युद्ध मे लाखाजी की उम्र सो वर्ष से भी अधिक थी, फीर भी मुलराज के िलये उन्हे परािजत करना बहोत कठीन काम हो गया था.
उस युद्ध मे रा’ग्रहिरपु, लाखा फुलाणी और राखायत तीनो वीर गित को प्राप्त हुए…

राखायत के पुत्र हुये व्याघ्रदेवजी, जिन से उनके वंशज ‘वाघेला’ कहेलाए…

»»» VAGHELA’s Great Ancestors «««

Maharaja-dhiraj Raj Solanki
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Shri Rakhayat ji
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Maharana Vyaghradev ji (Mukhya-purush of Vaghela Vansh, after Him we are known as Vaghelas)
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Maharana Suratdevji Vaghela (King of Viratnagari)
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Maharana Dhvaldevji Vaghela (after him Viratnagar known as Dhavallak, later became Dholka)
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Maharana Arnorajdevji
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Maharana Lavanya-prasadji
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Maharana Virdhavaldevji (also known as Virdhaval Rano, he defeated Mhmd Ghori near Abu)
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Maharana Vishaldev ji ( 1st Vaghela King of Gujarat, after defeated Tribhuvan pal Solanki 2nd)
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Maharana Arjundev ji (king of Patan-Gujarat)
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Maharana Sarangdev ji (defeted yadavraj Ramchandra of devgiri and Malavraj Bhojdev (2nd) both )
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Maharana Karandev ji (Last Rajput king who ruled over whole Gujarat, unbending Hero, Fought with khilji’s huge army and Lost but did not bow down)
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Maharana Veersinh ji ( he came to his maternal uncle Rao deshalji of kutch and become king of Sardhar, 650 village )
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Maharana Dhavaldev ji (king of Sardhar)
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Maharana Vishaldev ji
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Maharana Nodhandev ji
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Maharana Vijaypal ji
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Maharana Sursinh ji
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Maharana Ajabsinh ji
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Maharana Devkaran ji
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Maharana Pratapsinh ji
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Maharana Mandaldev ji
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Maharana Dhamankar ji (He gave throne of Sardhar to his younger brother and became King of Kalol)
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Maharana Jeetsinh ji ( He was younger son, came to Sanand and became king of Sanand & Koth)
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Maharana Gopalsinh ji (King of Sanand & Koth)
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Maharana Naysinh ji
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Maharana Nondhandev ji
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Maharana Varah ji
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Maharana Bhimsinh ji
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Maharana Dudhmal ji
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Maharana Virdhaval ji
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Maharana Sarangdev ji
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Maharana Maldeo ji
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Maharana Jaysinh ji
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Maharana Annraa ji
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Maharana Sarandev ji
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Maharana Bhimsinh ji
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Melo ji Vaghela (He was killed by his elder brother Karandevji Vaghela, King of Sanand & koth. After that shri Sanghji Vaghela of Kavitha killed Karandevji and whole state of sanand & koth was devided into two parts between Son of Karandev ji and Melo ji. Melo ji’s sons got Gangad state)
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Thakur saheb shri Pruthvirajsinh ji (king of gangad)

and Sons of karandev ji came on the throne of Sanand.

Source from: Divyrajsinh Sarvaiya & Satyapalsinh Vaghela

Jay Vagheshwari Ma,
Jay Mataji

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

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