सोही हिंद की राजपुतानीया थी, Sohi Hind ki Rajputaniya thi

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रंगमहेल में बानीयां बहोत रहे,
एक बोल सुने नहीं बानीयां का;
दरबार में गुनीका नाच नचे,
नहिं तान देखे गुनकानीया का;
नरनार प्रजा मिली पाव नमे,
नहिं पाव पोसराय ठानीया का;
जग जिनका जीवन पाठ पठे,
सोई जीवन राजपुतानीया का………. 1
व्याभिचार करे दरबार कदी,
घर बहार करी धमकावती थी;
फिटकार सुनावती जींदगी में,
फिर नाथ कही ना बुलावती थी;
पति झारको आप रीझावती ना,
जगतारक राम रीझावती थी;
ऐसा पावन जीवन था जिनका,
सोई हिंद की राजपुतानीया थी………….2
अरी फोज चडे रणहाक पडे,
राजपूत चडे राजधानीया का;
तलवार वडे सन्मुख लडे,
के ते शीश दळेय जुवानीया का;
रण पुत मरे, मुख गान करे,
पय थान भरे अभिमांनीया का;
बेटा युद्ध तजे, सुनी प्राण तजे,
सोई जीवन राजपुतानीया का………….3
रण तात मरे सुत भ्रात मरे,
निज नाथ मरे, नहिं रोवती थी;
सब घायल फोज को एक करी,
तरवार धरी रण झुझती थी;
समशेर झडी शिर झीलती थी,
अरी फोज का पाव हटावती थी;
कवि वृंद को गीत गवावती थी,
सोई हिंद की राजपुतानीया थी……………4
निज पुत सोते बाल पालने में,
रघुनाथ के गायन गावती थी;
कही ज्ञान गीता समजावती थी,
भय मोत का साव भुलावती थी;
तलवार धरी कर झुझने का,
रण दाव का पाठ पठावती थी;
घर अंबिका थी, रण कालिका थी,
सोई हिंद की राजपुतानीया थी……………5
अभियागत द्वार पे देखती वे,
निज पुत समान जीमावती थी;
सन्मान करी फिर दान करी,
चित लोभ का लंचन मानती थी;
अपमांती थी मनमोह बडा,
सोई हिंद की राजपुतानीया थी……………6
नृप ताज में जीनकी लाज बडी,
राज-काज में ध्यान लगावती थी;
प्रजा सुख रहे, नव भुख रहे,
ऐसा बोल सदा फरमावती थी;
सब रैयत की फरियाद सुनी,
फरियाद की दाद दीलावती थी;
निज रीत के गीत गुंजावती थी,
सोई हिंद की राजपुतानीया थी……………7
रण काज बळे राजपुत चडे,
और द्वार खडे मन सोचती थी;
मेरा मोह बडा इसी काज खडा,
फिर शिश दडा जिमी काटती थी;
मन शेश लटा सम केश पटा,
पति देवको हार पेहनावती थी;
जमदुतनी थी, अबधुतनी थी,
सोई हिंद की राजपुतानीया थी……………….8
पति देव के तात को मात को तो,
निज मात-पिता मम मानती थी;
छोटे भ्रात के हित की मात समी,
पितरायो को पंख में रखती थी;
दासी दास पे मात का रोफ राखे,
उसे घात की बात न दाखती थी;
नहिं भोगनी थी, जगजोगनी थी,
सोई हिंद की राजपुतानीया थी………………9
आज वीर की, धीर की खोट पडी,
पडी खोट उदारान दानीया की;
प्रजापाल दयाल की खोट पडी,
पडी खोट दीसे मतिवानिया की;
गीता ज्ञान की, ध्यान की खोट पडी,
पडी खोट महा राजधानीया की;
सब खोट का क़ारण “क़ाग” कहे, पडी खोट वे
“राजपुतानीया की”……………10
-“भगतबापु” दुला भाया काग

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

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