Daily Archives: July 26, 2015

क्षत्रिय वीर पाबूजी राठौड़

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पुकार जद, धाडी धन ले जाय |
आधा फेरा इण धरा , आधा सुरगां खाय ||
उस वीर ने फेरे लेते हुए ही सुना कि दस्यु एक अबला का पशुधन बलात हरण कर ले जा रहे है | यह सुनते ही वह आधे फेरों के बीच ही उठ खड़ा हुआ और तथा पशुधन की रक्षा करते हुए वीर-गति को प्राप्त हुआ | यों उस वीर ने आधे फेरे यहाँ व शेष स्वर्ग में पूरे किये |

सन्दर्भ कथा –
पाबूजी राठौड़चारण जाति की एक वृद्ध औरत से ‘केसर कालवी’ नामक घोड़ी इस शर्त पर ले आये थे कि जब भी उस वृद्धा पर संकट आएगा वे सब कुछ छोड़कर उसकी रक्षा करने के लिए आयेंगे | चारणी ने पाबूजी को बताया कि जब भी मुझपर व मेरे पशुधन पर संकट आएगा तभी यह घोड़ी हिन् हिनाएगी | इसके हिन् हिनाते ही आप मेरे ऊपर संकट समझकर मेरी रक्षा के लिए आ जाना |
चारणी को उसकी रक्षा का वचन देने के बाद एक दिन पाबूजी अमरकोट के सोढा राणा सूरजमल के यहाँ ठहरे हुए थे | सोढ़ी राजकुमारी ने जब उस बांके वीर पाबूजी को देखा तो उसके मन में उनसे शादी करने की इच्छा उत्पन्न हुई तथा अपनी सहेलियों के माध्यम से उसने यह प्रस्ताव अपनी माँ के समक्ष रखा | पाबूजी के समक्ष जब यह प्रस्ताव रखा गया तो उन्होंने राजकुमारी को जबाब भेजा कि ‘मेरा सिर तो बिका हुआ है ,विधवा बनना है तो विवाह करना | ‘
लेकिन उस वीर ललना का प्रत्युतर था ‘जिसके शरीर पर रहने वाला सिर उसका खुद का नहीं ,वह अमर है | उसकी पत्नी को विधवा नहीं बनना पड़ता | विधवा तो उसको बनना पड़ता है जो पति का साथ छोड़ देती है |’ और शादी तय हो गई | किन्तु जिस समय पाबूजी ने तीसरा फेरा लिया ,ठीक उसी समय केसर कालवी घोड़ी हिन् हिना उठी | चारणी पर संकट आ गया था | चारणी ने जींदराव खिंची को केसर कालवी घोड़ी देने से मना कर दिया था ,इसी नाराजगी के कारण आज मौका देखकर उसने चारणी की गायों को घेर लिया था |
संकट के संकेत (घोड़ी की हिन्-हिनाहट)को सुनते ही वीर पाबूजी विवाह के फेरों को बीच में ही छोड़कर गठ्जोड़े को काट कर चारणी को दिए वचन की रक्षा के लिए चारणी के संकट को दूर-दूर करने चल पड़े | ब्राह्मण कहता ही रह गया कि अभी तीन ही फेरे हुए चौथा बाकी है ,पर कर्तव्य मार्ग के उस बटोही को तो केवल कर्तव्य की पुकार सुनाई दे रही थी | जिसे सुनकर वह चल दिया; सुहागरात की इंद्र धनुषीय शय्या के लोभ को ठोकर मार कर,रंगारंग के मादक अवसर पर निमंत्रण भरे इशारों की उपेक्षा कर,कंकंण डोरों को बिना खोले ही |
और वह चला गया -क्रोधित नारद की वीणा के तार की तरह झनझनाता हुआ,भागीरथ के हठ की तरह बल खाता हुआ,उत्तेजित भीष्म की प्रतिज्ञा के समान कठोर होकर केसर कालवी घोड़ी पर सवार होकर वह जिंदराव खिंची से जा भिड़ा,गायें छुडवाकर अपने वचन का पालन किया किन्तु वीर-गति को प्राप्त हुआ |
इधर सोढ़ी राजकुमारी भी हाथ में नारियल लेकर अपने स्वर्गस्थ पति के साथ शेष फेरे पूरे करने के लिए अग्नि स्नान करके स्वर्ग पलायन कर गई |
इण ओसर परणी नहीं , अजको जुंझ्यो आय |
सखी सजावो साज सह, सुरगां परणू जाय ||
शत्रु जूझने के लिए चढ़ आया | अत: इस अवसर तो विवाह सम्पूर्ण नहीं हो सका | हे सखी ! तुम सती होने का सब साज सजाओ ताकि मैं स्वर्ग में जाकर अपने पति का वरण कर लूँ |
– स्व. आयुवानसिंहजी

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

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दूहा/दोहा/दोहरा

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॥मीठप वाळा मानवी
      जग छोडी जाशे
कागा ऐनी काण
      घर घर मंडाशे॥

॥घर आव्या घण पोखीया
          मीटु मळीयु ना
(ऐवा)मानव मारीश मा
        थोडी वयना ठाकरा॥

॥भवलग भुलाशे नहि
    सुता मर समसाण
कागा कायम काण
     मीठा मानवीओ तणी॥

॥मनमेला मानव तणा
    मुडदा बळे मसाण
कागा करशे कोण काण
      मोडा मोडा मानव॥

॥आणात वळ्या उतावळा
        केडे माफा होय
तेदी ज तुटी होय
    साधी दे जे  शामळा॥

॥माडव पगडा मेलिया
    चोरी चडेआ ना
(ऐवा)मानव मारीश ना
    थोडाक दिवश ठाकरा॥

॥मा मरी मडदू पडयू
    छोरु उर चडे
(ऐने)धावण धाववा दे
     थोडीक धणी ठाकरा॥

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

भरोसो मुंही ऐक अंबा ! तिहारो.. कवि दुला भाया काग

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दोहो

शांतिकरण जगभरण तुं, घडण घणा भवघाट;
नमो आध नारायणी , विश्र्वरूप           वैराट

                 (छंद-भुजंगी)

नमो ब्रह्मशक्ति  महाविश्र्वमाया,
            नमो धारनी कोटि ब्रह्मांड काया ;

नमो वेद वेदांत मे शेष बरनी,
                नमो राज का रंक पे छत्र धरनी;

नमो पौनरूपी महा प्राणदाता,
               नमो जगतभक्षी प्रले जीव घाता;

नमो दामनी तार तोरा रूपाळा,
                नमो गाजती कालिका मेघमाळा;

रमे रास तुं व्योम बाळा हुलासी,
                पूरे साथिया के’क रंगे प्रकाशी;

लहे ताल ब्रह्मांड ऐकी अवाजे,
                  तुंहारां अनोठांह वाजिंत्र वाजे;

निशा शामळी कामळी ओढ काळी,
                 तुंही काळरात्री ननामी कराळी;

तुंही तारले ज्योत झीणी जबूके,
                 फरे आभ का पंथ फेरा न चूके;

प्रभा भानुमें मात तोरी प्रकाशे,
                लखी उग्रता ओघ अंधार नाशे;

तुंही चंद्रिका रूप व्योमे हसंती,
                धरी ओढणी श्र्वेत आभें लसंती;

दिशा-काल के भेद तोरा न दिसे,
                   नमो सेव्यनी ब्रह्म रुद्रं हरिसे;

तुंही आभ औकाश केता निपावे,
         मथे मानवी थाह तोरा न पावे.

तुंही सायरां नीर गंभीर गाजे,
               भीडे आंकडा वांकडा नाट साजे;

धके हालता लोढ लेता हिलोळा,
               करंती जळां बोण अंगे किलोळा,,.,.७

तुही वादळां पा’ड माथे पछाडे,
                सरिता बनी घूघवे घोर त्राडे;

अषाढे सु नीलंबरं अंग ओढी,
             तुही जाणिये पाणिये सेज पोढी,.,.,.८

हिमंते  अनोधा हिमाळा हलावे;
               तुही पौनमां शीतल गीत  गावे;

वंसंते तुही मात हेते हुलासी,
            लता झाडमां फुल फुले प्रकाशी.,.,.९

                       भडी दानवा साथ बुढ्ढी भुजाळी;
           अखाडे अरि आमळा दीध ताळी;

पवाडे टला केतरी वार लीधा,
            रणे दोखियांरें सरे रेश दीधा.,.,.१०

तहीं वार काळी धरी हाथ कातां,
         रांग्यां राखसां लोई बंबोळ रातां;

भवानी असां भारथां के’क कीधां
           पछाडी घणां दानवां रेर पीधां.,.,.११

तुंही लोह खांडां धरी वीश हाथे,
           मंडी केध वाघेश्र्वरी दैत माथे;

वडा पं’ड शा आवता राह आडा,
        धकी वेढके त्रोडियां कांध जाडां.,.,१२

पछाड्यो जळां सोवळां दैत धाती,
         धरा दीध राखी रसाताळ जाती;

कहे सेवकां पाहि तोहि सराही,
        नमो विश्र्वग्राही अग्राही वराही,.,१३

तुंही टेर प्रेलादरी सुण ध्रोडी;
          तंमंकी बणी सिंहणी थंभ त्रोडी;

हणी दीध तें रामरो दैत द्रोही,
         नमो नारसिंघी असुरां, विमोही.,.,१४

फतेकार नेता तिहारा फरुके,
          जपे सुर माळा तुही पाव झुके;

तुही हेक चंडी महा मान खंडी,
          विखंडी दळां दानवां लोक मंडी,.,.,१५

तुही श्र्वास-उसासरी हाथ दोरी,
          कळा कोण जाणे तिहारी अघोरी;

सुणी सादने अंबिका धाय वारे,
       करो सेवकां जा’ज माता किनारे,.,.,१६

तुही कारणी मारणी मोह माया,
          तुही तारणी जे शेरे कीध दाया;

तुही जग्त निभावणी विश्र्वकाया,
       नमो राजराजेश्र्वरी योगमाया,.,.१७

भरी पूर्ण ब्रह्मांडमां पूर्ण पासे,
          अणु बीजमां तुं अनेरी प्रकाशे

तुंही जोगणी भोगणी जीव जाया,
       नमो सात द्वीपेश्र्वरी वज्र काया,.,.,१८

तुंही ब्रह्मविध्या अविध्या परेषी,
         तुंही तुल्या द्रष्टी तुही उग्र द्रेषी;

परा पश्यती मध्यमा वैखवानी
        न जानी गति जाय गंभीर ज्ञानी.,.,१९

खनु एक तुं के’क ब्रह्मांड थापे;
          खनुं ऐकमें के’क लोका   अथापे;

तुही तुं तुही तुं तुही तुं ज जानी,
        मति है यथा मोरी ऐती बखानी,.,.२०

ं नमो मात कागेश्र्वरी भद्रकाळी,
         कळा सोळ धारी रूपाळी कृपाळी,

दया दीठ से दास अंगे निहारो,
       भरोसो मुंही ऐक अंबा ! तिहारो.,.,२१

रचना   –    कवि  दुला भाया काग

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आई नागबाई ने वंदन

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.          || वेंण पाछां वाळजे ||

हे मां नागबाई..ते चारणो नी आखी नात ने श्रापी मां..पण बधा चारणो दोषीत नथी..माटे मारा ऐक सवाल नो पेहला जवाब दे मां..हुं दीकरो तारा वेंण नो विरोध नथी करतो पण दोष नो टोपलो आखा समाज माथे न नखाय…तारा वेंण पाछां वाळ..अथवा जवाब दे मां…

.                छंद : सारसी
.     रचना : जोगीदान गढवी (चडीया)

माता गणी तो पण मलकना सारणो सीद सापीया ?
नीरदोष ने दोषी गणीं तें केम सत क्रम कापीया ?
भुली तूं माता रीत तो भण गण तमारो क्यां गीयो ?
नागई तमांणीं नांभीये कां नफट़ नागा जण थीयो ? ||01||

रटतो हतो जे राजदे रघू वीर दीवस रातने.
जेनी जुबाने गंग झळके नड्यो लांगा नातने.
काळांय काळज करम हींणो पुरण कपटी पापीयो
नागई तमांणीं नांभीये कां नफट़ नागा जण थीयो ? ||02||

अंतर धरी अभीमांन जुठुं भूप भोळा ने भठ्यो.
चारण तणीं ई रीत्त चुकी हेठ्य कां मुरख हठ्यो.
खुट्टल थीयो अन खाईने ने दाव दुशमन ने दीयो.
नागई तमांणीं नांभीये कां नफट़ नागा जण थीयो ? ||03||

नाखेल आखी नात्य माथे वेंण पाछां वाळजे.
चारेय जुगमां चारणो नुं जीवन उजळुं जाळजे.
वेठी घणीं जे वेदना ई  दैत जगने तें दीयो.
नागई तमांणीं नांभीये कां नफट़ नागा जण थीयो ? ||04||

मुळीयां उखेड्या मांडळीकना देव तुं डाकण ठरी.
पडीयो तमांणे पेट पेला मुवो कां नव ग्यो मरी.
जांणेय जोगीदान ने अब जगत आखी जांणीयो.
नागई तमांणीं नांभीये कां नफट़ नागा जण थीयो ? ||05||
🌹🙏    आई नागबाई ने वंदन🌹🙏

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तमे रे तारो तो अमे तरिये..

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गुरु तारो पार न पायो… न पायो…
पृथ्वी ना मालिक,  तमे रे तारो तो अमे तरिये…

गौरी ना पुत्र गणेश ने बेसाडो,
समरुं हूँ शारदा माँ…
वारी वारी जाउ…
पृथ्वी ना मालिक, तमे रे तारो तो अमे तरिये…

जळहळ ज्योतुं देवा तारी जळहळे,
दर्शन कोइ हरि भग्तां ने पायो,
वारी वारी जाउ…
पृथ्वी ना मालिक,  तमे रे तारो तो अमे तरिये…

जमीन ने आकाश हरि नी मोरली ना ठेराव्या,
थंभ विना आभले ठेराव्यो,
वारी वारी जाउ…
पृथ्वी ना मालिक, तमे रे तारो तो अमे तरिये…

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कारगिल युद्ध के शहीदों को नमन

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कारगील विजय दिवस ( 26 जुलाई) के इस अवसर पर भारतीय शहीदों (सैनिक) को सो-सो सलाम

“कारगिल विजय करने हेतु चलाये गए “ऑपरेशन विजय ” में 527 जवान शहीद हुए और 1300 से अधिक घायल हुए वीरगति को प्राप्त हुए 527 जवानो में से अधिकतर अपने जीवन के 30 वसन्त भी नही देख पाये थे अर्थात अधिकतर 30 वर्ष की आयु से भी कम थे ….
जीवन पुष्प 🌹चढ़ा चरणों में मांगे मातृभूमि से यह वर …तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहे

🚩🇮🇳कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई 1999

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