Padmshri Dula Bhaya Kag

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(झुलणा छंद)

लेख कागळ लख्या तात प्रहलादने,
काळने जीतवा कलम टांकी;
वर्षनां वर्ष विचार करीने लख्युं,
मागतां नव रह्युं कांई बाकी;
देव सौ पाळता सही विरंचि तणी,
देवनो देव ए जगत थापे;
रद बन्या कागळो एक एवी गति,
फेंसलो नाथ नरसिंह आपे.

देव-दानव मळ्या साथ अचरजघणी,
कर्म जोगे करी संप कीधो;
संप करी कोईनुं मूळ नव खोदवुं,
एमणे जलधिनो ताग लीधो;
चौद रत्नो मळ्यां, गर्व गगने अड्यो,
विज्यनो महद् त्यां थंभ खोड्यो;
पंदरमो फेंसलो विष हळाहळभर्यो,
देव ने दैत्यनो दर्प तोड्यो.

मुज थकी कोई मोटुं नथी जगतमां,
लेख एवो ज एणे लखाव्यो;
लेख लीधा पछी नरम रे’तो सदा,
लेखने फाडवा कोई ना’व्यो;
‘ ‘ सर्वने हुं गळुं, सर्वने हुं गळुं, ‘ ‘
जलधिने ए अहंकार आव्यो;
उदरमां उतार्यो कुंभभव मुनिए,
गेबनो फेंसलो त्यां वंचाव्यो.

सर्व स्थळ पामता विजय रण क्षत्रियो,
मार्ग भूली दशो दिश दोडया;
भागवुं नहि कदि वीरने भारथे,
लेख एवा ललाटे ज चोड्या;
कुतूहल नीरखतां हसी कुदरत कळा,
जगतमां एक  ऋषिराज आव्यो;
जामदग्निए कुठारनी धारथी,
फेंसलो भागवानो सुणाव्यो.

विप्रना घोर परतापथी धडकती,
सुणतां नामने भोम सारी;
कंध कुठार वळी जीतना केफ़मां,
भूलियो ब्रह्मवर भान भारी;
सीत संतापहर जगत त्रय तापहर,
जनकपुरमां रघुनाथ आव्यो;
क्षत्रि हणनारने क्षत्रिवर राघवे,
फेंसलो वन जवानो वंचाव्यो.

लेख ब्रह्मा लखे पूछी पूछी अने,
हुकम लीधा पछी वायु वाता;
मेघजळ वर्षतां जेनी आञा थकी,
नव ग्रहो ऊंच ने नीच थाता;
बाणनी कलम करी शाही शोणित तणी,
पत्र रणभोमनो घोर कीधो;
दैत्य दशशीशनां शीशनो राघवे,
फेंसलो जगत सन्मुख दीधो.

कंस, शिशुपाळ, कौरव अने यादवो,
भीष्म ने द्नोण जमराज जेवा;
सर्वनो फेंसलो एकसाथे घडयो,
कलममां कृष्णजी कुशळ केवा !
हिमगिरि भींत पर जे लख्यो फेंसलो,
वन जतां पांडवे शिर धार्यो,
प्राचीने पीपळे भीलना बाणनो;
फेंसलो जगतनाथे स्वीकार्यो.

रात दी मुसदा घडे छे मानवी,
आपनी आंखथी जगत मापे;
केस छे लाभमां एम मान्या करे,
वकील पण ए ज सलाह आपे;
चतुर न्यायाधीश ज्यां कागळो वांचतो,
हाथनुं जे लख्युं थाय वेरी;
अकळ‍ना कोयडा केम करी ऊकले,
ईशनी कोरटुं छे अनेरी.

कैंक विधार्थी ने कैंक पंड्या बन्या,
जगत आ एक निशाळ मोटी,
कुशळ थई कैंक भणतर भण्यो मानवी;
जळ पवननी ज काढे कसोटी;
व्योम ऊडे अने जाय भूगर्भम‍ं .
काढता हरिनी कैंक खामी;
कुदरती कोरटे ज्यां चड्यो मानवी,
(त्यां) भणेली सर्व विधा नकामी.

जेह न्यायाधीश बन्या ए ज केदी बने,
केदीओ तेहने दंड आपे;
जे लखे फेंसला ते सुणे फेंसला,
काळनो कायदो कोण मापे ?
कोई वांचे नहि , कोई पहोंचे नहि,
केम एनी गति जाय जाणी ?
‘ काग ‘ हसतां अने कैंक रोतां हतां,
फेंसलो मानतां सर्व प्राणी.

कवि काग बापु।

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

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