Daily Archives: July 30, 2015

हाडी रानी – इतिहास का बड़ा बलिदान Hadi Rani

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इतिहास का सबसे बड़ा बलिदान

हमारे देश में कुछ महिलाओं ने यदि रणभूमि में कमान संभाली हैं तो कई ऐसी भी हैं, जिन्होंने घर पर रहकर ही अपनी शक्ति और हिम्मत का अनोखा परिचय दुनिया को दे दिया है। उन्हीं में से एक राजस्थान के इतिहास की वह घटना है, जब एक रानी ने विवाह के सिर्फ 7 दिन बाद ही अपना शीश अपने हाथों से काटकर युद्ध के लिए तैयार अपने पति की भिजवा दी, ताकि उनका पति अपनी नई नवेली पत्नी की खूबसूरती में उलझकर अपना कर्तव्य भूल न जाए। कहते हैं एक पत्नी द्वारा अपने पति को उसका फर्ज याद दिलाने के लिए किया गया इतिहास में सबसे बड़ा बलिदान है।यह रानी कोई और नहीं, बल्कि बूंदी के हाड़ा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़)के सलुम्बर ठिकाने के रावत चूड़ावत की रानी थी। इतिहास में यह हाड़ी रानी की नाम से प्रसिद्ध है।

हाड़ी रानी का सरदार चूड़ावत से विवाह –
अभी रानी के हाथों की मेंहदी भी नहीं छूटी थी । सुबह का वक्त था। रानी सज-धजकर राजा को जगाने आई। उनकी आखों में नींद की खुमारी साफ झलक रही थी। रानी ने हंसी ठिठोली से उन्हें जगाना चाहा। इसी बीच दरबान वहां आकर खड़ा हो गया। राजा का ध्यानन जाने पर रानी ने कहा, महाराणा का दूत काफी देर से खड़ा है। वह ठाकुर से तुरंत मिलना चाहते हैं। आपके लिए कोई आवश्यक पत्र लाया है उसे अभी देना जरूरी है। असमय दूत के आगमन पर ठाकुर हक्का बक्का रह गए। वह सोचने लगे कि अवश्य कोई विशेष बात होगी। राणा को पता है कि वह अभी ही ब्याह कर के लौटे हैं। आपात की घड़ी ही हो सकती है। सहसा बैठक में बैठे राणा केदूत पर ठाकुर की निगाह जा पड़ी। औपचारिकता के बाद ठाकुर ने दूत से कहा, अरे शार्दूल तू। इतनी सुबह कैसे? क्या भाभी ने घर से खदेड़ दिया है? सारा मजा फिर किरकिरा कर दिया। सरदार ने फिर दूत से कहा, तेरी नई भाभी अवश्य तुम पर नाराज होकर अंदर गई होगी। नई नई है न। इसलिए बेचारी कुछ नहीं बोली। शार्दूल खुद भी बड़ा हंसोड़ था। वह हंसी मजाक के बिना एक क्षण को भी नहीं रह सकता था, लेकिन वह बड़ा गंभीर था। दोस्त हंसी छोड़ो। सचमुच बड़ी संकट की घड़ी आ गई है। मुझे भी तुरंत वापस लौटना है।यह कहकर सहसा वह चुप हो गया। अपने इस मित्र के विवाह में बाराती बनकर गया था। उसके चेहरे पर छाई गंभीरता की रेखाओं को देखकर हाड़ा सरदार का मन आशंकित हो उठा। सचमुच कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई है! दूत संकोच रहा था कि इस समय राणा की चिट्ठी वह मित्रको दे या नहीं। हाड़ी सरदार को तुरंत युद्ध के लिए प्रस्थान करने का निर्देश लेकर वह लाया था। उसे मित्र के शब्द स्मरण हो रहे थे। हाड़ी के पैरों के नाखूनों में लगे महावर की लाली के निशान अभी भी वैसे के वैसे ही उभरे हुए थे। नव विवाहित हाड़ी रानी के हाथों की मेंहदी भी तो अभी सूखी न होगी। पति पत्नी ने एक-दूसरे को ठीक से देखा पहचाना नहीं होगा। कितना दुखदायी होगा उनका बिछोह! यह स्मरण करते ही वह सिहर उठा। पता नहीं युद्ध में क्या हो? वैसे तो राजपूत मृत्यु को खिलौना ही समझता है। अंत में जी कड़ा कर के उसने हाड़ी सरदार के हाथों में राणा राजसिंह का पत्र थमा दिया। राणा का उसके लिए संदेश था। क्या लिखा था पत्र में :वीरवर। अविलंब अपनी सैन्य टुकड़ी को लेकर औरंगजेब की सेना को रोको। मुसलमान सेना उसकी सहायता को आगे बढ़ रही है। इस समय औरंगजेब को मैं घेरे हुए हूं। उसकी सहायता को बढ़ रही फौज को कुछ समय के लिए उलझाकर रखना है, ताकि वह शीघ्र ही आगे न बढ़ सके तब तक मैं पूरा काम निपटा लेता हूं। तुम इस कार्य को बड़ी कुशलता से कर सकते हो। यद्यपि यह बड़ा खतरनाक है। जान की बाजी भी लगानी पड़ सकती है। मुझे तुमपर भरोसा है। हाड़ी सरदार के लिए यह परीक्षा की घड़ी थी। एक ओर मुगलों की विपुल सेना और उसकी सैनिक टुकड़ी अति अल्प है। राणा राजसिंह ने मेवाड़ के छीने हुए क्षेत्रों को मुगलों के चंगुल से मुक्त करा लिया था। औरंगजेब के पिता शाहजहां ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। वह चुप होकर बैठ गया था। अब शासन की बागडोर औरंगजेब के हाथों में आई थी। इसी बीच एक बात और हो गई थी जिसने राजसिंह और औरंगजेब को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया था। यह संपूर्ण हिन्दू जाति का अपमान था। इस्लाम को कुबूल करो या हिन्दू बने रहने का दंड भरो। यही कहकर हिन्दुओं पर उसने जजिया कर लगाया था। राणा राजसिंह ने इसका विरोध किया था। उनका मन भी इसे सहन नहीं कर रहा था। इसका परिणाम यह हुआ कई अन्य हिन्दू राजाओं ने उसे अपने यहां लागू करने में आनाकानी की। उनका साहस बढ़ गया था। गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंकने की अग्नि जो मंद पड़ गई थी फिर से प्रज्ज्वलित हो गई थी। दक्षिण में शिवाजी, बुंदेलखंड में छत्रसाल, पंजाब में गुरु गोविंद सिंह, मारवाड़ में राठौड़ वीर दुर्गादास मुगल सल्तनत के विरुद्ध उठ खड़े हुए थे। यहां तक कि आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह और मारवाड़ के जसवंत सिंह जो मुगल सल्तनत के दो प्रमुख स्तंभ थे। उनमें भी स्वतंत्रता प्रेमियों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हो गई थी। मुगल बादशाह ने एक बड़ी सेना लेकर मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया था। राणा राजसिंह ने सेना के तीन भाग किए थे। मुगल सेना के अरावली में न घुसने देने का दायित्व अपने बेटे जयसिंह को सौपा था। अजमेर की ओर से बादशाह को मिलने वाली सहायता को रोकने का काम दूसरे बेटे भीम सिंह का था। वे स्वयं अकबर और दुर्गादास राठौड़ के साथ औरंगजेब की सेना पर टूट पड़े थे। सभी मोर्चों पर उन्हें विजय प्राप्त हुई थी। बादशाह औरंगजेब की बड़ी प्रियबेगम बंदी बना ली गईं थी। बड़ी कठिनाई से किसी प्रकार औरंगजेब प्राण बचाकर निकल सका था । मेवाड़ के महाराणा की यह जीत ऐसी थी कि उनके जीवन काल में फिर कभी औरंगजेब उनके विरुद्ध सिर न उठा सका था। अब उन्होंने मुगल सेना के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करन के लिए हाड़ी सरदार को पत्र लिखा था। वही संदेश लेकर शार्दूल सिंह मित्र के पास पहुंचा था। एक क्षण का भी विलंब न करते हुए हाड़ा सरदार ने अपने सैनिकों को कूच करने का आदेश दे दिया था। अब वह पत्नी से अंतिम विदाई लेने के लिए उसके पास पहुंचा था। केसरिया बाना पहने युद्ध वेष में सजे पति को देखकर हाड़ी रानी चौंक पड़ीं। उसने पूछा, कहां चले स्वामी? इतनी जल्दी। अभी तो आप कह रहे थे कि चार छह महीनों के लिए युद्ध से फुरसत मिली है, आराम से कटेगी। लेकिन, यह क्या? आश्चर्य मिश्रित शब्दों में हाड़ी रानी पति से बोली। प्रिय, पति के शौर्य और पराक्रम को परखने के लिए लिए ही तो क्षत्राणियां इसी दिन की प्रतीक्षा करती हैं। वह शुभ घड़ी अभी ही आ गई। देश के शत्रुओं से दो-दो हाथ होने का अवसर मिला है। मुझे यहां से अविलंब निकलना है। हंसते-हंसते विदा दो। पता नहीं फिर कभी भेंट हो या नहो, हाड़ी सरदार ने मुस्करा कर पत्नी से कहा। हाड़ी सरदार कामन आशंकित था। सचमुच ही यदि न लौटा तो। मेरी इस अर्धांगिनी का क्या होगा? एक ओर कर्तव्य और दूसरी ओर था पत्नी का मोह। इसी अन्तर्द्वंद में उसका मन फंसा था। उसने पत्नी को राणा राजसिंह के पत्र के संबंध में पूरी बात विस्तार से बतादी थी। विदाई मांगते समय पति का गला भर आया है यह हाड़ी राना की तेज आंखों से छिपा न रह सका। यद्यपि हाड़ा सरदार ने उन आंसुओं को छिपाने की कोशिश की। हताश मन व्यक्ति को विजय से दूर ले जाता है। उस वीर बाला को यह समझते देर न लगी कि पति रणभूमि में तो जा रहा है पर मोह ग्रस्त होकर। पति विजयश्री प्राप्त करें इसके लिए उसने कर्तव्य की वेदी पर अपने मोह की बलि दे दी। वह पति से बोली स्वामी जरा ठहरिए। मैं अभी आई। वह दौड़ी-दौड़ी अंदर गई और आरती का थाल सजाया। पति के मस्तक पर टीका लगाया, उसकी आरती उतारी। वह पति से बोली। मैं धन्य हो गई, ऐसा वीर पति पाकर। हमारा आपका तो जन्म जन्मांतर का साथ है। राजपूत रमणियां इसी दिन के लिए तो पुत्र को जन्म देती हैं, आप जाएं स्वामी। मैं विजय माला लिए द्वार पर आपकी प्रतीक्षा करूंगी। उसने अपने नेत्रों में उमड़ते हुए आंसुओं को पी लिया था। पति को दुर्बल नहीं करना चाहती थी। चलते-चलते पति ने कहा, मैं तुमको कोई सुख न दे सका, बस इसका ही दुख है मुझे। भूल तो नहीं जाओगी ? यदि मैं न रहा तो! उसके वाक्य पूरे भी नहो पाए थे कि हाड़ी रानी ने उसके मुख पर हथेली रख दी। न न स्वामी। ऐसी अशुभबातें न बोलें। मैं वीर राजपूतनी हूं, फिर वीर की पत्नी भी हूं। अपना अंतिम धर्म अच्छी तरह जानती हूं आप निश्चित होकर प्रस्थान करें। देश के शत्रुओं के दांत खट्टे करें। यही मेरी प्रार्थना है। इसके बाद रानी उसे एक टक निहारती रहीं जब तक वह आंखे से ओझल न हो गया। उसके मन में दुर्बलता का जो तूफान छिपाथा जिसे अभी तक उसने बरबस रोक रखा था वह आंखों से बह निकला। हाड़ी सरदार अपनी सेना के साथ हवा से बातें करता उड़ा जा रहा था, किन्तु उसके मन में रह रहकर आ रहा था कि कहीं सचमुच मेरी पत्नी मुझे भुला न दें? वह मन को समझाता, पर उसक ध्यान उधर ही चला जाता। अंत में उससे रहा न गया। उसने आधे मार्ग से अपने विश्वस्त सैनिकों के रानी के पास भेजा। उसको फिर से स्मरण करायाथा कि मुझे भूलना मत। मैं जरूर लौटूंगा। संदेश वाहक को आश्वस्त कर रानी ने लौटाया। दूसर दिन एक और वाहक आया। फिर वही बात। तीसरे दिन फिर एक आया। इस बार वह पत्नी के नाम सरदार का पत्र लाया था। प्रिय मैं यहां शत्रुओं से लोहा ले रहा हूं। अंगद के समान पैर जमारक उनको रोक दिया है। मजाल है कि वे जरा भी आगे बढ़ जाएं। यह तो तुम्हारे रक्षा कवच का प्रताप है। पर तुम्हारे बड़ी याद आ रही है। पत्र वाहक द्वारा कोई अपनी प्रिय निशानी अवश्य भेज देना। उसे ही देखकर मैं मन को हल्का कर लिया करुंगा। हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गईं। रानी ने सोचा युद्ध क्षेत्र में भी उन्हें मेरी याद सतायेगी तो वे कमजोर पड़ जायेंगे, युद्ध कैसे कर पायेंगे। मैं उनके कर्तव्य में बाधक क्यों बनू¡? युद्धरत पति का मन यदि मेरी याद में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे। विजय श्री का वरण कैसे करेंगे? उसके मन में एक विचार कौंधा। वह सैनिक से बोली वीर ? मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशान दे रही हूं। यह सोचकर हाड़ी रानी ने सेवक के हाथ से तलवार लेकर सेवक को अपना सिर ले जाने का आदेश देते हुए तलवार से अपना सिर काट डाला। सेवक रानी का कटा सिर अपनी थाली में लेकर, सरदार के पास पहु¡चा। रानी का बलिदान देखकर चुण्डावत की भुजाए¡ फड़क उठी। उत्साहित सरदार तलवार लेकर शत्रु-दल पर टूट पड़े वह शत्रु पर टूट पड़ा। इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है। जीवन की आखिरी सांस तक वह लंड़ता रहा। औरंगजेब की सहायक सेना को उसने आगे नहीं बढऩे दिया, जब तक मुगल बादशाह मैदान छोड़कर भाग नहीं गया था।

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

भानजी/भाणजी दल जाडेजा Jadeja

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एक वीर राजपूत योद्धा जिन्होंने अकबर को हरा कर भागने पर मजबूर किया,और कब्जे में लिए 52 हाथी 3530 घोड़े पालकिया आदि

वीर योद्धा भानजीदाल जाडेजा

राजपूत एक वीर स्वाभिमानी और बलिदानी कौम जिनकी वीरता के दुश्मन भी कायल थे जिनके जीते जी दुश्मन राजपूत राज्यो की प्रजा को छु तक नही पाये अपने रक्त से मातृभूमि को लाल करने वाले जिनके सिर कटने पर भी धड़ लड़ लड़ कर झुंझार हो गए

वक़्त विक्रम सम्वंत 1633(1576 ईस्वी) मेवाड़,गोंड़वाना के साथ साथ गुजरात भी उस वक़्त मुगलो से लोहा ले रहा था गुजरात में स्वय बादशाह अकबर और उसके सेनापति कमान संभाले थे
अकबर ने जूनागढ़ रियासत पर 1576 ईस्वी में आक्रमण करना चाहा तब वहा के नवाब ने पडोसी राज्य नवानगर (जामनगर) के राजपूत राजा जाम सताजी जडेजा से सहायता मांगी क्षत्रिय धर्म के अनुरूप महाराजा ने पडोसी राज्य जूनागढ़ की सहायता के लिए अपने 30000 योद्धाओ को भेजा जिसका नेतत्व कर रहे थे नवानगर के सेनापति वीर योद्धा भानजी जाडेजा
सभी राजपूत योद्धा देवी दर्शन और तलवार शास्त्र पूजा कर जूनागढ़ की और सहायता के निकले पर माँ भवानी को कुछ और ही मजूर था उस दिन
जूनागढ़ के नवाब अकबर की स्वजातीय विशाल सेना के सामने लड़ने से इंकार कर दिया व आत्मसमर्पण के लिए तैयार हुआ और नवानगर के सेनापति वीर भांनजी दाल जडेजा को वापस अपने राज्य लौट जाने को कहा इस पर भान जी और उनके वीर राजपूत योद्धा अत्यंत क्रोधित हुए इस पर भान जी जडेजा ने सीधे सीधे जूनागढ़ नवाब को रजपूती तेवर में कहा “क्षत्रिय युद्ध के लिए निकलता है या तो वो जीतकर लौटेगा या फिर रण भूमि में वीर गति को प्राप्त होकर”
वहा सभी वीर जानते थे की जूनागढ़ के बाद नवानगर पर आक्रमण होगा आखिर सभी वीरो ने फैसला किया की वे बिना युद्ध किये नही लौटेंगे
अकबर की सेना लाखो में थी उन्होंने मजेवाड़ी गाव के मैदान में अपना डेरा जमा रखा था
अन्तः भान जी जडेजा ने मुगलो के तरीके से ही कुटनीति का उपयोग करते हुए आधी रात को युद्ध लड़ने का फैसला किया सभी योद्धा आपस में गले मिले फिर अपने इष्ट स्मरण कर युद्ध स्थल की और निकल पड़े
आधी रात और युद्ध हुआ मुगलो का नेतृत्व मिर्ज़ा खान कर रहा था उस रात हजारो मुगलो को काटा गया मिर्जा खांन भाग खड़ा हुआ सुबह तक युद्ध चला मुग़ल सेना अपना सामान छोड़ भाग खड़ी हुयी

बादशाह अकबर जो की सेना से कुछ किमी की दुरी पर था वो भी उसी सुबह अपने विश्वसनीय लोगो के साथ काठियावाड़ छोड़ भाग खड़ा हुए युद्ध में मुग़ल सेनापति मिर्जा खान भाग खड़ा हुआ भान जी ने बहुत से मुग़ल मनसबदारो को काट डाला हजारो मुग़ल मारे गए
नवानगर की सेना ने मुगलो को 20 कोस तक पीछा किये जो हाथ आये जो काटे गए अंत भान जी दाल जडेजा में मजेवाड़ी में अकबर के शिविर से 52 हाथी 3530 घोड़े और पालकियों को अपने कब्जे में ले लिया
उस के बाद राजपूती फ़ौज सीधी जूनागढ़ गयी वहा नवाब को कायरकता का जवाब देने के लिए जूनागढ़ के किल्ले के दरवाजे भी उखाड दिए ये दरवाजे आज जामनगर में खम्बालिया दरवाजे के नाम से जाने जाते है जो आज भी वहा लगे हुए है
बाद में जूनागढ़ के नवाब को शर्मिन्दिगी और पछतावा हुआ उसने नवानगर महाराजा साताजी से क्षमा मांगी और दंड स्वरूप् जूनागढ़ रियासत के चुरू ,भार सहित 24 गांव और जोधपुर परगना (काठियावाड़ वाला)नवानगर रियासत को दिए

कुछ समय बाद बदला लेने की मंशा से अकबर फिर आया और इस बार उसे “तामाचान की लड़ाई” में फिर हार का मुह देखना पड़ा

इस युद्ध वर्णन सौराष्ट्र नु इतिहास में भी है जिसे लिखा है शम्भूप्रसाद देसाई ने साथ ही Bombay Gezzetarium published by Govt of Bombay साथ ही विभा विलास में,यदु वन्स प्रकाश जो की मवदान जी रतनु ने लिखी है आधी में शौर्य गाथा का वर्णन है

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

धोळका नरेश राणा वीरधवल वाघेला Vaghela

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.          यह उस समय की बात हे जब अणहिलवाड पाटण पर भीमदेव (2nd) सोलंकी का राज था। अंधाधुँधी और घोर युध्धो के उस समय मे पाटण का राज छिन्नभिन हो रहा था। पाटण के सामंत राजा ओर अमात्य स्वतंत्र होकर सत्ता हथिया रहे थे, लेकिन धोळका मंडल के वाघेला राणा पाटण के प्रति हमेशा वफादार रहते आए थे।
          पीढ़ी दर पीढ़ी वाघेला राणाओ ने पाटण कि रक्षा के लिये अपनी कुर्बानीया दि थी।
          जब भीमदेव (2nd)  के ही दुसरै सामंतो ने राज हडपना चाहा तब धोळका के राणा अर्णोराज वाघेला ने भीमदेव के पक्ष मे रहकर युध्ध किया था और सोलंकीयो के राज को बचाया था। वोह युध्ध मे ही वीरगति को प्राप्त हुए और गुजरात कि रक्षा की जिम्मेदारी अपने पुत्र लावण्यप्रसाद को देते गए थे।
          लावण्यप्रसाद वाघेला भी पाटण के सब से वफादार सामंत एवं सेनापति बन के रहै। पाटण के राज की रक्षा के लिये अपना पुरा जीवन समर्पित कर दिया। धोळका मे रहकर भी पुरे राज्य की बागडोर संभालते रहे इसलिए वह “सर्वेश्वर” के नाम से भी जानें गये। इन्ही के पुत्र थे विरधवल वाघेला!
          विरधवल बड़े पराक्रमी और शुरविर थे। पाटण के लिये उन्होंने जिंदगीभर लडाईया लड़ी। विरधवल ने सभी सामंत राजाओ को हराया। खंभात के सामंत शंख (संग्रामसिंह) को हराकर वफादार मंत्री वस्तुपाल को सोप दिया। गोधरा के कुख्यात लुटैरे और भील सरदार घुघुल का वध किया। इसतरह राणक विरधवल ने पाटण के सभी सामंतो को अपने वश मे करके पाटण को अंदर से मजबूत और सुरक्षित बनाया ।
          विरधवल और लावण्यप्रसाद ने एक सच्चे राजपूत की तरह वफादारी और कर्तव्य निभाकर पाटण को मजबुत बनाया और जीवनभर पाटणपति की सेवा की। अगर ऊन्होने चाहा होता तो आसानी से राज हडप् कर जाते कयोकी वो इतने पराक्रमी ओर बलवान थे। मगर उन्होंने पाटणपति को ही अपना स्वामी माना और जीवनभर पाटण की तरफ से युध्ध ही किये। उनकी राजभक्ति को मेरुदंड समान अचल माना गया है।
          गुजरात का सुगठित और सुरक्षित समयकाल राणा वीरधवल वाघेला का कहा जा सकता हे, राणा वीरधवल वाघेला प्रजाप्रेम और शौर्य का समन्वय थे, वीरधवल के समयकाल में उनकी प्रजा आपसी मन-मिटाव भूलकर हिलमिल कर रहती थी, जंगल के भीलो को भी उन्होंने अपने वश में किया था। राजा के डर से चोर भी चोरी जैसा निच काम भूल गए थे। राणा वीरधवल ने उनको खेतउपयोगी सामान देकर महेनत कर पेट भरने वाले बना दिए थे।
          पाल विस्तार में ऐसा कहा जाता था की वहा से अगर कोई व्यक्ति अपने पहने हुए कपडे भी सही सलामत लेकर आ जाये तो वो धन्य हे, ऐसे प्रदेश में भी राणा वीरधवल ने कांटो की जालों को सुवर्ण आभूषण मूल्यवान वस्त्रो आदि से सुशोभित कर बिना चोकी पहरे के खुले छोड़ रखे थे, पर फिर भी उसे वहा से चुराने की कोई हिम्मत नही कर शकता था।
इस बात से आप अंदाजा लगा शकते हो की राणा वीरधवल का राज्य कितना सुगठित और संस्कारी होगा।
वीरधवल के डर से उनके राज्य में व्यभिचार बिलकुल बंध हो गया था। गुणिकाए भी बहु-पति छोड़ एक पति के साथ अपना जीवन निर्वाह करने लगी थी। ऐसी मर्यादाए राणा वीरधवल ने अपनी प्रजा हेतु बंदोबस्त की थी और गुजरात को समृद्ध और संस्कारी बनाया था।
          राणा वीरधवल ने अपने सामंतो से कर वसूल कर गुजरात को धन-धान्य से समृद्ध किया था, देश विदेशो में गुजरात की कीर्ति फैलनी लगी थी। और गुजरात की ऐसी विख्याति सुन कर दक्षिण का सिंधण राजा अपनी विशाल सेना के साथ गुजरात पर अपने अधिपत्य जमाने के मनसूबे से आया।
          गुजरात की प्रजा के मन में डर व्याप्त होने लगा शत्रु ओ की सैन्य की विशालता देखकर, पर राणा वीरधवल वाघेला ने अपनी प्रजा के मन से डर दूर किया उनको दिलासा दिया। सिंधण की सेना गुजरात की सिमा में दाखल हुई, और गुजरात के गाँवों को जलाती, प्रजा को मारती, परेशान करती हुई आगे बढ़ती जा रही थी।
          सिंधण की सेनाओ ने जलाये हुए गाँवों से उठते धुंए से सूर्य भी नही दिख रहा था, इसी पर से सिंधण की सेना की विशालता का अंदाजा लगाया जा शकता हे।
          वाघेला राणा वीरधवल वाघेला और उनके पिताजी लवणप्रसादजी ने अपनी सेना को सज्ज किया। सिंधण के मुकाबले वाघेला की सेना संख्या में बहुत कम थी, पर पराक्रम, शौर्य और युद्धकला में सिंधण को मात दे शके एसी गुजरात की सेना थी। सिंधण की सेना तापी नदी के किनारे तक पहुच चुकी थी,
          दोनों सेनाए आमने-सामने आ गयी, और गुजरात के इतिहास में उस युद्ध का प्रारंभ हुआ जो शौर्य में अव्वल कहा जा शके पर बहुत कम लोगो को इस पराक्रमी युद्ध के इतिहास का पता होगा, इतिहास में कुछ एसी बाते दब कर रह गयी हे जो साहस शौर्य में अव्वल रहनी चाहिए, यह हमारा कमनसीब हे की ऐसी गाथाये, कहानिया, इतिहासिक बाते चर्चा का विषय न बनकर मात्र कुछ किताबो में बंध पड़ी रही है, खैर मूल बात पर वापस आते हे… लवणप्रसाद अपने दोनों हाथो में आयुध धारण कर, मुखमंडल पर क्रोध की रेखाए अंकित हो चुकी थी, सिंधण सेना को त्राहिमाम कराने लगे थे।
          पर गुजरात का भविष्य धुंधला सा होने लगा था, कहा जाता हे की कोई संकट आता हे तो अकेला नही आता… उस हिसाब से, मारवाड़ पंथक के 4 राजाओ ने गुजरात की सेना को सिंधण के युद्ध में व्यस्त देख गुजरात पर कब्जा जमाने हेतु अपनी सेनाओ के साथ आ गए, इस तरह राणा वीरधवल वाघेला की सेना को दुगना संकट खड़ा हो गया, एसी विकट स्थिति में भी वीरधवल ने स्वयं पर संयम बनाये रखा, और एक तरफ मारवाड़ की सेना के सामने भी युद्ध आरंभ हुआ।
          मारवाड़ी सेना और सिंधण के सेना से युद्ध चालु ही था, पर वाघेला वीरधवल के लिए समस्या और भी बढ़ने ही वाली थी।
          भरुच और गोधरा के राजा राणा वीरधवल वाघेला के सामंत थे। वे दोनों इस युद्ध में राणा वीरधवल वाघेला की और से लड़ने आये थे। पर शत्रु ओ की बढ़ती संख्या देख उन दोनों ने क्षत्रित्व को कलंक लगाने वाला अति हीन काम किया, गुप्त तरीके से वे दोनों मारवाड़ी राजो से मंत्रणा करने लगे। उन दोनों राजवी ओ को वाघेला ओ के सामन्त पद से स्वतंत्र होने का यह बहोत ही अच्छा मौका दिख रहा था। और वे दोनों ने अपनी सेना मारवाड़ी सेना के साथ मिला दी और गुजरात के विरुद्ध हो गए।
          वाघेला राणा वीरधवल की सेना और भी कम हो गयी। पर वीरधवल मजबूत मनोबलि व्यक्तित्वधारी थे। उनको पता था की ऐसे राजा और उनकी सेना अपने साथ होकर भी न होने के बराबर थी। क्योंकि जो अन्तःकरण से अपना न हो वह अपने लिए बहोत बड़ा खतरा बन शकता हे। संकट बहोत बड़ा हो गया था पर फिर भी वीरधवल ने हार नही मानी और युद्ध चालू रखा।
          इस समय 4 मारवाड़ी राजा, दक्षिण का सिंधण राजा और दो फूटे हुए सामंत- गोधरा और भरुच के राजा, मतलब एक साथ 7 राजा ओ का सामना करना पड रहा था। पर इस बात से लवणप्रसाद और वीरधवल की मुखमुद्रा पर कोई भय या दिलगीरी की रेखा नही दिखी। सम्पूर्ण क्षात्रत्व धारी थे वे दोनों पिता-पुत्र। सच्चा क्षत्रिय व्ही हे जो राजसभा और युद्ध दोनों ही स्थलो पर समान स्थिति में रहे, जरा भी विचलित न हो। और होना भी नही चाहिए, अन्यथा बहोत बड़ा नुकशान हो शकता हे।
          उन्होंने सिंधण की सेना के साथ बहोत ही वीरता और शौर्य के साथ युद्ध किया। वृद्ध लवणप्रसाद ने पूरी बहादुरी के साथ सिंधण की बहोत सी सेना को काट डाला और सिंधण का बल कम किया। उसके बाद वे मारवाड़ी सेना पर टूट पड़े।
          सिंधण की सेना वाघेला ओ से इतनी ज्यादा त्रस्त हो गयी थी की जिस समय लवणप्रसाद पुरे जोश के साथ मारवाड़ी सेना को मार रहे थे उस समय वे चाहते तो वाघेला ओ को परेशान कर शकते थे। पर शेर के मार्ग में, अगर शेर गुफा से दूर भी गया हो तो भी हिरण उस मार्ग से नही चल शकता। इसी तरह सिंधण की सेना वाघेला ओ के पीछे नही जा शकी, इतना डर उनके मन में बैठ गया वाघेलाओ के प्रति,
अगर वे वीरधवल से पुनः युद्ध करते तो वे जित शकते थे।
          लवणप्रसाद को 4 मारवाड़ी राजाओ और अपने 2 विश्वासघाती सामंतो पर अतिशय क्रोध आया, जो उनको हराने के पश्चात ही शांत होने वाला था।
          पर एक तरफ नयी मुसीबत खड़ी हो उठी थी।

सिंधु के बेटे शंख जो घोघा बन्दर के पास वडुआ बेट का राजा था, उसने दूत द्वारा वीरधवल के मंत्री वस्तुपाल को युद्ध के लिए तैयार होने का संदेश भिजवाया।

          प्रसंग कुछ यु हुआ था की – एक बार जब धोळका से वस्तुपाल, राजा की आज्ञा से खंभात(खंभात वीरधवल वाघेला का राज्य का ही एक प्रदेश/बंदर) गया, वहा पुरे खंभात नगर ने उसकी आगता-स्वागता की, अमीर-उमराव उस से मिलने आये, दरबार में उसे बहुत मान मिला, पर एक सदीक नामक अमीर मिलने नही आया, वस्तुपालने सेवक भेज कर उसे मिलने बुलाया पर सदीक ने सेवक से कहा”में कोई अधिकारी से मिलने नही जाता, और ना ही किसी अधिकारी के सामने झुकता हु, पर अगर आप मुझसे मिलने आओ तो में आपकी हर इच्छा पूरी करूँगा, पर में आपसे मिलने नही आऊंगा॥”
          सदीक खंभात नगर का एक बहुत अमीर आदमी था, अहंकारी और घमंडी भी था, घोघा के पास वडुआ बेट का राजा शंख उसका मित्र था, साथ में हंमेशा हथियारधारी आदमी रखकर राजा-महाराजा जैसा दंभ भी करता था, जिस वजह से वस्तुपाल ने दबाव बनाया की अगर मिलने नही आओगे तो दंड होगा।
          सदीक ने अपने मित्र शंख से इस बारे में सहायता मांगी जिस पर शंख ने दूत भिजवाकर वस्तुपाल से कहा की “सदीक मेरा मित्र हे उसे परेशान ना करे अन्यथा परिणाम अच्छा नही होगा” वस्तुपाल ने उसी दूत से कहवाया की “आप वडुआ के राजा हे और यह हमारा आपसी मामला हे, खंभात हमारा प्रदेश जिस पर आप दखलअंदाजी नही कर शकते, और आप को लड़ने की इच्छा हो तो आप ख़ुशी से आ शकते हे…”

          अब जहा एक साथ 7 राजाओ से युद्ध चल रहा था उस समय शंख ने अपना दूत भेजा यह सोचकर की यह अच्छा समय हे खंभात पर कब्जा ज़माने के लिए। वाघेलाओ की सेना वेसे ही 7 राजाओ से युद्ध में व्यस्त हे, वस्तुपाल के पास दूत भिजवाकर कुछ इस तरह संदेश भेजा “हे चतुर मंत्री, तू समजदार हे और बहादुर भी, तेरे राजा पर बहुत बड़ा संकट आ गया हे, तुजे भी पता ही होगा की खंभात हमारे पूर्वजो की नगरी हे, वोह अब हमें वापस चाहिए, अगर तुजे उस नगर का मंत्री बनना हे तो तू मुझे आकर सलाम कर, में तुजे उस नगरी का हमेश के लिए मंत्री नियुक्त करूँगा, तुजे इनाम और गिरास दूंगा, पर यदि तूने मेरी बात स्वीकार नही की तो में खंभात तुम लोगो से छीन लूंगा, तेरी जगह पर किसी और को नियुक्त करूँगा, तूभी जानता हे तेरा अकेला राजा एक साथ 8 बड़े राजाओ से जित नही पायेगा, या मेरी बात मान ले या युद्ध के लिए तैयार हो जा..”
          ये बात वस्तुपाल को वज्र के घाव बराबर लगी, पर वह चतुर वणिक मंत्री ने बिना अभिमान दूत को उत्तर दिया “भले ही तेरा राजा युद्ध के लिए आ जाये, हम युद्ध के लिए तैयार हे, यदि गंगा नदी पर अगर हवा के साथ कुछ धूल-मिटटी या कचरा आकर गिरे तो वह नदी को मलिन नहीं कर शकता, पर नदी उस धूल-कचरे को कादव बनाकर पानी के निचे दबा देती हे, और स्वयंम असल स्थिति के मुताबिक़ निर्मल ही रहती हे। इसी लिए तुम लोग आकर खंभात पर कब्जा कर शको यह होना असंभव हे। शूरा क्षत्री राजाओ का तो धर्म ही हे की उसे अपना कर्तव्य कर के यश प्राप्त करना, पर तेरे जेसे के डराने से डर जाए वह नामर्द ही हो शकता हे। तेरा स्वामी राजा होकर भी खंभात मांग रहा हे, जब की हमारे राजा ने शस्त्रो के जोर पर खंभात को प्राप्त किया हे। अगर तेरे राजाको खंभात वापस चाहिए तो आयुध के जोर पर ही लेने की आशा रखे, तेरा राजा कहता हे की वीरधवल अकेला कैसे एक साथ सब से मुकाबला कर पायेगा? तो उसे कहना की वे दृढ और निश्चल पुरुष है, उनकी सहायता से वे कितने भी कठिन युद्ध में विजयश्री को हासिल करते हे, इस लिए हमें परमेश्वर पर पूरा विश्वास हे, खंभात नगरी का पति राणा वीरधवल वाघेला हे, और हमें एक पति छोड़ कर दूसरा पति लाने की कोई इच्छा नही हे। इसी लिए अगर खंभात नगरी तेरा राजा अपनी करना चाहता हे तो वो मारा जायेगा”
          एसा संदेश दूत ने अपने राजा को सुनाते ही शंख क्रोधायमान हुआ, अपनी सेना को सज्ज कर तुरंत तीव्र गति से वह खंभात के सरोवर किनारे आकर अपनी सेना को तैयार किया, वस्तुपाल को युद्ध के लिए सूचित करने हेतु जोर जोर से ढोल बजवाये.
          वस्तुपाल जानता ही था की शंख जरूर आएगा इस लिए वह भी युद्ध की पूर्ण तैयारिया कर के तैयार ही था। और भीषण लड़ाई हुई, वस्तुपाल खुद जैनधर्मि था, और जैन धर्म में हिंसा बहुत बड़ा पाप हे, पर फिर भी वह अपने राजा वीरधवल के प्रति पूरी वफादारी और कर्मनिष्टता से बाण-वर्षा करने लगा।
          मैदानी युद्ध में वस्तुपाल के दो श्रेष्ट क्षत्री वीर भुवनादित्य और संग्रामसिंह को शंख ने मार दिया जिस से वस्तुपाल क्रोधित हो उठा, वाचिंगदेव, उदयसिंह, विक्रमसिंह, सोमसिंह, भुवनपाल और हिरप्रधान की राजपूत टुकड़ी अपने जाबांज की शहादत देख शंख पर टूट पड़ी, शंख घोड़े से निचे गिर गया और भुवनपाल या वस्तुपाल ने उसे मोत के घाट उतार दिया। चारोंओर जोर से विजयनाद हुआ।
          उस तरफ वाघेला से त्रस्त सिंधण ने बहुत बड़ी रकम का दंड भर कर संधि कर ली, मारवाड़ी और फूटे हुए सामंत को हार का मुह देखना पड़ा, चारोंओर वीरधवल की जयकार हो चली, गुजरात पुनः एक बार अपना सर आसमान से ऊँचा कर गौरवान्वित हो गया था।
          शत शत नमन वंदन ऐसे वीरो को जिन्होंने इतने बड़े संकट में भी अपने आप पर संयम बनाये रख कर बुलंद हौसले के साथ एक समेत 8 राजाओ को हरा दिया।
पुस्तक : वाघेला वृतांत
संयोजक : सत्यपालसिंह वाघेला(धनाळा)

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|| मोगल करज्यो माफ ||

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.        || मोगल करज्यो माफ ||
.   राग: ठाकर अमुं मेल्य मां ठेली..
.  रचना : जोगीदान गढवी ( चडिया )

.                     दोहो
करजे कुंणा काळजे. आयल तुं ईन साफ
जुनी भुल्युं के जोगडो. मोगल करजे माफ.

.                     सरज

माडी अमुं बाळ तमारां..गुना कर्य माफ अमारा..
अविरत आभ उतारा…धींगी अमरत नी धारा…..टेक

मात बोलावे बाळुडां तारा..होय त्यांथी झट हाल्य..
बुडीये तारी बेडली विना..झट्य बांवलडी झाल्य..
भम्मरीयां वेण छे  भारा.. काढी ने लाव्य किनारा…||01||

चारणीं मोगल आई चंडीका..काळ तणीं तुं काळ..
दैत्य नी ढाहण देव धरे तुं..वान को दी विक राळ..
वेरी नां पाड्यती वारा..लाखेंणीं तुं काढती लारा…||02||

जण्यां अमे मां जग मां तारा..बांय झालण तुं बाई..
जोवरावे नई वाट्य जाया ने..ओखा धराळी आई..
भले होय भुल्य नां भारा..देती ना तुं बाळ ने डारा…||03||

आज लगी अगनांन मां घुम्यां..अथडांणां अण पार..
दश दिशा मां दिसतुं नई मां..ऐक तारो आघार..
अंतर मां घोर अंघारा..बाई हवे काढ्य तुं बारा…||04||

चारणों केरा चित मां माडी..थोक थडे तुंज थान..
तेज तारुं शीत त्रण भुवन मां..जीरवे जोगीदान..
जुगे जुग ज्योत उजारा..मोगल तमे मात छो मारा…||05||

🌹🌹🌹🙏🙏 मोगलं शिरो मणीं 🙏🙏🌹🌹🌹

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सोलंकी राजपूत राजवंश Solanki

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सोलंकी वंश वीर योद्धाओ का इतिहास🌞

1. दद्दा चालुक्य पहले राजपूत योद्धा थे जिन्होंने गजनवी को सोमनाथ मंदिर लूटने से रोका b 
2. भीमदेव द्वित्य ने मोहम्मद गोरी की सेना को 2 बार बुरी तरह से हराया और मोहम्मद गोरी को दो साल तक गुजरात के कैद खाने में रखा और बाद में छोड़ दिया जिसकी वजह से मोहम्मद गोरी ने तीसरी बार गुजरात की तरफ आँख उठाना तो दूर जुबान पर नाम तक नहीं लिया |
3. सोलंकी सिद्धराज जयसिंह इनके बारे में तो जितना कहे कम है | 56 वर्ष तक गुजरात पर राज किया सिंधदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान का कुछ भाग, सोराष्ट्र, तक इनका राज्य था | सबसे बड़ी बात तो यह है की यह किसी अफगान, और मुग़ल से युद्ध भूमि में हारे नहीं | बल्कि उनको धुल चटा देते थे | सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल ने व्यापार के नए-नए तरीके खोजे जिससे गुजरात और राजस्थान की आर्थिक स्थितिया सुधर गयी गरीबो को काम मिलने लगा और सब को काम की वजह से उनके घर की स्थितियां सुधर गयी |
4. पुलकेशी महाराष्ट्रा, कर्नाटक, आँध्रप्रदेश तक इनका राज्य था | इनके समय भारत में ना तो मुग़ल आये थे और ना अफगान थे उस समय राजपूत राजा आपस में लड़ाई करते थे अपना राज्य बढ़ाने के लिए |
5. किल्हनदेव सोलंकी ( टोडा-टोंक ) इन्होने दिल्ली पर हमला कर बादशाह की सारी बेगमो को उठाकर टोंक के नीच जाति के लोगो में बाट दिया | क्यूंकि दिल्ली का सुलतान बेगुनाह हिन्दुओ को मारकर उनकी बीवी, बेटियों, बहुओ को उठाकर ले जाता था | इनका राज्य टोंक, धर्मराज, दही, इंदौर, मालवा तक फैला हुआ था |
6. मांडलगढ़ के बल्लू दादा ने अकेले ही अकबर के दो खास ख्वाजा अब्दुलमाजिद और असरफ खान की सेना का डट कर मुकाबला किया और मौत के घाट उतार दिया | हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के साथ युद्ध में काम आये | बल्लू दादा के बाद उनके पुत्र नंदराय ने मांडलगढ़ – मेवाड की कमान अपने हाथों में ली इन्होने मांडलगढ़ की बहुत अच्छी तरह देखभाल की लेकिन इनके समय महाराणा प्रताप जंगलो में भटकने लगे थे और अकबर ने मान सिंह के साथ मिलकर मांडलगढ़ पर हमला कर दिया और सभी सोलंकियों ने उनका मुकाबला किया और लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की |
7. वच्छराज सोलंकी इन्होने गौ हथ्यारो को अकेले ही बिना सैन्य बल के लड़ते हुए धड काटने के बाद भी 32 किलोमीटर तक लड़ते हुए गए अपने घोड़े पर और गाय चोरो को एक भी गाय नहीं ले जने दी और सब को मौत के घात उतार कर अंत में वीरगति को प्राप्त हो गए जिसकी वजह से आज भी गुजरात की जनता इनकी पूजती है और राधनपुर-पालनपुर में इनका एक मंदिर भी बनाया हुआ है |
8. भीमदेव प्रथम जब 10-11 वर्ष के थे तब इन्होने अपने तीरे अंदाज का नमूना महमूद गजनवी को कम उमर में ही दिखा दिया था महमूद गजनवी को कोई घायल नहीं कर पाया लेकिन इन्होने दद्दा चालुक्य की भतीजी शोभना चालुक्य (शोभा) के साथ मिलकर महमूद गजनवी को घायल कर दिया और वापस गजनी-अफगानिस्तान जाने पर विवश कर दिया जिसके कारण गजनवी को सोमनाथ मंदिर लूटने का विचार बदलकर वापस अफगानिस्तान जाना पड़ा |
9. कुमारपाल इन्होने जैन धर्म की स्थापना की और जैनों का साथ दिया | गुजरात और राजस्थान के व्यापारियों को इन्होने व्यापार करने के नए – नए तरीके बताये और वो तरीके राजस्थान के राजाओ को भी बेहद पसंद आये और इससे दोनों राज्यों की शक्ति और मनोबल और बढ़ गया | और गुजरात, राजस्थान की जनता को काम मिलने लगे जिससे उनके घरो का गुजारा होने लगा |
10. राव सुरतान के समय मांडू सुल्तान ने टोडा पर अधिकार कर लिया तब बदनोर – मेवाड की जागीर मिली राणा रायमल उस समय मेवाड के उतराधिकारी थे | राव सुरतान की बेटी ने शर्त रखी ‘ मैं उसी राजपूत से शादी करुँगी जो मुझे मेरी जनम भूमि टोडा दिलाएगा | तब राणा रायमल के बेटे राणा पृथ्वीराज ने उनका साथ दिया पृथ्वीराज बहुत बहादूर था और जोशीला बहुत ज्यादा था | चित्तोड़ के राणा पृथ्वीराज, राव सुरतान सिंह और राजकुमारी तारा बाई ने टोडा-टोंक पर हमला किया और मांडू सुलतान को तारा बाई ने मौत के घाट उतार दिया और टोडा पर फिर से सोलंकियों का राज्य कायम किया | तारा बाई बहुत बहादूर थी | उसने अपने वचन के मुताबिक राणा पृथ्वीराज से विवाह किया | ऐसी सोलंकिनी राजकुमारी को सत सत नमन | यहाँ पर मान सिंह और अकबर खुद आया था | युद्ध करने और पुरे टोडा को 1 लाख मुगलों ने चारो और से गैर लिया | सोलंकी सैनिको ने भी अकबर की सेना का सामना किया और अकबर के बहुत से सैनिको को मार गिराया और अंत में सब ने लड़ते हुए वीरगति पाई | 
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जय सोमनाथ महादेव
जय खिमज माता दी
जय बहुचराजी माता दी

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