Daily Archives: July 31, 2015

मारवाड़ राज्य के संस्थापक राव सिंहाजी राठौर Rav Sinhaji Rathore

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राव सीहा जी राजस्थान में स्वतंत्र राठौड़ राज्य के संस्थापक थे | राव सीहा जी के वीर वंशज अपने शौर्य, वीरता एवं पराक्रम व तलवार के धनी रहे है |मारवाड़ में राव सीहा जी द्वारा राठौड़ साम्राज्य का विस्तार करने में उनके वंशजो में राव धुहड़ जी , राजपाल जी , जालन सिंह जी ,राव छाडा जी , राव तीड़ा जी , खीम करण जी ,राव वीरम दे , राव चुडा जी , राव रिदमल जी , राव जोधा , बीका , बीदा, दूदा , कानध्ल , मालदेव का विशेष क्रमबद्ध योगदान रहा है | इनके वंशजों में दुर्गादास व अमर सिंह जैसे इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति हुए| राव सिहा सेतराम जी के आठ पुत्रों में सबसे बड़े थे| !

चेतराम सम्राट के, पुत्र अस्ट महावीर !
जिसमे सिहों जेस्ठ सूत , महारथी रणधीर ||
राव सिहाँ जी सं. 1268 के लगभग पुष्कर की तीर्थ यात्रा के समय मारवाड़ आये थे उस मारवाड़ की जनता मीणों, मेरों आदि की लूटपाट से पीड़ित थी , राव सिहा के आगमन की सूचना पर पाली नगर के पालीवाल ब्राहमण अपने मुखिया जसोधर के साथ सिहा जी मिलकर पाली नगर को लूटपाट व अत्याचारों से मुक्त करने की प्रार्थना की| अपनी तीर्थ यात्रा से लौटने के बाद राव सिहा जी ने भाइयों व फलोदी के जगमाल की सहायता से पाली में हो रहे अत्याचारों पर काबू पा लिया एवं वहां शांति व शासन व्यवस्था कायम की, जिससे पाली नगर की व्यापारिक उन्नति होने लगी|

आठों में सिहाँ बड़ा ,देव गरुड़ है साथ |
बनकर छोडिया कन्नोज में ,पाली मारा हाथ ||
पाली के अलावा भीनमाल के शासक के अत्याचारों की जनता की शिकायत पर जनता को अत्याचारों से मुक्त कराया |
भीनमाल लिधी भडे,सिहे साल बजाय|
दत दीन्हो सत सग्रहियो, ओ जस कठे न जाय||

पाली व भीनमाल में राठौड़ राज्य स्थापित करने के बाद सिहा जी ने खेड़ पर आक्रमण कर विजय कर लिया| इसी दौरान शाही सेना ने अचानक पाली पर हमला कर लूटपाट शुरू करदी ,हमले की सूचना मिलते ही सिहा जी पाली से 18 KM दूर बिठू गावं में शाही सेना के खिलाफ आ डटे, और मुस्लिम सेना को खधेड दिया| वि. सं . 1330 कार्तिक कृष्ण दवादशी सोमवार को करीब 80 वर्ष की उमर में सिहा जी स्वर्गवास हुआ व उनकी सोलंकी रानी पार्वती इनके साथ सती हुई | सिहाजी की रानी (पाटन के शासक जय सिंह सोलंकी की पुत्री )से बड़े पुत्र आस्थान जी हुए जो पिता के बाद मारवाड़ के शासक बने | राव सिहं जी राजस्थान में राठौड़ राज्य की नीवं डालने वाले पहले व्यक्ति थे |

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

चांपानेर पताई रावल चौहान का बेगड़ा से युद्ध Khichi Chauhan Rajputs Of Chapaner

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         चहुदिश आन चक्रवर्ती चौहान
भारतीय इतिहास के एक ऐसे गौरवशाली संघर्ष से परिचय कराएंगे जो राजपूतो के अपने धर्म के प्रति प्रतिबद्धता और स्वतंत्रता के प्रति लगाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। चंपानेर के खिंची चौहान वंश ने अपने से कहीँ ज्यादा ताकतवर गुजरात की मुस्लिम सल्तनत से संघर्ष करते हुए उसके बिलकुल जड़ में एक सदी तक स्वतंत्र शाशन किया लेकिन कभी झुकना या धर्म परिवर्तन स्वीकार नही किया।

गुजरात पर उस समय मुस्लिम सल्तनत का परचम लहरा रहा था। अहमदाबाद उसकी राजधानी थी। तब चांपानेर मे खींची चौहानो का राज अपनी वीरता और वैभव के लिए मशहूर था। चांपानेर के संस्थापक गुजरात नरेश वनराजसिंह चावडा थे। 1300 ई. में चौहानों ने चांपानेर पर अधिकार कर लिया था।

एक और चौहानो के शौर्य का रस मुस्लिम सेना चख रही थी तो दुसरी और गुजरात का सुलतान आकुल व्याकुल हो रहा था। बात यह थी की अहमदाबाद के पास ही चांपानेर मे चौहान राजपूतो का छोटा सा राज्य था और कभी उन्होने मुस्लिम सुल्तानों के आधिपत्य को स्वीकार नही किया था। इस बात से गुजरात के सुलतान चांपानेर पर धावा बोलने की योजनाए बनाते ,
पर चौहानो की तेज तलवारो की कल्पना मात्र से ही वे अपना मन बदल लेते। एक सदी तक चांपानेर के खिंची राजपूतो से सल्तनत की लड़ाई चलती रही, लेकिन सल्तनत उन्हें झुका या हरा नही पाई।

जब गुजरात की गद्दी पर मुहम्मद शाह आया तब उसने चांपानेर पर आक्रमण करने की कई योजनाए बनाई लेकिन किसी ना किसी कारण वश वो सफल नही हो पाता था, 1449 ई. मे आखिर उसने आक्रमण कर ही दिया।

चांपानेर पर तब कनकदास चौहान उर्फ गंगदास चौहान का राज था। सुलतान के आक्रमण की खबर सुनते ही उन्होने अपनी सेना को सुसज्जित किया। मालवा के महमूद शाह खिलजी ने भी अपनी सेना सहायता हेतु भेजी। चांपानेर की सेना ने मुहम्मदशाह की सेना का ना सिर्फ सामना किया बल्कि औंधे मुह घर लौंटने को मजबुर कर दिया |

1451 ई. मे अहमदाबाद वापिस लौटते समय मुहम्मदशाह बीमार पड गया और रास्ते मे ही उसकी मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कुतुब-उद-दिन अहमदशाह || (1451-1458) गद्दी पर आया और उसके बाद Abu-al Fath Mahmud Shah अबु-अल फाथ महमुद शाह को गद्दी पर बिठाया गया जो महमुद ‘बेगडा’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

बेगडा छोटी उम्र मे ही सुलतान बन गया था लेकिन उसकी महत्वकांक्षाए बहुत बडी थी। वो एक धर्मांध और जूनुनी शासक था। चांपानेर की स्वतंत्रता उसे कांटे की तरह चुभ रही थी। अपने विरोधीयो और दुश्मनो को खत्म करके मजबुत सत्ता जमाने मे कामयाब हो गया था। अब उसकी नजर एक सदी तक उसके बाप दादाओ को अपने स्वतंत्र अस्तित्व से चिढ़ाते आ रहे चांपानेर पर थी।

उस वक्त चांपानेर मे कनकदास/गंगदास के पुत्र जयसिंह चौहान (पत्तई रावल के नाम से प्रसिद्ध) की सत्ता थी | ( कई जगह जयसिंह को उदय सिंह का पुत्र लिखा हुआ है)

1482 ई.मे महमुद बेगडा को चांपानेर पर आक्रमण करने का मौका मिला। रसुलाबाद जो की चांपानेर से 14 मील की दुरी पर था, वहां महमूद का सूबेदार मलिक था, उसने चांपानेर के प्रदेश मे घूसखोरी और लूटपाट करी। जब इसका पता जयसिंह को चला उन्होने रसुलाबाद पर धावा बोल दिया, सारा लूट का माल वापिस ले लिया, दो हाथी भी ले लिये और रसूलाबाद को तबाह कर दिया ||

इस घटना का पता चलने पर महमुद ने चांपानेर को जीतने का इरादा बनाया। उसने अपनी सेना के एक जत्थे को बडौदा की और भेजा ताकी उस ओर से चांपानेर आ रहे साधन सामग्री और खाने पीने की चीजो पर रोक लगा सके, और खुद 4 दिसंबर, 1482 को ढाई से तीन लाख की सेना के साथ चांपानेर पर उसने हमला किया लेकिन जयसिंह ने भी बडी बहादुरी से उसका सामना किया। करीब दो साल तक चले घेरे मे मुस्लिमो ने कई मंदिरो और तीर्थस्थलो को तहस-नहस कर दिया, पावागढ के महाकाली के मंदिर का गर्भगृह भी टूट गया था, लेकिन पावागढ का दुर्ग महमूद के लिये बडी चुनौती बना हुआ था। आखिर उसने जयसिंह के कुछ दरबारियो को लालच देकर अपने साथ मिला लिया और 21, नवंबर, 1484 के दिन किले के दरवाजे खुलवा लिये।

जयसिंह की सेना की संख्या मुस्लिम सेना से काफी कम थी लेकिन फिर भी उन्होने विधर्मियो को काटना जारी रखा। 700 राजपुतो ने शाका किया और बेगडा के 20,000 मुस्लिम सैनिको को दोजख मे पहुचा दिया था। दूसरी ओर महारानी चंपादेवी और दुसरी राजपुत स्त्रीयो ने जौहर कर विधर्मीयो के हाथो से खुद को बचा लिया। सुरंग मार्ग से जयसिंह के पुत्र को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। राजा जयसिंह लडते लडते दुश्मनो के हाथो लग गये और उन्हे उनके मंत्री सूरी के साथ बंदी बना लिया गया।

बन्दी बनाकर जब राजा जयसिंह और सूरी को बेगड़ा के सामने लाया गया तो उसने पूछा कि किसकी प्रेरणा से तुम्हारी हिम्मत हुई अपनी छोटी सी सेना लेकर मेरी इतनी विशालकाय और ताकतवर सेना से लड़ने की???

वो दोनों राजपूत घायल अवस्था में बेगड़ा की गिरफ्त में थे, उनके परिवार जौहर की अग्नि में विलीन हो गए थे, चांपानेर और पावागढ़ के दुर्ग तबाह हो गए थे, इस सब के बाद भी राजा जयसिंह ने पूरी दृढ़ता से बेगड़ा को जवाब दिया– इस भूमी पर मेरा वंशानुगत अधिकार है, यह मेरे पूर्वजो द्वारा अर्जित है और इतने महान और कुलीन पूर्वजो की श्रृंखला का वंशज होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि जिस गौरवशाली नाम को उन्होंने मुझे दिया है उसकी इज्जत मरते दम तक बनाए रखू।”

बेगड़ा राजा जय सिंह के इस वीरोचित उत्तर से बहुत प्रभावित हुआ और दोनों राजपूतो को इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिये मनाया लेकिन उनके इनकार करने पर करीब पांच महिनो तक राजा जय सिंह और उनके मंत्री सूरी को घोर यातनाए देकर ईस्लाम कबुल करने का दबाव डाला गया लेकिन वे टस से मस न हुए, उसके बाद उनका शिरछेद कर हत्या कर दी गई।

राजा जयसिंह और उनके मंत्री सूरी का यह बलिदान असंख्य राजपूत वीरो के देश, धर्म और कुल के मान सम्मान के लिये अपना सर्वस्व बलिदान करने की परंपरा का एक अप्रतिम उदाहरण है। आज भी गुजरात में राजा जयसिंह को पतई रावल नाम से याद किया जाता है और उनके बारे में अनेको लोक कहानिया प्रचलित हैँ।

जयसिंह के पुत्र रायसिंह के पुत्र त्र्यंबकसिंह हुए जिनके दो पुत्र थे, 1. पृथ्वीराजजी जिन्होने छोटा उदैपुर रियासत की स्थापना की, 2. डुंगरसिंहजी जिन्होने बारिया रियासत की नींव रखी। ये दोनों रियासत आज भी मौजूद हैँ।

राजपुताना सोच और क्षत्रिय इतिहास

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

गुरुपूनम पर कबीर के कुछ दोहे- Kabir Ke Dohe

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          परम पूज्य गुरुश्री राजर्षी मुनि
(1)
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय॥

(2)
गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।
बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि॥

(3)
सतगुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावणहार॥

(4)
गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं ।
भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहि॥

(5)
शब्द गुरु का शब्द है, काया का गुरु काय।
भक्ति करै नित शब्द की, सत्गुरु यौं समुझाय॥

(6)
बलिहारी गुर आपणैं, द्यौंहाडी कै बार।
जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार।।

(7)
कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥

(8)
जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय॥

(9)
यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान॥

(10)
गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव।
दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव॥

कबीर दास…

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

स्वाधीनता संग्राम में राजपूतो का योगदान – कुँवरसिंह परमार Parmar

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स्वाधीनता संग्राम में राजपूतो का योगदान –

मित्रो जैसा कि सभी को पता है कि 1857 के संग्राम में राजपूत अंग्रेज़ो के विरुद्ध संघर्ष में सबसे आगे रहे थे। हमेशा की तरह राजपूतो ने इस संग्राम का नेतृत्व किया था। 1857 का संग्राम, सबसे पहले मुख्यत: एक सैनिक विद्रोह था जिसमे अधिकतर अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के राजपूत सैनिक शामिल थे। इन सैनिको से प्रेरणा लेकर ही इन क्षेत्रो में आम जनता ने अंग्रेज़ो के विरुद्ध बगावत करी। अवध में तो ये बगावत सबसे भीषण थी और समाज के लगभग हर वर्ग ने संग्राम में भाग लिया जिसका नेतृत्व राजपूतो ने किया। अवध, पूर्वांचल और पश्चिम बिहार के राजपूतो ने संग्राम में सबसे सक्रीय रूप से भाग लिया जिसके परिणाम स्वरुप संघर्ष समाप्ति के बाद अंग्रेज़ो ने उनका दमन किया। सिर्फ अवध में ही एक साल के अंदर राजपूतो की 1783 किलों/गढ़ियों को ध्वस्त किया गया जिनमे से 693 तोप, लगभग 2 लाख बंदूके, लगभग 7 लाख तलवारे, 50 हजार भाले और लगभग साढ़े 6 लाख अन्य तरह के हथियारों को अंग्रेज़ो ने जब्त करके नष्ट किया। यहाँ तक की अधिकतर संपन्न राजपूतो के घर किलेनुमा होते थे, उन्हें भी नष्ट कर दिया गया। इसके बाद शस्त्र रखने के लिये अंग्रेज़ो ने लाइसेंस अनिवार्य कर दिया जो बहुत कम लोगो को दिया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ की अवध के राजपूत शस्त्रविहीन हो गए।

इसके अलावा वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुन्देलखण्ड, मध्य प्रदेश, हरयाणा, राजस्थान में भी राजपूत ही स्वाधीनता के इस संघर्ष में सबसे आगे थे जिसका खामियाजा उन्हें अपनी जमीनें और रियासते गवाँ कर उठाना पड़ा।

अंग्रेज़ो के विरुद्ध संघर्ष में राजपूतो के योगदान से परिचित कराते हुए इससे पहले हम लखनेसर के सेंगर और वीर राम सिंह पठानिया पर पोस्ट कर चुके है। इस श्रृंखला में यह तीसरी पोस्ट 1857 के सबसे बड़े योद्धा बिहार के वीर राजपूत कुँवर सिंह जी और उनके भाई अमर सिंह जी पर है।

~~भारत माँ का सच्चा सपूत 1857 का महान राजपूत योद्धा वीर कुंवर सिंह 1777 -1858~~

जीवन परिचय और गौरव गाथा—–
बाबू कुंवर सिंह का जन्म आरा के निकट जगदीशपुर रियासत में 1777 में हुआ था | मुग़ल सम्राट शाहजहा के काल से उस रियासत के मालिक को राजा की उपाधि मिली हुई थी।ये उज्जैनिया पवार(परमार)राजपूत कुल के थे. कुंवर सिंह के पिता का नाम साहेबजादा सिंह और माँ का नाम पंचरतन कुवरी था | कुंवर सिंह की यह रियासत भी डलहौजी की हडप नीति का शिकार बन गयी थी।
कुंवर सिंह न केवल 1857 के महासमर के सबसे महान योद्धा थे, बल्कि वह इस संग्राम के एक वयोवृद्ध योद्धा भी थे। इस महासमर में तलवार उठाने वाले इस योद्धा की उम्र उस समय 80 वर्ष की थी। महासमर का यह वीर न केवल युद्ध के मैदान का चपल निर्भीक और जाबांज खिलाड़ी था, अपितु युद्ध की व्यूहरचना में भी उस समय के दक्ष , प्रशिक्षित एवं बेहतर हथियारों से सुसज्जित ब्रिटिश सेना के अधिकारियों, कमांडरो से कही ज्यादा श्रेष्ठ थे।

क्रांति की घटनाएँ——
10 मई 1857 से इस महासमर की शुरुआत के थोड़े दिन बाद ही दिल्ली पर अंग्रेजो ने पुन: अपना अधिकार जमा लिया था। अंग्रेजो द्वारा दिल्ली पर पुन:अधिकार कर लेने के बाद भी 1857 के महासमर की ज्वाला अवध और बिहार क्षेत्र में फैलती धधकती रही। दानापुर की क्रांतिकारी सेना के जगदीशपुर पहुंचते ही 80 वर्षीय स्वतंत्रता प्रेमी योद्धा कुंवर सिंह ने शस्त्र उठाकर इस सेना का स्वागत किया और उसका नेतृत्त्व संभाल लिया।

इस समय तक क्रांतिकारियों की अधिकांश गथिविधियाँ असफल सिद्ध हो रही थी क्योंकि उनमे उचित रणनीति का आभाव था,

महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के शब्दों में ———–
“अंग्रेजो का जुआ उतार फेकने के बाद जिस एक कमी के कारण क्रांतिकारियों के सारे परिश्रम विफल हो रहे थे,वह कुशलता और रणनीति की कमी जगदीशपुर के राजमहल ने शेष न रहने दी,इसलिए जगदीशपुर के उस हिन्दू राजा के ध्वज की और सोन नदी उतरकर ये सिपाही दोड़े जा रहे थे.क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम का नेत्रत्व करने वाला सुयोग्य नेता इन्हें जगदीशपुर में ही मिलने वाला था.राजपूत वंश की खान से ही जिस महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्म हुआ उस वीर का नाम कुंवर सिंह था.अपने स्वदेश को गुलामी की कठिन अवस्था में देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि के कारण वह वृद्ध कुंवर सिंह अपने महल में मूंछो पर ताव देता खड़ा था.
वृद्ध युवा–हाँ वह वृद्ध युवा था,क्योंकि अस्सी शरद ऋतुएँ देह पर से उतर गई थी.परन्तु उनकी आत्मा का तेज अभी भी जीवित अंगारे सा दहकता था.अस्सी वर्ष का कुंवर सिंह,अस्सी वर्ष का कुमार और उसमे भी सिंह,,,उसके देश का अंग्रेजो द्वारा किया गया अपहरण उसे कैसे मान्य हो?????अपने स्वदेश का अपहरण करने वाली अंग्रेजी तलवार के मै टुकड़े करूँगा,ऐसी गर्जना कुंवर सिंह ने कीं और उन्होंने गुपचुप शिवाजी की निति पर चलते हुए नाना साहब से सम्पर्क करके क्रांति की योजना बनाई,
कुंवर सिंह के मन में क्रांति की भावनाएं जोर पकड़ रही हैं ये जानकारी जल्द ही अंग्रेजो को मिल गई और उन्होंने छल से कुंवर सिंह को पकड़ने की निति बनाई…
भयंकर चाल,भयंकर बोल और हर हर महादेव का बोल…अफजल खान वध के पोवाडा की चाल…..
पटना के कमिश्नर टेलर ने कुंवर सिंह को आतिथ्य का विनम्र निमन्त्रण भेजा,पर चतुर कुंवर सिंह ने अस्वस्थता का बहाना बनाकर इसे ठुकरा दिया,
जल्द ही दानापुर के बागी सिपाही जगदीशपुर आ पहुंचे,अब फिर किसके लिए ठहरना????
पटना शहर हाथी पर बैठकर जाने से भी अस्वस्थता के कारण जिस कुंवर सिंह ने मना कर दिया था वो राजा भोज परमार का वंशज और अस्सी साल का बुजुर्ग राजपूत अपनी रुग्ण शैय्या से तडाक से उठा और सीधा रणभूमि में ही जाकर रुका”

क्रांति की घटनाएँ—–
कुंवर सिंह के नेतृत्त्व में इस सेना ने सबसे पहले आरा पर धावा बोल दिया। क्रांतिकारी सेना ने आरा के अंग्रेजी खजाने पर कब्जा कर लिया। जेलखाने के कैदियों को रिहा कर दिया गया। अंग्रेजी दफ्तरों को ढाहकर आरा के छोटे से किले को घेर लिया। किले के अन्दर सिक्ख और अंग्रेज सिपाही थे। तीन दिन किले की घेरेबंदी के साथ दानापुर से किले की रक्षा के लिए आ रहे कैप्टन डनवर और उनके 400 सिपाहियों से भी लोहा लिया। डनवर युद्ध में मारा गया। थोड़े बचे सिपाही दानापुर वापस भाग गये। किला और आरा नगर पर कुंवर सिंह कीं क्रांतिकारी सेना का कब्जा हो गया। लेकिन यह कब्जा लम्बे दिनों तक नही रह सका। मेजर आयर एक बड़ी सेना लेकर आरा पर चढ़ आया। युद्ध में कुंवर सिंह और उसकी छोटी सी सेना पराजित हो गयी। आरा के किले पर अंग्रेजो का पुन: अधिकार हो गया।

कुंवर सिंह अपने सैनिको सहित जगदीशपुर की तरफ लौटे। मेजर आयर ने उनका पीछा किया और उसने जगदीशपुर में युद्ध के बाद वहा के किले पर भी अधिकार कर लिया। कुंवर सिंह को अपने 122 सैनिको और बच्चो स्त्रियों के साथ जगदीशपुर छोड़ना पडा। अंग्रेजी सेना से कुंवर सिंह की अगली भिडंत आजमगढ़ के अतरौलिया क्षेत्र में हुई। अंग्रेजी कमांडर मिल मैन ने 22 मार्च 1858 को कुंवर सिंह की फ़ौज पर हमला बोल दिया। हमला होते ही कुंवर सिंह की सेना पीछे हटने लगी अंग्रेजी सेना कुंवर सिंह को खदेड़कर एक बगीचे में टिक गयी। फिर जिस समय मिल मैन की सेना भोजन करने में जुटी थी, उसी समय कुंवर सिंह की सेना अचानक उन
पर टूट पड़ी। मैदान थोड़ी ही देर में कुंवर सिंह के हाथ आ गया। मिलमैन अपने बचे खुचे सैनिको को लेकर आजमगढ़ की ओर निकल भागा। अतरौलिया में पराजय का समाचार पाते ही कर्नल डेम्स गाजीपुर से सेना लेकर मिलमैन की सहायता के लिए चल निकला। 28 मार्च 1858 को आजमगढ़ से कुछ दूर कर्नल डेम्स और कुंवर सिंह में युद्ध हुआ। कुंवर सिंह पुन: विजयी रहे। कर्नल डेम्स ने भागकर आजमगढ़ के किले में जान बचाई।

अब कुंवर सिंह बनारस की तरफ बड़े। तब तक लखनऊ क्षेत्र के तमाम विद्रोही सैनिक भी कुंवर सिंह के साथ हो लिए थे। बनारस से ठीक उत्तर में 6 अप्रैल के दिन लार्ड मार्क्कर की सेना ने कुंवर सिंह का रास्ता रोका और उन पर हमला कर दिया। युद्ध में लार्ड मार्क्कर पराजित होकर आजमगढ़ की ओर भागा। कुंवर सिंह ने उसका पीछा किया और किले में पनाह के लिए मार्क्कर की घेरे बंदी कर दी। इसकी सुचना मिलते ही पश्चिम से कमांडर लेगर्ड की बड़ी सेना आजमगढ़ के किले की तरफ बड़ी। कुंवर सिंह ने आजमगढ़ छोडकर गाजीपुर जाने और फिर अपने पैतृक रियासत जगदीशपुर पहुचने का निर्णय किया। साथ ही लेगर्ड की सेना को रोकने और उलझाए रखने के लिए उन्होंने अपनी एक टुकड़ी तानु नदी के पुल पर उसका मुकाबला करने के लिए भेज दी। लेगर्ड की सेना ने मोर्चे पर बड़ी लड़ाई के बाद कुंवर सिंह का पीछा किया। कुंवर सिंह हाथ नही आये लेकिन लेगर्ड की सेना के गाफिल पड़ते ही कुंवर सिंह न जाने किधर से अचानक आ धमके और लेगर्ड पर हमला बोल दिया। लेगर्ड की सेना पराजित हो गयी।

अब गंगा नदी पार करने के लिए कुंवर सिंह आगे बड़े लेकिन उससे पहले नघई गाँव के निकट कुंवर सिंह को डगलस की सेना का सामना करना पडा। डगलस की सेना से लड़ते हुए कुंवर सिंह आगे बढ़ते रहे। अन्त में कुंवर सिंह की सेना गंगा के पार पहुचने में सफल रही। अंतिम किश्ती में कुंवर सिंह नदी पार कर रहे थे, उसी समय किनारे से अंग्रेजी सेना के सिपाही की गोली उनके दाहिनी बांह में लगी। कुंवर सिंह ने बेजान पड़े हाथ को अपनी तलवार से काटकर अलग कर गंगा में प्रवाहित कर दिया। घाव पर कपड़ा लपेटकर कुंवर सिंह ने गंगा जी पार की।

वीर सावरकर ने किस प्रकार अपनी पुस्तक 1857 के स्वतंत्रता समर के पृष्ठ संख्या 340-341 में इस घटना का वर्णन किया है आप स्वयं पढ़ें——
“भारत भूमि का यह सौभाग्य तिलक,स्वतंत्रता की तलवार-राणा कुंवर सिंह !गंगा पाट में बीचो बीच पहुँच गया तब शत्रु की एक गोली आई और राणा के हाथ में घुस गई.खून की धारा बह निकली.जिससे सारे शरीर में गोली का जहर फैलने का खतरा हो गया…..
यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया???
आंसू बहाने लगा क्या???
तनिक भी विचलित हुआ क्या?रक्त का बहाव रोकने को किसी से सहायता मांगी क्या??
नही-नही ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.हाथ पर मक्खी बैठे,उतना भी कम्पित नही हुआ.उसने दुसरे हाथ से अपनी तलवार निकाली,और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ अपना हाथ कुहनी से छांट दिया और वह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की–हे माता हे गंगा ! बालक का यह उपहार स्वीकार कर!!
इस महान वृद्ध राजपूत द्वारा भगीरथी को यह अलौकिक उपहार अर्पित करते ही उसकी शीतल फुआरो ने उसका देह सिंचन किया और मात्रप्रेम से उत्साहित यह वीरवर अपनी सेना सहित गंगा पार हो गया”

अंग्रेजी सेना उनका पीछा न कर सकी। गंगा पार कर कुंवर सिंह की सेना ने 22 अप्रैल को जगदीशपुर और उसके किले पर पुन: अधिकार जमा लिया। 23 अप्रैल को ली ग्रांड की सेना आरा से जगदीशपुर की तरफ बड़ी ली ग्रांड की सेना तोपों व अन्य साजो सामानों से सुसज्जित और ताजा दम थी। जबकि कुंवर सिंह की सेना अस्त्र -शस्त्रों की भारी कमी के साथ लगातार की लड़ाई से थकी मादी थी। अभी कुंवर सिंह की सेना को लड़ते – भिड़ते रहकर जगदीशपुर पहुचे 24 घंटे भी नही हुआ था। इसके बावजूद आमने-सामने के युद्ध में ली ग्रांड की सेना पराजित हो गयी।

चार्ल्स बाल की ‘इन्डियन म्युटनि’ में उस युद्ध में शामिल एक अंग्रेज अफसर का युद्ध का यह बयान दिया हुआ है की——-
“वास्तव में जो कुछ हुआ उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है। लड़ाई का मैदान छोडकर हमने जंगल में भागना शुरू किया। शत्रु हमे पीछे से बराबर पीटता रहा। स्वंय ली ग्रांड को छाती में गोली लगी और वह मारा गया। 199 गोरो में से केवल 80 सैनिक ही युद्ध के भयंकर संहार से ज़िंदा बच सके। हमारे साथ के सिक्ख सैनिक हमसे आगे ही भाग गये थे”

22 अप्रैल की इस जीत के बाद जगदीशपुर में कुंवर सिंह का शासन पुन: स्थापित हो गया। किन्तु कुंवर सिंह के कटे हाथ का घाव का जहर तेजी से बढ़ रहा था इसके परिणाम स्वरूप 26 अप्रैल 1858 को इस महान वयोवृद्ध पराक्रमी विजेता का जीवन दीप बुझ गया।

राजा कुंवर सिंह के दो पुत्र हुए वे भी इस संग्राम में शहीद हुए
1. दल भंजन सिंह जो 5 नवंबर 1857 को कानपूर के युद्ध में शहीद हुए
2. वीर भंजन सिंह जो 8 अक्टूबर 1857 को बाँदा के युद्ध में शहीद हुए

आप परमार वंश की उज्जैनिया शाखा हुए थे बिहार में उज्जैन से आये हुए परमारों को उज्जैनिया कहा जाता है

अंग्रेज इतिहासकार होम्स लिखता है की– उस बूढ़े राजपूत की जो ब्रिटिश सत्ता के साथ इतनी बहादुरी व आन के साथ लड़ा 26 अप्रैल 1858 को एक विजेता के रूप में मृत्यु हुई। एक अन्य इतिहासकार लिखता है की कुवरसिंह का व्यक्तिगत चरित्र भी अत्यंत पवित्र था, उसका जीवन परहेजगार था। प्रजा में उसका बेहद आदर- सम्मान था। युद्ध कौशल में वह अपने समय में अद्दितीय थे।
इसका सबसे बड़ा सबूत यह है की इस महान योद्धा ने न केवल कई जाने माने अंग्रेज कमांडरो को युद्ध के मैदान में पराजित किया अपितु जीवन के अंतिम समय में विजित रहकर अपने गाँव की माटी में ही प्राण त्याग किया | उनकी मृत्यु 26 अप्रैल 1858 को हुई, जबकि उसके तीन दिन पहले 23 अप्रैल को जगदीशपुर के निकट उन्होंने कैप्टन ली ग्राड की सेना को युद्ध के मैदान में भारी शिकस्त दी थी।
अंग्रेज इतिहासकार होम्स लिखता है की उस बूढ़े राजपूत की जो ब्रिटिश सत्ता के साथ इतनी बहादुरी व आन के साथ लड़ा 26 अप्रैल 1858 को एक विजेता के रूप में मृत्यु का वरण किया।

वीर सावरकर के शब्दों में——-
“””‘जब कुंवर सिंह का जन्म हुआ था तब उनकी भूमि स्वतंत्र थी और जिस दिन कुंवर सिंह ने प्राण त्यागे उस दिन भी उनके किले पर स्वदेश और स्वधर्म का भगवा ध्वज लहरा रहा था,,राजपूतो के लिए इससे पुण्यतर मृत्यु और कौन सी हो सकती है??????
उसने अपने अपमान का प्रतिशोध लिया और अल्प साधनों से शक्तिशाली अंग्रेज सेना के दांत खट्टे कर दिए…श्री कुंवर सिंह की भूमिका किसी वीर काव्य के नायक स्थान पर शोभित हो सकती है,सन 1857 के क्रांतियुद्ध में कोई नेता सर्वश्रेष्ठ था तो वीर कुंवर सिंह था,युधकला में कोई उनकी बराबरी कर सके ऐसा कोई था ही नहीं,क्रांति में शिवाजी के कूट युद्ध की सही सही नकल कैसे की जाए उसी अकेले ने सिद्ध किया.तांत्या टोपे और कुंवर सिंह के युद्ध चातुर्य की तुलना करें तो कुंवर सिंह की कूट पद्धति ही अधिक बेजोड़ थी”””

कुंवर सिंह द्वारा चलाया गया स्वतंत्रता युद्ध खत्म नही हुआ। अब उनके छोटे भाई अमर सिंह ने युद्ध की कमान संभाल ली।
~~~अमरसिंह~~~
कुंवर सिंह के बाद उनके छोटे भाई अमर सिंह जगदीशपुर की गद्दी पर बैठा। अमर सिंह ने बड़े भाई के मरने के बाद चार दिन भी विश्राम नही किया। केवल जगदीशपुर की रियासत पर अपना अधिकार बनाये रखने से भी वह सन्तुष्ट न रहे। उन्होंने तुरंत अपनी सेना को फिर से एकत्रित कर आरा पर चढाई की। ली ग्रांड की सेना की पराजय के बाद जनरल डगलस और जरनल लेगर्ड की सेनाये भी गंगा पार कर आरा की सहायता के लिए पहुच चुकी थी। 3 मई को राजा अमर सिंह की सेना के साथ डगलस का पहला संग्राम हुआ। उसके बाद बिहिया, हातमपुर , द्लिलपुर इत्यादि अनेको स्थानों पर दोनों सेनाओं में अनेक संग्राम हुए। अमर सिंह ठीक उसी तरह युद्ध नीति द्वारा अंग्रेजी सेना को बार – बार हराते और हानि पहुचाता रहे, जिस तरह की युद्ध नीति में कुंवर सिंह निपुण थे। निराश होकर 15 जून को जरनल लेगर्ड ने इस्तीफा दे दिया। लड़ाई का भार अब जनरल डगलस पर पडा। डगलस के साथ सात हजार सेना थी। डगलस ने अमर सिंह को परास्त करने की कसम खाई। किन्तु जून , जुलाई, अगस्त और सितम्बर के महीने बीत गये अमर सिंह परास्त न हो सके। इस बीच विजयी अमर सिंह ने आरा में प्रवेश किया और जगदीशपुर की रियासत पर अपना आधिपत्य जमाए रखा। जरनल डगलस ने कई बार हार खाकर यह ऐलान कर दिया जो मनुष्य किसी तरह अमर सिंह को लाकर पेश करेगा उसे बहुत बड़ा इनाम दिया जाएगा, किन्तु इससे भी काम न चल सका। तब डगलस ने सात तरफ से विशाल सेनाओं को एक साथ आगे बढाकर जगदीशपुर पर हमला किया। 17 अक्तूबर को इन सेनाओं ने जगदीशपुर को चारो तरफ से घेर लिया। अमर सिंह ने देख लिया की इस विशाल सैन्य दल पर विजय प्राप्त कर सकना असम्भव है। वह तुरंत अपने थोड़े से सिपाहियों सहित मार्ग चीरते हुए अंग्रेजी सेना के बीच से निकल गए। जगदीशपुर पर फिर कम्पनी का कब्जा हो गया, किन्तु अमर सिंह हाथ न आ सके। कम्पनी की सेना ने अमर सिंह का पीछा किया। 19 अक्तूबर को नौनदी नामक गाँव में इस सेना ने अमर सिंह को घेर लिया। अमर सिंह के साथ केवल 400 सिपाही थे। इन 400 में से 300 ने नौनदी के संग्राम में लड़कर प्राण दे दिए। बाकी सौ ने कम्पनी की सेना को एक बार पीछे हटा दिया। इतने में और अधिक सेना अंग्रेजो की मदद के लिए पहुच गयी। अमर सिंह के सौ आदमियों ने अपनी जान हथेली पर रखकर युद्ध किया। अन्त में अमर सिंह और उसके दो और साथी मैदान से निकल गये। 97 वीर वही पर मरे।
नौनदी के संग्राम में कम्पनी के तरफ से मरने वालो और घायलों की तादाद इससे कही अधिक थी। कम्पनी की सेना ने फिर अमर सिंह का पीछा किया। एक बार कुछ सवार अमर सिंह के हाथी तक पहुच गये। हाथी पकड लिया, किन्तु अमर सिंह कूद कर निकल गए। अमर सिंह ने अब कैमूर के पहाडो में प्रवेश किया। शत्रु ने वहा पर
भी पीछा किया किन्तु अमर सिंह ने हार स्वीकार न की।
इसके बाद राजा अमर सिंह का कोई पता नही चलता। जगदीशपुर की महल की स्त्रियों ने भी शत्रु के हाथ में पड़ना गवारा न किया। लिखा है की जिस समय महल की 150 स्त्रियों ने देख
लिया की अब शत्रु के हाथो में पड़ने के सिवाय कोई चारा नही तो वे तोपों के मुँह के सामने खड़ी हो गयी और स्वंय अपने हाथ से पलीता लगाकर उन सबने ऐहिक जीवन का अन्त कर दिया।

बाबू कुँवर सिंह और अमर सिंह की शौर्य गाथा आज भी याद की जाती है और उनपर भोजपुरी में अनेक लोकगीत और लोकोक्तिया प्रचलित है-

बाबू कुंवरसिह तेगवा बहादुर
बंगला पर उडता अबीर
होरे लाला बांग्ला पर उडता अबीर।

बाबू कुंवर सिंह तोहरे राजबिनु,
हम ना रंगाइबो केसरिया।

कप्तान लिखे मिलअ कुंवर सिंह,
आरा के सबा बनाइब रे
बाबू कुंवर सिंह भेजते सनेसवा, मोसे
न चली चतुराई रे
जब तक प्रान रहीतन भीतर, मारग नहीं बदलाई रे

जे न हिदी कुंवर सिंह के साथ,
उ अगीला जन्म में होई सुअर।
ओकर बाद होई भुअर

राम अनुज जगजान लखन,
ज्यो उनके सदा सहाई थे।
गोकुल मे बलदाऊ के प्रिय थे,
जैंसे कुँवर कन्हाई थे।
वीर श्रेष्ठ आल्हा के प्यारे,
ऊदल ज्यो सुखदाई थे।
अमर सिंह भी कंुवर सिंह के
वैंसे ही प्रिय भाई थे।
कुवरसिंह का छोटा भाई
वैंसा ही मस्ताना था,
सब कहते हैं अमर सिंहभी
बडा वीर मर्दाना था।

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संतो नो स्वभाव छे एवो

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गुरु पुर्णिमां ना पावन तहेवार नी हार्दिक शुभकामना …💐

संतोनो स्वभाव छे अेवो , जनेतानी गोदना जेवो ,

दान बापुना देवळे जाजो , मानवी उजळे मन ,
साचा रुदे तमे साद करो तो दु:खना टाळे दन ,

संतोनो स्वभाव छे अेवो , जनेतानी गोदना जेवो ,

वगर माग्ये आपशे वे’ला , बाळने दिधेल बोल ,
बिरद संतोनां आकरां बापा , कहुं वगाडीने ढोल ,

संतोनो स्वभाव छे अेवो , जनेतानी गोदना जेवो ,

परचा अेना पार विनाना , ज माने तमारुं मन ,
फेरो सुधरी जाय , फेर नही एेमां , ताप मटाडे तन ,

संतोनो स्वभाव छे अेवो , जनेतानी गोदना जेवो ,

एेक डगलुं में आगळ भाळ्या , जननी थी जग संत ,
मात सुवरावे , संत जगाडे भेळवी द्ये भगवंत ,

संतोनो स्वभाव छे अेवो , जनेतानी गोदना जेवो ,

धुड धमाहा धोडता आवे , मा बथमां  लेशे बाळ ,
काळ मोढाथी कढवी नांखे , भावथी ल्ये संत भाळ ,

संतोनो स्वभाव छे अेवो , जनेतानी गोदना जेवो ,

बाळ स्वभावी “रावत” बनी जा माथडुं खोळे मेल्य ,
जवाबदारी दे दानबापुने , पछी खलक आखामां खेल्य ,

संतोनो स्वभाव छे अेवो , जनेतानी गोदना जेवो ,

रचयता कवि श्री :- रावत भगत , सरदारपुर .भेंसाण

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गुरिपूर्णिमा

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गुरुब्रह्मा गुरुविर्ष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर, विश्व के समस्त गुरुजनों को मेरा शत् शत् नमन। गुरु के महत्व को हमारे सभी संतो, ऋषियों एवं महान विभूतियों ने उच्च स्थान दिया है।संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान)एवं ‘रु’ का अर्थ होता है प्रकाश(ज्ञान)। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं।

हमारे जीवन के प्रथम गुरु हमारे माता-पिता होते हैं। जो हमारा पालन-पोषण करते हैं, सांसारिक दुनिया में हमें प्रथम बार बोलना, चलना तथा शुरुवाती आवश्यकताओं को सिखाते हैं। अतः माता-पिता का स्थान सर्वोपरी है। जीवन का विकास सुचारू रूप से सतत् चलता रहे उसके लिये हमें गुरु की आवश्यकता होती है। भावी जीवन का निर्माण गुरू द्वारा ही होता है।

मानव मन में व्याप्त बुराई रूपी विष को दूर करने में गुरु का विषेश योगदान है। महर्षि वाल्मिकी जिनका पूर्व नाम ‘रत्नाकर’ था। वे अपने परिवार का पालन पोषण करने हेतु दस्युकर्म करते थे। महर्षि वाल्मिकी जी ने रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की, ये तभी संभव हो सका जब गुरू रूपी नारद जी ने उनका ह्दय परिर्वतित किया। मित्रों, पंचतंत्र की कथाएं हम सब ने पढी या सुनी होगी। नीति कुशल गुरू विष्णु शर्मा ने किस तरह राजा अमरशक्ती के तीनों अज्ञानी पुत्रों को कहानियों एवं अन्य माध्यमों से उन्हें ज्ञानी बना दिया।

गुरू शिष्य का संबन्ध सेतु के समान होता है। गुरू की कृपा से शिष्य के लक्ष्य का मार्ग आसान होता है।

स्वामी विवेकानंद जी को बचपन से परमात्मा को पाने की चाह थी। उनकी ये इच्छा तभी पूरी हो सकी जब उनको गुरू परमहंस का आर्शिवाद मिला। गुरू की कृपा से ही आत्म साक्षात्कार हो सका।

छत्रपति शिवाजी पर अपने गुरू समर्थ गुरू रामदास का प्रभाव हमेशा रहा।

गुरू द्वारा कहा एक शब्द या उनकी छवि मानव की कायापलट सकती है। मित्रों, कबीर दास जी का अपने गुरू के प्रति जो समर्पण था उसको स्पष्ट करना आवश्यक है क्योंकि गुरू के महत्व को सबसे ज्यादा कबीर दास जी के दोहों में देखा जा सकता है।

एक बार रामानंद जी गंगा स्नान को जा रहे थे, सीढी उतरते समय उनका पैर कबीर दास जी के शरीर पर पङ गया। रामानंद जी के मुख से ‘राम-राम’ शब्द निकल पङा। उसी शब्द को कबीर दास जी ने दिक्षा मंत्र मान लिया और रामानंद जी को अपने गुरू के रूप में स्वीकार कर लिया। कबीर दास जी के शब्दों में—  ‘हम कासी में प्रकट हुए, रामानंद चेताए’। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि जीवन में गुरू के महत्व का वर्णन कबीर दास जी ने अपने दोहों में पूरी आत्मियता से किया है।

गुरू गोविन्द दोऊ खङे का के लागु पाँव,

बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।

गुरू का स्थान ईश्वर से भी श्रेष्ठ है। हमारे सभ्य सामाजिक जीवन का आधार स्तभ गुरू हैं। कई ऐसे गुरू हुए हैं, जिन्होने अपने शिष्य को इस तरह शिक्षित किया कि उनके शिष्यों ने राष्ट्र की धारा को ही बदल दिया।

आचार्य चाणक्य ऐसी महान विभूती थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। गुरू चाणक्य कुशल राजनितिज्ञ एवं प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में विश्व विख्यात हैं। उन्होने अपने वीर शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य को शासक पद पर सिहांसनारूढ करके अपनी जिस विलक्षंण प्रतिभा का परिचय दिया उससे समस्त विश्व परिचित है।

गुरु हमारे अंतर मन को आहत किये बिना हमें सभ्य जीवन जीने योग्य बनाते हैं। दुनिया को देखने का नज़रिया गुरू की कृपा से मिलता है। पुरातन काल से चली आ रही गुरु महिमा को शब्दों में लिखा ही नही जा सकता। संत कबीर भी कहते हैं कि –

सब धरती कागज करू, लेखनी सब वनराज।

सात समुंद्र की मसि करु, गुरु गुंण लिखा न जाए।।

गुरु पूर्णिमा के पर्व पर अपने गुरु को सिर्फ याद करने का प्रयास है। गुरू की महिमा  बताना तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है। गुरु की कृपा हम सब को प्राप्त हो। अंत में कबीर दास जी के निम्न दोहे से अपनी कलम को विराम देते हैं।

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।

शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।

बिन गुरु बुद्धि न बापरे, बिन गुरु मिले न बोध।
बिन गुरु उगत न ऊपजे, बिन गुरु सधे न सोध।
बिन गुरु सत्त न सूझहिं, बिन गुरु कहाँ बिनान।
कर्मयोग बिन गुरु कहाँ, धरम मरम कहं ध्यान।
गजराज कहै गुणियन गुणो, सद्गुरु ही सुखधाम है।
गुरु रीझ्यां हरि रीझिहे, सद्गुरु तीर्थ तमाम है।।

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