चांपानेर पताई रावल चौहान का बेगड़ा से युद्ध Khichi Chauhan Rajputs Of Chapaner

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         चहुदिश आन चक्रवर्ती चौहान
भारतीय इतिहास के एक ऐसे गौरवशाली संघर्ष से परिचय कराएंगे जो राजपूतो के अपने धर्म के प्रति प्रतिबद्धता और स्वतंत्रता के प्रति लगाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। चंपानेर के खिंची चौहान वंश ने अपने से कहीँ ज्यादा ताकतवर गुजरात की मुस्लिम सल्तनत से संघर्ष करते हुए उसके बिलकुल जड़ में एक सदी तक स्वतंत्र शाशन किया लेकिन कभी झुकना या धर्म परिवर्तन स्वीकार नही किया।

गुजरात पर उस समय मुस्लिम सल्तनत का परचम लहरा रहा था। अहमदाबाद उसकी राजधानी थी। तब चांपानेर मे खींची चौहानो का राज अपनी वीरता और वैभव के लिए मशहूर था। चांपानेर के संस्थापक गुजरात नरेश वनराजसिंह चावडा थे। 1300 ई. में चौहानों ने चांपानेर पर अधिकार कर लिया था।

एक और चौहानो के शौर्य का रस मुस्लिम सेना चख रही थी तो दुसरी और गुजरात का सुलतान आकुल व्याकुल हो रहा था। बात यह थी की अहमदाबाद के पास ही चांपानेर मे चौहान राजपूतो का छोटा सा राज्य था और कभी उन्होने मुस्लिम सुल्तानों के आधिपत्य को स्वीकार नही किया था। इस बात से गुजरात के सुलतान चांपानेर पर धावा बोलने की योजनाए बनाते ,
पर चौहानो की तेज तलवारो की कल्पना मात्र से ही वे अपना मन बदल लेते। एक सदी तक चांपानेर के खिंची राजपूतो से सल्तनत की लड़ाई चलती रही, लेकिन सल्तनत उन्हें झुका या हरा नही पाई।

जब गुजरात की गद्दी पर मुहम्मद शाह आया तब उसने चांपानेर पर आक्रमण करने की कई योजनाए बनाई लेकिन किसी ना किसी कारण वश वो सफल नही हो पाता था, 1449 ई. मे आखिर उसने आक्रमण कर ही दिया।

चांपानेर पर तब कनकदास चौहान उर्फ गंगदास चौहान का राज था। सुलतान के आक्रमण की खबर सुनते ही उन्होने अपनी सेना को सुसज्जित किया। मालवा के महमूद शाह खिलजी ने भी अपनी सेना सहायता हेतु भेजी। चांपानेर की सेना ने मुहम्मदशाह की सेना का ना सिर्फ सामना किया बल्कि औंधे मुह घर लौंटने को मजबुर कर दिया |

1451 ई. मे अहमदाबाद वापिस लौटते समय मुहम्मदशाह बीमार पड गया और रास्ते मे ही उसकी मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कुतुब-उद-दिन अहमदशाह || (1451-1458) गद्दी पर आया और उसके बाद Abu-al Fath Mahmud Shah अबु-अल फाथ महमुद शाह को गद्दी पर बिठाया गया जो महमुद ‘बेगडा’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

बेगडा छोटी उम्र मे ही सुलतान बन गया था लेकिन उसकी महत्वकांक्षाए बहुत बडी थी। वो एक धर्मांध और जूनुनी शासक था। चांपानेर की स्वतंत्रता उसे कांटे की तरह चुभ रही थी। अपने विरोधीयो और दुश्मनो को खत्म करके मजबुत सत्ता जमाने मे कामयाब हो गया था। अब उसकी नजर एक सदी तक उसके बाप दादाओ को अपने स्वतंत्र अस्तित्व से चिढ़ाते आ रहे चांपानेर पर थी।

उस वक्त चांपानेर मे कनकदास/गंगदास के पुत्र जयसिंह चौहान (पत्तई रावल के नाम से प्रसिद्ध) की सत्ता थी | ( कई जगह जयसिंह को उदय सिंह का पुत्र लिखा हुआ है)

1482 ई.मे महमुद बेगडा को चांपानेर पर आक्रमण करने का मौका मिला। रसुलाबाद जो की चांपानेर से 14 मील की दुरी पर था, वहां महमूद का सूबेदार मलिक था, उसने चांपानेर के प्रदेश मे घूसखोरी और लूटपाट करी। जब इसका पता जयसिंह को चला उन्होने रसुलाबाद पर धावा बोल दिया, सारा लूट का माल वापिस ले लिया, दो हाथी भी ले लिये और रसूलाबाद को तबाह कर दिया ||

इस घटना का पता चलने पर महमुद ने चांपानेर को जीतने का इरादा बनाया। उसने अपनी सेना के एक जत्थे को बडौदा की और भेजा ताकी उस ओर से चांपानेर आ रहे साधन सामग्री और खाने पीने की चीजो पर रोक लगा सके, और खुद 4 दिसंबर, 1482 को ढाई से तीन लाख की सेना के साथ चांपानेर पर उसने हमला किया लेकिन जयसिंह ने भी बडी बहादुरी से उसका सामना किया। करीब दो साल तक चले घेरे मे मुस्लिमो ने कई मंदिरो और तीर्थस्थलो को तहस-नहस कर दिया, पावागढ के महाकाली के मंदिर का गर्भगृह भी टूट गया था, लेकिन पावागढ का दुर्ग महमूद के लिये बडी चुनौती बना हुआ था। आखिर उसने जयसिंह के कुछ दरबारियो को लालच देकर अपने साथ मिला लिया और 21, नवंबर, 1484 के दिन किले के दरवाजे खुलवा लिये।

जयसिंह की सेना की संख्या मुस्लिम सेना से काफी कम थी लेकिन फिर भी उन्होने विधर्मियो को काटना जारी रखा। 700 राजपुतो ने शाका किया और बेगडा के 20,000 मुस्लिम सैनिको को दोजख मे पहुचा दिया था। दूसरी ओर महारानी चंपादेवी और दुसरी राजपुत स्त्रीयो ने जौहर कर विधर्मीयो के हाथो से खुद को बचा लिया। सुरंग मार्ग से जयसिंह के पुत्र को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। राजा जयसिंह लडते लडते दुश्मनो के हाथो लग गये और उन्हे उनके मंत्री सूरी के साथ बंदी बना लिया गया।

बन्दी बनाकर जब राजा जयसिंह और सूरी को बेगड़ा के सामने लाया गया तो उसने पूछा कि किसकी प्रेरणा से तुम्हारी हिम्मत हुई अपनी छोटी सी सेना लेकर मेरी इतनी विशालकाय और ताकतवर सेना से लड़ने की???

वो दोनों राजपूत घायल अवस्था में बेगड़ा की गिरफ्त में थे, उनके परिवार जौहर की अग्नि में विलीन हो गए थे, चांपानेर और पावागढ़ के दुर्ग तबाह हो गए थे, इस सब के बाद भी राजा जयसिंह ने पूरी दृढ़ता से बेगड़ा को जवाब दिया– इस भूमी पर मेरा वंशानुगत अधिकार है, यह मेरे पूर्वजो द्वारा अर्जित है और इतने महान और कुलीन पूर्वजो की श्रृंखला का वंशज होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि जिस गौरवशाली नाम को उन्होंने मुझे दिया है उसकी इज्जत मरते दम तक बनाए रखू।”

बेगड़ा राजा जय सिंह के इस वीरोचित उत्तर से बहुत प्रभावित हुआ और दोनों राजपूतो को इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिये मनाया लेकिन उनके इनकार करने पर करीब पांच महिनो तक राजा जय सिंह और उनके मंत्री सूरी को घोर यातनाए देकर ईस्लाम कबुल करने का दबाव डाला गया लेकिन वे टस से मस न हुए, उसके बाद उनका शिरछेद कर हत्या कर दी गई।

राजा जयसिंह और उनके मंत्री सूरी का यह बलिदान असंख्य राजपूत वीरो के देश, धर्म और कुल के मान सम्मान के लिये अपना सर्वस्व बलिदान करने की परंपरा का एक अप्रतिम उदाहरण है। आज भी गुजरात में राजा जयसिंह को पतई रावल नाम से याद किया जाता है और उनके बारे में अनेको लोक कहानिया प्रचलित हैँ।

जयसिंह के पुत्र रायसिंह के पुत्र त्र्यंबकसिंह हुए जिनके दो पुत्र थे, 1. पृथ्वीराजजी जिन्होने छोटा उदैपुर रियासत की स्थापना की, 2. डुंगरसिंहजी जिन्होने बारिया रियासत की नींव रखी। ये दोनों रियासत आज भी मौजूद हैँ।

राजपुताना सोच और क्षत्रिय इतिहास

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

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