रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय , वकळ वेशीय ईश्र्वरी

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🙏.        जय माताजी         🙏

🌻🌞🌹शुभ प्रभात 🌹🌞🌻

( रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय , वकळ वेशीय ईश्र्वरी )

दोहा ,
शारदा माता समरु , धरु तो निज ध्यान ,
करजोडी “डोसल” कहे , दियो विधा मुज दान,

सतगुरु मुद समपियो , विधा और विश्र्वास ,
आज रवेशीय अंतरे , अळातम आकाश ,

छंद रुप मुकूंद
आकाश पाताळ तुं धर अंबर , नाग सुर पाय नमे ,
दिगपाल दिगंबर आठ ही डुंगर सात ही शायर तेण समे ,
नव नाथ अने नर चौसठ नारीये हाथ पसारीये तेम हरी ,
  रवराय रवशीय जग प्रवेशीय.वकळ वेशीय इश्वरी.
जीये वकळ वेशीय इश्वरी…..टेक.   `||1||

सतयुग वीसे मही दाणव साथीये , बाथीये कोई न जोत बिया ,
हणीया सर हुकळ हुयशे हाथीये , हारये क्रोड ते़तीस हिया ,
तब साम तणे अंग उुपनी सुंदर , कोई एेकादशी रुप करी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ……… ||2||

मय मोहन रूप हण्यो महि मंडळे लोक ही लोहळ सदय लही ,
सब सो सठ क्रोड दईत संहारण , राह तणे कंठ आव्य रही ,
दळ देव तणे अंग शंख अतीदय , वे लखमी होय नाथ वरी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ……..||3||

तब त्रेता मज तुज ने देवीये , सेवा़ीये कारण रुप सती ,
अदभुत पराक्रम तुज तणे अंग , मोहीयो रावण फेर मती ,
लंक लखण राम पताळ गीयो लेह पेहमे रावण हुत परी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ………||4||

दूवापर अंत हुवो दुरजोधन , मान तंगी बहु राज मही ,
सब सभाविच बोलावीयो शकती , सोय द्रोपतीय आप सही ,
कोई कौरव रे शीर सोंप असो कर खोई दियो सब रा खरी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ………||5||

आ कळ जगमां किधाई उूपर मेंद तणे शीर आव मसी ,
खटमास अती ते परसो खोळीयो , तोळीयो जोगीने आप तसी ,
नन काट मसतक ईम कहे नर , कोई भयंकर साद करी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ………||6||

बोली तब भाट कवेशर बडीयो , पंड्ये मावल भीड पडी ,
सपना तर अंतर आविये चंडिये ,बात असंडीय तीमबडी ,
आपरो सेवग जाण उुंबारीये , कुंभ बोलावीये साद करी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ………||7||

खाधीय सोगंध राणीगे खोटीय , मोटीये देवरी तेम मया ,
ए मकवाण री दशाय ओटीय , जोटीये काढीये तेम ज्या ,
कोई कोप भयंकर राव परे कर बाबाह रे शर कीध बरी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ………||8||

कांक वरण ना जोरथी काढीये आठीये पोर संताप असो ,
मत वीसळरी दशा होय ई माठीये त्राठीये गायडी हेड तसो ,
मारीय वीसळ क्रोध करी माडी ,धाव कव्यारी ध्यान धरी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ………||9||

सवंत अढार पंचाणु नी साल मां ,राघवश घटमांय रमे ,
खेध करतल नाखीये खोदीये , नर मोटा भूप पाय नमे ,
सब्ब चारण का कोई काज सुधारण कारज कीधाय रुप करी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ………||10||
चारणीया मध्य तुंज शकतीये , जयीये राघव सात जमी ,
रंगभीना रंगीला ने खुब रमाडीये , राग रंग हुते फाग रमी ,
रख्य राघवने दीधी असारंग ,कव्य “डोसल” नी भेर करी ,
रवराय रवेशीय जग प्रवेशीय ………||11||

कळस छंद छप्प्य
चौद भुवन तन सार सात पाताळ सवीजे
सपत दीप दधि सात , तसा नवखंड तवीजे ,
अष्टकुळ उच्चार , सिध्ध चोराशी सोहे ,
नवे ग्रहे नवनाथ .मुनी अठयासी माहे ,
रवेशी आई एता रसण , गावे मख मख गाथ ही ,
करी भेर “डोसल” कहे आई मुज अनाथरी ,
:- रचयता .डोसलभाई सांव (गीर)

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

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