Daily Archives: August 3, 2015

वीर दुर्गादास राठौर veer Durgadas Rathore

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Durgadas Rathore

जिसने इस देश का पूर्ण इस्लामीकरण करने की औरंगजेब की साजिश को विफल कर हिन्दू धर्म की रक्षा की थी…..उस महान यौद्धा का नाम है वीर दुर्गादास राठौर…

समय – सोहलवीं – सतरवी शताब्दी
चित्र – वीर शिरोमणि दुर्गा दस राठौड़
स्थान – मारवाड़ राज्य

वीर दुर्गादास राठौड का जन्म मारवाड़ में करनोत ठाकुर आसकरण जी के घर सं. 1695 श्रावन शुक्ला चतुर्दसी को हुआ था। आसकरण जी मारवाड़ राज्य की सेना में जोधपुर नरेश महाराजा जसवंत सिंह जी की सेवा में थे ।अपने पिता की भांति बालक दुर्गादास में भी वीरता कूट कूट कर भरी थी,एक बार जोधपुर राज्य की सेना के ऊंटों को चराते हुए राईके (ऊंटों के चरवाहे) आसकरण जी के खेतों में घुस गए, बालक दुर्गादास के विरोध करने पर भी चरवाहों ने कोई ध्यान नहीं दिया तो वीर युवा दुर्गादास का खून खोल उठा और तलवार निकाल कर झट से ऊंट की गर्दन उड़ा दी,इसकी खबर जब महाराज जसवंत सिंह जी के पास पहुंची तो वे उस वीर बालक को देखने के लिए उतावले हो उठे व अपने सेनिकों को दुर्गादास को लेन का हुक्म दिया ।अपने दरबार में महाराज उस वीर बालक की निडरता व निर्भीकता देख अचंभित रह गए,आस्करण जी ने अपने पुत्र को इतना बड़ा अपराध निर्भीकता से स्वीकारते देखा तो वे सकपका गए। परिचय पूछने पर महाराज को मालूम हुवा की यह आस्करण जी का पुत्र है,तो महाराज ने दुर्गादास को अपने पास बुला कर पीठ थपथपाई और इनाम तलवार भेंट कर अपनी सेना में भर्ती कर लिया।

उस समय महाराजा जसवंत सिंह जी दिल्ली के मुग़ल बादशाह औरंगजेब की सेना में प्रधान सेनापति थे,फिर भी औरंगजेब की नियत जोधपुर राज्य के लिए अच्छी नहीं थी और वह हमेशा जोधपुर हड़पने के लिए मौके की तलाश में रहता था ।सं. 1731 में गुजरात में मुग़ल सल्तनत के खिलाफ विद्रोह को दबाने हेतु जसवंत सिंह जी को भेजा गया,इस विद्रोह को दबाने के बाद महाराजा जसवंत सिंह जी काबुल में पठानों के विद्रोह को दबाने हेतु चल दिए और दुर्गादास की सहायता से पठानों का विद्रोह शांत करने के साथ ही वीर गति को प्राप्त हो गए । उस समय उनके कोई पुत्र नहीं था और उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थी,दोनों ने एक एक पुत्र को जनम दिया,एक पुत्र की रास्ते में ही मौत हो गयी और दुसरे पुत्र अजित सिंह को रास्ते का कांटा समझ कर ओरंग्जेब ने अजित सिंह की हत्या की ठान ली,ओरंग्जेब की इस कुनियत को स्वामी भक्त दुर्गादास ने भांप लिया और मुकंदास की सहायता से स्वांग रचाकर अजित सिंह को दिल्ली से निकाल लाये व अजित सिंह की लालन पालन की समुचित व्यवस्था करने के साथ जोधपुर में गदी के लिए होने वाले ओरंग्जेब संचालित षड्यंत्रों के खिलाफ लोहा लेते अपने कर्तव्य पथ पर बदते रहे।

अजित सिंह के बड़े होने के बाद गद्दी पर बैठाने तक वीर दुर्गादास को जोधपुर राज्य की एकता व स्वतंत्रता के लिए दर दर की ठोकरें खानी पड़ी,ओरंग्जेब का बल व लालच दुर्गादास को नहीं डिगा सका जोधपुर की आजादी के लिए दुर्गादास ने कोई पच्चीस सालों तक सघर्ष किया,लेकिन जीवन के अन्तिम दिनों में दुर्गादास को मारवाड़ छोड़ना पड़ा । महाराज अजित सिंह के कुछ लोगों ने दुर्गादास के खिलाफ कान भर दिए थे जिससे महाराज दुर्गादास से अनमने रहने लगे वस्तु स्तिथि को भांप कर दुर्गादास ने मारवाड़ राज्य छोड़ना ही उचित समझा ।और वे मारवाड़ छोड़ कर उज्जेन चले गए वही शिप्रा नदी के किनारे उन्होने अपने जीवन के अन्तिम दिन गुजारे व वहीं उनका स्वर्गवास हुवा ।दुर्गादास हमारी आने वाली पिडियों के लिए वीरता, देशप्रेम, बलिदान व स्वामिभक्ति के प्रेरणा व आदर्श बने रहेंगे ।

१-मायाड ऐडा पुत जाण, जेड़ा दुर्गादास । भार मुंडासा धामियो, बिन थम्ब आकाश ।
२-घर घोड़ों, खग कामनी, हियो हाथ निज मीत सेलां बाटी सेकणी, श्याम धरम रण नीत ।
वीर दुर्गादास का निधन 22 नवम्बर, सन् 1718 में हुवा था इनका अन्तिम संस्कार शिप्रा नदी के तट पर किया गया था ।
“उनको न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुग़ल शक्ति उनके दृढ हृदये को पीछे हटा सकी। वह एक वीर था जिसमे राजपूती साहस व मुग़ल मंत्री सी कूटनीति थी ”

जिसने इस देश का पूर्ण इस्लामीकरण करने की औरंगजेब की साजिश को विफल कर हिन्दू धर्म की रक्षा की थी…..उस महान यौद्धा का नाम है वीर दुर्गादास राठौर…
इसी वीर दुर्गादास राठौर के बारे में रामा जाट ने कहा था कि “धम्मक धम्मक ढोल बाजे दे दे ठोर नगारां की,, जो आसे के घर दुर्गा नहीं होतो,सुन्नत हो जाती सारां की…….
आज भी मारवाड़ के गाँवों में लोग वीर दुर्गादास को याद करते है कि
“माई ऐहा पूत जण जेहा दुर्गादास, बांध मरुधरा राखियो बिन खंभा आकाश”
हिंदुत्व की रक्षा के लिए उनका स्वयं का कथन
“रुक बल एण हिन्दू धर्म राखियों”
अर्थात हिन्दू धर्म की रक्षा मैंने भाले की नोक से की…………
इनके बारे में कहा जाता है कि इन्होने सारी उम्र घोड़े की पीठ पर बैठकर बिता दी।
अपनी कूटनीति से इन्होने ओरंगजेब के पुत्र अकबर को अपनी और मिलाकर,राजपूताने और महाराष्ट्र की सभी हिन्दू शक्तियों को जोडकर ओरंगजेब की रातो की नींद छीन ली थी।और हिंदुत्व की रक्षा की थी।
उनके बारे में इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने कहा था कि …..
“उनको न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुगलों की शक्ति उनके दृढ निश्चय को पीछे हटा सकी,बल्कि वो ऐसा वीर था जिसमे राजपूती साहस और कूटनीति मिश्रित थी”.

ये निर्विवाद सत्य है कि अगर उस दौर में वीर दुर्गादास राठौर,छत्रपति शिवाजी,वीर गोकुल,गुरु गोविन्द सिंह,बंदा सिंह बहादुर जैसे शूरवीर पैदा नहीं होते तो पुरे मध्य एशिया,ईरान की तरह भारत का पूर्ण इस्लामीकरण हो जाता और हिन्दू धर्म का नामोनिशान ही मिट जाता…………

28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया था उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थी इसलिए वीर शिरोमणि दुर्गादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया | और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक एक पुत्र को जन्म दिया,बड़े राजकुमार नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गया

ये वही वीर दुर्गा दास राठौड़ जो जोधपुर के महाराजा को औरंगज़ेब के चुंगल ले निकल कर लाये थे जब जोधपुर महाराजा अजित सिंह गर्भ में थे उनके पिता की मुर्त्यु हो चुकी थी तब औरंगज़ेब उन्हें अपने संरक्षण में दिल्ली दरबार ले गया था उस वक़्त वीर दुर्गा दास राठौड़ चार सो चुने हुए राजपूत वीरो को लेकर दिल्ली गए और युद्ध में मुगलो को चकमा देकर महाराजा को मारवाड़ ले आये…..

उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह मेड़तिया की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थी | उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई | यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी ,दुर्गादास,ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास,कु.हरिसिघ के अलावा किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है |

छ:माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती,नहलाती व कपडे पहनाती ताकि किसी को पता न चले पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को बता दी,अत: अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने मायके जाने का बहाना कर खिंची मुक्न्दास व कु.हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में अपने एक परिचित व निष्टावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई व राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा जहाँ उसकी (जयदेव)की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया |
((वीर दुर्गादास राठौड़ के सिक्के और पोस्ट स्टाम्प भारत सरकार पहले ही जारी कर चुकी है ))

History & Literature

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बुन्देल केसरी,मुग़लो के काल महाराजा छत्रसाल Bundel Kesari Maharaja Chhatrasal

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Maharaja Chhatrasal Bundela

बुन्देल केसरी,मुग़लो के काल महाराजा छत्रसाल

आज ही के दिन दिनांक 04 मई 1649 ईस्वी को महाराजा छत्रसाल का जन्म हुआ था।
कम आयु में ही अनाथ हो गए वीर बालक छत्रसाल ने छत्रपति शिवाजी से प्रभावित होकर अपनी छोटी सी सेना बनाई और मुगल बादशाह औरंगजेब से जमकर लोहा लिया और मुग़लो के सबसे ताकतवर काल में उनकी नाक के नीचे एक बड़े भूभाग को जीतकर एक विशाल स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।

बुन्देलखंड की भूमि प्राकृतिक सुषमा और शौर्य पराक्रम की भूमि है, जो विंध्याचल पर्वत की पहाड़ियों से घिरी है। चंपतराय जिन्होंने बुन्देलखंड में बुन्देला राज्य की आधार शिला रखी थी, महाराज छत्रसाल ने उस बुन्देला राज्य को ना केवल पुनर्स्थापित किया बल्कि उसका विस्तार कर के उसे समृद्धि प्रदान की।
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====जीवन परिचय====
महाराजा छत्रसाल का जन्म गहरवार (गहड़वाल) वंश की बुंदेला शाखा के राजपूतो में हुआ था,काशी के गहरवार राजा वीरभद्र के पुत्र हेमकरण जिनका दूसरा नाम पंचम सिंह गहरवार भी था,वो विंध्यवासिनी देवी के अनन्य भक्त थे,जिस कारण उन्हें विन्ध्य्वाला भी कहा जाता था,इस कारण राजा हेमकरण के वंशज विन्ध्य्वाला या बुंदेला कहलाए,हेमकर्ण की वंश परंपरा में सन 1501 में ओरछा में रुद्रप्रताप सिंह राज्यारूढ़ हुए, जिनके पुत्रों में ज्येष्ठ भारतीचंद्र 1539 में ओरछा के राजा बने तब बंटवारे में राव उदयजीत सिंह को महेबा (महोबा नहीं) का जागीरदार बनाया गया, इन्ही की वंश परंपरा में चंपतराय महेबा गद्दी पर आसीन हुए।

चम्पतराय बहुत ही वीर व बहादुर थे। उन्होंने मुग़लो के खिलाफ बगावत करी हुई थी और लगातार युद्धों में व्यस्त रहते थे। चम्पतराय के साथ युद्ध क्षेत्र में रानी लालकुँवरि भी साथ ही रहती थीं और अपने पति को उत्साहित करती रहती थीं। छत्रसाल का जन्म दिनांक 04 मई 1649 ईस्वी को पहाड़ी नामक गाँव में हुआ था। गर्भस्थ शिशु छत्रसाल तलवारों की खनक और युद्ध की भयंकर मारकाट के बीच बड़े हुए। यही युद्ध के प्रभाव उनके जीवन पर असर डालते रहे और माता लालकुँवरि की धर्म व संस्कृति से संबंधित कहानियाँ बालक छत्रसाल को बहादुर बनाती रहीं।

छत्रसाल के पिता चंपतराय जब मुग़ल सेना से घिर गये तो उन्होंने अपनी पत्नी ‘रानी लाल कुंवरि’ के साथ अपनी ही कटार से प्राण त्याग दिये, किंतु मुग़लों के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।
छत्रसाल उस समय चौदह वर्ष की आयु के थे। क्षेत्र में ही उनके पिता के अनेक दुश्मन थे जो उनके खून के प्यासे थे। इनसे बचते हुए और युद्ध की कला सीखते हुए उन्होंने अपना बचपन बिताया। अपने बड़े भाई ‘अंगद राय’ के साथ वह कुछ दिनों मामा के घर रहे, किंतु उनके मन में सदैव मुग़लों से बदला लेकर पितृ ऋण से मुक्त होने की अभिलाषा थी। बालक छत्रसाल मामा के यहाँ रहता हुआ अस्त्र-शस्त्रों का संचालन और युद्ध कला में पारंगत होता रहा। अपने पिता के वचन को ही पूरा करने के लिए छत्रसाल ने पंवार वंश की कन्या ‘देवकुंवरि’ से विवाह किया।
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====छत्रपति शिवाजी से सम्पर्क और ओरंगजेब से संघर्ष=====

दस वर्ष की अवस्था तक छत्रसाल कुशल सैनिक बन गए थे। अंगद राय ने जब सैनिक बनकर राजा जयसिंह के यहाँ कार्य करना चाहा तो छोटे भाई छत्रसाल को यह सहन नहीं हुआ। छत्रसाल ने अपनी माता के कुछ गहने बेचकर एक छोटी सा सैनिक दल तैयार करने का विचार किया। छोटी सी पूंजी से उन्होंने 30 घुड़सवार और 347 पैदल सैनिकों का एक दल बनाया और मुग़लों पर आक्रमण करने की तैयारी की। 22 वर्ष की आयु में छत्रसाल युद्ध भूमि में कूद पड़े। छत्रसाल बहुत दूरदर्शी थे। उन्होंने पहले ऐसे लोगों को हटाया जो मुग़लों की मदद कर रहे थे।

सन 1668 ईस्वी में उन्होंने दक्षिण में छत्रपति शिवाजी से भेट की,शिवाजी ने उनका हौसला बढ़ाते हुए उन्हें वापस बुंदेलखंड जाकर मुगलों से अपनी मात्रभूमि स्वतंत्र कराने का निर्देश दिया,
शिवाजी ने छत्रसाल को उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियों का आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापना की मंत्रणा दी एवं समर्थ गुरु रामदास के आशीषों सहित ‘भवानी’ तलवार भेंट की-

करो देस के राज छतारे
हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।
दौर देस मुग़लन को मारो
दपटि दिली के दल संहारो।
तुम हो महावीर मरदाने
करि हो भूमि भोग हम जाने।
जो इतही तुमको हम राखें
तो सब सुयस हमारे भाषें।

छत्रसाल ने वापिस अपने गृह क्षेत्र आकर मुग़लो के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत कर दी। इसमें उनको गुरु प्राणनाथ का बहुत साथ मिला। दक्षिण भारत में जो स्थान समर्थगुरु रामदास का है वही स्थान बुन्देलखंड में ‘प्राणनाथ’ का रहा है, प्राणनाथ छत्रसाल के मार्ग दर्शक, अध्यात्मिक गुरु और विचारक थे.. जिस प्रकार समर्थ गुरु रामदास के कुशल निर्देशन में छत्रपति शिवाजी ने अपने पौरुष, पराक्रम और चातुर्य से मुग़लों के छक्के छुड़ा दिए थे, ठीक उसी प्रकार गुरु प्राणनाथ के मार्गदर्शन में छत्रसाल ने अपनी वीरता से, चातुर्यपूर्ण रणनीति से और कौशल से विदेशियों को परास्त किया। .

छत्रसाल ने पहला युद्ध अपने माता-पिता के साथ विश्वासघात करने वाले सेहरा के धंधेरों से किया हाशिम खां को मार डाला और सिरोंज एवं तिबरा लूट डाले गये लूट की सारी संपत्ति छत्रसाल ने अपने सैनिकों में बाँटकर पूरे क्षेत्र के लोगों को उनकी सेना में सम्मिलित होने के लिए आकर्षित किया। कुछ ही समय में छत्रसाल की सेना में भारी वृद्धि होने लगी और उन्हेांने धमोनी, मेहर, बाँसा और पवाया आदि जीतकर कब्जे में कर लिए। ग्वालियर-खजाना लूटकर सूबेदार मुनव्वर खां की सेना को पराजित किया, बाद में नरवर भी जीता।
ग्वालियर की लूट से छत्रसाल को सवा करोड़ रुपये प्राप्त हुए पर औरंगजेब इससे छत्रसाल पर टूट-सा पड़ा। उसने सेनपति रुहल्ला खां के नेतृत्व में आठ सवारों सहित तीस हजारी सेना भेजकर गढ़ाकोटा के पास छत्रसाल पर धावा बोल दिया। घमासान युद्ध हुआ पर दणदूल्हा (रुहल्ला खां) न केवल पराजित हुआ वरन भरपूर युद्ध सामग्री छोड़कर जन बचाकर उसे भागना पड़ा।

बार बार युद्ध करने के बाद भी औरंगज़ेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। छत्रसाल को मालूम था कि मुग़ल छलपूर्ण घेराबंदी में सिद्धहस्त है। उनके पिता चंपतराय मुग़लों से धोखा खा चुके थे। छत्रसाल ने मुग़ल सेना से इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर लड़ाई लड़ी और मुग़लों को धूल चटाई। छत्रसाल की शक्ति निरंतर बढ़ती गयी। बन्दी बनाये गये मुग़ल सरदारों से छत्रसाल ने दंड वसूला और उन्हें मुक्त कर दिया। धीरे धीरे बुन्देलखंड से मुग़लों का एकछत्र शासन छत्रसाल ने समाप्त कर दिया।

छत्रसाल के शौर्य और पराक्रम से आहत होकर मुग़ल सरदार तहवर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन, हमीद बुन्देलखंड से दिल्ली का रुख़ कर चुके थे। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ लड़ाई में मारा गया और मुराद ख़ाँ, दलेह ख़ाँ, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार बुन्देला वीरों से पराजित होकर भाग गये थे।
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====राज्याभिषेक और राज्य विस्तार====

छत्रसाल के राष्ट्र प्रेम, वीरता और हिन्दूत्व के कारण छत्रसाल को भारी जन समर्थन प्राप्त था। छत्रसाल ने एक विशाल सेना तैयार कर ली जिसमे क्षेत्र के सभी राजपूत वंशो के योद्धा शामिल थे। इसमें 72 प्रमुख सरदार थे। वसिया के युद्ध के बाद मुग़लों ने भी छत्रसाल को ‘राजा’ की मान्यता प्रदान कर दी थी। उसके बाद महाराजा छत्रसाल ने ‘कालिंजर का क़िला’ भी जीता और मांधाता चौबे को क़िलेदार घोषित किया। छत्रसाल ने 1678 में पन्ना में अपनी राजधानी स्थापित की और विक्रम संवत 1744 मे योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया।

छत्रसाल के गुरु प्राणनाथ आजीवन हिन्दू मुस्लिम एकता के संदेश देते रहे। उनके द्वारा दिये गये उपदेश ‘कुलजम स्वरूप’ में एकत्र किये गये। पन्ना में प्राणनाथ का समाधि स्थल है जो अनुयायियों का तीर्थ स्थल है। प्राणनाथ ने इस अंचल को रत्नगर्भा होने का वरदान दिया था। किंवदन्ती है कि जहाँ तक छत्रसाल के घोड़े की टापों के पदचाप बनी वह धरा धनधान्य, रत्न संपन्न हो गयी। छत्रसाल के विशाल राज्य के विस्तार के बारे में यह पंक्तियाँ गौरव के साथ दोहरायी जाती है-
‘इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोस छत्रसाल सों लरन की रही न काहू हौस।’

बुंदेलखंड की शीर्ष उन्नति इन्हीं के काल में हुई। छत्रसाल के समय में बुंदेलखंड की सीमायें अत्यंत व्यापक हो गई। इस प्रदेश में उत्तर प्रदेश के झाँसी, हमीरपुर, जालौन, बाँदा, मध्य प्रदेश के सागर, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, मण्डला, मालवा संघ के शिवपुरी, कटेरा, पिछोर, कोलारस, भिण्ड और मोण्डेर के ज़िले और परगने शामिल थे। छत्रसाल ने लगातार युद्धों और आपस में लूट मार से त्रस्त इस पिछड़े क्षेत्र को एक क्षत्र के निचे लाकर वहॉ शांति स्थापित की जिससे बुंदेलखंड का पहली बार इतना विकास संभव हो सका।

छत्रसाल का राज्य प्रसिद्ध चंदेल महाराजा कीर्तिवर्धन से भी बड़ा था। कई शहर भी इन्होंने ही बसाए जिनमे छतरपुर शामिल है। छत्रसाल तलवार के धनी थे और कुशल शस्त्र संचालक थे। वह शस्त्रों का आदर करते थे। लेकिन साथ ही वह विद्वानों का बहुत सम्मान करते थे और स्वयं भी बहुत विद्वान थे। वह उच्च कोटि के कवि भी थे, जिनकी भक्ति तथा नीति संबंधी कविताएँ ब्रजभाषा में प्राप्त होती हैं। इनके आश्रित दरबारी कवियों में भूषण, लालकवि, हरिकेश, निवाज, ब्रजभूषण आदि मुख्य हैं। भूषण ने आपकी प्रशंसा में जो कविताएँ लिखीं वे ‘छत्रसाल दशक’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। ‘छत्रप्रकाश’ जैसे चरितकाव्य के प्रणेता गोरेलाल उपनाम ‘लाल कवि’ आपके ही दरबार में थे। यह ग्रंथ तत्कालीन ऐतिहासिक सूचनाओं से भरा है, साथ ही छत्रसाल की जीवनी के लिए उपयोगी है। उन्होंने कला और संगीत को भी बढ़ावा दिया, बुंदेलखंड में अनेको निर्माण उन्होंने करवाए। छत्रसाल धार्मिक स्वभाव के थे। युद्धभूमि में व शांतिकाल में दैनिक पूजा अर्चना करना छत्रसाल का कार्य रहा।
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====कवि भूषण द्वारा छत्रसाल की प्रशंसा====

कविराज भूषण ने शिवाजी के दरबार में रहते हुए छत्रसाल की वीरता और बहादुरी की प्रशंसा में अनेक कविताएँ लिखीं। ‘छत्रसाल दशक’ में इस वीर बुंदेले के शौर्य और पराक्रम की गाथा गाई गई है।
छत्रसाल की प्रशंसा करते हुए कवि भूषण दुविधा में पड़ गये और लिखा कि—–
“और राव राजा एक,मन में लायुं अब ,
शिवा को सराहूँ या सराहूँ छत्रसाल को”
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====मुगल सेनापति बंगश का हमला और पेशवा बाजीराव का सहयोग====

महाराज छत्रसाल अपने समय के महान शूरवीर, संगठक, कुशल और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल को अपने जीवन की संध्या में भी आक्रमणों से जूझना पडा।सन 1729 में सम्राट मुहम्मद शाह के शासन काल में प्रयाग के सूबेदार बंगस ने छत्रसाल पर आक्रमण किया। उसकी इच्छा एरच, कौच, सेहुड़ा, सोपरी, जालोन पर अधिकार कर लेने की थी। छत्रसाल को मुग़लों से लड़ने में दतिया, सेहुड़ा के राजाओं ने सहयोग नहीं दिया। उनका पुत्र हृदयशाह भी उदासीन होकर अपनी जागीर में बैठा रहा। तब छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को संदेश भेजा –
‘जो गति मई गजेन्द्र की सोगति पहुंची आय
बाजी जात बुन्देल की राखो बाजीराव’

बाजीराव सेना सहित सहायता के लिये पहुंचा और उसने बंगस को 30 मार्च 1729 को पराजित कर दिया। बंगस हार कर वापिस लौट गया।

4 अप्रैल 1729 को छत्रसाल ने विजय उत्सव मनाया। इस विजयोत्सव में बाजीराव का अभिनन्दन किया गया और बाजीराव को अपना तीसरा पुत्र स्वीकार कर मदद के बदले अपने राज्य का तीसरा भाग बाजीराव पेशवा को सौंप दिया, जिस पर पेशवा ने अपनी ब्राह्मण जाति के लोगो को सामन्त नियुक्त किया।

प्रथम पुत्र हृदयशाह पन्ना, मऊ, गढ़कोटा, कालिंजर, एरिछ, धामोनी इलाका के जमींदार हो गये जिसकी आमदनी 42 लाख रू. थी।
दूसरे पुत्र जगतराय को जैतपुर, अजयगढ़, चरखारी, नांदा, सरिला, इलाका सौपा गया जिसकी आय 36 लाख थी।
बाजीराव पेशवा को काल्पी, जालौन, गुरसराय, गुना, हटा, सागर, हृदय नगर मिलाकर 33 लाख आय की जागीर सौपी गयी।
—————————————
=====निधन====
छत्रसाल ने अपने दोनों पुत्रों ज्येष्ठ जगतराज और कनिष्ठ हिरदेशाह को बराबरी का हिस्सा, जनता को समृद्धि और शांति से राज्य-संचालन हेतु बांटकर अपनी विदा वेला का दायित्व निभाया।
इस वीर बहादुर छत्रसाल का 83 वर्ष की अवस्था में 13 मई 1731 ईस्वी को मृत्यु हो गयी। छत्रसाल के लिए कहावत है –
‘छत्ता तेरे राज में,
धक-धक धरती होय।
जित-जित घोड़ा मुख करे,
तित-तित फत्ते होय।’

मध्यकालीन भारत में विदेशी आतताइयों से सतत संघर्ष करने वालों में छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप और बुंदेल केसरी छत्रसाल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, परंतु जिन्हें उत्तराधिकार में सत्ता नहीं वरन ‘शत्रु और संघर्ष’ ही विरासत में मिले हों, ऐसे बुंदेल केसरी छत्रसाल ने वस्तुतः अपने पूरे जीवनभर स्वतंत्रता और सृजन के लिए ही सतत संघर्ष किया। शून्य से अपनी यात्रा प्रारंभ कर आकाश-सी ऊंचाई का स्पर्श किया। उन्होंने विस्तृत बुंदेलखंड राज्य की गरिमामय स्थापना ही नहीं की थी, वरन साहित्य सृजन कर जीवंत काव्य भी रचे। छत्रसाल ने अपने 82 वर्ष के जीवन और 44 वर्षीय राज्यकाल में 52 युद्ध किये थे। शौर्य और सृजन की ऐसी उपलब्धि बेमिसाल है-
‘‘इत जमना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस।
छत्रसाल से लरन की रही न काह होंस।’’

History & Literature

“राजपूताना राइफल्स” की ऐसी 17 बातें जिन्हें जानकर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा Rajputana Rifles

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“राजपूताना राइफल्स” की ऐसी 17 बातें जिन्हें जानकर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा
1. ‘राजपूताना राइफल्स’ इंडियन आर्मी का सबसे पुराना
और सम्मानित राइफल रेजिमेंट है. इसे 1921 में ब्रिटिश
इंडियन आर्मी के तौर पर विकसित किया गया था.
2. सन् 1945 से पहले इसे 6 राजपूताना राइफल्स के तौर पर जाना जाता था क्योंकि, इसे तब की ब्रिटिश इंडियन
आर्मी के 6 रेजिमेंट्स के विलय के बाद बनाया गया था.
3. राजपूताना राइफल्स को मुख्यत: पाकिस्तान के साथ
युद्ध के लिए जाना जाता है.
4. 1953-1954 में वे कोरिया में चल रहे संयुक्त राष्ट्र संरक्षक सेना का हिस्सा थे. साथ ही वे 1962 में कौंगो में चले संयुक्त राष्ट्र मिशन का भी हिस्सा थे.
5. राजपूताना राइफल्स की स्थापना 1775 में की गई थी,
जब तात्कालिक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने राजपूत लड़ाकों
की क्षमता को देखते हुए उन्हें अपने मिशन में भरती कर
लिया.
6. तब की बनी स्थानीय यूनिट को 5वीं बटालियन बंबई
सिपाही का नाम दिया गया था. इसे 1778 में 9वीं
बटालियन बंबई सिपाही के तौर पर रि-डिजाइन किया
गया था. रेजिमेंट को 1921 में फ़ाइनल शेप देने से पहले 5बार रि-डिजाइन किया गया.
7. 2 राजपूताना राइफल्स वहां लड़ने वाली 7 आर्मी
यूनिट्स में से पहली यूनिट थी, जिसे 1999 में हुए कारगिल
युद्ध में बहादुरी के लिए आधिकारिक तौर पर सम्मान पत्र से
नवाज़ा गया था.
8. राजपूताना राइफल्स का आदर्श और सिद्धांत वाक्य
“वीर भोग्या वसुंधरा” है. जिसका अर्थ है कि ‘केवल वीर और शक्तिशाली लोग ही इस धरती का उपभोग कर सकते हैं’. अब और कुछ बाकी है क्या?
9. राजपूताना राइफल्स का युद्धघोष है… “राजा रामचन्द्र
की जय”
10. राजपूतों के अलावा, राजपूताना राइफल्स में अब जाट,
अहीर, गुज्जर और मुस्लिमों की भी थोडी संख्या है.
11. प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान राजपूताना
राइफल्स के लगभग 30,000 सैनिकों ने अपनी जान गंवा दी.
12. मध्यकालीन राजपूतों का हथियार कटार और बिगुल
राजपूत रेजिमेंट का प्रतीक चिन्ह है.
13. राजपूत रेजिमेंट और राजपूताना राइफल्स दो अलग-अलग आर्मी यूनिट हैं.
14. दिल्ली में स्थित राजपूताना म्यूजियम राजपूताना
राइफल्स के समृद्ध इतिहास की बेहतरीन झलक है. यह पूरे
भारत के बेहतरीन सेना म्यूजियमों में से एक है.
15. 6th बटालियन राजपूताना राइफल्स के कम्पनी हवलदार मेजर पीरू सिंह शेखावत को 1948 में हुए भारत-पाक युद्ध के बाद, मरणोपरांत सेना में अदम्य साहस के लिए दिए जाने वाले तमगे “परम वीर चक्र” से नवाज़ा गया.
16. राजपूताना राइफल्स को आज़ादी पूर्व 6 विक्टोरिया
क्रॉस से नवाज़ा गया है. जो अदम्य साहस, इच्छाशक्ति और
अभूतपूर्व सेवाभाव का परिचायक है.
17. राजपूताना राइफल्स के अधिकतर मेंबरान अपनी विशेष शैली की मूछों के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं.
अब तक आपको इतना तो समझ में आ ही गया होगा कि
पूरी दुनिया की फौजें और ख़ास तौर पर पाकिस्तान और
चीन की फौज “राजपूताना राइफल्स” से इतना ख़ौफ क्यों
खाती हैं.

History & Literature

पृथ्वीराज चौहान के काका श्री *कन्ह*के युद्ध वर्णन का कवित्त 💥

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पृथ्वीराज चौहान के काका श्री *कन्ह*के युद्ध वर्णन का कवित्त 💥
कालंजर इक लख्ख,
सार सिंधुरह गुड़ावै !
मार मार मुख चवै,
सिंघ सिंघा मुख धावै!!
दौरि *कन्ह* नर नाह,
पटी छुट्टी अंखिन पर!
हथ्थ लाइ किरवार ,
रूंडमाला निन्निय हर!!
विहु बाह लख्ख लौहे परिय ,
छानि करिब्बर दाह किय !
उच्छारि पारि धरि उप्परें ,
कलह कियौ कि उघान किय !!–

(चंदवरदाई रचित “पृथ्वीराज रासौ”से अवतरित *घग्घर नदी का युद्ध* में पृथ्वीराज चौहान के काका श्री *कन्ह*के युद्ध वर्णन का यह कवित्त है! कहते है कि यह कन्ह महारथी तथा अति वचन पालने वाला राजपूत था!

इनका प्रण था कि मेरे सामने यदि किसी ने अपनी मूंछ पर हाथ भी रखा तो फिर चाहे वो कोई भी व्यक्ति क्यों न हो?मैं उसका सिर छैंदन कर दूंगा या स्वंय मर मिटूंगा!इसलिऐ पृथ्वी राज चौहान के पिता सामैश्वर चौहान ने अपनी शपथ दैकर कन्ह की ऑखौं पर सदैव पट्टी बांधकर रखने को राजी
किया!
इस युद्ध में ही पृथ्वीराज चौहान के विशेष आग्रह पर पट्टी उतार दी गई तथा गौरी के प्रमुख सैनानायक ने जब मूंछों पर हाथ रखा तो उसकों हाथी पर सवार ही नही होने दिया तथा शिख से नख तक चीर कर दो भाग कर दिये!)
संकलन्:-रिड़मल दान दैथा , सात
साभार: Kathiyawad Glory

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दिल्ली के तंवर/तोमर राजपूत वंश का तुर्कों के विरुद्ध संघर्ष Dilipati Tomar/Tanvar/Tanwar Rajvansh

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दिल्ली के तंवर/तोमर राजपूत वंश का तुर्कों के विरुद्ध संघर्ष

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Anangpal Tomar

—–भारत पर इस्लामिक आक्रमण——

सन 632 ईस्वी में मौहम्मद साहब की मृत्यु के उपरांत छ: वर्षों के अंदर ही अरबों ने सीरिया,मिस्र,ईरान,इराक,उत्तरी अफ्रीका,स्पेन को जीत लिया था और उनका इस्लामिक साम्राज्य फ़्रांस के लायर नामक स्थान से लेकर भारत के काबुल नदी तक पहुँच गया था,एक दशक के भीतर ही उन्होंने लगभग समूचे मध्य पूर्व का इस्लामीकरण कर दिया था और इस्लाम की जोशीली धारा स्पेन,फ़्रांस में घुसकर यूरोप तक में दस्तक दे रही थी,अब एशिया में चीन और भारतवर्ष ही इससे अछूते थे.

सन 712 ईस्वी में खलीफा के आदेश पर मुहम्मद बिन कासिम के नेत्रत्व में भारत के सिंध राज्य पर हमला किया गया जिसमे सिंध के राजा दाहिर की हार हुई और सिंध पर अरबों का अधिकार हो गया,इस युद्ध में सिंध की जाट जाति ने भी अरबो का साथ दिया था क्योंकि सिंध में जाटों के साथ अछूत जैसा बर्ताव होता था,किन्तु इसका उन्हें कोई लाभ नहीं मिला क्योंकि विजेता अरबों ने भी वही सामाजिक व्यवस्था बनाये रखी.

अरबों ने इसके बाद भारत के भीतरी इलाको में राजस्थान,गुजरात तक हमले किये,पर प्रतिहार राजपूत नागभट और बाप्पा रावल गुहिलौत ने संयुक्त मौर्चा बनाकर अरबों को करारी मात दी,अरबों ने चित्तौड के मौर्य,वल्लभी के मैत्रक,भीनमाल के चावड़ा,साम्भर के चौहान राजपूत, राज्यों पर भी हमले किये मगर उन्हें सफलता नहीं मिली,

दक्षिण के राष्ट्रकूट और चालुक्य शासको ने भी अरबो के विरुद्ध संघर्ष में सहायता की,कुछ समय पश्चात् सिंध पुन: सुमरा और सम्मा राजपूतो के नेत्रत्व में स्वाधीन हो गया और अरबों का राज बहुत थोड़े से क्षेत्र पर रह गया.
किसी मुस्लिम इतिहासकार ने लिखा भी है कि “इस्लाम की जोशीली धारा जो हिन्द को डुबाने आई थी वो सिंध के छोटे से इलाके में एक नाले के रूप में बहने लगी,अरबों की सिंध विजय के कई सौ वर्ष बाद भी न तो यहाँ किसी भारतीय ने इस्लाम धर्म अपनाया है न ही यहाँ कोई अरबी भाषा जानता है”
अरब तो भारत में सफल नहीं हुए पर मध्य एशिया से तुर्क नामक एक नई शक्ति आई जिसने कुछ समय पूर्व ही बौद्ध धर्म छोडकर इस्लाम धर्म ग्रहण किया था,
अल्पतगीन नाम के तुर्क सरदार ने गजनी में राज्य स्थापित किया,फिर उसके दामाद सुबुक्तगीन ने काबुल और जाबुल के हिन्दू शाही जंजुआ राजपूत राजा जयपाल पर हमला किया,
जंजुआ राजपूत वंश भी तोमर वंश की शाखा है और अब अधिकतर पाकिस्तान के पंजाब में मिलते हैं और अब मुस्लिम हैं कुछ थोड़े से हिन्दू जंजुआ राजपूत भारतीय पंजाब में भी मिलते हैं ।

उस समय अधिकांश अफगानिस्तान(उपगणस्तान),और समूचे पंजाब पर जंजुआ शाही राजपूतो का शासन था,
सुबुक्तगीन के बाद उसके पुत्र महमूद गजनवी ने इस्लाम के प्रचार और धन लूटने के उद्देश्य से भारत पर सन 1000 ईस्वी से लेकर 1026 ईस्वी तक कुल 17 हमले किये,जिनमे पंजाब का शाही जंजुआ राजपूत राज्य पूरी तरह समाप्त हो गया और उसने सोमनाथ मन्दिर गुजरात, कन्नौज, मथुरा,कालिंजर,नगरकोट(कटोच),थानेश्वर तक हमले किये और लाखो हिन्दुओं की हत्याएं,बलात धर्मपरिवर्तन,लूटपाट हुई,

ऐसे में दिल्ली के तंवर/तोमर राजपूत वंश ने अन्य राजपूतो के साथ मिलकर इसका सामना करने का निश्चय किया,

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दिल्लीपति राजा जयपालदेव तोमर(1005-1021)—–

गज़नवी वंश के आरंभिक आक्रमणों के समय दिल्ली-थानेश्वर का तोमर वंश पर्याप्त समुन्नत अवस्था में था।महमूद गजनवी ने जब सुना कि थानेश्वर में बहुत से हिन्दू मंदिर हैं और उनमे खूब सारा सोना है तो उन्हें लूटने की लालसा लिए उसने थानेश्वर की और कूच किया,थानेश्वर के मंदिरों की रक्षा के लिए दिल्ली के राजा जयपालदेव तोमर ने उससे कड़ा संघर्ष किया,किन्तु दुश्मन की अधिक संख्या होने के कारण उसकी हार हुई,तोमरराज ने थानेश्वर को महमूद से बचाने का प्रयत्न भी किया, यद्यपि उसे सफलता न मिली।और महमूद ने थानेश्वर में जमकर रक्तपात और लूटपाट की.

दिल्लीपति राजा कुमार देव तोमर(1021-1051)—-

सन् 1038 ईo (संo १०९५) महमूद के भानजे मसूद ने हांसी पर अधिकार कर लिया। और थानेश्वर को हस्तगत किया। दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी होने लगी। ऐसा प्रतीत होता था कि मुसलमान दिल्ली राज्य की समाप्ति किए बिना चैन न लेंगे।किंतु तोमरों ने साहस से काम लिया।
गजनी के सुल्तान को मार भगाने वाले कुमारपाल तोमर ने दुसरे राजपूत राजाओं के साथ मिलकर हांसी और आसपास से मुसलमानों को मार भगाया.

अब भारत के वीरो ने आगे बढकर पहाड़ो में स्थित कांगड़ा का किला जा घेरा जो तुर्कों के कब्जे में चला गया था,चार माह के घेरे के बाद नगरकोट(कांगड़ा)का किला जिसे भीमनगर भी कहा जाता है को राजपूत वीरो ने तुर्कों से मुक्त करा लिया और वहां पुन:मंदिरों की स्थापना की.

लाहौर का घेरा——
इ सके बाद कुमारपाल देव तोमर की सेना ने लाहौर का घेरा डाल दिया,वो भारत से तुर्कों को पूरी तरह बाहर निकालने के लिए कटिबद्ध था.इतिहासकार गांगुली का अनुमान है कि इस अभियान में राजा भोज परमार,कर्ण कलचुरी,राजा अनहिल चौहान ने भी कुमारपाल तोमर की सहायता की थी.किन्तु गजनी से अतिरिक्त सेना आ जाने के कारण यह घेरा सफल नहीं रहा.

नगरकोट कांगड़ा का द्वितीय घेरा(1051 ईस्वी)—–

गजनी के सुल्तान अब्दुलरशीद ने पंजाब के सूबेदार हाजिब को कांगड़ा का किला दोबारा जीतने का निर्देश दिया,मुसलमानों ने दुर्ग का घेरा डाला और छठे दिन दुर्ग की दीवार टूटी,विकट युद्ध हुआ और इतिहासकार हरिहर दिवेदी के अनुसार कुमारपाल देव तोमर बहादुरी से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ.अब रावी नदी गजनी और भारत के मध्य की सीमा बन गई.
मुस्लिम इतिहासकार बैहाकी के अनुसार “राजपूतो ने इस युद्ध में प्राणप्रण से युद्ध किया,यह युद्ध उनकी वीरता के अनुरूप था,अंत में पांच सुरंग लगाकर किले की दीवारों को गिराया गया,जिसके बाद हुए युद्ध में तुर्कों की जीत हुई और उनका किले पर अधिकार हो गया.”

इस प्रकार हम देखते हैं कि दिल्लीपति कुमारपाल देव तोमर एक महान नायक था उसकी सेना ने न केवल हांसी और थानेश्वर के दुर्ग ही हस्तगत न किए; उसकी वीर वाहिनी ने काँगड़े पर भी अपनी विजयध्वजा कुछ समय के लिये फहरा दी। लाहौर भी तँवरों के हाथों से भाग्यवशात् ही बच गया।

दिल्लीपती राजाअनंगपाल-II ( 1051-1081 )—–

उनके समय तुर्क इबराहीम ने हमला किया जिसमें अनगपाल द्वितीय खुद युद्ध लड़ने गये,,,, युद्ध में एक समय आया कि तुर्क इबराहीम ओर अनगपाल कि आमना सामना हो गया। अनंगपाल ने अपनी तलवार से इबराहीम की गर्दन ऊडा दि थी। एक राजा द्वारा किसी तुर्क बादशाह की युद्ध में गर्दन उडाना भी एक महान उपलब्धि है तभी तो अनंगपाल की तलवार पर कई कहावत प्रचलित हैं।

जहिं असिवर तोडिय रिउ कवालु, णरणाहु पसिद्धउ अणंगवालु ||
वलभर कम्पाविउ णायरायु, माणिणियण मणसंजनीय ||

The ruler Anangapal is famous, he can slay his enemies with his sword. The weight (of the Iron pillar) caused the Nagaraj to shake.

तुर्क हमलावर मौहम्मद गौरी के विरुद्ध तराइन के युद्ध में तोमर राजपूतो की वीरता—
दिल्लीपति राजा चाहाडपाल/गोविंदराज तोमर (1189-1192)—–

गोविन्दराज तोमर पृथ्वीराज चौहान के साथ मिलकर तराइन के दोनों युद्धों में लड़ें,
पृथ्वीराज रासो के अनुसार तराईन के पहले युद्ध में मौहम्मद गौरी और गोविन्दराज तोमर का आमना सामना हुआ था,जिसमे दोनों घायल हुए थे और गौरी हारकर भाग रहा था। भागते हुए गौरी को धीरसिंह पुंडीर ने पकडकर बंदी बना लिया था। जिसे उदारता दिखाते हुए पृथ्वीराज चौहान ने छोड़ दिया। हालाँकि गौरी के मुस्लिम इतिहासकार इस घटना को छिपाते हैं।
पृथ्वीराज चौहान के साथ मिलकर गोरी के साथ युद्ध किया,तराईन दुसरे युद्ध मे मारे गए.

तेजपाल द्वितीय (1192-1193 ई)——-

दिल्ली का अन्तिम तोमर राजा,जिन्होंने स्वतन्त्र 15 दिन तक शासन किया,इन्ही के पास पृथ्वीराज चौहान की रानी(पुंडीर राजा चन्द्र पुंडीर की पुत्री) से उत्पन्न पुत्र रैणसी उर्फ़ रणजीत सिंह था,तेजपाल ने बची हुई सेना की मदद से गौरी का सामना करने की गोपनीय रणनीति बनाई,युद्ध से बची हुई कुछ सेना भी उसके पास आ गई थी.
मगर तुर्कों को इसका पता चल गया और कुतुबुद्दीन ने दिल्ली पर आक्रमण कर हमेशा के लिए दिल्ली पर कब्जा कर लिया।इस हमले में रैणसी मारे गए.

इसके बाद भी हांसी में और हरियाणा में अचल ब्रह्म के नेत्रत्व में तुर्कों से युद्ध किया गया,इस युद्ध में मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी किसी जाटवान नाम के व्यक्ति का उल्लेख करता है जिसे आजकल हरियाणा के जाट बताते हैं जबकि वो राजपूत थे और संभवत इस क्षेत्र में आज भी पाए जाने वाले तंवर/तोमर राजपूतो की जाटू शाखा से थे,

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इस प्रकार हम देखते हैं कि दिल्ली के तोमर राजवंश ने तुर्कों के विरुद्ध बार बार युद्ध करके महान बलिदान दिए किन्तु खेद का विषय है कि संभवत: कोई तोमर राजपूत भी दिल्लीपति कुमारपाल देव तोमर जैसे वीर नायक के बारे में नहीं जानता होगा जिसने राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अपने राज्य से आगे बढकर कांगड़ा,लाहौर तक जाकर तुर्कों को मार लगाई और अपना जीवन धर्मरक्षा के लिए न्योछावर कर दिया.
दिल्ली के तोमर राजवंश की वीरता को समग्र राष्ट्र की और से शत शत नमन.

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सन्दर्भ—
1-राजेन्द्र सिंह राठौर कृत राजपूतो की गौरवगाथा पृष्ठ संख्या 113,116,117
2-डा० अशोक कुमार सिंह कृत सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध पृष्ठ संख्या 48,68,69,70
3-देवी सिंह मंडावा कृत सम्राट पृथ्वीराज चौहान पृष्ठ संख्या 94-98
4-दशरथ शर्मा कृत EARLY CHAUHAN DYNASTIES
5- महेंद्र सिंह तंवर खेतासर कृत तंवर/तोमर राजवंश का सांस्कृतिक एवम् राजनितिक इतिहास।
सौजन्य – राजपुताना सोच

History & Literature

राजपूताने की शान- कुम्भलगढ़ का किला Kumbhalgarh Fort

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Kumbhalgarh Fort

   राजपूताने की शान- कुम्भलगढ़ का किला

1. कुम्भलगढ़ का निर्माण 15वीं सदी में महाराणा कुंभा ने किया था। मेवाड़ के 84 में से 32 किलो को महाराणा कुंभा ने बनवाया जिनमे यह सबसे बड़ा और अजेय दुर्ग है।

2. कुम्भलगढ़ किले को देश का सबसे मजबूत दुर्ग माना जाता है जिसे आज तक सीधे युद्ध में जीतना नामुमकिन है। गुजरात के अहमद शाह से लेकर महमूद ख़िलजी सभी ने आक्रमण किया लेकिन कोई भी युद्ध में इसे जीत नही सका।

3. यह चित्तौरगढ़ के बाद सबसे बड़ा दुर्ग है।

4. इसकी परकोटे की दीवार लंबाई में दुनिया में चीन की दीवार के बाद दुसरे स्थान पर है। इसकी लंबाई 38 किलोमीटर है और इसे भारत की महान दिवार भी कहा जाता है।

5. कुम्भलगढ़ के निर्माण के वक्त आने वाली बाधाओ को दूर करने के लिये सबसे पहले इस स्थान पर एक राजपूत योद्धा की स्वेछिक नर बलि दी गई थी।

6. कुम्भलगढ़ मेवाड़ के महाराणाओं की शरणस्थली रहा है। विपत्तिकाल में हमेशा महाराणाओं ने इस दुर्ग में शरण ली है। यही पर महाराणा उदय सिंह को छिपाकर सुरक्षित रखा गया और उनका पालन हुआ।

7. इसी दुर्ग में हिंदुआ सूर्य महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। उस कमरे को आज भी देखा जा सकता है।

8. महाराणा कुंभा हर रात को दुर्ग के निचे वादियों में काम करने वाले किसानो के लिये 50 किलो घी और 100 किलो रुई के इस्तमाल से जलने वाले दियो से रोशनी करवाते थे।

9. कुम्भलगढ़ किले को हाल ही में चित्तोड़, गागरोन, जैसलमेर, आम्बेर और रणथम्भोर के साथ यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साईट के रूप में मान्यता मिली है और इन्हें राजपूत पहाड़ी दुर्ग कला का अद्वितीय नमूना माना गया है।

10. कुम्भलगढ़ किला 1100 मीटर ऊँची पहाड़ी पर बना है और इसकी दीवारे 14 फ़ीट मोटी हैँ और इसके 7 मुख्य दरवाजे हैँ।

11. इस दुर्ग में 360 जैन और सनातनी मन्दिर हैँ जिनमे कई अब भी अच्छी हालत में हैँ।

12. कुम्भलगढ़ से एक तरफ सैकड़ो किलोमीटर में फैले अरावली पर्वत श्रृंखला की हरियाली दिखाई देती हैँ जिनसे वो घिरा हैँ, वहीँ दूसरी तरफ थार रेगिस्तान के रेत के टीले भी दिखते हैँ।

13. हर साल यहाँ राजस्थान सरकार द्वारा 3 दिन का उत्सव मनाया जाता है जिसमे महाराणा कुंभा के स्थापत्य और कला में योगदान को याद किया जाता है।

History & Literature

आजादी के इतिहास की एक सच्ची घटना Thakur Kushal Singh ji Rathore From Auwa,Pali-Rajasthan

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ठाकुरो की बगावत लटका दिए ब्रिटिश गोरो के सिर अपने किलो के बहार लगवा दिए दिए थे मेले आजादी के
इतिहास की एक सच्ची घटना

जो लोग राजपूतो से जलकर हर दिन नए इल्जाम लगाते रहते है कि इतिहास को छोडकर राजपूतो ने अंग्रेजो के खिलाफ क्या किया ये पोस्ट उन्ही खोखले लोगो के लिए है जो आजकल हमारे पूर्वजो को अपना बनाकर हमे ही आंखे दिखा रहे है और एक बात ये कि ये तो सिर्फ एक महान योद्धा के बारे मे बताया है आज इनके अलावा भी हजारो राजपूत योद्धा है उनके बारे मे भी धीरे धीरे पोस्ट करेगें –!!

Thakur Kushal Singh ji Rathore From Auwa,Pali-Rajasthan

“लटका दिया था बड़े अँगरेज़ अफसर का सर अपने किले के बहार लगवा दिया था मेला जब हुयी थी अँगरेज़ गोरो की हार ”

ठाकुरो की और ब्रिटिश जोधपुर संयुक्त सेना की जंग

“ठाकुर कुशाल सिंह आउवा” 1857 में राजस्थान क्रांति के पूर्व जहाँ राजस्थान में अनेक शासक ब्रिटिश भक्त थे, वहीं राजपूत सामन्तों का एक वर्ग ब्रिटिश सरकार का विरोध कर रहा था। अत: उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया । इस अवसर पर उन्हें जनता का समर्थन भी प्राप्त हुआ। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि राजस्थान की जनता में भी ब्रिटिश साम्राज्य के
विरुद्ध असंतोष की भावनाएं विद्यमान थी। जोधपुर में विद्रोह जोधपुर के शासक तख्तसिंह के विरुद्ध वहाँ के जागीरदारों में घोर असंतोष व्याप्त था। इन विरोधियों का नेतृत्व पाली मारवाड़ आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह कर रहे थे ।

1857 में आउवा ,पाली के ठाकुर कुशल सिंह जी राठौड़ ने जोधपुर राज्य से बगावत कर दी क्यों की जोधपुर के महाराजा तखत सिंह जी उस वक़्त ब्रिटिश गोवेर्मेंट और ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ दे रहे थे ठाकुर कुशल सिंह का गोडवाड़ के ज्यादातर ठाकुरो ने साथ दिया …..
1857 की क्रांति में में मारवाड़ /मेवाड़/गोडवाड़ के 30 से ज्यादा ठाकुरो ने जोधपुर स्टेट से बगावत कर ठाकुर कुशल सिंह जी का साथ दिया जिस में एरिनपुरा सुमेरपुर पाली की राजपूत आर्मी भी शामिल हो गयी अजमेर से पहले पाली अजमेर की सरहद पर भयानक लड़ाई हुयी और ब्रिटिश और जोधपुर राज्य की की सयुक्त सेना की अप्रत्यक्ष रूप से हार हुयी ठाकुर कुशल सिंह ने भंयकर युद्ध किया। २००० हजार सैनिको को मार डाला और तोपखाने की तोपे छीन ली। ब्रिगेडियर जनरल सर पैट्रिक लारेंस मैदान छोड़ कर भाग गया। इतनी बड़ी पराजय से फिरंगीयों को होश ऊड गये

,,,,तभी आउवा ठाकुर वह के कप्तान मोंक मेंसेंन का सिर काट कर आपने घोड़े पर बांधकर आपने किल्ले ले आये दूसरे ठाकुरो ने भी दूसरे ब्रिटिश गोरो का सिर काट अपने साथ ले आये ……….

इस लड़ाई के बाद अँगरेज़ राजपूताने में आपने पाँव नही जमा पाये और पुरे राजस्थान में अजमेर शहर को छोड़ कही अपनी ईमारत तक नही बना पाये …
और उस दिन सारे गाव में जश्न हुआ जो आज भी मेले के रूप में पाली जिले के “आउवा” गाव में मनाया जाता है एक साल बाद फिर आउवा पर अजमेर ,नसीराबाद ,मऊ व नीमच की छावनियो की फोजो आउवा पंहुची। सब ने मिलकर आऊवा पर हमला बोल दिया। क्रांति कारी सामन्तो के किलों को सुरंग से उड़ा दिया। आउवा को लूटा। सुगली देवी की मूर्ति अंग्रेज उठा ले गये।
हमला हुआ को किल्ले को काफी नुकशान पहुचाया गया

वही 1857 में गए ठाकुरो के ज्यादातर ठिकानो को जोधपुर दरबार ने खालसा कर दिया गया

** सलूम्बर के रावत केसरी सिंह के साथ मिलकर जो व्यूह-रचना उन्होंने की उसमें यदि अँग्रेज़ फँस जाते तो राजस्थान से उनका सफाया होना निश्चित था। बड़े राजघरानों को छोड़कर सभी छोटे ठिकानों के सरदारों से क्रांति के दोनों धुरधरों की गुप्त मंत्रणा हुई। इन सभी ठिकानों के साथ घ् जोधपुर लीजन ‘ को जोड़कर कुशाल सिंह और केसरी सिंह ब्रितानियों के ख़िलाफ़ एक अजेय मोर्चेबन्दी करना चाहते थे।

** इसी के साथ आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह तथा आलयनियावास के ठाकुर अजीत सिंह भी अपनी सेना सहित आउवा आ गए। लाम्बिया, बन्तावास तथा रूदावास के जागीरदार भी अपने सैनिकों के साथ आउवा आ पहुँचे। सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के स्वातंत्र्य-सैनिक भी वहाँ आकर ब्रितानियों से दो-दो हाथ करने की तैयारी करने लगे। वही अपने क्षेत्र गोड़वाड के भी बहुत से ठाकुरो ने इनका साथ दिया

** जोधपुर सेना की अगुवाई अनाड़सिंह पंवार ने की थी जो बिथौड़ा के पास हुए इस युद्ध मरे गए तथा अँगरेज़ अफसर हीथकोट भाग खड़ा हुआ

** दुर्गति का समाचार मिलते ही जार्ज लारेंस ने ब्यावर में एक सेना खड़ी की तथा आउवा की ओर चल पड़ा। 18 सितम्बर को फ़िरंगियों की इस विशाल सेना ने आउवा पर हमला कर दिया। ब्रितानियों के आने की ख़बर लगते ही कुशाल सिंह क़िले से निकले और ब्रितानियों पर टूट पड़े। चेलावास के पास घमासान युद्ध हुआ तथा लारेन्स की करारी हार हुई।

** आस-पास से क्षेत्रों में आज तक लोकगीत में इस युद्ध को याद किया जाता है। एक लोकगीत इस प्रकार है
ढोल बाजे चंग बाजै, भलो बाजे बाँकियो।
एजेंट को मार कर, दरवाज़ा पर टाँकियो।
झूझे आहूवो ये झूझो आहूवो, मुल्कां में ठाँवों दिया आहूवो।
सौजन्य – राजपुताना सोच

History & Literature

श्याम विना व्रज सुनु लागे , ओधा हमको न भावे रे

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श्याम विना व्रज सुनु लागे , ओधा हमको न भावे रे

श्याम विना व्रज सुनु लागे !

.󾁅.
विकट दिशे यमुना किनारो , वहमो लागे वनरावन हारो

अति तलखे जीव हमारो , मोहन कौन मिलावे रे

श्याम विना व्रज सुनु लागे !

.󾁅.
चित्त हमारो गयो चूरा के , मोहन मीठी मीठी बैन बजा के

पहले हम से प्रीत लगा के , रजळती मेली मने मावे रे

श्याम विना व्रज सुनु लागे !

.󾁅.
हाल हमारा श्री कृष्ण को किजीये , यादवराय को संदेशो दिजीये

मुज रंक पर रिस न किजीये , करुणा सिंधु कहावे रे

श्याम विना व्रज सुनु लागे !

.󾁅.
रोवन लागी व्रज की नारी , शकल जगत के काज विसारी

” थायोॅ चारण ” कहे प्रभु चरण बलिहारी , दिल मे ध्यान लगावे रे

श्याम विना व्रज सुनु लागे !
★★{ραявαт}★★

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गुजरात के वीर राजपुत – पार्ट 2 Rajputs Of Gujarat

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🔸 गुजरात के वीर राजपुत – पार्ट 2 🔸

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1 ➡ ठाकोर रणमलजी जाडेजा (खीरसरा) – जुनागढ के नवाब ने खीरसरा पर दो बार हमला किया लेकिन रणमलजी ने उसे हरा दिया, युद्ध की जीत की याद मे जुनागढ की दो तोपे खीरसरा के गुढ मे मोजुद है ||

2 ➡ राणा वाघोजी झाला (कुवा) – मुस्लिम सुल्तान के खिलाफ बगावत करी, सुल्तान ने खलिल खाँ को भेजा लेकिन वाघोजी ने उसे मार भगाया, तब सुल्तान खुद बडी सेना लेकर आया, वाघोजी रण मे वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी रानीयां सती हुई ||

3 ➡ राणा श्री विकमातजी || जेठवा (छाया) – खीमोजी के पुत्र विकमातजी द्वितीय ने पोरबंदर को मुगलो से जीत लिया. वहां पर गढ का निर्माण कराया. तब से आज तक पोरबंदर जेठवाओ की गद्दी रही है ||

4 ➡ राव रणमल राठोर (ईडर) – जफर खाँ ने ईडर को जीतने के लिये हमला किया लेकिन राव रणमल ने उसे हरा दिया. श्रीधर व्यासने राव रणमल के युद्ध का वर्णन ‘रणमल छंद’ मे किया है ||

5 ➡ तेजमलजी, सारंगजी, वेजरोजी सोलंकी (कालरी) – सुल्तान अहमदशाह ने कालरी पर आक्रमण किया, काफी दिनो तक घेराबंधी चली, खाद्यसामग्री खत्म होने पर सोलंकीओने शाका किया, सुल्तान की सेना के मोघल अली खान समेत 42 बडे सरदार, 1300 सैनिक और 17 हाथी मारे गये, तेजमलजी, सारंगजी और वेजरोजी वीरगति को प्राप्त हुए ||

6 ➡ ठाकुर सरतानजी वाला (ढांक) – तातरखां घोरी ने ढांक पर हमला किया, सरतानजी ने सामना किया पर संख्या कम होने की वजह से समाधान कर ढांक तातर खां को सोंप ढांक के पीछे पर्वतो मे चले गये, बाद मे चारण आई नागबाई के आशिर्वाद से अपने 500 साथियो के साथ ढांक पर हमला किया और तातर खां और उसकी सेना को भगा दिया, मुस्लिमो की सेना के नगाडे आज भी उस युद्ध याद दिलाते ढांक दरबारगढ मे मोजुद है ||

7 ➡ ठाकोर वखतसिंहजी गोहिल (भावनगर) – भावनगर के पास ही तलाजा पर नुरुदीन का अधिकार था, ठाकोर वखतसिंहजी ने तलाजा पर आक्रमण किया, नुरुदीन की सेना के पास बंदुके थी लेकिन राजपुतो की तलवार के सामने टीक ना सकी, वखतसिंहजी ने खुद अपने हाथो नुरुदीन को मार तलाजा पर कब्जा किया ||

8 ➡ रणमलजी जाडेजा (राजकोट) – राजकोट ठाकोर महेरामनजी को मार कर मासुमखानने राजकोट को ‘मासुमाबाद’ बनाया. महेरामनजी के बडे पुत्र रणमलजी और उनके 6 भाईओने 12 वर्षो बाद मासुमखान को मार राजकोट और सरधार जीत लिया, अपने 6 भाईओ को 6-6 गांव की जागीर सोंप खुद राजकोट गद्दी पर बैठे ||

9 ➡ जेसाजी & वेजाजी सरवैया (अमरेली) – जुनागढ के बादशाह ने जब इनकी जागीरे हडप ली तब बागी बनकर ये बादशाह के गांव और खजाने को लुंटते रहे लेकिन कभी गरीब प्रजा को हेरान नही किया | बगावत से थककर बादशाह ने इनसे समाधान कर लिया और जागीर वापिस दे दी ||

10 ➡ रा’ मांडलिक (जुनागढ) – महंमद बेगडा ने जुनागढ पर आक्रमण कर जीतना चाहा पर कई महिनो तक उपरकोट को जीत नही शका तो वो जुनागढ के गांवो को लुंटने लगा  और प्रजा का कत्लेआम करने लगा, तब रा’ मांडलिक और उनकी राजपुती सेना ने शाका कर बेगडा की सेना पर हमला कर दीया तादाद कम होने की वजह से रा’ मांडलिक ईडर की ओर सहायता प्राप्त करने नीकल गये, बेगडा ने वहा उनका पीछा किया, रा’ मांडलिक और उनके साथी बहादुरी से लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए ||

11 ➡ कनकदास चौहान (चांपानेर) – गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह ने चांपानेर पर हमला कर उस पर मुस्लिम सल्तनत स्थापित करने की सोची लेकिन चौहानो की तलवारो ने उसको ऐसा स्वाद चखाया की हार कर लौटते समय ही मुजफ्फर शाह की मृत्यु हो गई ||

12 ➡ विजयदास वाजा (सोमनाथ) – सुल्तान मुजफ्फरशाह ने सोमनाथ को लुंटने के लिये आक्रमण किया लेकिन विजयदास वाजा ने उसका सामना करते हुए उसे वापिस लौटने को मजबुर कर दिया, दो साल बाद सुल्तान बडी सेना लेकर आया, विजयदास ने बडी वीरता से उसका सामना कर वीरगति प्राप्त की ||

👆👆👆👆 ये तो सिर्फ गिने चुने नाम है, ऐसे वीरो के निशान आपको यहां हर कदम, हर गांव मिल जायेगे..

👉 डुप्लीकेटो से निवेदन है की यह सिर्फ और सिर्फ राजपुतो की पोस्ट है, ईसमे दुसरो के नाम एड करके पोस्ट से छेडखानी ना करे…आभार 🙏

History & Literature

गुजरात के वीर राजपूत पार्ट 1 Rajputs Of Gujarat

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          गुजरात के वीर योद्धा राजपूत
गुजरात के कुछ वीर राजपुत यौद्धाओं के बारे मे लिखा है। जिन्होने ना ही कभी किसी के सामने सर झुकाया है, ना ही कभी हार मानी है। अपनी प्रजा के रक्षार्थ अपनी और अपने परिवारो की गरदने कटवाई है, लेकिन कभी विदेशी आक्रमणकर्ताओ के आगे झुके नही…!!

जाम नरपतजी (जाडेजा) – जाम नरपतजी ने गजनी के पिरोजशाह बादशाह का सर उसी के दरबार मे काट डाला था | अदभुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुए वे गजनी के सम्राट बने..

जाम अबडाजी “अडभंग” (जाडेजा) – 140 मुस्लिम लडकियो को बचाने के लिये दिल्ली के बादशाह अलाउदिन की विशाल सेना से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए..

जाम साहेबजी, पबाजी और रवाजी (जाडेजा) – सिंध के मिर्जा ईशा और मिर्जा सले को झारा के युद्ध (प्रथम) मे शर्मनाक हार दी..

जाम सताजी, कुंवर अजाजी और मेरामणजी हाला (जाडेजा) – कर्णावती(अहमदाबाद) के सुल्तान मुझफ्फर शाह को दिल्ली के बादशाह अकबर से बचाने के लिये ‘भूचरमोरी’ मे युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। जुनागढ के नवाब और लोमा काठी की दगाबाजी की वजह से जीता हुआ युद्ध हारे..

राव देशलजी जाडेजा – ईरानी आक्रमणकर्ता शेर बुलंदखान की सेना के आगे अपने बहुत कम योद्धाओ को लेकर देशलजी ने विधर्मीयो को अपने पैरो तले कुचल डाला… ईरानी सेना पागल कुत्तो की तरह भागने को मजबूर हो गयी..

लाखाजी जाडेजा (विंझाण) – सिंध के गुलामशाह कल्होरा से झारा के दुसरे युद्ध मे लडे… अदभुत शौर्य प्रदर्शित कर वीरोचित मृत्यु को प्राप्त हुए..

रायसंगजी झाला (हलवद) – अकबर के दरबार के पंजहथ्था पहलवान के साथ लडे. रायसंगजी की मुठ्ठी के एक ही प्रहार से पहलवान का सिर उसके धड मे घुस गया… अतुलनीय पराक्रम का उदाहरण..

रानजी गोहिल – कर्णावती(अहमदाबाद) के सुल्तान को युद्ध मे हराकर वापस लौट रहे थे, लेकिन उनकी रानीयो ने गलतफहमी की वजह से जौहर कर लिया…ये देख रानजी गोहिल वापिस सुलतान की सेना पर टूट पडे और वीरगति को प्राप्त हुए..

मोखडाजी गोहिल – दिल्ली के सुल्तान की सेना के साथ युद्ध। सिर कट जाने पर भी धड लडता रहा…अदभुत शौर्य का प्रदर्शन..
१०
लाठी के वीर हमीरजी गोहिल – 16 साल की उम्र मे सोमनाथ मंदिर की रक्षा हेतु अपने कुछ मित्रो के साथ मिलकर मुजफ्फरशाह की सेना से भिड गये…उन्होंने कहा-‘भले कोई आवे ना आवे मारी साथे, पण हुन जैस सोमनाथ नी सखाते'(कोई मेरे साथ आए ना आए, लेकिन में सोमनाथ की रक्षा के लिये जाऊँगा) सोमनाथ महादेव को सिर अर्पण कर युद्ध किया…विधर्मीयो को काटते-काटते रणशैया पर सो गये..
११
लखधीरजी परमार (मुली) – हेजतखाँ की पुत्री को बचाने के लिये सिंध के पादशाह की सेना से लडे, लखधीरजी और उनके परिवार ने सिंध की सेना का बहादुरी से सामना किया और वीरगति को प्राप्त हुए..
१२
रा’नवघण (जुनागढ) – अपनी मुंहबोली बहन जाहल को बचाने के लिये सिंध पर आक्रमण किया। पादशाह को मारकर बहन जाहल को छुडाकर लाये..
१३
सोलंकी वंश में जन्मे वचरा दादा गुजरात के सबसे बड़े लोकदेवता हैँ। इन्होंने गायो की रक्षा के लिये विवाह के फेरो से उठकर आकर युद्ध किया और सर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा। आज गुजरात के घर घर में इनकी पूजा होती है।
१४
पाटन के सोलंकी वंश की रानी नैकिदेवी के सेनापति वीरधवल वाघेला और भीमदेव सोलंकी 2nd (पाटन) – भीमदेव और सेनापति वीरधवलजी ने मुहम्मद गौरी की सेना को आबु के पर्वतो मे कुचल डाला और कुतुबूदिन ऐबक की सेना को भी गुजरात के बाहर खदेड दिया..
१५
करनदेव वाघेला (पाटन) – अलाउदिन खिलजी की विशाल सेना के साथ लडे, हार गये लेकिन झुके नही, जंगलो मे जाके अपनी अंतिम सांस तक लडते रहे और वीरगति को प्राप्त हुए..
१६
वीरसिंह वाघेला (कलोल) – कलोल के वाघेला सरदार ने गुजरात के सुलतान मोहम्मद बेगडा का सामना किया, सुलतान वीरसिंह की रानी से शादी करना चाहता था, वीरसिंह बहादुरी से लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए….रानी ने भी कुएं मे कुदकर अपनी जान देकर स्वाभीमान की रक्षा की..
१७
चंपानेर-पावागढ़ के खींची शाखा के चौहान– कर्णावती(अहमदाबाद) की सल्तनत की नाक के नीचे उससे संघर्ष करते हुए चंपानेर के खींची चौहानो ने 200 साल तक स्वतंत्र राज किया। अंत में रावल पतई जय सिंह जी ने महमूद बेगड़ा के साथ 20 महीनेे चले युद्ध के बाद पकड़े जाने पर उनकी वीरता से प्रभावित हो बेगड़ा द्वारा उन्हें इस्लाम स्वीकार और राज्य वापिस करने का प्रस्ताव देने पर उन्होंने मौत स्वीकार करी और उन्हें तड़पाकर मार डाला गया..
१८
इडर में राठौड़ो ने सैकड़ो साल तक अपने बगल में स्थित कही ज्यादा ताकतवर मुस्लिम सुल्तानों से लड़ते होने के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखा और मस्जिदो को तोड़कर वापिस मन्दिर बनाते रहे। राव रणमल ने अपने से कई गुना ताकतवर सुल्तान मुजफ्फर शाह को बुरी तरह हराकर उसका घमण्ड तोडा।

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