Daily Archives: August 5, 2015

अग्निवंश Agnivansh

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प्रतिहार, परमार, चौहान एवं चालुक्य
राजपूत आपके राज में, धक-धक धरती होय। जित-जित घोड़ा मुख करे, तित-तित फत्ते होय।

कहा जाता है की  यज्ञ की अग्नि से चार योद्धाओं- प्रतिहार, परमार, चौहान एवं चालुक्य की उत्पत्ति हुई जबकि हकीकत ये है की महर्षि और ब्राह्मणों ने उन्हें यज्ञ करवाया था ताकि वो आम जन की रक्षा मलेछो मुस्लिमो से कर सके साथ।

#प्रतिहार वंश 👑
ये वंश अब परिहार नाम से जाना जाता है जिसमे इंदा जैसे प्रमुख गोत्र आते है प्रतिहार मतलब पहरी इसका
राज्य मंडोर तक रहा 12 वी शतब्दी में जब कन्नौज से राव सिन्हा राठौड
जब मारवाड़ आये तब परिहारों ने बहुत मदद की और मंडोर में आज भी इनकी 1000 साल पुराणी छत्रिया मौजूद है

कुछ प्रशिद्ध शाशक
नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.)
वत्सराज (783 – 795 ई.)
नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.)
मिहिरभोज (भोज प्रथम) (836 – 889 ई.)
महेन्द्र पाल (890 – 910 ई.)
महिपाल (914 – 944 ई.)
भोज द्वितीयविनायकपालमहेन्द्रपाल (940 – 955 ई.)

प्रतिहारों के अभिलेखों में उन्हें श्रीराम के अनुज लक्ष्मण का वंशज बताया गया है, जो श्रीराम के लिए प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य करता था हूणों के साथ गुर्जर बहुत ज्यादा आये थे और गुजरात राजस्थान के एक हिस्से में फ़ैल गए थे इन पर राज करने से प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार कहा गया

#चौहान वंश 👑

‘चौहान’ नाडोल जालोर ,सांभर झील,पुष्कर, आमेर और वर्तमान जयपुर (राजस्थान) में होते हुए उत्तर भारत में फैले चुके हैं।

प्रसिद्ध शासक

चौहान वंश की अनेक शाखाओं में ‘शाकंभरी चौहान’ (सांभर-अजमेर के आस-पास का क्षेत्र) की स्थापना लगभग 7वीं शताब्दी में वासुदेव ने की। वासुदेव के बाद पूर्णतल्ल, जयराज, विग्रहराज प्रथम, चन्द्रराज, गोपराज जैसे अनेक सामंतों ने शासन किया। शासक अजयदेव ने ‘अजमेर’ नगर की स्थापना की और साथ ही यहाँ पर सुन्दर महल एवं मन्दिर का निर्माण करवाया। ‘चौहान वंश’ के मुख्य शासक इस प्रकार थे-

अजयदेव चौहानअर्णोराज (लगभग 1133 से 1153 ई.)विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव (लगभग 1153 से 1163 ई.)पृथ्वीराज तृतीय (1168-1198)

#परमार वंश👑

परमार वंश का आरम्भ नवीं शताब्दी के प्रारम्भ मेंनर्मदा नदी के उत्तर मालवा (प्राचीन अवन्ती) क्षेत्र में उपेन्द्र अथवा कृष्णराज द्वारा हुआ था। 
आज ये पाकिस्तान से लेकर हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र तक है इन्ही में सोढा राजपूत आते है वही भायल सांखला ये पंवार नाम से भी जाने जाते है

वंश शासक
उपेन्द् वैरसिंह प्रथम, सीयक प्रथम, वाक्पति प्रथम एवं वैरसिंह द्वितीय थे।

परमारों की प्रारम्भिक राजधानी उज्जैन में थी पर कालान्तर में राजधानी ‘धार’, मध्य प्रदेश में स्थानान्तरित कर ली गई परमार वंश में आठ राजा हुए, जिनमें सातवाँवाक्पति मुंज (973 से 995 ई.) और आठवाँ मुंज का भतीजा भोज (1018 से 1060 ई.) सबसे प्रतापी थी।मुंज अनेक वर्षों तक कल्याणी के चालुक्यराजाओं से युद्ध करता रहा और 995 ई. में युद्ध में ही मारा गया। उसका उत्तराधिकारी भोज (1018-1060 ई.) गुजरात तथा चेदि के राजाओं की संयुक्त सेनाओं के साथ युद्ध में मारा गया। उसकी मृत्यु के साथ ही परमार वंश का प्रताप नष्ट हो गया। यद्यपि स्थानीय राजाओं के रूप में परमार राजा तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ तक राज्य करते रहे, अंत में तोमरों ने उनका उच्छेद कर दिया।परमार राजा विशेष रूप से वाक्पति मुंज और भोज, बड़े विद्वान थे और विद्वानों एवं कवियों के आश्रयदाता थे।

#चालुक्य वंश / सोलंकी 👑

‘विक्रमांकदेवचरित’ में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद्  ‘एफ. फ्लीट’ तथा ‘के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री’ ने इस वंश का नाम ‘चलक्य’ बताया है। ‘आर.जी. भण्डारकरे’ ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम ‘चालुक्य’ का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है।

लगभग आधे भारत पर राज किया  सोलंकी चालुक्य राजाओ ने केरल से लेकर नेपाल तक विजय यात्रा की
दक्षिण और गुजरात के अधिकतर क्षेत्रो पर हुकूमत की वर्त्तमान ये सोलंकी नाम से जाने जाते है

History & Literature

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महाकवी भुषन रचित शिवाजी नां कवित Mahakavi Bhushan shivaji kavit

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महाकवी भुषन रचित शिवाजी नां कवित

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कुरम कमल कमधुज है कदम फूल,
गौर है गुलाब राना केतकी विराज है,
पांडुरी पवार जुही सोहत है चन्दावत,
सरस बुन्देला सो चमेली साजबाज है,
‘भुषण’ भनंत मुचकुन्द बड गुजर है,
बधेले बसंत सब कुसुम समाज है,
लेई रस एतेन बेठीन शकत अहे,
अली नवरंग जेब चंपो शिवराज है.

उंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,
उंचे घोर मंदर के अंदर रहाती है,
कंदमुल भोग करे कंद मुल भोग करे,
तिन बेर खाती सो तिन बेर खाती है,
भुषन शिथिल अंग भुषन शिथिल अंग,
बिजन डुलाती सो आज बिजन डुलाती है,
भुषन भनंत शिवराज वीर तेरे त्रास,
जगन जडाती सो आज नगन जनाती है.

छुटत कमान ओर तीर गोली बानके,
मुशकील होती मुरचान की ओट में,
ताही समय शिवराज हुकुम कै हल्ला कीयो,
दावा बांधी परा हल्ला बीर भट जोट में,
‘भुषण’ भनंत तेरी हिम्मत कहां लौ कहां,
किंमती ईहां लगी है जाकी भट जोंट में,
ताव दै मुच्छन पै कंगुरन पे पांव दै,
अरी मुख घाव दै कुदी पर्यो कोट में.

देवल गिरावतो फिरावतो निशान अली,
एसे सामे राव राना सब गये लबकी,
गौरा गनपती आप औरंग को देख ताप,
आपके मुकाम सब मार गये दबकी,
पीर पयगम्बरा दिगंबरा देखाई देत,
सिध की सिधाई गई रही बात रबकी,
काशीहुकी कला गई मथुरा मस्जीद भई,
शिवाजी नहोत तो सुन्नत होत सबकी.

ईन्द्र जीमी जंभ पर वडःव सुअंभ पर,
रावण सदंभ पर रघुकुल राज है,
पौन परिबाह पर शंभु रतीनाह पर,
ज्यों सहसबांह पर राम द्विजराज है,
दावा द्रुम दंड पर चिता मृग जंड पर,
भुषन वितंड पर जैसै मृगराज है,
तेजत्तम अंश पर क्रष्न जेम कंश पर,
त्यों मलेच्छ वंश पर शेर शिवराज है.

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