Daily Archives: August 9, 2015

लोकसाहित्य ना दूहा Loksahitya/CharniSahitya Duha

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परण्या नी पे’ली रात होय, पे’लो पो’र होय, ओरडा नी मालपा जाकजमाळ दीवो बळतो होय – ए समा ना अदभूत दुहा छे आपणा लोकसाहित्य मां :

थंभ थडके मेडी हसे, खेलण लागी खाट,
सो सजणा भले आवीया, जेनी जोतां वाट.

जेनी जोतां वाट, ए साजण सामा मळ्या,
पछी उघड्यां हैया नां हाट, काम नो पड्यां कुंची पड्यां.

अने रूप रूप ना अंबार समी, सिंहलदीप नी सुंदरी जेवी, पाताळ नी पदमणी जेवी गोरांदे धीमां धीमां धीमां डगलां मांडती ओरडे डग देती होय.

मोथवाणी एलचीवाणी,
खळखळते पाणीये नाई,
घट समाणो आरीसो मांडी,
वाळे वाळे मोती ठांसी,
हाले तो कंकु केसर नां पगलां पडे,
बोले तो बत्री पांखडी नां फूल जरे,
एवी हाम काम लोचना,
त्राठी मृगली ना जेवां नेण,
भुखी सिंहण ना जेवो कडनो लांक,
जाणे उगतो आंबो,
राण्य नो कोळांबो,
बारवटिया नी बरछी,
होळी नी जाळ,
पूनम नो चन्दरमा,
जूनी वाड्य नो भडको,
भादरवा नो तडको,
पाणी पीवे तो गळा सोंसरो घुंटडो देखाय,
संकेली नखमां समाय,
उडाडी आभ मां जाय,
उगमणा वा वाय तो आथमणी नमे,
आथमणा वाय तो उगमणी नमे,
ने चारे दश्य ना वाय तो भांगी ने भुको थई जाय,
एवां रूप लई,
थाळ पीरसी,
सुंदरी त्रणसे ने सांईठ पगथीयां चडी,
त्यांतो ‘आवो आवो आवो’ एवा त्रण आवकारा मळ्या,
मानसरवर नो हंसलो जेम मोतीडां चरे,
एम स्वामीनां त्रण नवालां लीधां,
ने रंग ना चार पोर वित्या.

आवी सुंदरी होय. केवी ?
के’ “सरग नी अपसरा जेवी ?’
के “ना ना ना’
तो के’ “मानसकवर नी हंसली जेवी ?’
के “ना ना ना ना’
तो के ‘केवी ?’
के –
नमणी खमणी बौ गणी,  सुकोमळी सुकच्छ,
गोरी गंगा नीर ज्युं, मन गरवी तन अच्छ.

वाणी मां वाराणसी, जेना कंठ मां कोयलडी,
रूप रंभा गुण गौरी ना, जेनी अमियल आंखलडी.

आंखडीयुं अणीयाणीयुं, सरजीं पधरीयुं,
जेना सामी नोंधीयुं, एना काळजा सोंसरीयुं.

लंब वेणी लज्जा घणी, जेनां पोचां पातळीयां,
आछे छांये निपावियां, को’ को’ कामणीयां.

पीतळ सरखी पीनीयुं, हेंगळा वरणा हाथ,
पंड बनावेल पूतळी, जेदी’ नवरो दीनोनाथ.

भगवाने जाणे साडा त्रण दी’ नी नवराश लईने घडी होय, रूप ओगळी ने हालतुं थाय एवी मीण नी पूतळी सरखी गोरांदे डगलां मांडे –

मारू चाली मो’ल पर, दिपक जगाड्ये,
हनवो जाणे हालीयो, लंका लगाड्ये.

मारू चाली मो’ल पर, छुटा मेल्या केश,
जाणे छत्रपत हालीयो, को’क नमावा देश.

मारू चली मोल पर, छोडे कळरी लाज,
अरियारा गढ उपरे, धधकार्यो गजराज.

मारू चडी पलंग पर, कचवा मेल्या दुर,
चकवा मन आंनंद थ्या, जाणे उग्या सुर.

उंचो नाळीयेर ओरडो, ने मधरो शीशो हाथ,
लडथडती प्याली लीये, ने चोमारी रात.

अने पछी तो धण – पियु नुं मिलन थाय. अरसपरस अंतर ना तार सधाई जाय, अने –

नेण पदारथ नेण रस, नेणे नेण मळन्त,
अणजाण्यासु प्रितडी, नेणे नेण करन्त.

मुं मन लागी तुं मना, तुं मन लागी मुं,
लुण वळुंभ्यां पाणीये, पाणी वळुंभ्यां लुण.

लुण पाणी ओगळी ने जेम एकरस थई जाय एम साम सामां अंतर एकाकार थई गयां. अने पछे तो –

पे’लो पोरो रेनरो, दिवडा जाकमजोळ,
पीयु कंटाळो केवडो, धण कंकु नी लोळ.

बीजो पोरो रेनरो, वीधीआ नेह सनेह,
धण त्यां धरती हो रही, पियु अषाढो मेह.

त्रिजो पोरो रेनरो, दिवडा शाख भरे,
धण जीती पियु हारीयो, राख्यो हार करे.

चोथो पो’रो रेनरो, बोल्या कुकड काग,
धण संभाळे कंचवो, पियु संभाळे काग.

आवा तो अनेक दुहा ‘लोक साहित्य अने चारणी साहित्य मां पड्या छे. फरीवार आवी ज रूपाळी पोस्ट साथे फरी मळीशुं.
जय माताजी.
पोस्ट – चमन गज्जर

History & Literature

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