Daily Archives: August 12, 2015

धरधरमनी धरवा परदःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे – Dhar dharam ne dharva pardukh harva mardo marva teg dhare…

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          दुहा
भूमि लाज ने भामनी स्व धरम स्वमान
मरद मेदाने मरवा कहुं करधरे करपान

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Mokhadaji Gohil

अंग जुवानी ऊमटे मनमा होय न मेल
पडे शिर ने धडे खेले खांडा ना खेल

         छंद त्रिभंगी         

खेल जंग खेलाते शरण के आते गाम भंगाते गोकीरे
जर जमीन ने जाते लाज लूंटाते   गाय हराते पडकारे
तंइ भलिय भाते मन मलकाते पंड वेचाते वेर करे
धरधरमनी धरवा परदःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे

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Rajput

लीधी वात न मेले पड्ये जेले सौ ने पेले वेर करे
आकाश उथेले आप अकेले अगम उकेले मारी मरे
अंग रगतां रेले जइ जंग खेले धरा धकेले तरवारे
धरधरमनी धरवा पर दुःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे

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Rajput

उठे अलबेला थइ रणघेला चडे अकेला रण जंगे
काळ पीधेला शूर भरेला देव दीधेला हय संगे
समर छकेला रंग रगेला मरद मढेला खेल करे
धरधरमनी धरवा पर दुःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे

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Rajput

कंइ गरीब नी वारे समदर पारे वेर वधारे अबधूतो
तरवार नी धारे शिश उतारे पर उपकारे रजपूतो
कव्य मेकरण वारे भू भार उतारे हौये न हारे किरत वरे
धरधरमनी धरवा पर दुःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे

             दुहा

मारो मरवो म्रद महीपरे अकळावे हाक अथाग
भनंत पडतां भेदु भणे तन रजपुतां ताग

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Rajput

अटके नहि अळपरे अंग जलावे आग
भेदु बंजतां भांखता रण भेरीना राग

History & Literature

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शिवाष्टक Shivashtak Shiva Vandna

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जोगीदान गढ़वी कृत शिव वंदना

़            शिवाष्टक
~•°•छंद ः भुजंगप्रयात•°•~

जयो ज्योति रूपम जटाधर जोगी,
नमो नट्टराजन अहालेक भोगी,
शिरे सोम धारी सदा निर्विकारी,
अहोनिशे दिव्यं भजां ओमकारी॥..१

गळे नाग बंधा जटे रुंध गंगा,
कटी व्याघ्रचर्म भरे नित भंगा,
निजानंद मोज़े मजा अल्लगारी,
अहोनिशे दिव्यं भजां ओमकारी॥..२

सती विन शंकर बजे डाक डम्मर,
बने रौद्र बंकर घुमे हर घम्मर,
रुवे रोम राजे नमो अर्धनारी,
अहोनिशे दिव्यं भजां ओमकारी॥..३

त्रणे लोक तारे उजारे महेशा,
करे कोप तो खोपरा कर ग्रहेशा,
नचे नाच तांडव रीझे प्रलेकारी,
अहोनिशे दिव्यं भजां ओमकारी॥..४

पृथी सर्ग पाताल महादेव दाता,
भवो पाप जाता भोळा मन भाता,
जपा नामं जारी मुखे त्रिपुरारी
अहोनिशे दिव्यं भजां ओमकारी॥..५

तमो देव आदी अनादी सुरेशां,
झरे तेज काया न रूपा उमेशां,
सदा सेव लिंगा स्वरूपम सारी,
अहोनिशे दिव्यं भजां ओमकारी॥..६

सतो गुण सेवा रीदये एव हेवा,
मलो मान मेवा महादेव देवा,
हरो हर्र दुःखह् शुभम सुखकारी,
अहोनिशे दिव्यं भजां ओमकारी॥..७

सुरो कोटी पाये पड़ी तप तापे,
नमे नाग चारण गंधर्व जापे,
दिया वर्र दानव ने भारोभारी,
अहोनिशे दिव्यं भजां ओमकारी॥..८
– दिव्यराजसिंह सरवैया कृत शिवाष्टक

History & Literature

नमस्तु मात हिंगलाज – Hinglaj Maa Stuti

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                नमस्तु मात हिंगलाज

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                        होग फीण छंद

प्रचंड दंड बाहु चन्ड योग निद्रा भेरवी
भुजंग केश कुन्डलाय कन्ठला मनोहरी
निकंद काम क्रोध दैत्य असुर काल मर्दनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी                 (1)

रक्त सींग आसनी सावधान संकरी
कुठार खडग खप्रधार कर दलन महेश्वरी
निसम्भ सम्भ रक्तबीज देत्य तेज गंजनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी                   (2)

ज्वाहिर रत्न बेल केल सर्व कर्म लोलनी
व्याल माल चंद्र केत पुष्प माल मेखली
चंन्ड मुन्ड गर्जनी सुनाद बिन्द वासनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी                  (3)

गजेन्द्र चाल काल धुम सेतुं चाल लोलनी
उदार तेज तिमर नास सुसोभे शेश संकरी
अनाद सिध्ध साद लोक सप्त दिप बिराजनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी              (4)

शैल शिखर राजनी जोग जुगत कारनी
चंड मुन्ड चुरकर सहस्त भुज दायनी
बिकराल केश भेश भुत अन्त रूप दायनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी               (5)

कलोल लोल कोचनी आनद कुद दायती
हद्य कपाट खोलनी सुरेश शब्द भासनी
धर्मकर्म जन्म मात भली मुक्ती दायती
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी               (6)

अलोक लोक राजनी दिव्य देव वरदायनी
त्रीलोक शोक हारणी सत्य वाक्य बोलनी
आदि अंत मद्य मात तेरो रूप सर्जनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी              (7)

कुबेर वरूण इन्द्र आदि सिद्धि साद रंजनी
अगम पंथ दर्श मात जन्म कष्ट हारणी
श्री राम चंन्द्र शरण मात अमर पद दायनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी           (8)

शेश सार नार दाहि योग निद्रा भेरवी
गंध मदन केल करत मंग दैत्य मर्दनी
अंब खंब फाडनी हव्य कव्य दायनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी               (9)

अष्ट हंस गर्जनी त्रिसुल चक्र धारनी
काल कन्ठ कुठ ब्याल मुन्डमाल धारनी
धुमधार श्वेतरूप दैत्य गर्भ भंजनी
नमस्तुं मात हिंगलाज निरमला निरंजनी              (10)
अज्ञात

पोस्ट : हरि गढवी

History & Literature

रामायण की चोपाई के माध्यम से कुछ जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र दिए जा रहे है जिनके जाप से सत्-प्रतिशत सफलता मिलती है- Chopai of Ramayana

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रामायण की चोपाई के माध्यम से कुछ जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र दिए जा रहे है जिनके जाप से सत्-प्रतिशत सफलता मिलती है आप से अनुरोध है इन मंत्रो का जीवन मे प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्री राम और श्री बालाजी सरकार आप के जीवन को सुख मय बना देगे !!

रक्षा के लिए
      मामभिरक्षक रघुकुल नायक !
      घृत वर चाप रुचिर कर सायक !!

विपत्ति दूर करने के लिए
     राजिव नयन धरे धनु सायक !
     भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक !!

सहायता के लिए
      मोरे हित हरि सम नहि कोऊ !
      एहि अवसर सहाय सोई होऊ !!

सब काम बनाने के लिए
      वंदौ बाल रुप सोई रामू !!
     सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू !!

वश मे करने के लिए
     सुमिर पवन सुत पावन नामू !!
     अपने वश कर राखे राम !!

संकट से बचने के लिए
     दीन दयालु विरद संभारी !!
     हरहु नाथ मम संकट भारी !!

विघ्न विनाश के लिए
     सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही !!
     राम सुकृपा बिलोकहि जेहि !

रोग विनाश के लिए
     राम कृपा नाशहि सव रोगा !
     जो यहि भाँति बनहि संयोगा !!

ज्वार ताप दूर करने के लिए
     दैहिक दैविक भोतिक तापा !
     राम राज्य नहि काहुहि व्यापा !!

दुःख नाश के लिए
      राम भक्ति मणि उस बस जाके !
      दुःख लवलेस न सपनेहु ताके !

खोई चीज पाने के लिए
      गई बहोरि गरीब नेवाजू !
      सरल सबल साहिब रघुराजू !!

अनुराग बढाने के लिए
     सीता राम चरण रत मोरे !
     अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे !!

घर मे सुख लाने के लिए
     जै सकाम नर सुनहि जे गावहि !
     सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं !!

सुधार करने के लिए
     मोहि सुधारहि सोई सब भाँती !
     जासु कृपा नहि कृपा अघाती !!

विद्या पाने के लिए
     गुरू गृह पढन गए रघुराई !
    अल्प काल विधा सब आई !!

सरस्वती निवास के लिए
     जेहि पर कृपा करहि जन जानी !
     कवि उर अजिर नचावहि बानी !

निर्मल बुध्दि के लिए
      ताके युग पदं कमल मनाऊँ !!
      जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ !!

मोह नाश के लिए
      होय विवेक मोह भ्रम भागा !
      तब रघुनाथ चरण अनुरागा !!

प्रेम बढाने के लिए
      सब नर करहिं परस्पर प्रीती !
      चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती !!

प्रीती बढाने के लिए
      बैर न कर काह सन कोई !
      जासन बैर प्रीति कर सोई !!

सुख प्रप्ति के लिए
      अनुजन संयुत भोजन करही !
      देखि सकल जननी सुख भरहीं !!

भाई का प्रेम पाने के लिए
      सेवाहि सानुकूल सब भाई !
      राम चरण रति अति अधिकाई !!

बैर दूर करने के लिए
      बैर न कर काहू सन कोई !
      राम प्रताप विषमता खोई !!

मेल कराने के लिए
      गरल सुधा रिपु करही मिलाई !
      गोपद सिंधु अनल सितलाई !!

शत्रु नाश के लिए
     जाके सुमिरन ते रिपु नासा !
     नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा !!

रोजगार पाने के लिए
     विश्व भरण पोषण करि जोई !
     ताकर नाम भरत अस होई !!

इच्छा पूरी करने के लिए
     राम सदा सेवक रूचि राखी !
     वेद पुराण साधु सुर साखी !!

पाप विनाश के लिए
     पापी जाकर नाम सुमिरहीं !
     अति अपार भव भवसागर तरहीं !!

अल्प मृत्यु न होने के लिए
     अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा !
     सब सुन्दर सब निरूज शरीरा !!

दरिद्रता दूर के लिए
     नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना !
     नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना !!

प्रभु दर्शन पाने के लिए
     अतिशय प्रीति देख रघुवीरा !
     प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा !!

शोक दूर करने के लिए
     नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी !
     आए जन्म फल होहिं विशोकी !!

क्षमा माँगने के लिए
     अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता !
     क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता !!

History & Literature