धरधरमनी धरवा परदःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे – Dhar dharam ne dharva pardukh harva mardo marva teg dhare…

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          दुहा
भूमि लाज ने भामनी स्व धरम स्वमान
मरद मेदाने मरवा कहुं करधरे करपान

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Mokhadaji Gohil

अंग जुवानी ऊमटे मनमा होय न मेल
पडे शिर ने धडे खेले खांडा ना खेल

         छंद त्रिभंगी         

खेल जंग खेलाते शरण के आते गाम भंगाते गोकीरे
जर जमीन ने जाते लाज लूंटाते   गाय हराते पडकारे
तंइ भलिय भाते मन मलकाते पंड वेचाते वेर करे
धरधरमनी धरवा परदःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे

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Rajput

लीधी वात न मेले पड्ये जेले सौ ने पेले वेर करे
आकाश उथेले आप अकेले अगम उकेले मारी मरे
अंग रगतां रेले जइ जंग खेले धरा धकेले तरवारे
धरधरमनी धरवा पर दुःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे

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Rajput

उठे अलबेला थइ रणघेला चडे अकेला रण जंगे
काळ पीधेला शूर भरेला देव दीधेला हय संगे
समर छकेला रंग रगेला मरद मढेला खेल करे
धरधरमनी धरवा पर दुःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे

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Rajput

कंइ गरीब नी वारे समदर पारे वेर वधारे अबधूतो
तरवार नी धारे शिश उतारे पर उपकारे रजपूतो
कव्य मेकरण वारे भू भार उतारे हौये न हारे किरत वरे
धरधरमनी धरवा पर दुःख हरवा मरदो मरवा तेग धरे

             दुहा

मारो मरवो म्रद महीपरे अकळावे हाक अथाग
भनंत पडतां भेदु भणे तन रजपुतां ताग

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Rajput

अटके नहि अळपरे अंग जलावे आग
भेदु बंजतां भांखता रण भेरीना राग

History & Literature

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