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मात्र दो राजपूत वीरो ने दिल्ली दरबार डरा दिया, History Of two brother brave Rajputs

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“हेला मारे खेजड़ी,सुण पंथी सन्देश
बिन माथे अरि बाढ़ण,निपजे म्हारो देश “

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Rajputi

बात सन 1656 के आस-पास की है, उस वक़्त दिल्ली में राज था शाहजहा का और मारवाड़ की गद्दी पर बैठे थे महाराजा गज सिंह प्रथम, एक दिन दिल्ली में दरबार लगा हुआ था, सभी उमराव बैठे हुए थे, तभी शाहजहा के मन में विचार आया की मेरे दरबार में खानों की बैठक 60 और राजपूतो की बैठक 62 क्यों , दो बैठक राजपूतो की ज्यादा क्यों है, सो उसने ये सवाल सभा में सब से पुछा, कोई जवाब नहीं आया,तभी दक्षिण के सूबेदार मीरखानजहा खड़ा हुआ “हजूर, राजपूतो की संख्या हम से दो ज्यदा इसलिए है क्योकि उनके दो ऐसे काम है जो हम नहीं कर सकते है, एक तो वो सर कटने के बाद भी लड़ते है और दूसरा उनकी पत्नी उन के साथ जिंदा जल के सती होती है” शाहजहा को बात जची नहीं बोला “में नहीं मानता इस को साबित कर के दिखाओ तो मानु”, जोधपुर महाराजा गज सिंह भी दरबार में थे, उनको ये बात अखरी, सभा ख़तम हुए तो वो सीधे जोधपुर के लिए रवाना हो गए, रात को सोचते सोचते अचानक उनको रोहिण्डी ठिकाने के जागीदार का ख्याल आया ।
कुछ ही दिन बाद अचानक एक रात को रोहिण्डी ठिकाने (परबतसर) में दो घुड़सवार बुजुर्ग जागीदार के पोल पर पहुंचे और मिलने की इजाजत मांगी । ठाकुर साहब काफी वृद अवस्था में थे फिर भी उठ कर मेहमान की आवभक्त के लिए बाहर पोल पर आये घुड़सवारों ने प्रणाम किया और वृद ठाकुर की आँखों में चमक सी उभरी और मुस्कराते हुए बोले जोधपुर महाराज आपको मेने गोद में खिलाया है और अस्त्र शस्त्र की शिक्षा दी है इस तरह भेष बदलने पर भी में आपको आवाज से पहचान गया हूँ । हुकम आप अंदर पधारो में आपकी रियासत का छोटा सा जागीरदार, आपने मुझे ही बुलवा लिया होता ।
जोधपुर महाराजा गज सिंह ने उनको झुककर प्रणाम किया और बोले आप मेरे पूजनीय है और गुरु भी है एक समस्या है और उस का जवाब मुझे मिल नही रहा सो आप के पास बड़ी आशा से पधारा हूँ, और फिर उन्होंने बादशाह के दरबार की पूरी कहानी सुना दी, और कहा की अब आप ही बताये की जीवित योद्धा का कैसे पता चले की ये लड़ाई में सिर कटने के बाद भी लड़ेगा ?
रोहणी जागीदार बोले , बस इतनी सी बात “मेरे दोनों बच्चे सिर कटने के बाद भी लड़ेंगे और आप दोनों को ले जाओ दिल्ली दरबार में ये आपकी और राजपूती की लाज जरूर रखेंगे लेकिन ?? लेकिन क्या ?? महाराजा गज सिंह ने पुछा, महाराज थोडा रुकिए में एक बार इनकी माँ से भी कुछ चर्चा कर लूँ इस बारे में । महाराजा गज सिंह ने सोचा आखिर पिता का ह्रदय है कैसे मानेगा अपने दोनों जवान बच्चो के सिर कटवाने को , एक बार महाराजा गज सिंह जी ने सोचा की मुझे दोनों बच्चो को यही छोड़कर चले जाना चाहिए । पर जब उन्होंने देखा की ठाकुर साहब ने ठकुरानी जी को पूछा की ” आपके दोनों बच्चो को दिल्ली मुगल बादशाह के दरबार में भेज रहा हूँ सिर कटवाने को , दोनों में से कोनसा सिर कटने के बाद भी लड़ सकता है ? आप माँ हो आपको ज्यादा पता होगा ,तब ठकुरानी जी ने एक क्षत्राणी की तरह जवाब दिया की बड़ा लड़का तो क़िले और क़िले के बाहर तक भी लड़ लेगा पर छोटा केवल परकोटे में ही लड़ सकता है क्योंकि पैदा होते ही इसको मेरा दूध नही मिला था इसलिए, लड़ दोनों ही सकते है ,आप निश्चित् होकर भेज दो । महाराजा गज सिंह उस वीर माँ को देखते ही रह गए, उस ही समय रोहिण्डी ठाकुर के साथ ही खड़े एक सहयोगी बोल पड़े की हजुर ये तो अभी कुवारा है, इसकी अभी शादी नहीं हुई है तो इसके पीछे सती कौन होगा”
विचार हुआ की इस को अपनी बेटी कौन देगा, तब ही जोधपुर महाराजा के साथ पधारे ओसिया के भाटी सरदार बोल उठे “में दूंगा अपनी बेटी इसको”,
भाटी कुल री रीत ,आ आनंद सु आवती !
करण काज कुल कीत, भटीयानिया होवे सती !!
महाराजा गज सिंह को घोर आस्चर्य हुआ , मान गए राजपूती धर्म को … अच्छा मुहूर्त देख कर,महाराजा गज सिंह जी रोहिण्डी ठाकुर साहब के बड़े पुत्र तोगा राठौर का विवाह रचाते है पर शादी के बाद तोगा बिन्दनी के डेरे जाने से इंकार कर देता है और कहलवाता है की “अब तो हम दोनों का मिलन स्वर्गलोक में ही होगा” कह कर तोगा राठौर आगरा कूच करने की तैयारी करने लगता है, शाहजहा तक समाचार पहूचाये जाते है, एक खास दिन का मुहूर्त देख कर तोगा राठौर आगरा का रास्ता पकड़ता है, दिल्ली के दरबार में आज कुछ विशेष भीड़ थी और हजारो लोग इस द्रश्य को देखने जमा थे । बादशाह शाहजहा ने अपने खास एक्के तोगा राठौर को मरने के लिए तैयार कर रखा थे, तोगा राठौर को मैदान में लाया गया और मुगल बादशाह ने जल्लादो को आदेश दिया की इसकी गर्दन उड़ा दो , तभी बीकानेर महाराजा बोले “ये क्या तमाशा है ? राजपूती इतनी भी सस्ती नही हुई है , लड़ाई का मोका दो और फिर देखो कौन बहादुर है ?
बादशाह ने खुद के सबसे मजबूत और कुशल योद्धा बुलाये और कहा ये जो घुड़सवार मैदान में खड़ा है उसका सिर् काट दो, 20 घुड़सवारों का दल रोहणी ठाकुर के बड़े लड़के का सिर उतारने को लपका और देखते ही देखते उन 20 घुड़सवारों की लाशें मैदान में बिछ गयी ।
दूसरा दस्ता आगे बढ़ा और उसका भी वही हाल हुआ , मुगलो में घबराहट और झुरझरि फेल गयी , बादशाह के 500 सबसे ख़ास योद्धाओ की लाशें मैदान में पड़ी थी और उस वीर राजपूत योद्धा के तलवार की खरोंच भी नही आई ।।
ये देख कर मुगल सेनापति ने कहा ” 500 मुगल बीबियाँ विधवा कर दी आपकी इस परीक्षा ने अब और मत कीजिये हजुर , इस काफ़िर को गोली मरवाईए हजुर ,, तलवार से ये नही मरेगा , कुटिलता और मक्कारी से भरे मुगलो ने उस वीर के सिर में गोलिया मार दी और फिर पीछे से उसका सर काट देते है पर उस वीर के धड़ ने तलवार की मजबूती कम नही करी और तोगा गिरता नहीं है वो अपने दोनों हाथो से तलवार चलते हुए, मुगलों का मरते रहे, मुगलो का कत्लेआम खतरनाक रूप से चलते रहा ।
बादशाह ने तोगा राठौर के छोटे भाई को अपने पास निहथे बेठा रखा था ये सोच कर की ये बड़ा यदि बहादुर निकला तो इस छोटे को कोई जागीर दे कर अपनी सेना में भर्ती कर लूंगा लेकिन जब छोटे ने ये अंन्याय देखा तो उसने झपटकर एक मुग़ल की तलवार निकाल ली । उसी समय बादशाह के अंगरक्षकों ने उनकी गर्दन काट दी फिर भी धड़ तलवार चलाता गया और अंगरक्षकों समेत मुगलो का काल बन गए बाहर मैदान में बड़े भाई और अंदर परकोटे में छोटे भाई का पराक्रम देखते ही बनता था । हजारो की संख्या में मुगल हताहत हो चुके थे और आगे का कुछ पता नही था । शाहजहा खुद बैठे ये नज़ारा देख रहे थे, की अचानक तब ही तोगा लड़ते हुए दरी-खाने तक पहूच जाते है और उन्हें लड़ते हुए अपनी और आता देख बादशाह घबरा जाता है और अपने रानीवास में जा कर छिप जाता है, आखिर बादशाह अपने आदमी को महाराजा गजसिंह के पास भेज कर माफ़ी मागता है की गलती हो गयी अब किसी तरह इन वीरो को शांत करो नहीं तो ये सब को मार देंगे, तब कही शाहजहा के कहने पर गजसिंह ब्राह्मण दुआरा तोगा राठौर और उन के छोटे भाई के धड पर गंगाजल डलवाते है तब जाके वो शांत हो कर गिर जाते है, महाराज गज सिंह दुआर राजकीय सम्मान के साथ उनका शव को डेरे पहूचाया जाता है, वहा भटियानी सौला सिन्गार किये तैयार बैठी होती है, जमुना नदी के किनारे चन्दन की चिता में भटियानी तोगा राठौर का सर और धड को गोद में ले कर राम नाम की रणकार के साथ चिता की अग्नि में समां जाती है !!
“कटार अमरेस री, तोगा री तलवार !
हाथल रायसिंघ री , दिल्ली रे दरबार !!”

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