दास सतार के भजन bhajans of Daas Satar

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                   (1)
भजन करी लेने ओ गुणीयल ज्ञानी,
जो जो जाती रहेशे आ जुवानी ….भजन करी लेने …

भजने नाम प्रभु नु प्यारु, भक्ति विना दीसे अंधारु,
साचुं मानी लेने कह्यु मारुं…भजन करी लेने …

समजु सानमां समजी जाए, मुरख होय ते गोथा खाशे,
अंते तेनी फजेती थाशे …भजन करी लेने …

आव्यु हरी भजवानु टाणुं, गाने प्रभु नाम नु गाणुं,
साथे बांधी ले साचुं ए नाणुं….भजन करी लेने …

मुरखा मनमां बहु मलकाय,धन ने देखीने छलकाय,
अंते खाली ते हाथे जाय …भजन करी लेने …

तुं तो शेठ नो छे वाणोतर, तारा शेठ छे परमेश्वर,
भक्ति करवा राख्यो छे तने नोकर …..भजन करी लेने …

कमाणी एवी करीने जईए, मांगे हीसाब तो पुरो दईए,
त्यारे शेठ ना वाला थई रहीए ….भजन करी लेने ….

भाई सानमां समजी जवुं, नित्य हरीना गुणने गावुं,
तारे दुर ना देशे छे जवु….भजन करी लेने …

भक्ति जे कोई करशे भावे, तेना जनम मरण मटी जावे,
” सतार ”सत्य कही समजावे …..भजन करी लेने ….

                   (2)
भजन बीन नर है पशू के समान,
जैसो फिरत है ढोर हरायो,
खात फीरत है घास परायो,
अपने धनी को नाम लजायो,
मुंढ मुरख मस्तान….भजनबीन…

कोल बचन दे बहार आयो,
आकर लोभ में चित लगायो,
धीकधीक हरको गुणनहीं गायो,
बे बचनी नादान ….भजन बीन

अज्ञानी क्या फल को पावे,
तेरी मेरी में जनम गुमावे,
हिरला हाथ फिर कहांसे आवे
निकल गयो जब प्राण ….भजन बीन..

प्रेम से हर का जो गुण गावे,
ज्ञानी होकर ध्यान लगावे,
” दास सतार ” वो ही फल पावे
जो भजते भगवान …भजन बीन …
– दास सतार
(3)
सुख और दु:ख में आनंद रहेवे
हरदम हरगुण गावे
साधु वो नर हमको भावे…टेक

परनारी परधन को त्यागे, सतकी रोजी खावे,
तनमन और बचन सें कोइ, जी को नांही दुभावे. …साधु वो…

करे सेवा संसार की उनको, साची राह दिखावे,
धर्म करतां धाड आवे तो, हिंमत हार न जावे. …साधु वो …

परदु:ख भंजन होकर रहेवे, गुरू गोविंद गुण गावे,
दास सत्तार गुरू गोविंद मिलकर, काल को मार हठावे … साधु वो…

रचना :- दास सत्तार
टाइप :- सामरा पी गढवी

History & Literature

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