Monthly Archives: August 2015

सरोवर नी वेदना Sarovar ni Vedna

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हुआ था उड उड हंसला, पांखु पसवारे,
जाण्युं चारे नई जडे, नवा ने निहारे.

पण एम के’वाय छे के जेदी सरवर सुकाणुं. अने हंसलो ई सरवर ने छोडी हाली नीकळवा नी तैयारी करतो’तो. तेदी’ ई सुकायेला सरोवरे पोकार कर्यो’तो के –

‘हेत नकामुं हंसनुं, विपत पड्ये उडी जाय,
साची प्रीत शेवाळ नी, जळ हार्ये सुकाय.’

‘ए हंसला, शुं तारो नातो आटलो ज हतो. ज्यां लगण मारा मां कह हतो न्यां लगण ज तोळुं हेत हतुं, बाप ? अने हवे, तुं मने मेली ने वयो जाछ ?’
पण हंसले तो सरवर नी आ वात ने सांभरी नो सांभरी करी, पांखुं फफडावी. डाया माणसे कीधुं के – ‘अरे हंसला –
‘हंसा, सायर मानवी, करीये हाथां जोड,
जेथी रूडा लागीए, एथी तणी म त्रोड.’

ए हंसला, स्वजन ने छांडी ने नो जवाय बाप ! नेह नी नेळ्य ने एम तोळी नो नखाय. जेनाथी सारा लागता होईए एने तो हाथ जोडीनेय मनावी लेवाय. अने हंसला, –
‘हंसा सायर सेवीये, जेनी जळ बरोबर पाळ,
ओछो राजा न सेवीये, जेनो उचाळो अंतरीयाळ’

पण हैया विहोणो हंसलो पांखु फफडावतो स्वार्थ ने पंथे उड्यो ‘खरररर खरररर खरररर’
पोस्ट – चमन गज्जर

History & Literature

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नीर थोडुं प्रीत घणी- Dula Bhaya kag

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**नीर थोडुं प्रीत धणी**

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हंसला कोइ पीऐ नई पाणी रे…जी
प्रीत नी रीत पीछाणी…हंसला.

मानसरोवर कांठडे रेता उरमां शांती आणी रे जी (2);
आवी चड्यो त्यां कोइ शिकारी (2), तीर चडाव्या ताणी हंसला.1.

कालतणा भयथी ऐ भाग्या, आवी भोम अजाणी रे जी (2);
पांखुं थाकी पगडा डुक्या (2), देह तरसथी पीडाणी-हंसला .2.

अंगडे अंगडे अग्नी उपड्यो, आतम गती अकळाणी रे जी(2);
पाणी थोडुं त्यां नजरे पडता(2), जीवन आश बधाणी-हंसला.3.

‘काग’ पंखीनो प्रेम धणेरो, थोडुं हतुं ऐ पाणी रे जी (2);
‘तुं पी’ ‘तुं पी’ ऐटलुं बोलता (2), जीवन ज्योत बुजाणी-हंसला .4.

रचना:- कवि श्री दुला-भाया ‘काग’
टाइपींग:- लाभुभाइ गढवी.

History & Literature

दुनिया ना डाया – Bhagat Bapu Dula Kag

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दुनिया ना डा’या 📖

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दुनियाना डा’या रे डा’पणनी वातुं कोणे कीधी ?
वेदने विचार्या जेणे, शिवने रीझवीआ वा’ला ! (2)
(ऐणे) जानकीने केम हरी लीधी ?… ऐ दुनियाना… 1

सत्ताना सुहागी बधा, सुभट भारतना वा’ला ! (2)
गर्भमां बाळुडां नाख्यां वींधी … ऐ दुनियाना… 2

ईन्द्रने गमे नहि कोईनुं उगमवुं वा’ला ! (2)
कुड-कपटनी वाटुं लीधी … ऐ दुनियाना… 3

जगने रंजाडे ऐवां दळ दानवोनां वा’ला ! (2)
शुकरे जीववानी केडी चींधी … ऐ दुनियाना… 4

डा’पणे मरे के पाछूं गांडु थईने जन्मे वा’ला ! (2)
पेलांथी घेलपनी भांग्युं पीधी … ऐ दुनियाना… 5

भावार्थ :-
             ईतिहासमां लखायेला जेटला डाह्या माणसो छे ऐ बधाना डहापण आ जातना होय तो ऐ डा’पण जगतनो नाश करनारु नीवड़े दाखला तरीके –
               रावण जेवो वेद शास्त्रनो जाणकार, सदाशिवने प्रसन्न करनार अने पुलस्त्य कुळ मां जन्मेला ऐने सीता हरण करवानी बुद्रि थई ?
               महाभारतना काळना प्रात: स्मरणीय मोटा माणसो तो सत्ता अने पृथ्वीना ज उपासको हता. अश्वत्थामां जेवा उत्तम ब्राह्मणों छेवट उत्तराकुमारीना गर्भमां रहेल बाळक परीक्षीत ने मारवा बाण मुकेलां.
                    देवताओना राजा ईन्द्र, सर्व पंचशकितओना स्वामी, ऐने कोईनो उत्कर्ष ज न गमे. ऐना आखा जीवनामां बीजो यज्ञ करे अथवा तप तपे के ऐने आग उपदे. लदीने, छळ करीने, बीजानी मदद लईने ऐनो नाश करे त्यारे ज ऐने शांति वळे.
               बे महामुनिओ ऐक बृहस्पति अने बीजा शुक्राचार्य. ऐक देवतानां गुरु, बीजा दैत्योंनो गुरुदेव. जगतने त्राहिमाम् पोकरावनारा दैत्योंने कोई मारी नाखे तो शुक्राचार्य ऐने संजीवनी दवाथी जीवता करे. वळी पाछा ऐ दानवो जगतना बाग़ने उधेमूळ करी मुके.
            डा’पणनुं मरण ऐ घेलापणानो जन्म, कारण के बधा ज बुद्धिना डा’पण नी गळथुथीमां घेलापणुं पायुं होय छे. श्रद्धा ऐक ज , अहिंसा अने सत्यथी जन्मेल ते साचुं डा’पण छे.

रचियता :- पह्मश्री दुला भाया काग (भगत बापू)

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अश्व नु सपाखरु – Dula Bhaya Kag

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वाह घोडा वाह
गीत सपाखरू
कवि दुला भाया काग

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छूटा ग्राहबे वोम बछूटा रोकता धराका छेडा
उठाहबे पागा महि शोभता अथोग
धाहबे खगेश तके वेगरा अथाह धख्या
साहबे नाखता पागा नटव्वा अमोध         (1)

डाबला मांडतां धरा धमंके साबधी दणी
झमंके साजहीं कोटे रंभरा झकोळ
चमके वाहसे जाणी वीजळी जालदा चळी
भ्रम्मवाळा भारे ठाळा गतिवाळा मोर      (2)

वांभशी सांकळांवाळा टांक कानसोरी वदां
कुरंगां आंखडीवाळा मूलरा करोड
भालावाळा लटां केश फोरणां उलंधी भजे
जटाळा जोगंद्र नहीं पटाळाकी जोड        (3)

छाछरा भालरा छातीयां ढालरा समां
चोडा त्रींग बाजोठरा खाळीया सढाळ
साकाबंधी तांसळीरा ओपता डाबला चोडा
ठमकंता घोडा नाडा तोड सांधे ठाळ       (4)

अंजळिमां पीता पाणी मोकली वखाणी आप
जांगळां थोकरा धरा पूंछरा झपाट
केशवाळी ढींचणारा ओवाराणा लीये काजु
थडक्के धरास वांसा डाबकी थपाट       (5)

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लगामे गराया हाथ ऊतरे गढांपे लाया
टोळे मृग्गवाळा फोळे खीजीया तोखार
चडाया वा’णरा सढां देखी कंपे निज छाया
नाचरा नचाया के हसाया नरां नार        (6)

करंता नख्खरा देखी धरापति रीझे केक
डरंता माठरा नरा घडेला देखाव
बाथां पाव उंडळां के भरंता भोमरी बथ्थां
नवल्ला बनाया घोडा ब्रह्मांडका नाव    (7)

चोब नगारांपें पडे गेडीया भारथां समे
धमां धमां खमा खमा दिहंता धमंक
धनकटां धनकटां तबल्लां तालरा घोडा
चटां पटां पाणरा के अंगरा चमंक        (8)

वागडदा गागदडा अंगठाळ फाळ सांधे वाह
आगडदा गागडदा थेइ थाइ थटां अंग
धीनकटां धररर धमां धमां खमा घोडा
तागडदा थागडदा ठाळ सांधणा तुरंग      (9)

बाहोळारा पुत्र रोझा आशा घोडां नके बीजे
वदां नाथ रोहणीका चंद्र जसा वान
छूटता रमेवा घोडा बजारां सांकडी सोडा
वाह हीपडारा घोडा देवरा वेमान       (10)

History & Literature

गागरोन का किल्ला ,Gagron Fort

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गागरोन का किला- त्याग का गवाह है यह किला, लाज बचाने के लिए हजारों महिलाओं ने दी थी जान
दुनिया में सबसे अधिक किले और गढ़ यदि कहीं हैं तो वो राजस्थान में। राजस्थान के किसी भी हिस्से में चले जाइए, कोई न कोई दुर्ग या किला सीना ताने आपका इंतजार करता हुआ आपको दिख जाएगा। आज हम आपको एक ऐसे ही किले ‘गागरोन’ के बारे में बताएंगे। राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित यह किला चारों ओर से पानी से घिरा हुआ है। यही नहीं यह भारत का एकमात्र ऐसा किला है जिसकी नींव नहीं है।

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गागरोन का किला अपने गौरवमयी इतिहास के कारण भी जाना जाता है। सैकड़ों साल पहले जब यहां के शासक अचलदास खींची मालवा के शासक होशंग शाह से हार गए थे तो यहां की राजपूत महिलाओं ने खुद को दुश्मनों से बचाने के लिए जौहर (जिंदा जला दिया) कर दिया था। सैकड़ों की तादाद में महिलाओं ने मौत को गले लगा लिया था। इस शानदार धरोहर को यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में भी शामिल किया है।

खासियतों से भरा है यह किला
गागरोन किले का निर्माण कार्य डोड राजा बीजलदेव ने बारहवीं सदी में करवाया था और 300 साल तक यहां खीची राजा रहे। यहां 14 युद्ध और 2 जोहर (जिसमें महिलाओं ने अपने को मौत के गले लगा लिया) हुए हैं। यह उत्तरी भारत का एकमात्र ऐसा किला है जो चारों ओर से पानी से घिरा हुआ है इस कारण इसे जलदुर्ग के नाम से भी पुकारा जाता है। यह एकमात्र ऐसा किला है जिसके तीन परकोटे हैं। सामान्यतया सभी किलो के दो ही परकोटे हैं। इसके अलावा यह भारत का एकमात्र ऐसा किला है जिसे बगैर नींव के तैयार किया गया है। बुर्ज पहाडियों से मिली हुई है।

आखिर क्यों जलना पड़ा था हजारों महिलाओं को?
अचलदास खींची मालवा के इतिहास प्रसिद्ध गढ़ गागरोन के अंतिम प्रतापी नरेश थे। मध्यकाल में गागरोन की संपन्नता एवं समृद्धि पर मालवा में बढ़ती मुस्लिम शक्ति की गिद्ध जैसी नजर सदैव लगी रहती थी। 1423 ई. में मांडू के सुल्तान होशंगशाह ने 30 हजार घुड़सवार, 84 हाथी व अनगिनत पैदल सेना अनेक अमीर राव व राजाओं के साथ इस गढ़ को घेर लिया। अपने से कई गुना बड़ी सेना तथा उन्नत अस्त्रों के सामने जब अचलदास को अपनी पराजय निश्चित जान पड़ी तो उन्होंने कायरतापूर्ण आत्मसमर्पण के स्थान पर राजपूती परंपरा में, वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। दुश्मन से अपनी असमत की रक्षा के लिए हजारों महिलाओं ने मौत को गले लगा लिया था।

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आखिर क्यों सैकड़ों वर्षों तक अचलदास के पलंग को किसी ने हाथ नहीं लगाया?
होशंगशाह जीत के बाद अचलदास की वीरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने राजा के व्यक्तिगत निवास और अन्य स्मृतियों से कोई छेड़छाड़ नहीं किया। सैकड़ों वर्षों तक यह दुर्ग मुसलमानों के पास रहा, लेकिन न जाने किसी भय या आदर से किसी ने भी अचलदास के शयनकक्ष में से उसके पलंग को हटाने या नष्ट करने का साहस नहीं किया। 1950 तक यह पलंग उसी जगह पर लगा रहा।

कई दिनों तक आती रहीं पलंग पर राजा के सोने और हुक्का पीने की आवाज
रेलवे में सुपरिटेंडेंट रहे ठाकुर जसवंत सिंह ने इस पलंग के बारे में रोचक बात बताई। उनके चाचा मोती सिंह जब गागरोन के किलेदार थे तब वे कई दिनों तक इस किले में रहे थे। उन्होंने स्वयं इस पलंग और उसके जीर्ण-शीर्ण बिस्तरों को देखा था। उन्होंने बतलाया कि उस समय लोगों की मान्यता थी कि राजा हर रात आ कर इस पलंग पर शयन करते हैं। रात को कई लोगों ने भी इस कक्ष से किसी के हुक्का पीने की आवाजें सुनी थीं।

पलंग के पास रोज मिलते थे पांच रुपए
हर शाम पलंग पर लगे बिस्तर को साफ कर, व्यवस्थित करने का काम राज्य की ओर एक नाई करता था और उसे रोज सुबह पलंग के सिरहाने पांच रुपए रखे मिलते थे। कहते हैं एक दिन रुपए मिलने की बात नाई ने किसी से कह दी। तबसे रुपए मिलने बंद हो गए। लेकिन बिस्तरों की व्यवस्था, जब तक कोटा रियासत रही, बदस्तूर चलती रही। कोटा रियासत के राजस्थान में विलय के बाद यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होने लगी।

मौत की सजा के लिए होता था इसका प्रयोग
किले के दो मुख्य प्रवेश द्वार हैं। एक द्वार नदी की ओर निकलता है तो दूसरा पहाड़ी रास्ते की ओर। इतिहासकारों के अनुसार, इस दुर्ग का निर्माण सातवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक चला था। पहले इस किले का उपयोग दुश्मनों को मौत की सजा देने के लिए किया जाता था।

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किले के अंदर हैं कई खास महल
किले के अंदर गणेश पोल, नक्कारखाना, भैरवी पोल, किशन पोल, सिलेहखाना का दरवाजा महत्पवूर्ण दरवाजे हैं। इसके अलावा दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जनाना महल, मधुसूदन मंदिर, रंग महल आदि दुर्ग परिसर में बने अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल हैं।

अकबर ने बनाया था मुख्यालय
मध्ययुग में गागरोन का महत्व इस बात से मालूम होता है कि प्रसिद्ध सम्राट शेरशाह एवं अकबर दोनों ने इस पर व्यक्तिगत रूप से आ कर विजय प्राप्त की और इसे अपने साम्राज्य में मिला दिया। अकबर ने इसे अपना मुख्यालय भी बनाया लेकिन अंत में इसे अपने नवरत्नों में से एक बीकानेर के राजपुत्र पृथ्वीराज को जागीर में दिया।

नहीं उठी खांडा तो रास्ते में छोड़ गए चोर
खींची राजा की भारी तलवार को एक एडीसी साहब उड़ा ले गए। लेकिन वजनी खांडा चुरा कर ले जाने वाले उसका वजन न उठा सके तो उसें रास्ते में ही छोड़ गए। अब वह झालावाड़ के थाने में बंद पड़ा है। खींची राजा के सदियों पुराने पलंग और उसके बिस्तरों को लोगों ने गायब कर दिया है। तोपें लोगों ने गला दीं।

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सबसे अलग हैं यहां के तोते
गागरोन के तोते बड़े मशहूर हैं ये सामान्य तोतों से आकार में दोगुने होते हैं तथा इनका रंग भी अधिक गहरा होता है इनके पंखों पर लाल निशान होते हैं नर तोते के गले के नीचे गहरे काले रंग की और ऊपर गहरे लाल रंग की कंठी होती है। कहा जाता है कि गागरोन किले की राम-बुर्ज में पैदा हुए हीरामन तोते बोलने में बड़े दक्ष होते हैं।

मनुष्यों के जैसे बोलते हैं यहां के तोते
यहां के तोते मनुष्यों के बोली की हूबहू नकल कर लेता है। गुजरात के बहादुरशाह ने 1532 में यह किला मेवाड़ के महाराणा विक्रमादित्य से जीत लिया था। बहादुरशाह गागरोन का एक तोता अपने साथ रखता था। बाद में, जब हुमायूं ने बहादुरशाह पर विजय प्राप्त की तो जीत के सामानों में आदमी की जुबान में बोलनेवाला यह तोता भी उसे सोने के पिंजरे में बंद मिला। हुमायूं उस समय मंदसौर में था। उस समय एक सेनापति की दगाबाजी पर हुमायूं ने तोते को मारने की बात कही थी।

सेनापति की गद्दारी पर तोते ने पुकारा गद्दार-गद्दार
बहादुरशाह का सेनापति रूमी खान अपने मालिक को छोड़ कर हुमायूं से जा मिला था। कहते हैं जब रूमी खान हुमायूं के शिविर में आया तो उसे देख कर यह तोता गद्दार-गद्दार चिल्लाने लगा। इसे सुन कर रूमी खान बड़ा लज्जित हुआ तथा हुमायूं ने नाराज हो कर कहा कि यदि तोते कि जगह यह आदमी होता तो मैं इसकी जबान कटवा देता।

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बेहतर पिकनिक स्पॉट
कालीसिंध व आहू नदी के संगम स्थल पर बना यह दुर्ग आसपास की हरी भरी पहाडिय़ों की वजह से पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। गागरोन दुर्ग का विहंगम नजारा पीपाधाम से काफी लुभाता है। इन स्थानों पर लोग आकर गोठ पार्टियां करते हैं। लोगों के लिए यह बेहतर पिकनिक स्पॉट है। इस शानदार धरोहर को यूनेस्को ने अपनी वर्ल्ड हेरिटेज साइट की सूची में शामिल किया है।

History & Literature

महाकवि कालिदास, Mahakavi Kalidas

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महाकवि कालिदास अपने समय के महान
विद्वान थे। उनके कंठ में साक्षात सरस्वती का
वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित
नहीं कर सकता था। अपार यश, प्रतिष्ठा और
सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी
विद्वत्ता का घमंड हो गया। उन्हें लगा कि
उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर
लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं
बचा। उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा
नहीं। एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ
का निमंत्रण पाकर कालिदास महाराज
विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर
रवाना हुए।
गर्मी का मौसम था, धूप काफी तेज़ और
लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग
आई। जंगल का रास्ता था और दूर तक कोई
बस्ती दिखाई नहीं दे रही थी। थोङी तलाश
करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी।
पानी की आशा में वो उस ओर बढ चले। झोपड़ी
के सामने एक कुआं भी था। कालिदास जी ने
सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी
देने का अनुरोध किया जाए। उसी समय
झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर
निकली। बच्ची ने कुएं से पानी भरा और जाने
लगी।
कालिदास उसके पास जाकर बोले ” बालिके!
बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे।”
बच्ची ने कहा, “आप कौन हैं? मैं आपको जानती
भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए।”

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Mahakavi Kalidas

कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं
जानता मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता?
फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले, “बालिके
अभी तुम छोटी हो। इसलिए मुझे नहीं जानती।
घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो। वो मुझे
देखते ही पहचान लेगा। मेरा बहुत नाम और
सम्मान है दूर-दूर तक। मैं बहुत विद्वान व्यक्ति
हूं।”
कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से
अप्रभावित बालिका बोली, “आप असत्य कह
रहे हैं। संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन
दोनों को मैं जानती हूं। अपनी प्यास बुझाना
चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं?”
थोङी देर सोचकर कालिदास बोले, “मुझे नहीं
पता, तुम ही बता दो। मगर मुझे पानी पिला
दो। मेरा गला सूख रहा है।”
बालिका बोली, “दो बलवान हैं ‘अन्न’ और
‘जल’। भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से
बड़े बलवान को भी झुका दें। देखिए तेज़ प्यास ने
आपकी क्या हालत बना दी है।”
कलिदास चकित रह गए। लड़की का तर्क
अकाट्य था। बड़े से बड़े विद्वानों को
पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने
निरुत्तर खङे थे।
बालिका ने पुनः पूछा, “सत्य बताएं, कौन हैं
आप?” वो चलने की तैयारी में थी, कालिदास
थोड़ा नम्र होकर बोले, “बालिके! मैं बटोही
हूं।”
मुस्कुराते हुए बच्ची बोली, “आप अभी भी झूठ
बोल रहे हैं। संसार में दो ही बटोही हैं। उन
दोनों को मैं जानती हूँ, बताइए वो दोनों
कौन हैं?”
तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास जी की
बुद्धि क्षीण कर दी थी। लेकिन लाचार होकर
उन्होंने फिर अनभिज्ञता व्यक्त कर दी।
बच्ची बोली, “आप स्वयं को बङा विद्वान
बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते? एक स्थान से
दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही
कहलाता है। बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और
दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं। आप तो
थक गए हैं। भूख प्यास से बेदम हो रहे हैं। आप कैसे
बटोही हो सकते हैं?”
इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका
उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई। अब तो
कालिदास और भी दुखी हो गए। इतने
अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए। प्यास से
शरीर की शक्ति घट रही थी। दिमाग़ चकरा
रहा था। उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़
देखा। तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली। उसके
हाथ में खाली मटका था। वो कुएं से पानी
भरने लगी।
अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास
बोले, “माते प्यास से मेरा बुरा हाल है। भर पेट
पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा।”
बूढी माँ बोलीं, ” बेटा मैं तुम्हे जानती नहीं।
अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला
दूँगी।”
कालिदास ने कहा, “मैं मेहमान हूँ, कृपया
पानी पिला दें।” “तुम मेहमान कैसे हो सकते
हो? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और
दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता,
सत्य बताओ कौन हो तुम?”
अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश
कालिदास बोले “मैं सहनशील हूं। पानी पिला
दें।”
“नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती
जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है,
उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज
के भंडार देती है। दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो
फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच
बाताओ कौन हो?”
कालिदास लगभग मूर्छा की स्थिति में आ गए
और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले, ” मैं हठी
हूं।”
“फिर असत्य। हठी तो दो ही हैं, पहला नख और
दूसरा केश। कितना भी काटो बार-बार
निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप?”
पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके
कालिदास ने कहा, “फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।”
“नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख दो ही हैं।
पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब
पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित
जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर
भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा
करता है।”
कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास
वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना
में गिड़गिड़ाने लगे।
उठो वत्स… ये आवाज़ सुनकर जब कालिदास ने
ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां
खड़ी थी। कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए।
“शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने
शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा
को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और
अहंकार कर बैठे। इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने
के लिए ये स्वांग करना पड़ा।”
कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और
भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

History & Literature

भूपत सिंह चौहाण – इंडियन रॉबिन हुड – जिसे कभी पुलिस पकड़ नहीं पायी, Bhupatsinh Chauhan Indian Robinhud

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भूपत सिंह चौहाण – इंडियन रॉबिन हुड – जिसे कभी पुलिस पकड़ नहीं पायी
यह बात आजादी के पहले की है। इस समय देश में राजा-रजवाड़ों का शासन चलता था। भारत की संपत्ति व संपदा लूटने में अंग्रेज कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। इतना ही नहीं, अपने स्वार्थ के लिए देश के कई राजा-रजवाडे भी अंग्रेजों के साथ मिलकर देश को लूट रहे थे और जनता अनकों तरह की यातनाएं भुगतते हुए भूखी-प्यासी मर रही थी। इस समय देश में चारों ओर सिर्फ लूटपाट का ही नगाड़ा बज रहा था।

इसी समय वडोदरा के शासक गायकवाड परिवार को एक चिट्ठी मिलती है, जिसमें पूरे परिवार को धमकी लिखी थी..‘महल में काम करने वाले सभी 42 नौकरों को उनकी सेवानिवृत्ति के समय पांच-पांच वीघा जमीन दी जाए और इसकी जाहिर सूचना पूरे शहर में भी दी जाए। अगर आपने ऐसा नहीं किया तो परिवार के सभी सदस्यों की एक-एक कर हत्या कर दी जाएगी।’ इस धमकी भरे पत्र के नीचे नाम लिखा था.. भूपत सिंह चौहाण। यह वही भूपतसिंह था, जिसने वडोदरा से लेकर दिल्ली की सरकार तक के नाक में दम कर रखा था।

इंग्लैंड के रॉबिनहुड या हिंदी फिल्मों की तरह लगने वाली यह कथा एक सच्ची घटना है। भूपतसिंह के कहर से जहां राजा-रजवाड़े और अंग्रेज कांपा करते थे, वहीं गरीबों के दिल में उसके लिए सर्वोच्च स्थान था।

गुजरात के कठियावाड की बहादुर धरती का पानी ही कुछ ऐसा है कि पूरे एशिया में सिर्फ यहीं एशियाटिक लायंस पैदा होते हैं। मात्र प्राणियों में ही नहीं, कठियावाडी लोगों की रगों में भी ¨सहों का शौर्य दौड़ता है। उनकी आवाज में भी उनकी शूरवीरता छलकती है। कठियावाड के इतिहास पर नजर डालें तो यहां से लोगों की वीरगाथा का एक लंबा इतिहास है। इन्हीं में एक नाम आता है भूपत सिंह चौहाण का।

कठियावाड में एक समय आया था, जब भूपत सिंह पूरे देश के राजा-रजवाड़ों और अंग्रजों के लिए सिरदर्द बन गया था। अंतिम समय तक भूपत सिंह को न तो किसी राजा की सेना पकड़ सकी और न ही ब्रितानी फौजें। अंतत: कई अंग्रेजों को मौत की नींद सुला देने वाले भूपत सिंह के बिना ही अंग्रेजों को वापस इंग्लैंड लौटना पड़ा। अंग्रेजी शासन के अंत के बाद इधर भारत सरकार भी भूपत को कभी पकड़ नहीं सकी।

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कठियावाड में जन्मा भूपत सिंह बचपन से ही बहादुर था। तेज भागने घोड़ों पर सवार होकर हवा से बात करने की कला तो जैसे उसे वरदान में ही मिली थी। भूपत को जानने वाले लोग बताते हैं कि वह इतनी तेज दौड़ा करता था कि अगर उस समय ओलंपिक में भाग लेता तो कोई उसे हरा नहीं सकता था। लेकिन उसके भाग्य में कुछ और ही लिखा था। तेज भागना उसकी आदत थी, इसलिए वह ताउम्र भागता ही रहा।

भूपत के शिकार बने कई लोगों का परिवार अब भी कठियावाड और आसपास के क्षेत्रों में रहते हैं। भूपत की कई क्रूरता भरी कहानियां हैं तो कई उसकी शौर्यगाथाओं और गरीबों के प्रति उसके प्रेम का गुणगान करती हुई भी हैं।

यह 1920 का समय था और भारत पर अब पूरी तरह ब्रिटिश सरकार का शासन था। कुछ राजा-रजवाड़ा बचे भी तो वे अंग्रेजी सरकार के कठमुल्ले मात्र ही थे। इस समय अमरेली जिला के वरवाला गांव में भूपत का जन्म हुआ। उसका पूरा नाम भूपत सिंह बूब था। लेकिन उसने अपने लिए भूपत सिंह चौहाण नाम ही पसंद किया और वह इसी नाम से पहचाना गया। दरअसल भूपत के इस नाम के पीछे का मूल कारण यह था कि उसके वंशज चौहाणवंशी क्षत्रियों से ही संबंध रखते थे।

भूपत का बचपन वाघणिया में बीता। वह बचपन से ही बहुत बुद्धिशाली था। उसकी तर्क-वितर्क और निर्णय की शक्ति इतनी पैनी थी कि जवानी की दहलीज पर कदम रखते हुए ही उसकी नियुकित वाघणिया के राजा के दरबार में हो गई थी। इसके अलावा भूपत को तरह-तरह के खेलों का भी बहुत शौक था। उसकी यह प्रतिभा भी ज्यादा दिन छुपी नहीं कर सकी। जब भी राजा के दरबार में दौड़, घुड़दौड़, गोला फेंक जैसी स्पर्धाएं आयोजित होती तो वह अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए कई अवार्ड भी राजा की झोली में डाल दिया करता था। बताया जाता है कि दरबार में नियुक्ति के बाद राज्य में आयोजित पहली स्पर्धा में ही वह सात खेलों में दूसरे नंबर पर रहा था। इसकी वजह से उसका दूर-दूर तक नाम प्रसिद्ध हो गया था।
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लेकिन भूपत का जीवन शायद आलीशान महल में रहने के लिए नहीं था। इसलिए उसकी जिंदगी में एक साथ दो-दो ऐसी घटनाएं हुई कि उसने हथिया उठा लिए। दरअसल भूपत के जिगरी दोस्त और पारिवारिक रिश्ते से भाई राणा की बहन के साथ उन लोगों ने बलात्कार किया, जिनसे राणा की पुरानी दुश्मनी थी। जब इनसे बदला लेने राणा पहुंचा तो उन लोगों ने राणा पर भी हमला कर दिया। भूपत ने किसी तरह राणा को बचा लिया, लेकिन झूठी शिकायतों के चलते वह खुद इस मामले में फंस गया और उसे कालकोठरी में डाल दिया गया। बस, यहीं से खिलाड़ी भूपत मर गया और डाकू भूपत पैदा हो गया।

भूपत ने जेल से फरार होते ही पहली हत्या की। इस समय उसकी टोली में सिर्फ तीन ही व्यक्ति थे। लेकिन जैसे-जैसे वह अपराध की दुनिया में कदम बढ़ाता चला गया, उसके साथियों की संख्या भी बढ़ती चली गई। अपराध की चरम सीमा पर पहुंचने तक उसके 42 साथी थे और सब एक से बढ़कर एक बहादुर और क्रूर भी। भूपत उस समय का पहला ऐसा डाकू था, जिसने अपने 21-21 साथियों की दो टोलियां बना रखी थीं। इसमें भी खास बात यह है कि इन दोनों टोलियों के लिए सरदार नियुक्त थे, लेकिन हुक्म सिर्फ भूपत का ही चलता था। इसके अलावा दोनों टोलियां जंगल में अलग-अलग ही पड़ाव डाला करती थीं।

भूपत से गद्दारी करते हुए उसका खबरी या उसके साथी पकड़े जाते तो वह उन्हें जान से नहीं मारता था, बल्कि उनकी नाक व कान काट दिया करता था। भूपत की इस क्रूर सजा का शिकार हुए लोगों की संख्या 40 से अधिक है। इसमें चार व्यक्ति तो अब भी सुरेंद्रनजर जिला में रहते हैं। इनमें से एक व्यक्ति के बताए अनुसार भूपत का मानना था कि हत्या करने की बजाय जीवन भर के लिए सजा देना अन्य लोगों को भी डराता रहता है। इसके अलावा भूपत उसे धमकी भी दिया करता था कि अगर उसने आत्महत्या की तो फिर उसके बाकी बचे परिवार की हत्या कर दी जाएगी। इस तरह से वे नाक-कान कटे लोगों को मरने भी नहीं देता था।
भूपत सिंह को खौफनाक हैवान कहा जाता था। उसे अतिशय विकृत मानसिकता का व्यक्ति करार दिया गया था, लेकिन महिलाओं के मामले में उसकी तारीफ भी की जाती थी। क्योंकि डाकू और लुटेरे बनने के बाद भी उसके दिल में महिलाओं के लिए बहुत सम्मान था। उसने अपनी पूरी उम्र किसी भी महिला पर कभी हाथ नहीं उठाया। उसके अलावा उसके साथियों को भी निर्देश था कि कोई भी स्थिति हो, महिलाओं को सम्मान की ही नजर से देखा जाए।

1947 की आजादी के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। इस दौरान भूपत और उसके साथियों ने अपनी दम पर सैकड़ों महिलाओं की आबरू बचाई। भूपत की इन्हीं अच्छाईयों की वजह से उसके क्रूर इतिहास को भुला दिया जाता था। इसके अलावा गरीब उसे अपना मसीहा भी मानते थे।

भूपत सिंह की इसी नेकनियती के कारण वह अनेकों बार पुलिस से बचा लिया गया। गुजरात में उसे कई बार पुलिस ने घेरा, लेकिन उसे बचने के लिए किसी न किसी का साथ मिल ही जाता था। कई बार तो उसे महिलाओं ने ही बचाया था। एक बार तो गिर के जंगल के पास के एक गांव की कई महिलाओं को इस आरोप में गिरफ्तार भी कर लिया गया था कि उन्होंने भूपत को भगाने में मदद की। लेकिन अखबारों में इसकी खबर आने और विवाद मचने के बाद सभी महिलाओं को मुक्त कर दिया गया था।
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भूपत सिंह ने सैकड़ों बार पुलिस को चकमा दिया। देश आजाद होने के बाद 1948 में भूपत के कारनामे चरम पर पहुंच गए थे और पुलिस भूपत को रोकने और पकड़ने में पूरी तरह नाकाम हो गई थी। इस बात से सौराष्ट्र के गृहमंत्री रसिक लाल इस कदर गुस्सा थे कि उन्होंने पुलिस प्रशासन को यह आदेश दे दिया था कि.. जब तक भूपत पकड़ा नहीं जाता, तब तक के लिए पुलिस को 25 प्रतिशत कम सैलरी मिलेगी। महीनों तक पुलिस को 25 प्रतिशत कम सैलरी मिली, लेमिन भूपत पकड़ा नहीं गया। इसके बाद भूपत ने रसिकलाल को ही धमकी दे दी थी कि वे तुरंत पुलिस को पूरी सैलरी देने का आदेश सुनाए। और भूपत की इसी धमकी की वजह से ही पुलिस को पूरा वेतन मिलना शुरू हो गया था। यह भूपत के नाम की धाक ही थी।
इसके अलावा भूपत सिंह को पशु-पक्षियों की आवाजें निकालना व पहचानने की कला भी आती थी। यह हुनर उसने जंगल में ही आदिवासियों से सीखा था। इसका उसे भरपूर फायदा भी मिला। गिर जैसे खतरनाक जंगल में इसी कला की वजह से वह जीवित रह सका। एक बार पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में यह बात लिखी भी थी कि भूपत को पशु-पक्षियों की आवाज निकालने व पहचानने का हुनर आता है, इसलिए जब भी पुलिस जंगल में उसे घेरने घुसती है तो वह बच जाता है और उल्टे पुलिस की टीम ही मुश्किल में पड़ जाती है। इसलिए उसे जंगल में जाकर पकड़ना बहुत मुश्किल है।

एक बार जब भारी पुलिस दल ने भूपत को जंगल में चारों ओर से घेर लिया तो वह शेर की गुफा में छिप गया। लगभग दो दिनों तक भूपत गुफा से बाहर नहीं निकला। जबकि इस गुफा में सिंह का एक पूरा परिवार था। पुलिस इस गुफा तक पहुंच भी गई थी, लेकिन शेरों को देखकर उनकी हिम्मत गुफा में दाखिल होने की नहीं हुई। इसके अलावा उन्होंने यह भी सोचा कि कम से कम वह शेर की गुफा में तो नहीं छुपा होगा, वरना शेर उसे मारकर खा जाएंगे। जबकि पुलिस का यह अंदेशा था, पुलिस यह भूल गई थी कि वह कई सालों से उन्हीं शेरों के साथ रह रहा था। पुलिस के वापस जाने के बाद भूपत ने अपने साथियों तक अपने यह संदेशा पहुंचाया कि वह पुलिस के चंगुल से अब भी बाहर है। भूपत की यह अदा उसकी दिलेरी की कहानी खुद-ब-खुद बयां करती है।

60 के दशक में डाकू भूपत सिंह अपने तीन खास साथियों के साथ देश छोड़कर गुजरात के सरहदी रास्ते कच्छ से पाकिस्तान पहुंच गया। हालांकि पाकिस्तान जाने के पीछे उसका कोई खास मकसद नहीं था। उसे मौत का खौफ भी नहीं था कि वह देश छोड़कर भागता। लेकिन कुछेक घटनाएं ऐसी हुईं कि भूपत कुछ समय के लिए पाकिस्तान चला गया। कुछ समय बाद उसने वापस भारत आने का इरादा किया, लेकिन भारत-पाक पर मचे घमासान के चलते उसके लिए यह मुमकिन नहीं हुआ।
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पाकिस्तानी सेना ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उसे घुसपैठ के आरोप में जेल भेज दिया गया। उसे एक साल की सजा सुनाई गई। लेकिन सजा पूरी होने के बाद भूपत वापस भारत नहीं आया और वहीं स्थायी हो गया। पाकिस्तान में उसने मुस्लिम धर्म अंगीकार कर लिया और अब उसका अमीन युसुफ हो गया। धर्म परिवर्तन के बाद उसने मुस्लिम लड़की से निकाह किया। उसके चार बेटे और दो बेटियां हुईं। हालांकि उसने व उसके अन्य साथियों ने भारत आने की कई कोशिशें की, लेकिन उसकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी और पाकिस्तान की धरती पर ही 2006 में उसने दुनिया से विदा ले ली।

History & Literature

चमकौर का युद्ध, Chamkaur yuddh, Guru Govindsinh

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चमकौर का युद्ध- जहां 10 लाख मुग़ल सैनिकों पर भारी पड़े थे 40 सिक्ख
22 दिसंबर सन्‌ 1704  को सिरसा नदी के किनारे चमकौर नामक जगह पर सिक्खों और मुग़लों के बीच एक ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया जो इतिहास में “चमकौर का युद्ध” नाम से प्रसिद्ध है। इस युद्ध में सिक्खों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के नेतृत्व में 40 सिक्खों का सामना वजीर खान के नेतृत्व वाले 10 लाख मुग़ल सैनिकों से हुआ था।  वजीर खान किसी भी सूरत में गुरु गोविंद सिंह जी को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ना चाहता था क्योंकि औरंगजेब की लाख कोशिशों के बावजूद गुरु गोविंद सिंह मुग़लों की अधीनता स्वीकार नहीं कर रहे थे। लेकिन गुरु गोविंद सिंह के दो बेटों सहित 40 सिक्खों ने गुरूजी के आशीर्वाद और अपनी वीरता से वजीर खान को अपने मंसूबो में कामयाब नहीं होने दिया और 10 लाख मुग़ल सैनिक भी गुरु गोविंद सिंह जी को नहीं पकड़ पाए। यह युद्ध इतिहास में सिक्खों की वीरता और उनकी अपने धर्म के प्रति आस्था के लिए जाना जाता है । गुरु गोविंद सिंह ने इस युद्ध का वर्णन “जफरनामा” में करते हुए लिखा है-  
” चिड़ियों से मै बाज  लडाऊ  गीदड़ों  को  मैं  शेर  बनाऊ.
सवा लाख से एक लडाऊ तभी गोबिंद सिंह नाम कहउँ,”

आइए याद करते अपने भारत के गौरवशाली इतिहास को और जानते है “चमकौर युद्ध” के पुरे घटनाक्रम को।

मई सन्‌ 1704  की आनंदपुर की आखिरी लड़ाई में कई मुग़ल शासकों की सयुक्त फौज ने आनंदपुर साहिब को 6 महीने तक घेरे रखा। उनका सोचना था की जब आनंदपुर साहिब में राशन-पानी खत्म हो जाएगा तब गुरु जी स्वयं मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेंगे। पर ये मुग़लों की नासमझी थी, जब आनंदपुर साहिब में राशन-पानी खत्म हुआ तो एक रात  गुरु गोविंद सिंह जी आनंदपुर साहिब में उपस्तिथ अपने सभी साथियों को लेकर वहां से रवाना हो गए।  पर कुछ ही देर बाद मुगलों को पता चल गया की गुरु जी यहां से प्रस्थान कर गए है तो वो उनका पीछा करने लगे।  उधर गुरु गोविंद सिंह जी अपने सभी साथियों के साथ सरसा नदी की और बढे जा रहे थे।

जिस समय सिक्खों का काफिला इस बरसाती नदी के किनारे पहुँचा तो इसमें भयँकर बाढ़ आई हुई थी और पानी जोरों पर था। इस समय सिक्ख भारी कठिनाई में घिर गए। उनके पिछली तरफ शत्रु दल मारो-मार करता आ रहा था और सामने सरसा नदी फुँकारा मार रही थी, निर्णय तुरन्त लेना था। अतः श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी ने कहा कि कुछ सैनिक यहीं शत्रु को युद्ध में उलझा कर रखों और जो सरसा पार करने की क्षमता रखते हैं वे अपने घोड़े सरसा के बहाव के साथ नदी पार करने का प्रयत्न करें।

ऐसा ही किया गया। भाई उदय सिंह तथा जीवन सिंह अपने अपने जत्थे लेकर शत्रु के साथ भिड़ गये। इतने में गुरूदेव जी सरसा नदी पार करने में सफल हो गए। किन्तु सैकड़ों सिक्ख सरसा नदी पार करते हुए मौत का शिकार हो गए क्योंकि पानी का वेग बहुत तीखा था। कई तो पानी के बहाव में बहते हुए कई कोस दूर बह गए। जाड़े ऋतु की वर्षा, नदी का बर्फीला ठँडा पानी, इन बातों ने गुरूदेव जी के सैनिकों के शरीरों को सुन्न कर दिया। इसी कारण शत्रु सेना ने सरसा नदी पार करने का साहस नहीं किया।

सरसा नदी पार करने के पश्चात 40 सिक्ख दो बड़े साहिबजादे अजीत सिंह तथा जुझार सिंह के अतिरिक्त गुरूदेव जी स्वयँ कुल मिलाकर 43 व्यक्तियों की गिनती हुईं। नदी के इस पार भाई उदय सिंह मुगलों के अनेकों हमलों को पछाड़ते रहे ओर वे तब तक वीरता से लड़ते रहे जब तक उनके पास एक भी जीवित सैनिक था और अन्ततः वे युद्ध भूमि में गुरू आज्ञा निभाते और कर्त्तव्य पालन करते हुए वीरगति पा गये।

इस भयँकर उथल-पुथल में गुरूदेव जी का परिवार उनसे बिछुड़ गया। भाई मनी सिंह जी के जत्थे में माता साहिब कौर जी व माता सुन्दरी कौर जी और दो टहल सेवा करने वाली दासियाँ थी। दो सिक्ख भाई जवाहर सिंह तथा धन्ना सिंह जो दिल्ली के निवासी थे, यह लोग सरसा नदी पार कर पाए, यह सब हरिद्वार से होकर दिल्ली पहुँचे। जहाँ भाई जवाहर सिंह इनको अपने घर ले गया। दूसरे जत्थे में माता गुजरी जी छोटे साहबज़ादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह तथा गँगा राम ब्राह्मण ही थे, जो गुरू घर का रसोईया था। इसका गाँव खेहेड़ी यहाँ से लगभग 15 कोस की दूरी पर मौरिंडा कस्बे के निकट था। गँगा राम माता गुजरी जी व साहिबज़ादों को अपने गाँव ले गया।

गुरूदेव जी अपने चालीस सिक्खों के साथ आगे बढ़ते हुए दोपहर तक चमकौर नामक क्षेत्र के बाहर एक बगीचे में पहुँचे। यहाँ के स्थानीय लोगों ने गुरूदेव जी का हार्दिक स्वागत किया और प्रत्येक प्रकार की सहायता की। यहीं एक किलानुमा कच्ची हवेली थी जो सामरिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण थी क्योंकि इसको एक ऊँचे टीले पर बनाया गया था। जिसके चारों ओर खुला समतल मैदान था। हवेली के स्वामी बुधीचन्द ने गुरूदेव जी से आग्रह किया कि आप इस हवेली में विश्राम करें।

गुरूदेव जी ने आगे जाना उचित नहीं समझा। अतः चालीस सिक्खों को छोटी छोटी टुकड़ियों में बाँट कर उनमें बचा खुचा असला बाँट दिया और सभी सिक्खों को मुकाबले के लिए मोर्चो पर तैनात कर दिया। अब सभी को मालूम था कि मृत्यु निश्चित है परन्तु खालसा सैन्य का सिद्धान्त था कि शत्रु के समक्ष हथियार नहीं डालने केवल वीरगति प्राप्त करनी है।

अतः अपने प्राणों की आहुति देने के लिए सभी सिक्ख तत्पर हो गये। गरूदेव अपने चालीस शिष्यों की ताकत से असँख्य मुगल सेना से लड़ने की योजना बनाने लगे। गुरूदेव जी ने स्वयँ कच्ची गढ़ी (हवेली) के ऊपर अट्टालिका में मोर्चा सम्भाला। अन्य सिक्खों ने भी अपने अपने मोर्चे बनाए और मुगल सेना की राह देखने लगे।

उधर जैसे ही बरसाती नाला सरसा के पानी का बहाव कम हुआ। मुग़ल सेना टिड्डी दल की तरह उसे पार करके गुरूदेव जी का पीछा करती हुई चमकौर के मैदान में पहुँची। देखते ही देखते उसने गुरूदेव जी की कच्ची गढ़ी को घेर लिया। मुग़ल सेनापतियों को गाँव वालों से पता चल गया था कि गुरूदेव जी के पास केवल चालीस ही सैनिक हैं। अतः वे यहाँ गुरूदेव जी को बन्दी बनाने के स्वप्न देखने लगे। सरहिन्द के नवाब वजीर ख़ान ने भोर होते ही मुनादी करवा दी कि यदि गुरूदेव जी अपने आपको साथियों सहित मुग़ल प्रशासन के हवाले करें तो उनकी जान बख्शी जा सकती है। इस मुनादी के उत्तर में गुरूदेव जी ने मुग़ल सेनाओं पर तीरों की बौछार कर दी।

इस समय मुकाबला चालीस सिक्खों का हज़ारों असँख्य (लगभग 10 लाख) की गिनती में मुग़ल सैन्यबल के साथ था। इस पर गुरूदेव जी ने भी तो एक-एक सिक्ख को सवा-सवा लाख के साथ लड़ाने की सौगन्ध खाई हुई थी। अब इस सौगन्ध को भी विश्व के समक्ष क्रियान्वित करके प्रदर्शन करने का शुभ अवसर आ गया था।

22 दिसम्बर सन 1704 को सँसार का अनोखा युद्ध प्रारम्भ हो गया। आकाश में घनघोर बादल थे और धीमी धीमी बूँदाबाँदी हो रही थी। वर्ष का सबसे छोटा दिन होने के कारण सूर्य भी बहुत देर से उदय हुआ था, कड़ाके की शीत लहर चल रही थी किन्तु गर्मजोशी थी तो कच्ची हवेली में आश्रय लिए बैठे गुरूदेव जी के योद्धाओं के हृदय में।

कच्ची गढ़ी पर आक्रमण हुआ। भीतर से तीरों और गोलियों की बौछार हुई। अनेक मुग़ल सैनिक हताहत हुए। दोबारा सशक्त धावे का भी यही हाल हुआ। मुग़ल सेनापतियों को अविश्वास होने लगा था कि कोई चालीस सैनिकों की सहायता से इतना सबल भी बन सकता है। सिक्ख सैनिक लाखों की सेना में घिरे निर्भय भाव से लड़ने-मरने का खेल, खेल रहे थे। उनके पास जब गोला बारूद और बाण समाप्त हो गए किन्तु मुग़ल सैनिकों की गढ़ी के समीप भी जाने की हिम्मत नहीं हुई तो उन्होंने तलवार और भाले का युद्ध लड़ने के लिए मैदान में निकलना आवश्यक समझा।

सर्वप्रथम भाई हिम्मत सिंह जी को गुरूदेव जी ने आदेश दिया कि वह अपने साथियों सहित पाँच का जत्था लेकर रणक्षेत्र में जाकर शत्रु से जूझे। तभी मुग़ल जरनैल नाहर ख़ान ने सीढ़ी लगाकर गढ़ी पर चढ़ने का प्रयास किया किन्तु गुरूदेव जी ने उसको वहीं बाण से भेद कर चित्त कर दिया। एक और जरनैल ख्वाजा महमूद अली ने जब साथियों को मरते हुए देखा तो वह दीवार की ओट में भाग गया। गुरूदेव जी ने उसकी इस बुजदिली के कारण उसे अपनी रचना में मरदूद करके लिखा है।

सरहिन्द के नवाब ने सेनाओं को एक बार इक्ट्ठे होकर कच्ची गढ़ी पर पूर्ण वेग से आक्रमण करने का आदेश दिया। किन्तु गुरूदेव जी ऊँचे टीले की हवेली में होने के कारण सामरिक दृष्टि से अच्छी स्थिति में थे। अतः उन्होंने यह आक्रमण भी विफल कर दिया और सिँघों के बाणों की वर्षा से सैकड़ों मुग़ल सिपाहियों को सदा की नींद सुला दिया।

सिक्खों के जत्थे ने गढ़ी से बाहर आकर बढ़ रही मुग़ल सेना को करारे हाथ दिखलाये। गढ़ी की ऊपर की अट्टालिका (अटारी) से गुरूदेव जी स्वयँ अपने योद्धाओं की सहायता शत्रुओं पर बाण चलाकर कर रहे थे। घड़ी भर खूब लोहे पर लोहा बजा। सैकड़ों सैनिक मैदान में ढेर हो गए। अन्ततः पाँचों सिक्ख भी शहीद हो गये।

फिर गुरूदेव जी ने पाँच सिक्खों का दूसरा जत्था गढ़ी से बाहर रणक्षेत्र में भेजा। इस जत्थे ने भी आगे बढ़ते हुए शत्रुओं के छक्के छुड़ाए और उनको पीछे धकेल दिया और शत्रुओं का भारी जानी नुक्सान करते हुए स्वयँ भी शहीद हो गए। इस प्रकार गुरूदेव जी ने रणनीति बनाई और पाँच पाँच के जत्थे बारी बारी रणक्षेत्र में भेजने लगे। जब पाँचवा जत्था शहीद हो गया तो दोपहर का समय हो गया था।

सरहिन्द के नवाब वज़ीर ख़ान की हिदायतों का पालन करते हुए जरनैल हदायत ख़ान, इसमाईल खान, फुलाद खान, सुलतान खान, असमाल खान, जहान खान, खलील ख़ान और भूरे ख़ान एक बारगी सेनाओं को लेकर गढ़ी की ओर बढ़े। सब को पता था कि इतना बड़ा हमला रोक पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए अन्दर बाकी बचे सिक्खों ने गुरूदेव जी के सम्मुख प्रार्थना की कि वह साहिबजादों सहित युद्ध क्षेत्र से कहीं ओर निकल जाएँ।

यह सुनकर गुरूदेव जी ने सिक्खों से कहा: ‘तुम कौन से साहिबजादों (बेटों) की बात करते हो, तुम सभी मेरे ही साहबजादे हो’ गुरूदेव जी का यह उत्तर सुनकर सभी सिक्ख आश्चर्य में पड़ गये। गुरूदेव जी के बड़े सुपुत्र अजीत सिंह पिता जी के पास जाकर अपनी युद्धकला के प्रदर्शन की अनुमति माँगने लगे। गुरूदेव जी ने सहर्ष उन्हें आशीष दी और अपना कर्त्तव्य पूर्ण करने को प्रेरित किया।

साहिबजादा अजीत सिंह के मन में कुछ कर गुजरने के वलवले थे, युद्धकला में निपुणता थी। बस फिर क्या था वह अपने चार अन्य सिक्खों को लेकर गढ़ी से बाहर आए और मुगलों की सेना पर ऐसे टूट पड़े जैसे शार्दूल मृग-शावकों पर टूटता है। अजीत सिंघ जिधर बढ़ जाते, उधर सामने पड़ने वाले सैनिक गिरते, कटते या भाग जाते थे। पाँच सिंहों के जत्थे ने सैंकड़ों मुगलों को काल का ग्रास बना दिया।

अजीत सिंह ने अविस्मरणीय वीरता का प्रदर्शन किया, किन्तु एक एक ने यदि हजार हजार भी मारे हों तो सैनिकों के सागर में से चिड़िया की चोंच भर नीर ले जाने से क्या कमी आ सकती थी। साहिबजादा अजीत सिंह को, छोटे भाई साहिबज़ादा जुझार सिंह ने जब शहीद होते देखा तो उसने भी गुरूदेव जी से रणक्षेत्र में जाने की आज्ञा माँगी। गुरूदेव जी ने उसकी पीठ थपथपाई और अपने किशोर पुत्र को रणक्षेत्र में चार अन्य सेवकों के साथ भेजा।

गुरूदेव जी जुझार सिंघ को रणक्षेत्र में जूझते हुए, को देखकर प्रसन्न होने लगे और उसके युद्ध के कौशल देखकर जयकार के ऊँचे स्वर में नारे बुलन्द करने लगे– “जो बोले, सो निहाल, सत् श्री अकाल”। जुझार सिंह शत्रु सेना के बीच घिर गये किन्तु उन्होंने वीरता के जौहर दिखलाते हुए वीरगति पाई। इन दोनों योद्धाओं की आयु क्रमश 18 वर्ष तथा 14 वर्ष की थी। वर्षा अथवा बादलों के कारण साँझ हो गई, वर्ष का सबसे छोटा दिन था, कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी, अन्धेरा होते ही युद्ध रूक गया।

गुरू साहिब ने दोनों साहिबजादों को शहीद होते देखकर अकालपुरूख (ईश्वर) के समक्ष धन्यवाद, शुकराने की प्रार्थना की और कहा:

‘तेरा तुझ को सौंपते, क्या लागे मेरा’।

शत्रु अपने घायल अथवा मृत सैनिकों के शवों को उठाने के चक्रव्यूह में फँस गया, चारों ओर अन्धेरा छा गया। इस समय गुरूदेव जी के पास सात सिक्ख सैनिक बच रहे थे और वह स्वयँ कुल मिलाकर आठ की गिनती पूरी होती थी। मुग़ल सेनाएँ पीछे हटकर आराम करने लगी। उन्हें अभी सन्देह बना हुआ था कि गढ़ी के भीतर पर्याप्त सँख्या में सैनिक मौजूद हैं।

रहिरास के पाठ का समय हो गया था अतः सभी सिक्खों ने गुरूदेव जी के साथ मिलकर पाठ किया तत्पश्चात् गुरूदेव जी ने सिक्खों को चढ़दीकला में रहकर जूझते हुए शहीद होने के लिए प्रोत्साहित किया। सभी ने शीश झुकाकर आदेश का पालन करते हुए प्राणों की आहुति देने की शपथ ली किन्तु उन्होंने गुरूदेव जी के चरणों में प्रार्थना की कि यदि आप समय की नज़ाकत को मद्देनज़र रखते हुए यह कच्ची गढ़ीनुमा हवेली त्यागकर आप कहीं और चले जाएँ तो हम बाजी जीत सकते हैं क्योंकि हम मर गए तो कुछ नहीं बिगड़ेगा परन्तु आपकी शहीदी के बाद पँथ का क्या होगा ?

इस प्रकार तो श्री गुरू नानक देव जी का लक्ष्य सम्पूर्ण नहीं हो पायेगा। यदि आप जीवित रहे तो हमारे जैसे हज़ारों लाखों की गिनती में सिक्ख आपकी शरण में एकत्र होकर फिर से आपके नेतृत्त्व में सँघर्ष प्रारम्भ कर देंगे।

गुरूदेव जी तो दूसरों को उपदेश देते थे: जब आव की आउध निदान बनै, अति ही रण में तब जूझ मरौ। फिर भला युद्ध से वह स्वयँ कैसे मुँह मोड़ सकते थे ? गुरूदेव जी ने सिंघों को उत्तर दिया– मेरा जीवन मेरे प्यारे सिक्खों के जीवन से मूल्यवान नहीं, यह कैसे सम्भव हो सकता है कि मैं तुम्हें रणभूमि में छोड़कर अकेला निकल जाऊँ। मैं रणक्षेत्र को पीठ नहीं दिखा सकता, अब तो वह स्वयँ दिन चढ़ते ही सबसे पहले अपना जत्था लेकर युद्धभूमि में उतरेंगे। गुरूदेव जी के इस निर्णय से सिक्ख बहुत चिन्तित हुए। वे चाहते थे कि गुरूदेव जी किसी भी विधि से यहाँ से बचकर निकल जाएँ ताकि लोगों को भारी सँख्या में सिंघ सजाकर पुनः सँगठित होकर, मुगलों के साथ दो दो हाथ करें।

सिक्ख भी यह मन बनाए बैठे थे कि सतगुरू जी को किसी भी दशा में शहीद नहीं होने देना। वे जानते थे कि गुरूदेव जी द्वारा दी गई शहादत इस समय पँथ के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होगी। अतः भाई दया सिंह जी ने एक युक्ति सोची और अपना अन्तिम हथियार आजमाया। उन्होंने इस युक्ति के अन्तर्गत सभी सिंहों को विश्वास में लिया और उनको साथ लेकर पुनः गुरूदेव जी के पास आये।

और कहने लगे: गुरू जी, अब गुरू खालसा, पाँच प्यारे, परमेश्वर रूप होकर, आपको आदेश देते हैं कि यह कच्ची गढ़ी आप तुरन्त त्याग दें और कहीं सुरक्षित स्थान पर चले जाएं क्योंकि इसी नीति में पँथ खालसे का भला है।

गुरूदेव जी ने पाँच प्यारों का आदेश सुनते ही शीश झुका दिया और कहा: मैं अब कोई प्रतिरोध नहीं कर सकता क्योंकि मुझे अपने गुरू की आज्ञा का पालन करना ही है।

गुरूदेव जी ने कच्ची गढ़ी त्यागने की योजना बनाई। दो जवानों को साथ चलने को कहा। शेष पाँचों को अलग अलग मोर्चो पर नियुक्त कर दिया। भाई जीवन सिंघ, जिसका डील-डौल, कद-बुत तथा रूपरेखा गुरूदेव जी के साथ मिलती थी, उसे अपना मुकुट, ताज पहनाकर अपने स्थान अट्टालिका पर बैठा दिया कि शत्रु भ्रम में पड़ा रहे कि गुरू गोबिन्द सिंघ स्वयँ हवेली में हैं, किन्तु उन्होंने निर्णय लिया कि यहाँ से प्रस्थान करते समय हम शत्रुओं को ललकारेगें क्योंकि चुपचाप, शान्त निकल जाना कायरता और कमजोरी का चिन्ह माना जाएगा और उन्होंने ऐसा ही किया।

देर रात गुरूदेव जी अपने दोनों साथियों दया सिंह तथा मानसिंह सहित गढ़ी से बाहर निकले, निकलने से पहले उनको समझा दिया कि हमे मालवा क्षेत्र की ओर जाना है और कुछ विशेष तारों की सीध में चलना है। जिससे बिछुड़ने पर फिर से मिल सकें। इस समय बूँदाबाँदी थम चुकी थी और आकाश में कहीं कहीं बादल छाये थे किन्तु बिजली बार बार चमक रही थी। कुछ दूरी पर अभी पहुँचे ही थे कि बिजली बहुत तेजी से चमकी।

दया सिंघ की दृष्टि रास्ते में बिखरे शवों पर पड़ी तो साहिबज़ादा अजीत सिंह का शव दिखाई दिया, उसने गुरूदेव जी से अनुरोध किया कि यदि आप आज्ञा दें तो मैं अजीत सिंह के पार्थिव शरीर पर अपनी चादर डाल दूँ। उस समय गुरूदेव जी ने दया सिंह से प्रश्न किया आप ऐसा क्यों करना चाहते हैं। दयासिंघ ने उत्तर दिया कि गुरूदेव, पिता जी आप के लाड़ले बेटे अजीत सिंह का यह शव है।

गुरूदेव जी ने फिर पूछा क्या वे मेरे पुत्र नहीं जिन्होंने मेरे एक सँकेत पर अपने प्राणों की आहुति दी है ? दया सिंह को इसका उत्तर हाँ में देना पड़ा। इस पर गुरूदेव जी ने कहा यदि तुम सभी सिंहों के शवों पर एक एक चादर डाल सकते हो, तो ठीक है, इसके शव पर भी डाल दो। भाई दया सिंह जी गुरूदेव जी के त्याग और बलिदान को समझ गये और तुरन्त आगे बढ़ गये।

योजना अनुसार गुरूदेव जी और सिक्ख अलग-अलग दिशा में कुछ दूरी पर चले गये और वहाँ से ऊँचे स्वर में आवाजें लगाई गई, पीर–ऐ–हिन्द जा रहा है किसी की हिम्मत है तो पकड़ ले और साथ ही मशालचियों को तीर मारे जिससे उनकी मशालें नीचे कीचड़ में गिर कर बुझ गई और अंधेरा घना हो गया। पुरस्कार के लालच में शत्रु सेना आवाज की सीध में भागी और आपस में भिड़ गई। समय का लाभ उठाकर गुरूदेव जी और दोनों सिंह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगे और यह नीति पूर्णतः सफल रही। इस प्रकार शत्रु सेना आपस में टकरा-टकराकर कट मरी।

अगली सुबह प्रकाश होने पर शत्रु सेना को भारी निराशा हुई क्योंकि हजारों असँख्य शवों में केवल पैंतीस शव सिक्खों के थे। उसमें भी उनको गुरू गोबिन्द सिंह कहीं दिखाई नहीं दिये। क्रोधतुर होकर शत्रु सेना ने गढ़ी पर पुनः आक्रमण कर दिया। असँख्य शत्रु सैनिकों के साथ जूझते हुए अन्दर के पाँचों सिक्ख वीरगति पा गए।

भाई जीवन सिंह जी भी शहीद हो गये जिन्होंने शत्रु को झाँसा देने के लिए गुरूदेव जी की वेशभूषा धारण की हुई थी। शव को देखकर मुग़ल सेनापति बहुत प्रसन्न हुए कि अन्त में गुरू मार ही लिया गया। परन्तु जल्दी ही उनको मालूम हो गया कि यह शव किसी अन्य व्यक्ति का है और गुरू तो सुरक्षित निकल गए हैं।

मुग़ल सत्ताधरियों को यह एक करारी चपत थी कि कश्मीर, लाहौर, दिल्ली और सरहिन्द की समस्त मुग़ल शक्ति सात महीने आनन्दपुर का घेरा डालने के बावजूद भी न तो गुरू गोबिन्द सिंह जी को पकड़ सकी और न ही सिक्खों से अपनी अधीनता स्वीकार करवा सकी। सरकारी खजाने के लाखों रूपय व्यय हो गये। हज़ारों की सँख्या में फौजी मारे गए पर मुग़ल अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त न कर सके।

यह गर्दन कट तो सकती है मगर झुक नहीं सकती।
कभी चमकौर बोलेगा कभी सरहिन्द की दीवार बोलेगी।।  “सरदार पँछी”

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अग्निवंश Agnivansh

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👉👉 राजपूत वंश👈👈 जरूर पढ़े और शेयर करे
प्रतिहार, परमार, चौहान एवं चालुक्य
राजपूत आपके राज में, धक-धक धरती होय। जित-जित घोड़ा मुख करे, तित-तित फत्ते होय।

कहा जाता है की  यज्ञ की अग्नि से चार योद्धाओं- प्रतिहार, परमार, चौहान एवं चालुक्य की उत्पत्ति हुई जबकि हकीकत ये है की महर्षि और ब्राह्मणों ने उन्हें यज्ञ करवाया था ताकि वो आम जन की रक्षा मलेछो मुस्लिमो से कर सके साथ।

#प्रतिहार वंश 👑
ये वंश अब परिहार नाम से जाना जाता है जिसमे इंदा जैसे प्रमुख गोत्र आते है प्रतिहार मतलब पहरी इसका
राज्य मंडोर तक रहा 12 वी शतब्दी में जब कन्नौज से राव सिन्हा राठौड
जब मारवाड़ आये तब परिहारों ने बहुत मदद की और मंडोर में आज भी इनकी 1000 साल पुराणी छत्रिया मौजूद है

कुछ प्रशिद्ध शाशक
नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.)
वत्सराज (783 – 795 ई.)
नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.)
मिहिरभोज (भोज प्रथम) (836 – 889 ई.)
महेन्द्र पाल (890 – 910 ई.)
महिपाल (914 – 944 ई.)
भोज द्वितीयविनायकपालमहेन्द्रपाल (940 – 955 ई.)

प्रतिहारों के अभिलेखों में उन्हें श्रीराम के अनुज लक्ष्मण का वंशज बताया गया है, जो श्रीराम के लिए प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य करता था हूणों के साथ गुर्जर बहुत ज्यादा आये थे और गुजरात राजस्थान के एक हिस्से में फ़ैल गए थे इन पर राज करने से प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार कहा गया

#चौहान वंश 👑

‘चौहान’ नाडोल जालोर ,सांभर झील,पुष्कर, आमेर और वर्तमान जयपुर (राजस्थान) में होते हुए उत्तर भारत में फैले चुके हैं।

प्रसिद्ध शासक

चौहान वंश की अनेक शाखाओं में ‘शाकंभरी चौहान’ (सांभर-अजमेर के आस-पास का क्षेत्र) की स्थापना लगभग 7वीं शताब्दी में वासुदेव ने की। वासुदेव के बाद पूर्णतल्ल, जयराज, विग्रहराज प्रथम, चन्द्रराज, गोपराज जैसे अनेक सामंतों ने शासन किया। शासक अजयदेव ने ‘अजमेर’ नगर की स्थापना की और साथ ही यहाँ पर सुन्दर महल एवं मन्दिर का निर्माण करवाया। ‘चौहान वंश’ के मुख्य शासक इस प्रकार थे-

अजयदेव चौहानअर्णोराज (लगभग 1133 से 1153 ई.)विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव (लगभग 1153 से 1163 ई.)पृथ्वीराज तृतीय (1168-1198)

#परमार वंश👑

परमार वंश का आरम्भ नवीं शताब्दी के प्रारम्भ मेंनर्मदा नदी के उत्तर मालवा (प्राचीन अवन्ती) क्षेत्र में उपेन्द्र अथवा कृष्णराज द्वारा हुआ था। 
आज ये पाकिस्तान से लेकर हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र तक है इन्ही में सोढा राजपूत आते है वही भायल सांखला ये पंवार नाम से भी जाने जाते है

वंश शासक
उपेन्द् वैरसिंह प्रथम, सीयक प्रथम, वाक्पति प्रथम एवं वैरसिंह द्वितीय थे।

परमारों की प्रारम्भिक राजधानी उज्जैन में थी पर कालान्तर में राजधानी ‘धार’, मध्य प्रदेश में स्थानान्तरित कर ली गई परमार वंश में आठ राजा हुए, जिनमें सातवाँवाक्पति मुंज (973 से 995 ई.) और आठवाँ मुंज का भतीजा भोज (1018 से 1060 ई.) सबसे प्रतापी थी।मुंज अनेक वर्षों तक कल्याणी के चालुक्यराजाओं से युद्ध करता रहा और 995 ई. में युद्ध में ही मारा गया। उसका उत्तराधिकारी भोज (1018-1060 ई.) गुजरात तथा चेदि के राजाओं की संयुक्त सेनाओं के साथ युद्ध में मारा गया। उसकी मृत्यु के साथ ही परमार वंश का प्रताप नष्ट हो गया। यद्यपि स्थानीय राजाओं के रूप में परमार राजा तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ तक राज्य करते रहे, अंत में तोमरों ने उनका उच्छेद कर दिया।परमार राजा विशेष रूप से वाक्पति मुंज और भोज, बड़े विद्वान थे और विद्वानों एवं कवियों के आश्रयदाता थे।

#चालुक्य वंश / सोलंकी 👑

‘विक्रमांकदेवचरित’ में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद्  ‘एफ. फ्लीट’ तथा ‘के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री’ ने इस वंश का नाम ‘चलक्य’ बताया है। ‘आर.जी. भण्डारकरे’ ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम ‘चालुक्य’ का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है।

लगभग आधे भारत पर राज किया  सोलंकी चालुक्य राजाओ ने केरल से लेकर नेपाल तक विजय यात्रा की
दक्षिण और गुजरात के अधिकतर क्षेत्रो पर हुकूमत की वर्त्तमान ये सोलंकी नाम से जाने जाते है

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महाकवी भुषन रचित शिवाजी नां कवित Mahakavi Bhushan shivaji kavit

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महाकवी भुषन रचित शिवाजी नां कवित

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कुरम कमल कमधुज है कदम फूल,
गौर है गुलाब राना केतकी विराज है,
पांडुरी पवार जुही सोहत है चन्दावत,
सरस बुन्देला सो चमेली साजबाज है,
‘भुषण’ भनंत मुचकुन्द बड गुजर है,
बधेले बसंत सब कुसुम समाज है,
लेई रस एतेन बेठीन शकत अहे,
अली नवरंग जेब चंपो शिवराज है.

उंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,
उंचे घोर मंदर के अंदर रहाती है,
कंदमुल भोग करे कंद मुल भोग करे,
तिन बेर खाती सो तिन बेर खाती है,
भुषन शिथिल अंग भुषन शिथिल अंग,
बिजन डुलाती सो आज बिजन डुलाती है,
भुषन भनंत शिवराज वीर तेरे त्रास,
जगन जडाती सो आज नगन जनाती है.

छुटत कमान ओर तीर गोली बानके,
मुशकील होती मुरचान की ओट में,
ताही समय शिवराज हुकुम कै हल्ला कीयो,
दावा बांधी परा हल्ला बीर भट जोट में,
‘भुषण’ भनंत तेरी हिम्मत कहां लौ कहां,
किंमती ईहां लगी है जाकी भट जोंट में,
ताव दै मुच्छन पै कंगुरन पे पांव दै,
अरी मुख घाव दै कुदी पर्यो कोट में.

देवल गिरावतो फिरावतो निशान अली,
एसे सामे राव राना सब गये लबकी,
गौरा गनपती आप औरंग को देख ताप,
आपके मुकाम सब मार गये दबकी,
पीर पयगम्बरा दिगंबरा देखाई देत,
सिध की सिधाई गई रही बात रबकी,
काशीहुकी कला गई मथुरा मस्जीद भई,
शिवाजी नहोत तो सुन्नत होत सबकी.

ईन्द्र जीमी जंभ पर वडःव सुअंभ पर,
रावण सदंभ पर रघुकुल राज है,
पौन परिबाह पर शंभु रतीनाह पर,
ज्यों सहसबांह पर राम द्विजराज है,
दावा द्रुम दंड पर चिता मृग जंड पर,
भुषन वितंड पर जैसै मृगराज है,
तेजत्तम अंश पर क्रष्न जेम कंश पर,
त्यों मलेच्छ वंश पर शेर शिवराज है.

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