Monthly Archives: September 2015

गीत नवां नुं गीत – जोगीदान गढ़वी कृत Jogidan Gadhavi Krut

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.                     || गीत नवां नुं गीत ||
.             रचना: जोगीदान गढवी (चडीया )
.                      छंद : त्रोटक नी चाल     

बहु सोर बकोर करे अबके गीत चीत हीलोळ न ऐक चले
धीब धीब अवाज धींबांग धमा बीन बांध समा झीक झाक झले
बिन राग, उडे ज्यम काग, ने ढोलक वाग रीयुं बस ताल वीना
बस ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीना.||01||

नर नारीयुं उंधेय कांध नचे नव सेह सरम्म ने सोहतां हे.
ध्रीज बांग ध्रीजांग ध्रीजांग ने तालेय मांन मुकी पथ मोहता हे
मन मीत न प्रित के  सीत बजे सूर गीत खळे खर खोल कीना
बस ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीना.||02||

दीये नांम डीजे रमी आम रीजे खोटा बोल सुणे कोय नाई खीजे
मुकी लाज अने मरजाद धमाचक लटक्क मट्टक खुब लीजे
समजाय नही ईक बोल भलो ज्यम चांग उचांग मे गाय चीना
बस ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीना.||03||

नवी शेल छकेल ने खेल सुजे जुनी रीत रीवाजुं ने रोळता हे
भुलीया भुतकाळ ने भाव भलो अब बाप नी ईज्जत बोळता हे,
हलकी हलवे नीज केड्य कहे गीत टोकर मंदीर टीन्न टीना
बस ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीना.||04||

जोगीदान ने आवांय गांन सुंणी अपमांन भळातुंय भारत नुं
नव शारदा के नव आरदा के नव अंतर ना कोई आरत नुं
बहु बोल भर्या वण तोल ने अक्खर भाव टटोल न ऐक भीना
बस ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीनाधीन, ताक धीना.||05||

(रोड पर जोयेल एक द्रस्य पर थी…आज ना युगना गीतो ये करेल
संस्कृति नी दुर्गती नो चितार करवानो प्रयास..)
रचना :- जोगीदान गढ़वी

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चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना:- पिंगलशि नरेला कृत Chit chet sihana fir nahi aana aakhar jag mein mar jana…

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.               दुहो

हर पर विपति हाथसे डर पर दारा दाम
धर ईश्वर नित ध्यानमें कर नेकी के काम

             छंद त्रिभंगी

कर नेकी करसे डरपर धरसे पाक नजरसे धर प्रीती
जप नाम जीगरसे बाल उमरसे जसले जरसे मन जीती
गंभीर सागरसे रहे सबरसे मिले उधरसे परवाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

मद ना कर मनमे मिथ्या धनमे जोर बदनमे जोबनमे
सुख हे न स्वपनमे जीवन जनमे चपला धनमे छनछनमे
तज वेर वतनमे द्वेश धरनमे नाहक इनमे तरसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

जुठा हे भाइ बाप बडाइ जुठी माइ माजाइ
जुठा पित्राइ जुठ जमाइ जुठ लगाइ ललचाइ
सब जुठ सगाइ अंत जुदाइ देह जलाइ समसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

कोउ अधिकारी भुजबलभारी कोउ अनारी अहंकारी
कोउ तपधारी फल आहारी कोउ विहारी वृर्तधारी
त्रस्ना नहीं टारी रह्या भीखारी अंत खुवारी उठ जाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

तज पाप पलीती असत अनीति भ्रांती भीति अस्थिती
सज न्याय सुनीति उत्तम रीती प्रभु प्रतिति धर प्रीती
इन्द्री ले जीतीसुख साबिती गुण माहिती दर्ढ ज्ञाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना

दुनिया दो रंगी तरक तुरंगी स्वारथ संगी ऐकंगी
होजा सतसंगी दूर कुसंगी ग्रहेन टंगी जन जंगी
पिंगल सुप्रसंगी रचे उमंगी छंद त्रिभंगी सरसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना

रचियता :- पिंगळशी भाइ नरेला
साभार :- हरि गढवी।

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कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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ए कुळ झेरी आप,  (एमां) चांदो ने गंगा शुं करे;
शंकर कंठमां साप, कडवो न मटयो, कागडा         ७१

(एक) लिये भरखी लोइ, दल बीजुं टाढक दिये;
जळो ने कमळ जोइ; (एमां) कुळनुं क्यां रय,ुं कागडा    ७२

साथे वसतां सोय, पाणी पण सरखुं पीए;
द्नाख ने मरची दोय,  (एनो) क्यारो एक ज,  कागडा   ७३

सु वायें पाके सदा, कू वाये कवठी जाय;
(एवां) तलनां खेत तकाय, (एना) कांउ भरोंसा, कागडा    ७४

साकरमां राखे सदा, (तो) विख साकर वरताय;
एफ़ीण शमृत मांय, कडवुं न मटे, कागडा      ७५

ताजणा पाडे तोय, फडकीने पाछी फरे;
कुळ टारडनां कोय, केडा पकडे,  कागडा    ७६

सोजां ने हराडां सार, वासो नित भेळां वसे;
(पण) झांपेथी जुहार, (बेउना) केडा नोखा, कागडा    ७७

भवहर न थियो भूत, भूत भवेश्र्वर नो थियो;
प्रेत ने हरना पूत, कायम भेळा, कागडा    ७८

अंग भूधर असवार, वैकुंठे कायम वसे;
(तोय) एरुनो आ’र, कदीये न छोडयो, कागडा   ७९

पेठो बळि पताळ, (त्यां) चरण हरिना चाडिया;
(एनो) गोविंद थइने गोवाळ, (हजु) करे रखोपां, कागडा     ८०

तारी, राम ! तराइ, नाविक के लेशु नईं,
भवहळ तारण भाइ ! (मने) करजे कांठे, कागडा    ९१

मही, सागर, असमान , रसता जिण हाथे रच्या;
भीलोने भगवान, केडा पूछे, कागडा     ९२

दुनियाने देवुं पडे, भोजन भगवतने;
(ए) वेडे फळ वने, काचां पाकां, कागडा   ९३

बोरांनी मनमां बीक, शवरीने रेती सदा;
(त्यां) ठळिया सोतां ठीक, करडीने खाधां, कागडा    ९४

वेनबां बंधणे वाम, पिताने संकट पडयां;
(पछी) रयो न ऊभो राम, करवा वैभव, कागडा    ९५

लागी लखमण लाय, जननीने जाती करी;
भेळो वनमां भाई, कूदीने हाल्यो,  कागडा   ९६

सीताए राधव साथ, राखे माथां रोळियां;
वननी लीधी वाट, कफनी पेरीने, कागडा   ९७

सीता तज शणगार, प्रेमे वळकळ पे’रियां;
(एनो) हईडे हाहाकार, कौशलंयाने, कागडा   ९८

विधिना आखर वाम, जगदीशे जाण्या नईं !
राजा न थिया राम, केडा वनना,  कागडा    ९९

तेने भोग तमाम, अवधना एरू थया;
रटतां दशरथ राम, कलेवर छोडयुं, कागडा   १००

दशरथ  छोडी देह, विधवापण आव्युं वळी;
रदे न लागयो रेह, केगै हरखी;  कागडा     १०१

सीताने राघव साथ, माए वनमां मोकल्यां;
(ए) वंसमी भरतने वात, (पछी) ककळी ऊठयो,  कागडा   १०२

तातें आपेल ताज, भरतने भोव्यो नईं;
राघव केरुं राज, (एने) कडवुं, कागडा   १०३

सीता केरो शोक, भेंकर लाग्यो भरतने;
भाईयुं विनाना भोग, कांटा सरखा, कागडा   १०४

वनमां राघव वास, पिता परलोके गयो;
भरत मनमां भास, केगै माता,  कागडा    १०५

दकळां सागर दु:ख, राम विनानां रेलियां;
मानुं न जोयुं मुख, कदीये भरते, कागडा    १०६

दशरथनो दरबार, इंदर पण आशा करे;
भाईयुं विण भेकार, कडवो भरतने, कागडा   १०७

आंखे एकल धार, आंसु भरतने ऊमटयां;
(हवे) करवुं शुं किरतार ? केडो न मळे, कागडा   १०८

भरत ! धारुं भेख, (के) गोझारे हेमाळे गळुं ?
आवे न मारग एक, (के) कलेवर छोडुं, कागडा   १०९

कारण मारे कांई, हरि वन पेदळ हालिया;
जनम न थयो जोई, (मारो) काचे मइने, कागडा   ११०

रचना :- दुला भाया काग
साभार :- सामळा .पी. गढवी

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कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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गळथी नोय गळ्यां, रंग बीजे रंगियां नहीं;
वारि वराळ तणां, कडवां न थियां कागडा      ५१

कूणी वीजळी कोय, लीओ तां टाढी लागती;
(पण) जरीअल सराणे जोय, (एना) कोठानी वातुं कागडा   ५२

अंगडां ऊंना होय, (कोई) आपे तो आडी पडे;
(पण) कसतर वारण कोय, एवी कोक ज गळणी, कागडा    ५३

धोको शिर धराय, चीजुं तो नजरे चडे;
दीवे नो देखाय, कूंडानी हेठळ, कागडा  ५४

जोयां मुख जळे, मीठांने जूठां मानवी;
मीतर कोक मळे, काच सरीखा, कागडा    ५५

लाखुं व्रस लगे, जिवाडीने पोते जीवशे;
सीसाने नो चडे, केफ दारूनो, कागडा    ५६

दीपावे दरने, अनहद मेनत आदरी;
(त्यां) एरु उंदरने, काढी मेले, कागडा     ५७

गळ साखुं गळवा कजु, धर नीचो ढळवा;
फळ मीठां फळवा, (एने) केवुं न पडे, कागडा   ५८

ए छे अंजवाळुं, पाळीने नोतरवुं पडे;
आवे अंधारुं, कीधा विणनुं, कागडा   ५८

त्रठ मोती करवा तणुं, भरती भरवानुं;
लेर्युं लेवानुं,  (एने) केवुं न पडे, कागडा    ६०

राते घोडां रोडवी, पो तक पूग्यानुं;
एने ऊग्यानुं, केवुं न पडे, कागडा      ६१

सोजीतण रीती सदा, ऊंये आफळतां;
अळ मारे अडतां, (एने) केवुं न पडे, कागडा   ६२

मोळा दन मागण मळे. अंग रोगीने अरियां;
घर घातक थियां, (त्रणे) कफरी वेळा, कागडा   ६३

सीमाडे अरि सामटा, एकल आफळवां;
भारतनां भरवा, (इ) कफरी वेळा, कागडा   ६४

पाणी पण एक ज पीए, आंबामां ऊभो होय;
(पण) नेसळ मीठो नोय, कडवो लींबड, कागडा  ६५

रोपी आंबो रानमां, अने पाणी कडवां पाय;
टाणे फळ तकाय, एने केरी ज आवे, कागडा    ६६

आग्युंमां ओराय, धमणे नत्रेडां धमे;
(तोय) काळप नो कळाय , कुळ कुंदनना, कागडा   ६७

जळियां पालव  जोय, पंडमां बौ फांकां पडयां;
(एने) नाधयों सांधा नोय, (जेनां) कलेवर बगडयां, कागडा   ६८

लवकारा कफरा लवे, हरदम पीडा होय;
(पण) जांगे गूमडां जोय, केम देखडीए, कागडा   ६९

परनाळें घी पाव, कठ चंदन होन्या करो;
(पण) एने जे दी अडवा जाव, (ते दी) काळी बळतर, कागडा   ७०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

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कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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सूरज घर संघरेल, चोरी जळ सायर तणां;
अषाढे ओकेल, कोठे न रयां, कागडा    ४१

बीडीने ऊबेल बाथ, राता थइ ऊभा रया;
सळग्या न खीला साथ, काठ बळी ग्यां, कागडा    ४२

खीला घाव खळ्ये, नोखा जे पडता नई;
कफरें काठ बळ्ये, (त्यारे) कूदी ने भाग्या, कागडा    ४३

(एने)हैडे वेर न होय, (जेनां) प्रीताळुं पंडडयां घडयां;
काठ खीला ने तोय, कांठे करशे, कागडा      ४४

तनडां तूटे तोय, प्रीतुं पालटशे नहीं;
जळमां खीलाने जोय, काठ न बोळे, कागडा,    ४५

काठ खीलाने कोय, जळमां जतनायुं करे;
(नहीं तो) तारण ब्रदने तोय, कळंक बेसे, कागडा     ४६

घोडा ने ऊंट घणा, जोजन सो झपटुं करे;
(पण) भोगळ भांगे ना, कुंभाथळ विण,  कागडा     ४७

आशा अठ मासें, उरें कदी न आणजे;
छत्री चोमासे, (तने) कोरो राखे, कागडा     ४८

कूडां न साचां कोय, आंख्यु उपर आवशे;
जश ने अपजश जोय, कीकीने न मळे, कागडा   ४९

ठुंठां आग थियां, दुनियां कहिया देवता;
(पण) तेनांय घर तजियां, (एने) कहीए राखुं,  कागडा    ५०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

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अमृत भरियल अप, तुंकारा जननी तणा;
बीजा भणता बाप, कोरा आखर, कागडा  २१

स्वारथ जग सारो, पधारो भणशे प्रथी;
(पण) तारो तुंकारो, क्यांये न मळे कागडा  २२

माता तो मनमां ऊणप कदी न आणजे;
(मारे) ऊभी अंतरमां (तारी) कायम छबी, कागडा   २३

अंतरमां अवधेश, रटवाने रोकेल नई;
(तेथी) हाले श्रंवास हंमेश, काळ घरा पर, कागडा    २४

काढी मेल्या कोई, राम भजनने रूसणे;
(तेथी) जाता दनडा जोई, काळ नोतरवा, कागडा    २५

उजळियां आवेल, पळियां तो माथे प्रगट;
काळांने काढी मेल, तने केस संदेशो, कागडा    २६

ऊभा नित आगें, तंग तबेले ताणता;
(पण) वांसाना वागे, (तारे) काम न लागे, कागडा   २७

रुडा मुख रागें, मीठां माखणियां भणे,
(जे दी) खेलेवुं खागें, (ते दी) काम न लागे, कागडा    २८

मन  गमतां मागे, मोढेथी माथां दिये;
(जेदी) ओरावुं आग्यें, (ते दी) काम न लागे, कागडा   २९

गोतर नव गणे, वातुडा भेरु वसव;
(ई) टाणे मोत तणे, काम न लागे, कागडा   ३०
रचना – दुला भाया काग
साभार- सामळा भाई गढ़वी

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तनमां आवे ताव, हैडां टाढे हडवडे;
भेथी पूछे भाव, करियातानो, कागडा    ३१

तेने न मळे तात, पंखी बे जनम्यां प्रगट;
(पण) रे छे दि ने रात, केम विजोगी, कागडा ,    ३२

हरिए ढांकेल होय, पशु ने पंखी तणी;
एब उगाडी नोय, कदीये व्खनी, कागडा    ३३

पंडना जोर परे, घटमां भरुंसो घणो;
(तेथी) सावज नो संघरे कदीये भोजन, कागडा   ३४

धींगी ढाल धरी ते पगलां केसर तणां;
(तेथी) बेठी जई बकरी, कुंभाथळ पर, कागडा,     ३५

न भणे एने नीर, प्रथमी कोई पणशे नई;
(जेने) वालां तजियां वीर, (सौ) कदाव भणशे, कागडा   ३६

व्रेमंड ताणे वाय, झोंटे कर भूतळ जठे;
(तेथी) पोकारो पडाई, काणां पडियां, कागडा   ३७

जेठें डुजेल जोय, उपर पाणी आळस्यां;
तरस छिपावे तोय, (न्यां) करजे वीरड, कागडा   ३८

जीवाई झोंटाणी, घर भीतर वेरी धर्या;
(त्यारे) माखी मध तणी क्रडवा धोडे, कागडा    ३९

मानव घरनां मेल, घाणीनां तलडा धर्या;
तलमां न रयां तेल, केवाणो खळ,  कागडा     ४०
रचना -दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

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कागवाणी Kagvani Dula Bhaya Kag

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Dula Bhaya Kag

कीधां न जीभे केण, नाड्युं झोंटाणा लगी;
न कर्यां दुखडां नेण, (एने) केम वीसरीए, कागडा.     ११

आखर एक जतां, क्रोडयुं न आखर कामना;
मोढे बोलुं ‘मा’, कोठाने टाठक, कागडा .   १२

मोढे बोलुं मा साचेंय नानप  सांभरे;
(त्यारे)मोटपनी मजा, मने कडवी लागे ,कागडा.  १३

अडी न जगनी आग, तारे खोळे खेलता;
तेनो कीधेल त्याग, (तेथी) काळज सळगे, कागडा.   १४

भगवत तो भजता,  माहेश्र्वर आवी मळे;
(पण) मळे न एक ज मा, कोई उपाये, कागडा.    १५

मळी न हरने मा, (तेथी) महेश्र्वर जो पशू थया;
(पण) जायो ई जशोदा, (पछी) कान केवाणो, कागडा.  १६

मळियल एने मा, सौ राधव करसनने रटे;
जग कोइ जाणे ना, काछप मच्छने, कागडा. १७

जननी केरुं जोर, राधवने रे’तुं सदा;
(तेथी) माने न करी मोर, करियो पिताने, कागडा.  १८

घूमीने घूघवतां, खोळे धावीने खेलतां;
(ए) खोळो खोजीतां, क्यांये न मळे, कागडा   १९

मोटां करीने मा, खोळेथी खसतां कर्यां;
खोळे खेलववा, (पाछां) कर ने बाळक, कागडा  २०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळाभाई गढ़वी

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जण को पास न जाय, उकरडो आघो करे;
(पण) एना गुण गणाय, (जे दी) करसड पाके कागडा !+ १

शीळो सारो होय तो, बावळनेय बेसाय;
(पण) शूळुं नो संघराय, कोठी भरीने कागडा !+  २

पोताना बावळ परे, मीठी मीटुं राख;
(एना) कांटा काढी नाख, तारा केडामांथी, कागडा !   ३

गियां मांस गळ्ये, तो हाडे हेवायां करे;
(ए) माता जाय मर्ये, (एने)केम वीसरीए, कागडा ?   ४

चींधे न छोरुने, लथडियां अंगडां लिये;
मरतां लग माने, केम वीसरीए, कागडा ?     ५

पंडमां पीड घणी, सांतीने हसती सदा;
माया मात तणी, केम वीसरीए, कागडा  ?   ६

कुथुंब कलेश अपार, कीधा न पूतरने कदी;
(एवां) झेर जीरणहार, केम वीसरीए,कागडा ?  ७

जम जडाफा खाय, मोते नाळ्युं माडियुं;
(तोय) छोरुनी चिंता थाय, (एने)केम वीसरीए कागडा ?   ८

धमणे श्र्वास धमाय, घटडामां घोडां फरे;
(तोय) छोरुनी चिंता थाय, (एने) केम वीसरीए, कागडा ?    ९

तो अंग अघळा ताव, पूतर तळ पूछे नई;
(पण)भाळ्यो न बीजो भाव, (एने)केम वीसरीए, कागडा ?   १०
(क्रमशः)
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळाभाई गढ़वी

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गोहिल हालरडु Gohil Halaradu

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हालरडुं

हाथ हींचोळीने ताणतां दोरी, हैडे हेत न माय –
माता गाय बाळनां गाणां……
(तोय)वीरोजी रेय नई छाना ……टेक

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Gohil Halaradu

पारणामांथी सुणवी छे एने, वंश गोहिलोनी वात  –
आंखोथी बाळ समजावे ……
(मने) ते केडे नींदरुं आवे ……१

सांभळे सूतो बाळराजा, माए मीठडी मांडी वात –
गोहिलोनुं बिरद छे न्यारुं ……
गंगाजळ कुळ छे तारुं ……२

ब्राह्मण वैश्य ने शूद्न माटे रूडी, गंगमाताजी धार-
रजपूतोनुं तीर्थ बतावुं ……
(एने) प्रजाना हितमां न्हावुं……३

बोल अफर, जेना काछ अणडग, जेने देशतणां अभिमान-
पोतानी भोमका माटे ……
ऊनां ऊनां लोई पण छाटे ……४

सिंह सादूळा ! तुं राखीश मा झाझी परदेशोनी प्रीत-
घरोघर घोडलां हांकी ……
प्रजानी सुण हालाकी ……५

आत्पजनो ने भायातने, बाळुडा ! जाणजे  पोतानी बांय-
एनी जागीर न लेजे ……
एने दु:खे भागीओ थाजे ……६

सुख दु:खे समभाव हृदे, एवा रजपूतोनां नाम
एटलुं, मारा प्राणथी व्हाला……
लखी राख, कृष्णना लाला ……७

आंहींनुं सुधारी, बाळ मारा ! उर धरजे इश्र्वर ध्यान-
सांभळ, पेरमना राज.
देयुंना मोह नो’य झाझा……८

आशरे आव्यो न आपीओ, रे एक ससलानो शिकार –
क्षत्रीवट धर्मने धार्यो……
(ते दी) खांडानो खेल स्वीकार्यो……९

चारणीने जोडी सांतीए रे, एनां वावणीनां टांणां जाय –
देपाळे धर्म संभार्यो……
धोंसर लईने कांध पर धार्यो……१०

बेटडा ! तारा बापदादा लेता, दरीआ केरां दाण-
सुणी शाह हाथ पछाडी……
आव्यो मोटी फोज उपाडी……११

मोखडो ऊठयो मामले रे ते दी, शाह पापी ग्यो त्राह-
खेडी जुद्ध मजलूं लांबी……
(एनी) “खदडपर” मां धडनी खांभी……१२

रामदास जाता काशीए ने; उदेपुरनां खाधेल अन्न-
आवी म्लेच्छ फोज हजारां……
ते दी ‘ राणा आडां शीश उतार्यां……१३

वखतसिंहे वेरीओ सामा रोमे रोमे झील्या घाव –
एनां फळ मीठडां वेड्यां……
(दादे) रातां रातां लोई बउ रेड्यां………१४

मोसाळमां तारे जाम अजोजी , ए सुणी धीगाणानी वात –
ते दी’ वरमाळ फेंकीने……
आव्यो रणमांय ठेकीने……” १५

आठ दीने उजागरे वीराने, आववा मांडी ऊंघ-
हालरडे आंख घेराणी……
व्हाली लागी ” काग ” नी वाणी. १६

रचना- दुला भाया काग
टाइप- सामळा पी गढ़वी
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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