Daily Archives: September 17, 2015

कागवाणी Kagvani Dula Bhaya Kag

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Dula Bhaya Kag

कीधां न जीभे केण, नाड्युं झोंटाणा लगी;
न कर्यां दुखडां नेण, (एने) केम वीसरीए, कागडा.     ११

आखर एक जतां, क्रोडयुं न आखर कामना;
मोढे बोलुं ‘मा’, कोठाने टाठक, कागडा .   १२

मोढे बोलुं मा साचेंय नानप  सांभरे;
(त्यारे)मोटपनी मजा, मने कडवी लागे ,कागडा.  १३

अडी न जगनी आग, तारे खोळे खेलता;
तेनो कीधेल त्याग, (तेथी) काळज सळगे, कागडा.   १४

भगवत तो भजता,  माहेश्र्वर आवी मळे;
(पण) मळे न एक ज मा, कोई उपाये, कागडा.    १५

मळी न हरने मा, (तेथी) महेश्र्वर जो पशू थया;
(पण) जायो ई जशोदा, (पछी) कान केवाणो, कागडा.  १६

मळियल एने मा, सौ राधव करसनने रटे;
जग कोइ जाणे ना, काछप मच्छने, कागडा. १७

जननी केरुं जोर, राधवने रे’तुं सदा;
(तेथी) माने न करी मोर, करियो पिताने, कागडा.  १८

घूमीने घूघवतां, खोळे धावीने खेलतां;
(ए) खोळो खोजीतां, क्यांये न मळे, कागडा   १९

मोटां करीने मा, खोळेथी खसतां कर्यां;
खोळे खेलववा, (पाछां) कर ने बाळक, कागडा  २०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळाभाई गढ़वी

History & Literature

कागवाणी Kagvani -Dula Bhaya Kag

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जण को पास न जाय, उकरडो आघो करे;
(पण) एना गुण गणाय, (जे दी) करसड पाके कागडा !+ १

शीळो सारो होय तो, बावळनेय बेसाय;
(पण) शूळुं नो संघराय, कोठी भरीने कागडा !+  २

पोताना बावळ परे, मीठी मीटुं राख;
(एना) कांटा काढी नाख, तारा केडामांथी, कागडा !   ३

गियां मांस गळ्ये, तो हाडे हेवायां करे;
(ए) माता जाय मर्ये, (एने)केम वीसरीए, कागडा ?   ४

चींधे न छोरुने, लथडियां अंगडां लिये;
मरतां लग माने, केम वीसरीए, कागडा ?     ५

पंडमां पीड घणी, सांतीने हसती सदा;
माया मात तणी, केम वीसरीए, कागडा  ?   ६

कुथुंब कलेश अपार, कीधा न पूतरने कदी;
(एवां) झेर जीरणहार, केम वीसरीए,कागडा ?  ७

जम जडाफा खाय, मोते नाळ्युं माडियुं;
(तोय) छोरुनी चिंता थाय, (एने)केम वीसरीए कागडा ?   ८

धमणे श्र्वास धमाय, घटडामां घोडां फरे;
(तोय) छोरुनी चिंता थाय, (एने) केम वीसरीए, कागडा ?    ९

तो अंग अघळा ताव, पूतर तळ पूछे नई;
(पण)भाळ्यो न बीजो भाव, (एने)केम वीसरीए, कागडा ?   १०
(क्रमशः)
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळाभाई गढ़वी

History & Literature

गोहिल हालरडु Gohil Halaradu

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हालरडुं

हाथ हींचोळीने ताणतां दोरी, हैडे हेत न माय –
माता गाय बाळनां गाणां……
(तोय)वीरोजी रेय नई छाना ……टेक

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Gohil Halaradu

पारणामांथी सुणवी छे एने, वंश गोहिलोनी वात  –
आंखोथी बाळ समजावे ……
(मने) ते केडे नींदरुं आवे ……१

सांभळे सूतो बाळराजा, माए मीठडी मांडी वात –
गोहिलोनुं बिरद छे न्यारुं ……
गंगाजळ कुळ छे तारुं ……२

ब्राह्मण वैश्य ने शूद्न माटे रूडी, गंगमाताजी धार-
रजपूतोनुं तीर्थ बतावुं ……
(एने) प्रजाना हितमां न्हावुं……३

बोल अफर, जेना काछ अणडग, जेने देशतणां अभिमान-
पोतानी भोमका माटे ……
ऊनां ऊनां लोई पण छाटे ……४

सिंह सादूळा ! तुं राखीश मा झाझी परदेशोनी प्रीत-
घरोघर घोडलां हांकी ……
प्रजानी सुण हालाकी ……५

आत्पजनो ने भायातने, बाळुडा ! जाणजे  पोतानी बांय-
एनी जागीर न लेजे ……
एने दु:खे भागीओ थाजे ……६

सुख दु:खे समभाव हृदे, एवा रजपूतोनां नाम
एटलुं, मारा प्राणथी व्हाला……
लखी राख, कृष्णना लाला ……७

आंहींनुं सुधारी, बाळ मारा ! उर धरजे इश्र्वर ध्यान-
सांभळ, पेरमना राज.
देयुंना मोह नो’य झाझा……८

आशरे आव्यो न आपीओ, रे एक ससलानो शिकार –
क्षत्रीवट धर्मने धार्यो……
(ते दी) खांडानो खेल स्वीकार्यो……९

चारणीने जोडी सांतीए रे, एनां वावणीनां टांणां जाय –
देपाळे धर्म संभार्यो……
धोंसर लईने कांध पर धार्यो……१०

बेटडा ! तारा बापदादा लेता, दरीआ केरां दाण-
सुणी शाह हाथ पछाडी……
आव्यो मोटी फोज उपाडी……११

मोखडो ऊठयो मामले रे ते दी, शाह पापी ग्यो त्राह-
खेडी जुद्ध मजलूं लांबी……
(एनी) “खदडपर” मां धडनी खांभी……१२

रामदास जाता काशीए ने; उदेपुरनां खाधेल अन्न-
आवी म्लेच्छ फोज हजारां……
ते दी ‘ राणा आडां शीश उतार्यां……१३

वखतसिंहे वेरीओ सामा रोमे रोमे झील्या घाव –
एनां फळ मीठडां वेड्यां……
(दादे) रातां रातां लोई बउ रेड्यां………१४

मोसाळमां तारे जाम अजोजी , ए सुणी धीगाणानी वात –
ते दी’ वरमाळ फेंकीने……
आव्यो रणमांय ठेकीने……” १५

आठ दीने उजागरे वीराने, आववा मांडी ऊंघ-
हालरडे आंख घेराणी……
व्हाली लागी ” काग ” नी वाणी. १६

रचना- दुला भाया काग
टाइप- सामळा पी गढ़वी
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

History & Literature

दीवाना दिल तणी वातो… Diwana Dil Tani Vaato…

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दिवाना दिल तणी वातो, जगतना लोक शुं जाणे,
बाहारथी वेष बहुरूपी, कहो पछी केम पिछाणे.  टेक

उपर देखावनां गांडा, भीतर डहापण भरेला,
अमर आनंदनी मोजु, सदा अंतर मही माणे.
                          दिवाना दिल तणी वातो…

डहापणमां दु:ख देखायुं, गांडापणुं गळ्युं लाग्युं,
एवी मतलब दिवानानी, गति ने कोुइ शुं जाणे.
                           दिवाना दिल तणी वातो…

जगतनी छे नही परवा, धराधन धाम शुं करवा,
जाण्युं जेणे बधुं जुठुं, वेदना वाकय परमाणे.
                          दिवाना दिल तणी वातो…

कहे छे लाल ए जाणे, बीजो मालीक पीछाणे,
झवेरी कोइ अगर जाणे, पडेलुं रत्न ए खाणे.
                         दिवाना दिल तणी वातो…

रचना :- लाल
टइप :- सामरा पी गढवी

4‬: दिवाना दिल तणी वातो, जगतना लोक शुं जाणे,
बाहारथी वेष बहुरूपी, कहो पछी केम पिछाणे.  टेक

उपर देखावनां गांडा, भीतर डहापण भरेला,
अमर आनंदनी मोजु, सदा अंतर मही माणे.
                          दिवाना दिल तणी वातो…

डहापणमां दु:ख देखायुं, गांडापणुं गळ्युं लाग्युं,
एवी मतलब दिवानानी, गति ने कोुइ शुं जाणे.
                           दिवाना दिल तणी वातो…

जगतनी छे नही परवा, धराधन धाम शुं करवा,
जाण्युं जेणे बधुं जुठुं, वेदना वाकय परमाणे.
                          दिवाना दिल तणी वातो…

कहे छे लाल ए जाणे, बीजो मालीक पीछाणे,
झवेरी कोइ अगर जाणे, पडेलुं रत्न ए खाणे.
                         दिवाना दिल तणी वातो…

रचना :- लाल
टइप :- सामरा पी गढवी

History & Literature

चिलम मेरे सद्गुरु ने पाई… Agyat

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मस्ती अजब की है छाइ, चिलम मेरे सदगुरू नें पाइ …टेक

साफ सुफ कर ञान का गांजा, समज तंम्बाकु मिलाइ;
ठांस ठांस भरदीनी चिलम में, फीर ञान की जयोत जलाइ .
चिलम मेरे सदगुरू नें पाइ…

अंगार दिया तप का छूआ कर, फीर काम विकोर जलाइ,
कृपा करके होठोसें लगाके. शब्द की साफी बनाइ.  चिलम मेरे सदगुरू नें पाइ…

पहेले दम में हुवा दिवाना, रोम रोम मस्ती छाइ,
अंतर घटमें हुआ उजाला, नूर में नूर समाइ.    चिलम मेरे सदगुरू नें पाइ…

गुरू गोविद दो नाम एक है, बात समज में आइ,
अब तुं ही तुं गुंजत मनमें, अवर कोइ मनमें नांही.  चिलम मेरे सदगुरू नें पाइ

रचना :- अज्ञात
टाइप:-सामरा पी गढवी

History & Literature

थार्या भगत ना भजन bhajans by tharya bhagat

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भजन (1)
‬: सूर्य देव तमे जई कहेजो, संदेशो आ अमारो.
अनाथोना नाथ मुने, हवे ना विसारो.   टेक…

पश्र्विमथी सुमेरू जई, गोविंदने घणु कही.
स्वामीजीने संगे लई, तुं ऊगजे सवारो .   १

वेगे थी वैकुंठ दौडी, कहेजो कर जोडी जोडी.
हठीला हरि हठ छोडी, पल भरमां पधारो.   २

हाल अमारा घणा कही, लालजीने आवो लई.
भवो भव हुं भूलुं नहिं, उपकार तमारो.     ३

एक वार न माने हरि, तो कहेजो करगरी फरी.
थार्यो कहे महेर करी, मारो वियोग टारो.    ४

भजन (2)
जदुपति जीवन मेरा तेरी कला न्यारी.  टेक

गज की पुकार सुनी वेगसे पधारे.
खग के पति को मग में छोडा मुरारी.  १

सुरपति कोप करी व्रज जन को सतायो.
कमला पति करपे गिरिवर धारी.  २

रमे रास गोपी संग रहे ब्रह्मचारी.
रति केरो पति जहां हिमत गयो हारी.  ३

पराशर सुत तेरो पार न पावे.
थार्यो जावे अकथनीय लीला पर वारी.  ४

भजन(3)
नीशदिन नीरभरे नयन हमारे, नयन हमारे बहुत दुखारे.   टेक
करभये पावन तेरी सेवा करी स्वामी.
पांव सफल किये तीरथ तुम्हारे.     १

श्रवण पवित्र तेरा यश सुनी जगपति.
रसना निहाल तेरो नाम पुकारे.    २

मन पावे मौज तेरो मनन करी माधवा.
बुद्धि निर्मल निज काज सुधारे.   ३

थार्यो कहे मेरी अभागिनी आंखे.
धर्शन काज दशों दिशा निहारे.  ४

भजन (4)
तुम बडे दाता मेरी दीनता निवारी,
दीनता निवारी प्रभु मेरी दीनता निवारी. …  टेक

जो संपदा मैने स्वपने न देखी.
ऐसी अमीरी मुज को दीन्ही मुरारी. …  १

भूपन को भूप मुजे बना दियो भूधरा.
ऐसी पदवी का मैं तो न था अधिकारी. … २

अलौकिक दान तेरा न जाने मन मेरा.
कल्पांते खजाना तेरा खूटे ना खरारी.  … ३

थार्यो कहे मेरा मोजीला माधव.
अविचल दशा ऐसी रखना हमारी.  … ४

भजन (5)
मन ना मोजीला हरि, मोरली वारा,
मोरली वार हरि मेरे नयनो का तारा.   टेक

सेवक तेरा अनेक एहि जग मांहि.
मेरा तुंहि एक प्रभुजी प्रीतम प्यारा.    १

खूब ज तपासिु मैने दिल मही देखा.
आप बिना कोई और न दीखे आधारा.    २

तुटा जल बीच में जहाज है हमारा.
करूंणा करो तो नाथजी मिलेगा किनारा.   ३

थार्यो कहे अब तो दर्शन द्यो तुम्हारा.
संकट समे में स्वामी मत करो मुंह टारा.   ४

भजन(6)
राम बिना सुख स्वपने नाहिं, क्यों भूले गाफिल प्रानी रे.  टेक

धन यौवन बादल की छाया, देख देख तुं क्यों ललचाया.
माटी में मिल जावे काया, रहे न एक निशानी रे .… राम बीना…

उपदेश देवे सन्त सुजाना, थके पुकारी वेद पुराना.
किरतारने तुजे दियादो काना, अजहु रहे अञानी रे… राम बीना…

मिथुनाहारमग्नमतिमन्दा, और सार समजे ना अन्धा.
अपनी भूलसे आप हि बन्धा, पडे चोरासी खानी रे…राम बीना…

थार्यो कहे छोडदे आशा, जूठा है सब भोग विलासा.
दो दिनका ये देख तमासा, आखर है सब फानी रे.…      राम बीना …

रचना – थार्या भगत
टाइप – सामरा गढ़वी

History & Literature

भजन – दास सतार Bhajan by Daas Sataar

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भजन(1) 🌻
🙏 मालुम नहीं रहेणी बीना घर दूर 🙏

मालुम नहीं रहेणी बीना घर दूर,
कलीयुग में कहेणीके बहोत मजूर.

शुरवीर होय ते सन्मुख लडे ने, कायर भागे दूर,
प्रेम पियाला कोई मरजीवा पीवे, नीत रहे चकचूर.
                    कलीयुग में कहेणीके बहोत मजूर…(१)

काम क्रोध मद लोभ मोह के, नाम पे डाल दे धूल,
पांच को मार पच्चीस को बस कर, मुख पर बरसे नूर.
                        कलीयुग में कहेणीके बहोत मजूर…(२)

ये हंसा का कया हय भरोंसा, उड जावे जयुं कपूर,
दास सत्तार भजो भय भंजन, साहेब हाल हजूर.
                      कलीयुग में कहेणीके बहोत मजूर…(३)

भजन(2)

सुख और दु:ख में आनंद रहेवे
हरदम हरगुण गावे
साधु वो नर हमको भावे…टेक

परनारी परधन को त्यागे, सतकी रोजी खावे,
तनमन और बचन सें कोइ, जी को नांही दुभावे. …साधु वो…

करे सेवा संसार की उनको, साची राह दिखावे,
धर्म करतां धाड आवे तो, हिंमत हार न जावे. …साधु वो …

परदु:ख भंजन होकर रहेवे, गुरू गोविंद गुण गावे,
दास सत्तार गुरू गोविंद मिलकर, काल को मार हठावे … साधु वो…

भजन(3)

मनुष्य देह मळ्यो अति दुर्लभ मोंघा एना मूल
मनवा लइ लें ल्हाव अमूल…टेक

षडरिपुओना संग तजीनें सेवाभक्ति शणगा सजीने.
निशदिन नाम प्रभुनुं भजीनें प्रेम हिंडोळे झूल. …टेक

मिथ्या मायामां मनडुं मोयुं विपरीत मार्गे आयुष्य खोयुं,
मुर्खा फरी पाछुं नव जोयुं ए ज छे मोटी भूल. …टेक

नही करवाना कर्म करीने पाप कमाणीए पेट भरीने,
परनारीथी प्रीत करीनें लाखो थइ ग्यां डूल…टेक

आ अवसर पाछो नही आवे अभिमाने शीद बाजी गुमावे,
सत्तार शाह साचुं समजावे फूलणशी मत फ़ूल. …टेक

रचना :- दास सत्तार
टाइप :- सामरा पी गढवी

History & Literature

दुला भाया काग ना दूहा – dula bhaya kag

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दुहा

बानी बरतन उभय को, मिलियो जा घर मेल;
सो घर को यम परहरे, ऐसी नीति अपेल.

जिसके हिरदय हरि बस्यो, लोभ रह्यो किमि जाय;
एक गगन के गोख में, रवि रजनी न सुहाय.

कितने धरपति धनपति, अकिले चले अनाथ;
सबसे प्रिय जो अधिक था, सो धन चला न साथ.

पर दुख सम न अधर्म को, परहित सम नहिं धर्म;
श्रद्ध घात समो नहीं, जगमें कोउ कुकर्म.

धरनी धारे पीठ पर, प्राणी मात्र का भार;
सहज कर्म ईसका बना, करना पर उपकार.

नहिं कलेश अरु कृपणता, सब नर चतुर सुजान;
सो घरका परिचय करो, वहां बसे भगवान.

ईतना लाभ सरीत को, कोउ पी गया नीर;
मिली उदधी को तटनि जब, सारा उखर शरीर.

सुत दारा संसार सुख, भालु कुकर को होय;
परहित लगि जीवन धरे, वृक्ष सरिता दोय.

सूरज जलता गगन में, देता सदा प्रकाश;
गंगा हरती पाप को, करे न किसकी आश.

है अन्न की वह सफलता, पीस पीस कोउ खाय;
कन बिगडा नित जंतु से, गंध न किसीको सुहाय.

रचना :- दुला भाया काग
टाइप :- सामरा पी गढवी

History & Literature

सदा शिव सर्व वरदाता – स्वामी ब्रह्मानंद, Shiv Mahima- swami brahmanand

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सदा शिव सर्व वरदाता, दिगंबर हो तो ऐसा हो,
हरे सब दु:ख भकतन के, दयाकर होतो ऐसा हो.
  सदा शिव सर्व वरदाता… टेक

शिखर कैलाश के उपर, कल्प तरूंओ की छाय में,
रमे नित संग गिरीजा के, रमाण घर हो तो ऐसा हो.
  सदा शिव सर्व वरदाता.…   (१)

शिरपे   गंगकी   धारा,   सुहावे   भालमें   लोचन,
कला मस्तक में चंदरकी, मनोहर हो तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता.… (२)

भयंकर झहर जब निकला, क्षीर सागर के मंथन सें,
धरा  सब  कंठ में  पी  कर,  वीषंधर हो  तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(३)

शिरों को काटकर अपने, कीया जब होम रावणने,
दिया सब राज दुनिया का, दिलावर हो तो ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(४)

किया नंदी ने जा बन में, कठीन तप काल के डरसें,
बनाया खास गण अपना, अमर कर होतो  ऐसा हो .
सदा शिव सर्व वरदाता…(५)

बनाये  बीच  सागर  में,  तीन  पुर  दैत्य  सेनाने,
उडाये  एक ही  सरसे,  त्रिपुंडहर  हो  तो  ऐसा  हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(६)

दक्ष के यञ  में  जा  कर,  तजी  जब  देह  गिरीजा नें,
कीया सब  ध्वंस  पलभर में,  भयंकर  हो तो  ऐसा हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(७)

देव  नर  दैत्य  गण  सारे, रटे  नित  नाम  शंकर  का,
वो  ब्रह्मानंद  दुनिया  में,  उजागर  होतो  ऐसा  हो.
सदा शिव सर्व वरदाता…(८)

रचना :- श्री ब्रह्मानंद
टाइप :- सामरा पी गढवी

History & Literature

आद्यशक्ति Aadishakti

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छंद मनहर (कवित)

ॐ नमो आदि शक्ति, प्रभा परिह्ममकी तुं.
ईश्र्वरी अपार हो, अनंत लोक धारिणी.   |
सुद्धञान मागुंदान, अंतर हारो गुमान.
शरणागत जान देवि, सिंहपे सवारिणी.   |
चौदे भुवनो की मात, जग जश विख्यात गात.
कुबुद्धिको निवार, कोह मोह मान मारिणी.   |
वेगे चढ वार, धार आयुध कर मार पाप.
नेहसे निहार जरा हमको नारायणी.            १

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दु:खी तेरा बाल, करो ख्याल मात उसिका तुं.
दयाली कृपाली, दु:ख दुविधा निवारिणी.   |
पापको विनाश कर, तापको निवार मेरे.
भवसे उतार पार, तीनलोक तारिणी.   |
कालिका कृपाली, जग जननीजवाल मैया.
अभय कर कवियोंको, चारणो उचारिणी.    |
थार्यो कर जोडी कहे, सदा साथ मेरे रहो.
अनाथ- सनाथ करो, अधम उधारिणी.    २

रचना :- थार्या भगत
टाइप :- सामळा .पी. गढवी

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