कागवाणी Kagvani Dula Bhaya Kag

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Dula Bhaya Kag

कीधां न जीभे केण, नाड्युं झोंटाणा लगी;
न कर्यां दुखडां नेण, (एने) केम वीसरीए, कागडा.     ११

आखर एक जतां, क्रोडयुं न आखर कामना;
मोढे बोलुं ‘मा’, कोठाने टाठक, कागडा .   १२

मोढे बोलुं मा साचेंय नानप  सांभरे;
(त्यारे)मोटपनी मजा, मने कडवी लागे ,कागडा.  १३

अडी न जगनी आग, तारे खोळे खेलता;
तेनो कीधेल त्याग, (तेथी) काळज सळगे, कागडा.   १४

भगवत तो भजता,  माहेश्र्वर आवी मळे;
(पण) मळे न एक ज मा, कोई उपाये, कागडा.    १५

मळी न हरने मा, (तेथी) महेश्र्वर जो पशू थया;
(पण) जायो ई जशोदा, (पछी) कान केवाणो, कागडा.  १६

मळियल एने मा, सौ राधव करसनने रटे;
जग कोइ जाणे ना, काछप मच्छने, कागडा. १७

जननी केरुं जोर, राधवने रे’तुं सदा;
(तेथी) माने न करी मोर, करियो पिताने, कागडा.  १८

घूमीने घूघवतां, खोळे धावीने खेलतां;
(ए) खोळो खोजीतां, क्यांये न मळे, कागडा   १९

मोटां करीने मा, खोळेथी खसतां कर्यां;
खोळे खेलववा, (पाछां) कर ने बाळक, कागडा  २०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळाभाई गढ़वी

History & Literature

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