कागवाणी Kagvani -Dula Bhaya Kag

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जण को पास न जाय, उकरडो आघो करे;
(पण) एना गुण गणाय, (जे दी) करसड पाके कागडा !+ १

शीळो सारो होय तो, बावळनेय बेसाय;
(पण) शूळुं नो संघराय, कोठी भरीने कागडा !+  २

पोताना बावळ परे, मीठी मीटुं राख;
(एना) कांटा काढी नाख, तारा केडामांथी, कागडा !   ३

गियां मांस गळ्ये, तो हाडे हेवायां करे;
(ए) माता जाय मर्ये, (एने)केम वीसरीए, कागडा ?   ४

चींधे न छोरुने, लथडियां अंगडां लिये;
मरतां लग माने, केम वीसरीए, कागडा ?     ५

पंडमां पीड घणी, सांतीने हसती सदा;
माया मात तणी, केम वीसरीए, कागडा  ?   ६

कुथुंब कलेश अपार, कीधा न पूतरने कदी;
(एवां) झेर जीरणहार, केम वीसरीए,कागडा ?  ७

जम जडाफा खाय, मोते नाळ्युं माडियुं;
(तोय) छोरुनी चिंता थाय, (एने)केम वीसरीए कागडा ?   ८

धमणे श्र्वास धमाय, घटडामां घोडां फरे;
(तोय) छोरुनी चिंता थाय, (एने) केम वीसरीए, कागडा ?    ९

तो अंग अघळा ताव, पूतर तळ पूछे नई;
(पण)भाळ्यो न बीजो भाव, (एने)केम वीसरीए, कागडा ?   १०
(क्रमशः)
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळाभाई गढ़वी

History & Literature

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