दुला भाया काग ना दूहा – dula bhaya kag

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दुहा

बानी बरतन उभय को, मिलियो जा घर मेल;
सो घर को यम परहरे, ऐसी नीति अपेल.

जिसके हिरदय हरि बस्यो, लोभ रह्यो किमि जाय;
एक गगन के गोख में, रवि रजनी न सुहाय.

कितने धरपति धनपति, अकिले चले अनाथ;
सबसे प्रिय जो अधिक था, सो धन चला न साथ.

पर दुख सम न अधर्म को, परहित सम नहिं धर्म;
श्रद्ध घात समो नहीं, जगमें कोउ कुकर्म.

धरनी धारे पीठ पर, प्राणी मात्र का भार;
सहज कर्म ईसका बना, करना पर उपकार.

नहिं कलेश अरु कृपणता, सब नर चतुर सुजान;
सो घरका परिचय करो, वहां बसे भगवान.

ईतना लाभ सरीत को, कोउ पी गया नीर;
मिली उदधी को तटनि जब, सारा उखर शरीर.

सुत दारा संसार सुख, भालु कुकर को होय;
परहित लगि जीवन धरे, वृक्ष सरिता दोय.

सूरज जलता गगन में, देता सदा प्रकाश;
गंगा हरती पाप को, करे न किसकी आश.

है अन्न की वह सफलता, पीस पीस कोउ खाय;
कन बिगडा नित जंतु से, गंध न किसीको सुहाय.

रचना :- दुला भाया काग
टाइप :- सामरा पी गढवी

History & Literature

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