शिव स्तुति Shiva Stuti

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             ॥शिव स्तुति॥
                     दोहा
हरकरूणा बिन दिशत नही, सब गुण धर कैलास.
सो योजन विस्तार वट, तहां शंकर करत निवास.

                 छंद:-रणंकी
कर कर निवास शंकर समरथ, झर झर मुखमें तेज झरे.
खर खर गंग जटामें खरकत, भरर भभूति सुअंग भरे.
चरचित चंदन गंध समीरे, मधुकर वृंद गुजारत है.
शोभित शिव कैलास शिखरपर, अजर अमर बिराजत है.    १

वाघचर्म वस्तर अतिशोभित, चम चम भाल शशी चमके.
लरलर गले भुजंगम लरकत, ठणण श्रवण कुंडळ ठमके
गौरवदन पर जूल लटाक, अनंग अनेक लजावत है.
शोभित शिव कैलास शिखर पर, अजर अमर बिराजत है.    २

त्रेंक त्रेंक शंखरव शणणण, डिम डिम डिम डमरूक बजे.
धिनक धिनक तबलध्वनि बाजत, गणण गणण दशदिग्गरजे.
किन्नर चारण गावत गुण गण, अजब अप्सरा नाचत है.
शोभित शिव कैलास शिखर पर, अजर अमर बिराजत है.    ३

पद पदमासनको हि जमावत, बढ अष्टांग हीयोग बढे.
संकर सेज स्वरूप संभारत, सर सर सुखद समाधि चढे.
विगत करत युग कोटी हजारो, धीरे प्राण उतारत है.
शोभित शिव कैलास शिखर पर, अजर अमर बिराजत है.   ४

नाग नर देवा कर पद सेवा, धर धर योगी ध्यान धरे.
अनंत अजन्मा एक अनुपम, डर डर आगे काल डरे.
अष्टसिद्धि नवनिधि कर जोड, हमेश हुकम पर चालत है.
शोभित शिव कैलास शिखर पर, अजर अमर बिराजत है.   ५

कर महेर देवाधिप मुजपर, हर हर मेरे दोष हरो.
भवसागर बूडत है नैया, धर कर बेगसे पार करो.
अविचल वास दियो चरनोंमें, थार्यो ए वर मागत है.
शोभित शिव कैलास शिखर पर, अजर अमर बिराजत है.  ६

कळश छप्य

शोभित शिव कैलास, शकर जगतके स्वामी.

अविचल करत निवास, अजन्मा अंतरयामी.

परिब्रह्म पूरण काम, हर यश जो नर गावे.

पावे उत्तम धाम, फिर चोर्यासी नावे.

आनंद आठों पहोर, दो अज अलख अभेवा.

थार्यो कह कर जोड, जय श्रीशंकर देवा

रचना :- थार्या भगत  (झरपरा)
टाइप :- सामळा .पी. गढवी

History & Literature

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