हंस, लोह, कांचळी- दुला भाया काग – Dula Bhaya Kag

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हंस, लोह, कांचळी.
       (झूलणा छंद)

            (हंस)
त्याग हंसे कर्यो मान सरोवर तणो
आवियो तट दधी निर ना’यो
कोई ऐने पछी हंस के’तु नथी
हंस बगलानी हारे गणायो
मोती मळीयां नही त्यां मळी माछली
सुख लवलेश त्यांथी न लाध्युं
शरीर रजळ्युं जुवो तीर सागर तणे
बकगणे हंसनुं मांस खाधुं…
           
          (लोह)
लोहने काष्ठ बे संगे ज्यारे मळ्यां
जा’जा थई सागरे सफर किधी
लोह वजने धणुं काष्ठ संगे रही अकळ रत्नाकरे ल्हेर लीधी
वहाण छे काष्टनुं ऐम सौव को कहे
लोहथी ऐ न मनमां सहाणु
तुर्त जुदुं थयुं काष्ट तरतुं रह्युं
लोह दरियाने तळीये समाणुं…

         (कांचळी)
सर्प अंगे मळीने रही रात दी
ऐ पराधीनतामां न फाव्युं
नागथी जेम जुदी पडी कांचळी
उंदरोऐ बिछानुं बनाव्युं
विख गणी दुष्ट ने त्याग सापे कर्यो
उरमां ऐ अहंकार लाव्यो
झेर हीण कंडिऐ पूरियो वादीऐ
नागने जुओ धर धर नचाव्यो…

त्याग करसो नही मित्र सजज्न तणो
जेहनां तेज अंगे प्रकाशे
सुजन मित्रो एने स्थानना त्यागथी
दु:खनां धोर वादळ छवाशे
गुण गणी राखजे ‘काग’ तुं मित्रना
होय मर कंई अवगुणकारी
भूलतां जीभने दांत कचरे कदी
पाडवानी न करतो तैयारी…
रचना – दुला भाया काग
पोस्ट – लाभूभाई गढ़वी

History & Literature

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