Daily Archives: September 23, 2015

कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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ए कुळ झेरी आप,  (एमां) चांदो ने गंगा शुं करे;
शंकर कंठमां साप, कडवो न मटयो, कागडा         ७१

(एक) लिये भरखी लोइ, दल बीजुं टाढक दिये;
जळो ने कमळ जोइ; (एमां) कुळनुं क्यां रय,ुं कागडा    ७२

साथे वसतां सोय, पाणी पण सरखुं पीए;
द्नाख ने मरची दोय,  (एनो) क्यारो एक ज,  कागडा   ७३

सु वायें पाके सदा, कू वाये कवठी जाय;
(एवां) तलनां खेत तकाय, (एना) कांउ भरोंसा, कागडा    ७४

साकरमां राखे सदा, (तो) विख साकर वरताय;
एफ़ीण शमृत मांय, कडवुं न मटे, कागडा      ७५

ताजणा पाडे तोय, फडकीने पाछी फरे;
कुळ टारडनां कोय, केडा पकडे,  कागडा    ७६

सोजां ने हराडां सार, वासो नित भेळां वसे;
(पण) झांपेथी जुहार, (बेउना) केडा नोखा, कागडा    ७७

भवहर न थियो भूत, भूत भवेश्र्वर नो थियो;
प्रेत ने हरना पूत, कायम भेळा, कागडा    ७८

अंग भूधर असवार, वैकुंठे कायम वसे;
(तोय) एरुनो आ’र, कदीये न छोडयो, कागडा   ७९

पेठो बळि पताळ, (त्यां) चरण हरिना चाडिया;
(एनो) गोविंद थइने गोवाळ, (हजु) करे रखोपां, कागडा     ८०

तारी, राम ! तराइ, नाविक के लेशु नईं,
भवहळ तारण भाइ ! (मने) करजे कांठे, कागडा    ९१

मही, सागर, असमान , रसता जिण हाथे रच्या;
भीलोने भगवान, केडा पूछे, कागडा     ९२

दुनियाने देवुं पडे, भोजन भगवतने;
(ए) वेडे फळ वने, काचां पाकां, कागडा   ९३

बोरांनी मनमां बीक, शवरीने रेती सदा;
(त्यां) ठळिया सोतां ठीक, करडीने खाधां, कागडा    ९४

वेनबां बंधणे वाम, पिताने संकट पडयां;
(पछी) रयो न ऊभो राम, करवा वैभव, कागडा    ९५

लागी लखमण लाय, जननीने जाती करी;
भेळो वनमां भाई, कूदीने हाल्यो,  कागडा   ९६

सीताए राधव साथ, राखे माथां रोळियां;
वननी लीधी वाट, कफनी पेरीने, कागडा   ९७

सीता तज शणगार, प्रेमे वळकळ पे’रियां;
(एनो) हईडे हाहाकार, कौशलंयाने, कागडा   ९८

विधिना आखर वाम, जगदीशे जाण्या नईं !
राजा न थिया राम, केडा वनना,  कागडा    ९९

तेने भोग तमाम, अवधना एरू थया;
रटतां दशरथ राम, कलेवर छोडयुं, कागडा   १००

दशरथ  छोडी देह, विधवापण आव्युं वळी;
रदे न लागयो रेह, केगै हरखी;  कागडा     १०१

सीताने राघव साथ, माए वनमां मोकल्यां;
(ए) वंसमी भरतने वात, (पछी) ककळी ऊठयो,  कागडा   १०२

तातें आपेल ताज, भरतने भोव्यो नईं;
राघव केरुं राज, (एने) कडवुं, कागडा   १०३

सीता केरो शोक, भेंकर लाग्यो भरतने;
भाईयुं विनाना भोग, कांटा सरखा, कागडा   १०४

वनमां राघव वास, पिता परलोके गयो;
भरत मनमां भास, केगै माता,  कागडा    १०५

दकळां सागर दु:ख, राम विनानां रेलियां;
मानुं न जोयुं मुख, कदीये भरते, कागडा    १०६

दशरथनो दरबार, इंदर पण आशा करे;
भाईयुं विण भेकार, कडवो भरतने, कागडा   १०७

आंखे एकल धार, आंसु भरतने ऊमटयां;
(हवे) करवुं शुं किरतार ? केडो न मळे, कागडा   १०८

भरत ! धारुं भेख, (के) गोझारे हेमाळे गळुं ?
आवे न मारग एक, (के) कलेवर छोडुं, कागडा   १०९

कारण मारे कांई, हरि वन पेदळ हालिया;
जनम न थयो जोई, (मारो) काचे मइने, कागडा   ११०

रचना :- दुला भाया काग
साभार :- सामळा .पी. गढवी

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कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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गळथी नोय गळ्यां, रंग बीजे रंगियां नहीं;
वारि वराळ तणां, कडवां न थियां कागडा      ५१

कूणी वीजळी कोय, लीओ तां टाढी लागती;
(पण) जरीअल सराणे जोय, (एना) कोठानी वातुं कागडा   ५२

अंगडां ऊंना होय, (कोई) आपे तो आडी पडे;
(पण) कसतर वारण कोय, एवी कोक ज गळणी, कागडा    ५३

धोको शिर धराय, चीजुं तो नजरे चडे;
दीवे नो देखाय, कूंडानी हेठळ, कागडा  ५४

जोयां मुख जळे, मीठांने जूठां मानवी;
मीतर कोक मळे, काच सरीखा, कागडा    ५५

लाखुं व्रस लगे, जिवाडीने पोते जीवशे;
सीसाने नो चडे, केफ दारूनो, कागडा    ५६

दीपावे दरने, अनहद मेनत आदरी;
(त्यां) एरु उंदरने, काढी मेले, कागडा     ५७

गळ साखुं गळवा कजु, धर नीचो ढळवा;
फळ मीठां फळवा, (एने) केवुं न पडे, कागडा   ५८

ए छे अंजवाळुं, पाळीने नोतरवुं पडे;
आवे अंधारुं, कीधा विणनुं, कागडा   ५८

त्रठ मोती करवा तणुं, भरती भरवानुं;
लेर्युं लेवानुं,  (एने) केवुं न पडे, कागडा    ६०

राते घोडां रोडवी, पो तक पूग्यानुं;
एने ऊग्यानुं, केवुं न पडे, कागडा      ६१

सोजीतण रीती सदा, ऊंये आफळतां;
अळ मारे अडतां, (एने) केवुं न पडे, कागडा   ६२

मोळा दन मागण मळे. अंग रोगीने अरियां;
घर घातक थियां, (त्रणे) कफरी वेळा, कागडा   ६३

सीमाडे अरि सामटा, एकल आफळवां;
भारतनां भरवा, (इ) कफरी वेळा, कागडा   ६४

पाणी पण एक ज पीए, आंबामां ऊभो होय;
(पण) नेसळ मीठो नोय, कडवो लींबड, कागडा  ६५

रोपी आंबो रानमां, अने पाणी कडवां पाय;
टाणे फळ तकाय, एने केरी ज आवे, कागडा    ६६

आग्युंमां ओराय, धमणे नत्रेडां धमे;
(तोय) काळप नो कळाय , कुळ कुंदनना, कागडा   ६७

जळियां पालव  जोय, पंडमां बौ फांकां पडयां;
(एने) नाधयों सांधा नोय, (जेनां) कलेवर बगडयां, कागडा   ६८

लवकारा कफरा लवे, हरदम पीडा होय;
(पण) जांगे गूमडां जोय, केम देखडीए, कागडा   ६९

परनाळें घी पाव, कठ चंदन होन्या करो;
(पण) एने जे दी अडवा जाव, (ते दी) काळी बळतर, कागडा   ७०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

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कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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सूरज घर संघरेल, चोरी जळ सायर तणां;
अषाढे ओकेल, कोठे न रयां, कागडा    ४१

बीडीने ऊबेल बाथ, राता थइ ऊभा रया;
सळग्या न खीला साथ, काठ बळी ग्यां, कागडा    ४२

खीला घाव खळ्ये, नोखा जे पडता नई;
कफरें काठ बळ्ये, (त्यारे) कूदी ने भाग्या, कागडा    ४३

(एने)हैडे वेर न होय, (जेनां) प्रीताळुं पंडडयां घडयां;
काठ खीला ने तोय, कांठे करशे, कागडा      ४४

तनडां तूटे तोय, प्रीतुं पालटशे नहीं;
जळमां खीलाने जोय, काठ न बोळे, कागडा,    ४५

काठ खीलाने कोय, जळमां जतनायुं करे;
(नहीं तो) तारण ब्रदने तोय, कळंक बेसे, कागडा     ४६

घोडा ने ऊंट घणा, जोजन सो झपटुं करे;
(पण) भोगळ भांगे ना, कुंभाथळ विण,  कागडा     ४७

आशा अठ मासें, उरें कदी न आणजे;
छत्री चोमासे, (तने) कोरो राखे, कागडा     ४८

कूडां न साचां कोय, आंख्यु उपर आवशे;
जश ने अपजश जोय, कीकीने न मळे, कागडा   ४९

ठुंठां आग थियां, दुनियां कहिया देवता;
(पण) तेनांय घर तजियां, (एने) कहीए राखुं,  कागडा    ५०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

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कागवाणी , Kagvani – Dula Bhaya Kag

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अमृत भरियल अप, तुंकारा जननी तणा;
बीजा भणता बाप, कोरा आखर, कागडा  २१

स्वारथ जग सारो, पधारो भणशे प्रथी;
(पण) तारो तुंकारो, क्यांये न मळे कागडा  २२

माता तो मनमां ऊणप कदी न आणजे;
(मारे) ऊभी अंतरमां (तारी) कायम छबी, कागडा   २३

अंतरमां अवधेश, रटवाने रोकेल नई;
(तेथी) हाले श्रंवास हंमेश, काळ घरा पर, कागडा    २४

काढी मेल्या कोई, राम भजनने रूसणे;
(तेथी) जाता दनडा जोई, काळ नोतरवा, कागडा    २५

उजळियां आवेल, पळियां तो माथे प्रगट;
काळांने काढी मेल, तने केस संदेशो, कागडा    २६

ऊभा नित आगें, तंग तबेले ताणता;
(पण) वांसाना वागे, (तारे) काम न लागे, कागडा   २७

रुडा मुख रागें, मीठां माखणियां भणे,
(जे दी) खेलेवुं खागें, (ते दी) काम न लागे, कागडा    २८

मन  गमतां मागे, मोढेथी माथां दिये;
(जेदी) ओरावुं आग्यें, (ते दी) काम न लागे, कागडा   २९

गोतर नव गणे, वातुडा भेरु वसव;
(ई) टाणे मोत तणे, काम न लागे, कागडा   ३०
रचना – दुला भाया काग
साभार- सामळा भाई गढ़वी

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कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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तनमां आवे ताव, हैडां टाढे हडवडे;
भेथी पूछे भाव, करियातानो, कागडा    ३१

तेने न मळे तात, पंखी बे जनम्यां प्रगट;
(पण) रे छे दि ने रात, केम विजोगी, कागडा ,    ३२

हरिए ढांकेल होय, पशु ने पंखी तणी;
एब उगाडी नोय, कदीये व्खनी, कागडा    ३३

पंडना जोर परे, घटमां भरुंसो घणो;
(तेथी) सावज नो संघरे कदीये भोजन, कागडा   ३४

धींगी ढाल धरी ते पगलां केसर तणां;
(तेथी) बेठी जई बकरी, कुंभाथळ पर, कागडा,     ३५

न भणे एने नीर, प्रथमी कोई पणशे नई;
(जेने) वालां तजियां वीर, (सौ) कदाव भणशे, कागडा   ३६

व्रेमंड ताणे वाय, झोंटे कर भूतळ जठे;
(तेथी) पोकारो पडाई, काणां पडियां, कागडा   ३७

जेठें डुजेल जोय, उपर पाणी आळस्यां;
तरस छिपावे तोय, (न्यां) करजे वीरड, कागडा   ३८

जीवाई झोंटाणी, घर भीतर वेरी धर्या;
(त्यारे) माखी मध तणी क्रडवा धोडे, कागडा    ३९

मानव घरनां मेल, घाणीनां तलडा धर्या;
तलमां न रयां तेल, केवाणो खळ,  कागडा     ४०
रचना -दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

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