कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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तनमां आवे ताव, हैडां टाढे हडवडे;
भेथी पूछे भाव, करियातानो, कागडा    ३१

तेने न मळे तात, पंखी बे जनम्यां प्रगट;
(पण) रे छे दि ने रात, केम विजोगी, कागडा ,    ३२

हरिए ढांकेल होय, पशु ने पंखी तणी;
एब उगाडी नोय, कदीये व्खनी, कागडा    ३३

पंडना जोर परे, घटमां भरुंसो घणो;
(तेथी) सावज नो संघरे कदीये भोजन, कागडा   ३४

धींगी ढाल धरी ते पगलां केसर तणां;
(तेथी) बेठी जई बकरी, कुंभाथळ पर, कागडा,     ३५

न भणे एने नीर, प्रथमी कोई पणशे नई;
(जेने) वालां तजियां वीर, (सौ) कदाव भणशे, कागडा   ३६

व्रेमंड ताणे वाय, झोंटे कर भूतळ जठे;
(तेथी) पोकारो पडाई, काणां पडियां, कागडा   ३७

जेठें डुजेल जोय, उपर पाणी आळस्यां;
तरस छिपावे तोय, (न्यां) करजे वीरड, कागडा   ३८

जीवाई झोंटाणी, घर भीतर वेरी धर्या;
(त्यारे) माखी मध तणी क्रडवा धोडे, कागडा    ३९

मानव घरनां मेल, घाणीनां तलडा धर्या;
तलमां न रयां तेल, केवाणो खळ,  कागडा     ४०
रचना -दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

History & Literature

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