कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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सूरज घर संघरेल, चोरी जळ सायर तणां;
अषाढे ओकेल, कोठे न रयां, कागडा    ४१

बीडीने ऊबेल बाथ, राता थइ ऊभा रया;
सळग्या न खीला साथ, काठ बळी ग्यां, कागडा    ४२

खीला घाव खळ्ये, नोखा जे पडता नई;
कफरें काठ बळ्ये, (त्यारे) कूदी ने भाग्या, कागडा    ४३

(एने)हैडे वेर न होय, (जेनां) प्रीताळुं पंडडयां घडयां;
काठ खीला ने तोय, कांठे करशे, कागडा      ४४

तनडां तूटे तोय, प्रीतुं पालटशे नहीं;
जळमां खीलाने जोय, काठ न बोळे, कागडा,    ४५

काठ खीलाने कोय, जळमां जतनायुं करे;
(नहीं तो) तारण ब्रदने तोय, कळंक बेसे, कागडा     ४६

घोडा ने ऊंट घणा, जोजन सो झपटुं करे;
(पण) भोगळ भांगे ना, कुंभाथळ विण,  कागडा     ४७

आशा अठ मासें, उरें कदी न आणजे;
छत्री चोमासे, (तने) कोरो राखे, कागडा     ४८

कूडां न साचां कोय, आंख्यु उपर आवशे;
जश ने अपजश जोय, कीकीने न मळे, कागडा   ४९

ठुंठां आग थियां, दुनियां कहिया देवता;
(पण) तेनांय घर तजियां, (एने) कहीए राखुं,  कागडा    ५०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

History & Literature

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