कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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गळथी नोय गळ्यां, रंग बीजे रंगियां नहीं;
वारि वराळ तणां, कडवां न थियां कागडा      ५१

कूणी वीजळी कोय, लीओ तां टाढी लागती;
(पण) जरीअल सराणे जोय, (एना) कोठानी वातुं कागडा   ५२

अंगडां ऊंना होय, (कोई) आपे तो आडी पडे;
(पण) कसतर वारण कोय, एवी कोक ज गळणी, कागडा    ५३

धोको शिर धराय, चीजुं तो नजरे चडे;
दीवे नो देखाय, कूंडानी हेठळ, कागडा  ५४

जोयां मुख जळे, मीठांने जूठां मानवी;
मीतर कोक मळे, काच सरीखा, कागडा    ५५

लाखुं व्रस लगे, जिवाडीने पोते जीवशे;
सीसाने नो चडे, केफ दारूनो, कागडा    ५६

दीपावे दरने, अनहद मेनत आदरी;
(त्यां) एरु उंदरने, काढी मेले, कागडा     ५७

गळ साखुं गळवा कजु, धर नीचो ढळवा;
फळ मीठां फळवा, (एने) केवुं न पडे, कागडा   ५८

ए छे अंजवाळुं, पाळीने नोतरवुं पडे;
आवे अंधारुं, कीधा विणनुं, कागडा   ५८

त्रठ मोती करवा तणुं, भरती भरवानुं;
लेर्युं लेवानुं,  (एने) केवुं न पडे, कागडा    ६०

राते घोडां रोडवी, पो तक पूग्यानुं;
एने ऊग्यानुं, केवुं न पडे, कागडा      ६१

सोजीतण रीती सदा, ऊंये आफळतां;
अळ मारे अडतां, (एने) केवुं न पडे, कागडा   ६२

मोळा दन मागण मळे. अंग रोगीने अरियां;
घर घातक थियां, (त्रणे) कफरी वेळा, कागडा   ६३

सीमाडे अरि सामटा, एकल आफळवां;
भारतनां भरवा, (इ) कफरी वेळा, कागडा   ६४

पाणी पण एक ज पीए, आंबामां ऊभो होय;
(पण) नेसळ मीठो नोय, कडवो लींबड, कागडा  ६५

रोपी आंबो रानमां, अने पाणी कडवां पाय;
टाणे फळ तकाय, एने केरी ज आवे, कागडा    ६६

आग्युंमां ओराय, धमणे नत्रेडां धमे;
(तोय) काळप नो कळाय , कुळ कुंदनना, कागडा   ६७

जळियां पालव  जोय, पंडमां बौ फांकां पडयां;
(एने) नाधयों सांधा नोय, (जेनां) कलेवर बगडयां, कागडा   ६८

लवकारा कफरा लवे, हरदम पीडा होय;
(पण) जांगे गूमडां जोय, केम देखडीए, कागडा   ६९

परनाळें घी पाव, कठ चंदन होन्या करो;
(पण) एने जे दी अडवा जाव, (ते दी) काळी बळतर, कागडा   ७०
रचना – दुला भाया काग
साभार – सामळा भाई गढ़वी

History & Literature

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