कागवाणी Kagvani – Dula Bhaya Kag

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ए कुळ झेरी आप,  (एमां) चांदो ने गंगा शुं करे;
शंकर कंठमां साप, कडवो न मटयो, कागडा         ७१

(एक) लिये भरखी लोइ, दल बीजुं टाढक दिये;
जळो ने कमळ जोइ; (एमां) कुळनुं क्यां रय,ुं कागडा    ७२

साथे वसतां सोय, पाणी पण सरखुं पीए;
द्नाख ने मरची दोय,  (एनो) क्यारो एक ज,  कागडा   ७३

सु वायें पाके सदा, कू वाये कवठी जाय;
(एवां) तलनां खेत तकाय, (एना) कांउ भरोंसा, कागडा    ७४

साकरमां राखे सदा, (तो) विख साकर वरताय;
एफ़ीण शमृत मांय, कडवुं न मटे, कागडा      ७५

ताजणा पाडे तोय, फडकीने पाछी फरे;
कुळ टारडनां कोय, केडा पकडे,  कागडा    ७६

सोजां ने हराडां सार, वासो नित भेळां वसे;
(पण) झांपेथी जुहार, (बेउना) केडा नोखा, कागडा    ७७

भवहर न थियो भूत, भूत भवेश्र्वर नो थियो;
प्रेत ने हरना पूत, कायम भेळा, कागडा    ७८

अंग भूधर असवार, वैकुंठे कायम वसे;
(तोय) एरुनो आ’र, कदीये न छोडयो, कागडा   ७९

पेठो बळि पताळ, (त्यां) चरण हरिना चाडिया;
(एनो) गोविंद थइने गोवाळ, (हजु) करे रखोपां, कागडा     ८०

तारी, राम ! तराइ, नाविक के लेशु नईं,
भवहळ तारण भाइ ! (मने) करजे कांठे, कागडा    ९१

मही, सागर, असमान , रसता जिण हाथे रच्या;
भीलोने भगवान, केडा पूछे, कागडा     ९२

दुनियाने देवुं पडे, भोजन भगवतने;
(ए) वेडे फळ वने, काचां पाकां, कागडा   ९३

बोरांनी मनमां बीक, शवरीने रेती सदा;
(त्यां) ठळिया सोतां ठीक, करडीने खाधां, कागडा    ९४

वेनबां बंधणे वाम, पिताने संकट पडयां;
(पछी) रयो न ऊभो राम, करवा वैभव, कागडा    ९५

लागी लखमण लाय, जननीने जाती करी;
भेळो वनमां भाई, कूदीने हाल्यो,  कागडा   ९६

सीताए राधव साथ, राखे माथां रोळियां;
वननी लीधी वाट, कफनी पेरीने, कागडा   ९७

सीता तज शणगार, प्रेमे वळकळ पे’रियां;
(एनो) हईडे हाहाकार, कौशलंयाने, कागडा   ९८

विधिना आखर वाम, जगदीशे जाण्या नईं !
राजा न थिया राम, केडा वनना,  कागडा    ९९

तेने भोग तमाम, अवधना एरू थया;
रटतां दशरथ राम, कलेवर छोडयुं, कागडा   १००

दशरथ  छोडी देह, विधवापण आव्युं वळी;
रदे न लागयो रेह, केगै हरखी;  कागडा     १०१

सीताने राघव साथ, माए वनमां मोकल्यां;
(ए) वंसमी भरतने वात, (पछी) ककळी ऊठयो,  कागडा   १०२

तातें आपेल ताज, भरतने भोव्यो नईं;
राघव केरुं राज, (एने) कडवुं, कागडा   १०३

सीता केरो शोक, भेंकर लाग्यो भरतने;
भाईयुं विनाना भोग, कांटा सरखा, कागडा   १०४

वनमां राघव वास, पिता परलोके गयो;
भरत मनमां भास, केगै माता,  कागडा    १०५

दकळां सागर दु:ख, राम विनानां रेलियां;
मानुं न जोयुं मुख, कदीये भरते, कागडा    १०६

दशरथनो दरबार, इंदर पण आशा करे;
भाईयुं विण भेकार, कडवो भरतने, कागडा   १०७

आंखे एकल धार, आंसु भरतने ऊमटयां;
(हवे) करवुं शुं किरतार ? केडो न मळे, कागडा   १०८

भरत ! धारुं भेख, (के) गोझारे हेमाळे गळुं ?
आवे न मारग एक, (के) कलेवर छोडुं, कागडा   १०९

कारण मारे कांई, हरि वन पेदळ हालिया;
जनम न थयो जोई, (मारो) काचे मइने, कागडा   ११०

रचना :- दुला भाया काग
साभार :- सामळा .पी. गढवी

History & Literature

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