चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना:- पिंगलशि नरेला कृत Chit chet sihana fir nahi aana aakhar jag mein mar jana…

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.               दुहो

हर पर विपति हाथसे डर पर दारा दाम
धर ईश्वर नित ध्यानमें कर नेकी के काम

             छंद त्रिभंगी

कर नेकी करसे डरपर धरसे पाक नजरसे धर प्रीती
जप नाम जीगरसे बाल उमरसे जसले जरसे मन जीती
गंभीर सागरसे रहे सबरसे मिले उधरसे परवाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

मद ना कर मनमे मिथ्या धनमे जोर बदनमे जोबनमे
सुख हे न स्वपनमे जीवन जनमे चपला धनमे छनछनमे
तज वेर वतनमे द्वेश धरनमे नाहक इनमे तरसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

जुठा हे भाइ बाप बडाइ जुठी माइ माजाइ
जुठा पित्राइ जुठ जमाइ जुठ लगाइ ललचाइ
सब जुठ सगाइ अंत जुदाइ देह जलाइ समसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

कोउ अधिकारी भुजबलभारी कोउ अनारी अहंकारी
कोउ तपधारी फल आहारी कोउ विहारी वृर्तधारी
त्रस्ना नहीं टारी रह्या भीखारी अंत खुवारी उठ जाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

तज पाप पलीती असत अनीति भ्रांती भीति अस्थिती
सज न्याय सुनीति उत्तम रीती प्रभु प्रतिति धर प्रीती
इन्द्री ले जीतीसुख साबिती गुण माहिती दर्ढ ज्ञाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना

दुनिया दो रंगी तरक तुरंगी स्वारथ संगी ऐकंगी
होजा सतसंगी दूर कुसंगी ग्रहेन टंगी जन जंगी
पिंगल सुप्रसंगी रचे उमंगी छंद त्रिभंगी सरसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना

रचियता :- पिंगळशी भाइ नरेला
साभार :- हरि गढवी।

History & Literature

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