Daily Archives: October 18, 2015

नवरात्री दूहा- छंद/ Navratri Duha Chhand

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आजे छठ्ठु नोरतु छे ते निमिते श्री देवदान देथा जी नी एेक रचना माणीये

🌻 शकित सकल मिल रास सजे🌻
            छंद रेणंकी
राजत पट सधर नीलंबर अंबर, धर नव सत सणगार धरे
फररर पर थंभ ध्वजा वर फरकत,  जरर जरर प्रतिबिंब जरे,
लरलर उर हार गुलकके लरकत ,सिर पर गजरा कुसम सजे ,
परगट धर सधर मानसर उपर, शकित सकल मिल रास, सजे.जी. १

झंझर धुन झणण झणण गत झणकत गणणण घुघर पाय घुरे
तणणणणण तंत्त बाजते तंबुर, सणणण गावत मधुर सुरे,
थणणण थैकार भयो जब थैतत, गणणगणण जब धरण गजे,
परगट धर सधर मान सर उपर , शकित शकल मिल रास सजे.जी.  २

कटकट गये विकट दु:ख संकट धिन कट बाजत तबल धुनी,
जटपट जगमात फिरत फरगट जित सिरत्रट सुरथट आयसुनी,
धिधिकट धृकट धृकट कट ध्राकट, बिकट उलट मरदंग बजे,
परगट धर सधर मानसर उपर,  शकित सकल मिल रास सजे.जी.३

झमझम कर झांझ बाजते रमजम, कम कम कोर पीठ कमं
समसमसम भेद वेद वत संगीत, ठमठम ठमकत मेध ठमं,
गमगमगम घोर घुमड धन गरजत,  धमम धमम धम भोम ध्रुजे,
परगट घर सधर मानसर उपर, शकित सकल मिल रास सजे.जी.४

सरसत रंग रचत सपत सुर साधत, गमन परत गत अगम गती,
सरसत पद कमल विमल रज परसत, तरत नमत तब अमर पती,
चितवत नित जगत भगत चरनन चित, रमत जमत अत ललित रजे,
परगट घर सधर मानसर उपर, शकित सकल मिल रास,सजे.जी.५

बनठन सुरनार करत तव वंदन, थनगन थनगन होत थनं,
धनधन धन रमन रच्यो सोई दिन धन, भन भन जयों नरनार भनं,
मन मन तन मगन भुवन त्रय निज मन, गानतान सुन गगन गजे,
परगट घर सधर मानसर उपर, शकित सकल मिल रास,सजे.जी.६

खळ हळ भुज चुड उजळ अति खळकत, कुंडल प्रबल प्रकाश करं,
जळळळ मुख नुर सुर सम जळहळ ,भळ हळ भळ हळ तेज भरं,
लळवळ नग जोत विमळ मनी लळकत , भ्रुकुटी मंगळमय भीडभजे,
परगट घर सधर मानसर उपर, शकित सकल मिल रास ,सजे.जी.७

हसरस नव दरस परस पर हसबस,  सरस संपुरण रास भयो,
बरसत सुर सुमन वदन जय बोलत,  सब दिस हुलस हुलास छयो,
सेवत विधि इश शक्र हरि सेवत, “देवीदास ” पुनि दसॅ दिजे,
परगट घर सधर मानसर उपर, शकित सकल मिल रास ,सजे.जी.

             ❄-  छप्पय -❄
रमत रास सुर राय,  सरस श्रृंगारही सज्जे,
गाय गीत सगीत, बीन मरदंग सु बज्जे,
घुघर बाजत गमक,  धमक पायन धर ध्रुज्जे,
झांझर अति जमकंत,  भनक सुन सकंट भज्जे,
जयकार संत सुरनर जपत, गगन बीच नोबत गजे,
कर जुगल जोर “देवो ” कहे, शकित रास इन बिध सजे
(श्री देवा विलास अने सुबोध बावनी //श्री देवीदान जी देथा )
साभार-गढवी कमलेश आर. (कच्छ)
जय माताजी

History & Literature

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सुजाणसिंह शेखावत, सर कट ने के बाद भी जिनका धड़ लड़ा / Sujansinh Shekhavat

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🌞  जय क्षात्रधर्म !  🙏🏻

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Rajputi Rit

“बारात चल पड़ी है। गाँव समीप आ गया है इसलिए घुड़सवार घोड़ों को दौड़ाने  लगे हैं। ऊँट दौड़ कर रथ से आगे निकल गए हैं । गाँव में ढोल और नक्कारे बज रहे हैं –
दुल्हा-दुल्हिन एक विमान पर बैठे हैं । दुल्हे के हाथ में दुल्हिन का हाथ है । हाथ का गुदगुदा स्पर्श अत्यन्त ही मधुर है। दासी पूछ रही है -“सुहागरात के लिए सेज किस महल में सजाऊँ? इतने में विमान ऊपर उड़ पड़ा।।’

विमान के ऊपर उड़ने से एक झटका-सा अनुभव हुआ और सुजाणसिंह की नीद खुल गई । मधुर स्वप्न भंग हुआ । उसने लेटे ही लेटे देखा, पास में रथ ज्यों का त्यों खड़ा था । ऊँट एक ओर बैठे जुगाली कर रहे थे । कुछ आदमी सो रहे थे

और कुछ बैठे हुए हुक्का पी रहे थे । अभी धूप काफी थी । बड़ के पत्तों से छन-छन कर आ रही धूप से अपना मुँह बचाने के लिए उसने करवट बदली ।

‘‘आज रात को तो चार-पाँच कोस पर ही ठहर जायेंगे । कल प्रात:काल गाँव पहुँचेंगे । संध्या समय बरात का गाँव में जाना ठीक भी नहीं है ।’
लेटे ही लेटे सुजाणसिंह ने सोचा और फिर करवट बदली । इस समय रथ सामने था । दासी जल की झारी अन्दर दे रही थी । सुजाणसिंह ने अनुमान लगाया –
‘‘वह सो नहीं रही है, अवश्य ही मेरी ओर देख रही होगी ।’

दुल्हिन का अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए उसने बनावटी ढंग से खाँसा । उसने देखा – रथ की बाहरी झालर के नीचे फटे हुए कपड़े में से दो भाव-पूर्ण नैन उस ओर टकटकी लगाए देख रहे थे । उनमें संदेश, निमंत्रण, जिज्ञासा, कौतूहल और सरलता सब कुछ को उसने एक साथ ही अनुभव कर लिया । उसका उन नेत्रों में नेत्र गड़ाने का साहस न हुआ । दूसरी ओर करवट बदल कर वह फिर सोने का उपक्रम करने लगा । लम्बी यात्रा की थकावट और पिछली रातों की अपूर्ण निद्रा के कारण उसकी फिर आँख लगी अवश्य, पर दिन को एक बार निद्रा भंग हो जाने पर दूसरी बार वह गहरी नहीं आती । इसलिए सुजाणसिंह की कभी आँख लग जाती और कभी खुल जाती । अर्द्ध निद्रा, अर्द्ध स्वप्न और अर्द्ध जागृति की अवस्था थी वह । निद्रा उसके साथ ऑख-मिचौनी सी खेल रही

थी । इस बार वह जगा ही था कि उसे सुनाई दिया

“कुल मे है तो जाण सुजाण, फौज देवरे आई।’
“राजपूत का किसने आह्वान किया है ? किसकी फौज और किस देवरे पर आई है ?”
सहसा सुजाणसिंह के मन में यह प्रश्न उठ खड़े हुए । वह उठना ही चाहता था कि उसे फिर सुनाई पड़ा –
‘‘झिरमिर झिरमिर मेवा बरसै, मोरां छतरी छाई।’’
कुल में है तो जाण सुजाण, फौज देवरे आई।”
‘‘यहाँ हल्ला मत करो ? भाग जाओ यहाँ से ?‘‘ एक सरदार को हाथ में घोड़े की चाबुक लेकर ग्वालों के पीछे दौड़ते हुए उन्हें फटकारते हुए सुजाणसिंह ने देखा ।
“ठहरों जी ठहरो । ये ग्वाले क्या कह रहे हैं ? इन्हें वापिस मेरे पास बुलाओ ।’ सुजाणसिंह ने कहा –
“कुछ नहीं महाराज ! लड़के हैं,यों ही बकते हैं । … ने हल्ला मचा कर नीद खराब कर दी |” …… एक लच्छेदार गाली ग्वालों को सरदार ने दे डाली ।
“नहीं ! मैं उनकी बात सुनना चाहता हूँ ।’
“महाराज ! बच्चे हैं वे तो । उनकी क्या बात सुनोगे ?’
“उन्होंने जो गीत गाया, उसका अर्थ पूछना चाहता हूँ ।’
“गंवार छोकरे हैं । यों ही कुछ बक दिया है। आप तो घड़ी भर विश्राम कर लीजिए फिर रवाना होंगे ।’’
“पहले मैं उस गीत का अर्थ समझुंगा और फिर यहाँ से चलना होगा ।’
‘‘उस गीत का अर्थ. ।’’ कहते हुए सरदार ने गहरा निःश्वास छोड़ा और फिर वह रुक गया |
“हाँ हाँ कहों, रुकते क्यों हो बाबाजी?”

“पहले बरात को घर पहुँचने दो फिर अर्थ बताएगे”
‘आप अभी बच्चे हैं । विवाह के मांगलिक कार्य में कहीं विघ्न पड़ जायगा ।’’

“मैं किसी भी विघ्न से नहीं डरता ।

आप तो मुझे उसका अर्थ…… I’

‘‘मन्दिर को तोड़ने के लिए पातशाह की फौज आई है । यही अर्थ है उस का।’’
“कौनसा मन्दिर ?’
“खण्डेले का मोहनजी का मन्दिर ।’
‘‘मन्दिर की रक्षा के लिए कौन तैयार हो रहे हैं ?’
‘‘कोई नहीं।’’ ‘‘क्यों ?’
‘‘किसमें इतना साहस है जो पातशाह की फौज से टक्कर ले सके । हरिद्वार, काशी, वृन्दावन, मथुरा आदि के हजारों मन्दिर तुड़वा दिए हैं, किसी ने चूँ तक नहीं की ‘‘
“पर यहाँ तो राजपूत बसते हैं।’’
“मौत के मुँह में हाथ देने का किसी में साहस नहीं है ।
“मुझ में साहस है । मैं मौत के मुँह में हाथ दूँगा । सुजाणसिंह के जीते जी तुर्क की मन्दिर पर छाया भी नहीं पड़ सकती । भूमि निर्बीज नहीं हुई, भारत माता की पवित्र गोद से क्षत्रियत्व कभी भी निःशेष नहीं हो सकता । यदि गौ, ब्राह्मण और मन्दिरों की रक्षा के लिए यह शरीर काम आ जाय तो इससे बढ़कर सौभाग्य होगा ही क्या ? शीघ्र घोड़ों पर जीन किए जाएँ ?’ कहते हुए सुजाणसिंह उठ खड़ा हुआ ।
परन्तु आपके तो अभी काँकण डोरे (विवाह-कंगन) भी नहीं खुले हैं ।
“कंकण-डोरडे अब मोहनजी कचरणों में ही खुलेंगे ।।’

बात की बात में पचास घोड़े सजकर तैयार हो गए । एक बरात का कार्य पूरा हुआ, अब दूसरी बरात की तैयारी होने लगी
। सुजाणसिंह ने घोड़े पर सवार होते हुए रथ की ओर देखा – कोई मेहन्दी लगा हुआ सुकुमार हाथ रथ से बाहर निकाल कर अपना चूड़ा बतला रहा था । सुजाणसिंह मन ही मन उस मूक भाषा को समझ गया।
“अन्य लोग जल्दी से जल्दी घर पहुँच जाओ ।’ कहते हुए सुजाणसिंह ने घोड़े का मुँह खण्डेला की ओर किया और एड़ लगा दी । वन के मोरों ने पीऊ-पीऊ पुकार कर विदाई दी ।

मार्ग के गाँवों ने देखा कोई बरात जा रही थी । गुलाबी रंग का पायजामा, केसरिया बाना, केसरिया पगड़ी और तुर्रा-कलंगी
लगाए हुए दूल्हा सबसे आगे था और पीछे केसरिया-कसूमल पार्गे बाँधे पचास सवार थे । सबके हाथों में तलवारें और भाले थे । बड़ी ही विचित्र बरात थी वह । घोड़ों को तेजी से दौड़ाये जा रहे थे, न किसी के पास कुछ सामान था और न अवकास ।

दूसरे गाँव वालों ने दूर से ही देखा – कोई बरात आ रही थी । मारू नगाड़ा बज रहा था; खन्मायच राग गाई जा रही थी, केसरिया-कसूमल बाने चमक रहे थे, घोड़े पसीने से तर और सवार उन्मत्त थे । मतवाले होकर झूम रहे थे ।

खण्डेले के समीप पथरीली भूमि पर बड़गड़ बड़गड़ घोड़ों की टापें सुनाई दीं । नगर निवासी भयभीत होकर इधर-उधर दौड़ने लगे । औरते घरों में जा छिपी । पुरूषों ने अन्दर से किंवाड़ बन्द कर लिए । बाजार की दुकानें बन्द हो गई । जिधर देखो उधर भगदड़ ही भगदड़ थी ।

“तुर्क आ गये, तुर्क आ गये “ की आवाज नगर के एक कोने से उठी और बात की बात में दूसरे कोने तक पहुँच गई । पानी लाती हुई पनिहारी, दुकान बन्द करता हुआ महाजन और दौड़ते हुए बच्चों के मुँह से केवल यही आवाज निकल रही थी- “तुर्क आ गये हैं, तुर्क आ गये हैं “ मोहनजी के पुजारी ने मन्दिर के पट बन्द कर लिए । हाथ में माला लेकर वह नारायण कवच का जाप करने लगा, तुर्क को भगाने के लिए भगवान से प्रार्थना करने लगा ।

इतने में नगर में एक ओर से पचास घुड़सवार घुसे । घोड़े पसीने से तर और सवार मतवाले थे । लोगों ने सोचा –
‘‘यह तो किसी की बरात है, अभी चली जाएगी ।’
घोड़े नगर का चक्कर काट कर मोहनजी के मन्दिर के सामने आकर रुक गए । दूल्हा ने घोड़े से उतर कर भगवान की मोहिनी मूर्ति को साष्टांग प्रणाम किया और पुजारी से पूछा –
“तुर्क कब आ रहे हैं ?’
“कल प्रातः आकर मन्दिर तोड़ने की सूचना है ।’
“अब मन्दिर नहीं टूटने पाएगा । नगर में सूचना कर दो कि छापोली का सुजाणसिंह शेखावत आ गया है; उसके जीते जी मन्दिर की ओर कोई ऑख उठा कर भी नहीं देख सकता । डरने-घबराने की कोई बात नहीं है ।’

पुजारी ने कृतज्ञतापूर्ण वाणी से आशीर्वाद दिया । बात की बात में नगर में यह बात फैल गई कि छापोली ठाकुर सुजाणसिंह जी मन्दिर की रक्षा करने आ गए हैं । लोगों की वहाँ भीड़ लग गई । सबने आकर देखा, एक बीस-बाईस वर्षीय दूल्हा और छोटी सी बरात वहाँ खड़ी थी । उनके चेहरों पर झलक रही तेजस्विता,दृढ़ता और वीरता को देख कर किसी को यह पूछने का साहस नहीं हुआ कि वे मुट्टी भर लोग मन्दिर की रक्षा किस प्रकार कर सकेंगे । लोग भयमुक्त हुए । भक्त लोग इसे भगवान मोहनजी का चमत्कार बता कर लोगों को समझाने लगे –

“इनके रूप में स्वयं भगवान मोहनजी ही तुकों से लड़ने के लिए आए है । छापोली ठाकुर तो यहाँ हैं भी नहीं- वे तो बहुत

दूर ब्याहने के लिए गए है,- जन्माष्टमी का तो विवाह ही था, इतने जल्दी थोड़े ही आ सकते हैं ।

यह बात भी नगर में हवा के साथ ही फैल गई । किसी ने यदि शंका की तो उत्तर मिल गया –
‘‘मोती बाबा कह रहे थ
मोती बाबा का नाम सुन कर सब लोग चुप हो जाते ।
मोती बाबा वास्तव में पहुँचे हुए महात्मा हैं । वे रोज ही भगवान का दर्शन करते हैं, उनके साथ खेलते, खाते-पीते लोहागिरी के जंगलों में रास किया करते हैं । मोती बाबा ने पहचान की है तो बिल्कुल सच है । फिर क्या था, भीड़ साक्षात् मोहनजी के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी । भजन  मण्डलियाँ आ गई । भजन-गायन प्रारम्भ हो गया । स्त्रियाँ भगवान का दर्शन कर अपने को कृतकृत्य समझने लगी । सुजाणसिंह और उनके साथियों ने इस भीड़ के आने के वास्तविक रहस्य को नहीं समझा । वे यही सोचते रहे कि सब लोग भगवान की मूर्ति के दर्शन करने ही आए हैं । रात भर जागरण होता रहा, भजन गाये जाते रहे और सुजाणसिंह भी घोड़ों पर जीन कसे ही रख कर उसी वेश में
रात भर श्रवण-कीर्तन में योग देते रहे ।

प्रात:काल होते-होते तुर्क की फौज ने आकर मोहनजी के मन्दिर को घेर लिया । सुजाणसिंह पहले से ही अपने साथियों सहित आकर मन्दिर के मुख्य द्वार के आगे घोड़े पर चढ़ कर खड़ा हो गया । सिपहसालार ने एक नवयुवक को दूल्हा वेश में देख कर अधिकारपूर्ण ढंग से पूछा –
“तुम कौन हो और क्यों यहाँ खड़े हो?’
“तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए हो ?’
“जानते नहीं, मैं बादशाही फौज का सिपहसालार हूँ।’
“तुम भी जानते नहीं, मैं सिपहसालारों का भी सिपहसालार हूँ ।’

‘‘ज्यादा गाल मत बजाओ और रास्ते से

हट जाओ नहीं तो अभी. ”

“तुम भी थूक मत उछालो और चुपचाप यहाँ से लौट जाओ नहीं तो अभी ….।”
“तुम्हें भी मालूम है, तुम किसके सामने खड़े हो?’

“शंहशाह आलमगीर ने मुझे बुतपरस्तों को सजा देने और इस मन्दिर की बुत को तोड़ने के लिए भेजा है। शहंशाह आलमगीर की हुक्म-उदूली का नतीजा क्या होगा, यह तुम्हें अभी मालूम नहीं है। तुम्हारी छोटी उम्र देख करे

मुझे रहम आता है, लिहाजा मैं तुम्हें एक बार फिर हुक्म देता हूँ कि यहाँ से हट जाओ ।।’

“मुझे शहंशाह के शहंशाह मोहनजी ने तुकों को सजा देने के लिए यहाँ भेजा है पर तुम्हारी बिखरी हुई बकरानुमा दाढ़ी और अजीब सूरत को देख कर मुझे दया आती है, इसलिए मैं एक बार तुम्हें फिर चेतावनी देता हूँ कि यहाँ से लौट जाओ।’
इस बार सिपहसालार ने कुछ नम्रता से पूछा – “तुम्हारा नाम क्या है ?’
“मेरा नाम सुजाणसिंह शेखावत है ।’

“मैं तुम्हारी बहादूरी से खुश हूँ।

मैं सिर्फ मन्दिर के चबूतरे का एक कोना तोड़ कर ही यहाँ से हट जाऊँगा । मन्दिर और बुत के हाथ भी न लगाऊँगा । तुम रास्ते से हट जाओ ।’’

“मन्दिर का कोना टूटने से पहले मेरा सिर टूटेगा और मेरा सिर टूटने से पहले कई तुकों के सिर टूटेंगे ।
सिपहसालार ने घोड़े को आगे बढ़ाते हुए नारा लगाया –
‘‘अल्ला हो। अकबर |”
“जय जय भवानी ।’ कह कर सुजाणसिंह अपने साथियों सहित तुकों पर टूट पड़ा |

लोगों ने देखा उसकी काली दाढ़ी का प्रत्येक बाल कुशांकुर की भाँति खड़ा हो गया। तुर्रा -कलंगी के सामने से शीघ्रतापूर्वक
घूम रही रक्तरंजित तलवार की छटा अत्यन्त ही मनोहारी दिखाई से रही थी|  बात की बात में उस अकेले ने बत्तीस कब्रे खोद दी थी ।

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रात्रि के चतुर्थ प्रहर में जब ऊँटों पर सामान लाद कर और रथ में बैलों को जोत कर बराती छापोली की ओर रवाना होने

लगे कि दासी ने आकर कहा –

“बाईसा ने कहलाया है कि बिना दुल्हा के दुल्हिन को घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए ।।’
“तो क्या करें ?’ एक वृद्ध सरदार ने उत्तर दिया ।
“वे कहती हैं, मैं भी अभी खण्डेला जाऊँगी ।
“खण्डेला जाकर क्या करेंगी ? वहाँ तो मारकाट मच रही होगी ।’
“ वे कहती हैं कि आपको मारकाट से डर लगता है क्या ?’
“मुझे तो डर नहीं लगता पर औरत को मैं आग के बीच कैसे ले जाऊँ ।’
“वे कहती हैं कि औरतें तो आग में खेलने से ही राजी होती हैं ।
मन ही मन – ‘‘दोनों ही कितने हठी हैं ।
प्रकट में – “मुझे ठाकुर साहब का हुक्म छापोली ले जाने का है ।
“बाईसा कहती हैं कि मैं आपसे खण्डेला ले जाने के लिए प्रार्थना करती हूँ ।’
‘‘अच्छा तो बाईं जैसी इनकी इच्छा ।।’ और रथ का मुँह खण्डेला की ओर कर दिया । बराती सब रथ के पीछे हो गए । रथ के आगे का पद हटा दिया गया ।

खण्डेला जब एक कोस रह गया तब वृक्षों की झुरमुट में से एक घोड़ी आती हुई दिखाई दी ।
“यह तो उनकी घोड़ी है ।“ दुल्हिन ने मन में कहा । इतने में पिण्डलियों के ऊपर हवा से फहराता हुआ केसरिया बाना भी दिखाई पड़ा ।
“ओह! वे तो स्वयं आ रहे हैं । क्या लड़ाई में जीत हो गई? पर दूसरे साथी कहाँ हैं ? कहीं भाग कर तो नहीं आ रहे हैं ?’
इतने में घोड़ी के दोनों ओर और पीछे दौड़ते हुए बालक और खेतों के किसान भी दिखाई दिए ।
‘‘यह हल्ला किसका है ? ये गंवार लोग इनके पीछे क्यों दौड़ते हैं ? भाग कर आने के कारण इनको कहीं चिढ़ा तो नहीं रहे हैं ?
दुल्हिन ने फिर रथ में बैठे ही नीचे झुक कर देखा, वृक्षों के झुरमुट में से दाहिने हाथ में रक्त-रंजित तलवार दिखाई दी ।
“जरूर जीत कर आ रहे हैं, इसीलिए खुशी में तलवार म्यान करना भी भूल गए । घोड़ी की धीमी चाल भी यही बतला रही है ।’’
इतने में रथ से लगभग एक सौ हाथ दूर एक छोटे से टीले पर घोड़ी चढ़ी । वृक्षावली यहाँ आते-आते समाप्त हो गई थी । दुल्हिन ने उन्हें ध्यान से देखा । क्षण भर में उसके मुख-मण्डल पर अद्भुत भावभंगी छा गई और वह सबके सामने रथ से कूद कर मार्ग के बीच में जा खड़ी हुई । अब न उसके मुख पर घूंघट था और न लज्जा और विस्मय का कोई भाव ।
“नाथ ! आप कितने भोले हो, कोई अपना सिर भी इस प्रकार रणभूमि में भूल कर आता है ।’’ कहते हुए उसने आगे बढ़ कर अपने मेंहदी लगे हाथ से कमध ले जाती हुई घोड़ी की लगाम पकड़ ली ।

और उसी स्थान पर खण्डेला से उत्तर में भग्नावस्था में छत्री खड़ी हुई है, जिसकी देवली पर सती और झुंझार की दो मूर्तियाँ अंकित हैं । वह उधर से आते-जाते पथिकों को आज भी अपनी मूक वाणी में यह कहानी सुनाती है और न मालूम भविष्य में भी कब तक सुनाती रहेगी ।

History & Literature

अजा उमाजी अंबाजी- शंकरदान देथा कृत / Duha-chhand Ambaji – Shankardan Detha Krut

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Navratri

जय माताजी

अजा उमाजी अंबाजी

दुहो
प्रसन प्रसन प्रसनाननी , हम पर रहो सदाय ,
प्रणतपाल परमेश्वरी , जय अंबा जगराय .

         || छंद त्रिभंगी ||
जय जगरायाजी , महामायाजी , शुसि कायाजी , छायाजी ,
होवो शिशु पाजी , तउ क्षमाजी , कर तुं हाजी , हा हा जी ,
प्रिति नित ताजी , नहि ईतराजी , वा माताजी , वा वा जी ,
रहो राजी राजी , हम पर माजी , अजा उमाजी , अंबाजी
जय अजा उमाजी , अंबाजी ……टेक ||1||

धवलांबर धरनी , उजवल बरनी , शंकर धरनी , शंकरनी ,
निज जन निर्जरनी , रक्षा करनी , अशरन शरनी , अध हरनी ,
वासी गिरवरनी , शिव सहचरनी , हिम भूधरनी , दुहिता जी ,
रहो राजी राजी ……….||2||

चकवे चरिताळी , बूढी बाळी , जोबनवाळी , जोराळी ,
विध विध वपु वाळी , अकळ कपाळी , मृडा दयाळी , मायाळी ,
आपाति अघ टाळी , कर रखवाळी , तूं अेको मम , त्राता जी ,
रहो राजी राजी ……….||3||

प्राकम पामेवा , विजय करेवा , लेवा जग जश लाभेवा ,
अजरामर अेवा , अभय अभेवा , देवन देवा ,महादेवा ,
चाहत तुव सेवा , हरी-हर जेवा , देवी वांच्छित फल , दाताजी ,
रहो राजी राजी ……….||4||

निगमागम जाणी , विविध वखाणी , पुनित पुराणी , परमाणी ,
सुर सेव्य सयाणी , मा महाराणी , रुप ब्रमाणी , रुद्राणी ,
विध्याप्रद वाणी , वीणा पाणी , वरदाणी , विख्याताजी ,
रहो राजी राजी ……….||5||

महिषादीक मारणी , असुर अहारणी , खळदळ दारणि , खग धारणि ,
सुरजकाज सुधारणि , अमर उधारणि , कष्ट निवारणी , शुभ कारणि ,
आश्रीत उगारणि , दुर्मिति हारणि , चारणि चंडि प्रख्याताजी ,
रहो राजी राजी ……….||6||

शंतर कैलासी , संग प्रवासी , सदा हुलासी , सूख राशी ,
गिरी गबर निवासी , विध्य विलासी , टाळण फांसी , चोरासी ,
रुषि सहस्त्र अठ्यासी , सिध्ध सन्यासी , गुण चारण सुर , गाताजी ,
रहो राजी राजी ……….||7||

सेवक कवि “शंकर” कहत जोरि कर , कृपा नजर कर करुणाळी ,
मोही ताप मुगतकर , षड रिपु क्षयकर , तन-मन दु:ख हर , त्रिशुळाळी ,
गिरीजा मा मम घर , रिध्धि सिध्धि वृधि कर , दे सुबुधी सुख , शाताजी ,
रहो राजी राजी ……….||8||

           || छंद : छप्पय ||

नमो अंबीका उमा , अद्रिजा अजा अपर्णा ,
नमो गौरी गिरिसुता , आशापुर्णा , अन्नपुर्णा ,
नमो भीड भंजणी , भवा भगवती भवानी ,
नमो दया सागरी , देवि दुर्गा महादानी ,
दु:ख दमनि सिधेश्वरी शंकरी , कृपा सिघ्र मम पर करो ,
शिव प्रिया हुं “शंकरदास” के ,दुरित रोग दारिद हरो ,

                 || दुहा ||

सुमती आयु आरोग्यदा , वांच्छिंत प्रदा विख्यात ,
धन यश स्त्री सुख धामदा , नमो अंबिका मात (1)

जिमि दिनकर के दरशते , सिघ्र तिमिर विनसाय ,
ईमि अंबाष्टक उचरते , पाप त्रिताप नसाय , (2)

रचयता :- कविश्री शंकरदान जेठीदान देथा ( लिंबडी राज कवि )

साभार:- मनुदान गढवा – महुवा.

History & Literature

माड़ी तारा बेसणा गढ़गिरनार…दुला भाया काग / Madi Tara Besna Gadh-Girnar – Dula Bhaya Kag

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माडी तारां बेसणा गढगिरनार , नवे खंड नजरुं पडे रे …..जी ;
माडी तारो मढडे नेसळ  वास , अुगमणे ओरडे रे…..जी ; (टेक)

माडी. तें तो कळजगमां चारण कुळ , आइ ऊुजळुं कर्यु रे …….जी ;
माडी. तें तो दीपाव्यो सोरठ देश , धजाळी खोळियुं धर्यु रे……जी ; ||1||

माडी . तारी मेर्युना मेवला मंडाणा , गोम वोम गाजी ऊुठ्या रे …….जी ;
माडी. जेणे हैडाना खेतर खेड्या , वावणीया वे’ ता कर्या रे ……जी ; ||2||

माडी. तारा वचनुंनां बी वाव्या , कोठारे रुडा कण भर्या रे….. जी ;
माडी. अेने दाणे दाणे दीनोनाथ ,
विशंभर वातुं करे रे……जी ; ||3||

माडी. अेतो बियारण खाईने बेठो , खेप अेनी खाली गई रे……जी ; ||4||
माडी तारी दया डुंहरडानां पाणी , कायरनी दे ” युं कंपे रे…..जी ;
माडी. जेणे शंकानी छतरी उुघाडी , काळज साव कोरां रिया रे …..जी ; ||5||

माडी. तारी मोजुंनो दरियो मोटो , लाख लाख लेरुं चडे रे …..जी ;
माडी. तारा शबदुंना सढ बांधी , निवेडी जेणे नावडी रे ……जी ; ||6||

माडी. अेमां ओगळी रात अंधारी , काळकाअे काजळ घोळ्या रे…..जी ;
माडी. अेणे नवलख आंखडी आंजी,तारलियाएे लोचन बीड्यां रे ….जी ; ||7||

माडी. एवी नाविकनी नजरुं मूंझाणी, सोनबाई . वारे चड्ये रे…..जी ;
माडी. तुं तो करुणाने उुजळे कांठे ,
झबूकी जोत्य जोगणी रे…..जी ; ||8||

माडी. तारा खमकारा गगने गाज्या , पाणीमां अंजवाळां पड्या रे……जी ;
माडी. तारां वचनुंना जे विशवासी , बूडे नई अेनी बेडली रे …..जी ; ||9||

माडी. एवो जादवे रणथंभ रोप्यो , प्रभासने पादरे रे …..जी ;
माडी. अेवा बेटाने बापे संघार्या , द्वारकामां दरियो रेल्यो रे……जी ; ||10||

माडी. अेवा दारुना दैत्यथी दुभाणो , देवकीनो दीकरो रे…जी ;
माडी. ई तो सोड्युं ताणीने सूतो , पाटणने पीपळे रे…..जी ; ||11||

माडी. अेणे देवनां दलडा दुभाव्यां , सोरठने शरम घणी रे …..जी ;
माडी. अेवा दारुने देशवटो देवा , अंबा तुं अवतरी रे …..जी ; ||12||

माडी. पाछा दारुडे देवळ बांध्यां , देवने दु:ख पड्या रे….जी ;
माडी. आज दावानळ डुंगरे लाग्यो , बाई. जो भडका बळे रे ….जी ; ||13||

माडी. अेणे लाखुंने भरखी लीधा , मेडियुंमां मसाण कीधां रे …..जी ; 
माडी. तारा नेहडामां दैत जो नाचे , जणेता कां जोई रई रे….जी ? ||14||

माडी. तारा तपनां तरशूळ धारी , सोनल था साबदी रे …..जी ;
माडी. हवे जाडा रथडा जोडो , धरती धमधमे रे …..जी . ||15||

माडी. तारे चोसठ जोगणी साथे , चोरासनी चारण्युं रे ….जी ;
माडी. आखा वर्णनी करजे वार्यु , असुरने अुथापजे रे…..जी ; ||16||

माडी. कैक मनना मानवी मेला , पाघडियुं तारे पगे धरे रे ….जी ;
माडी. तारी छबियुं घरमां चोडे ,कीधेल तारुं नव करे रे…..जी ; ||17||

माडी. अेतो दारुनी घंटीए दळाणा , रुदियामां राखुं उुडे रे……जी ;
माडी. अेणे विशवासने वटलाव्यो , आतमो उज्जड थियो रे.. .. जी ; ||18||

माडी. अेतो दुबजानी घाणीअे पिलाणा , अे तलमां तेल नथी रे…..जी ;
माडी. अेना छेल्ला जीवन – झबकारा , दीवामां दीवेल नथी रे….जा ; ||19||

माडी अेतो भाग्यनी वातुं भांखे , कामवानी नंद्या करे रे ….. जी ;
माडी अेनो ओलातो जीवडो जागे , आशिषुं  आपजे रे ….जी ; ||20||

माडी. अमे छोरु कछोरु सांभळ्या छे , पण मावडी न माया मेले रे…..जी ;
माडी. तें तो ठारी हत्यानी होळी , तोळाणी सत त्राजवे रे…..जी ; ||21||

माडी. तें तो दोरा धागाना वे ” म टाळ्या , करमनी केडी चींधी रे ….जी ;
माडी. तारी आण छे रामनी रेखा , आगळे रावण उुभो रे…..जी ; ||22||

माडी. तारा लीटाने लोपीने जाशे , तो जानकीनां जोखम थाशे रे ……जी ;
माडी. तारा ऊुजळा आवकार माथे , ओळघोळ काया करुं रे …..जी ; ||23||

माडी. तारे पगले फलुडांनी फांटुं , भमर थईने भम्या करुं रे ……जी ;
माडी. तारा कंठमा कायम बोले , वा’लाजीनी वांसळी रे …..जी ; ||24||

माडी. तारां नमणा नरंमळ रुप , क्रोड क्रोड वंदन करुं रे… .जी ;
माडी. तारा गरवा गूढा वेश , भजे रुडो भेळीअो रे……जी ; ||25||

माडी. तारी लटमां जमना झूले , जीभडीये गंगा झरे रे …..जी ;
माडी. तारां रिध्धिअे भरीआं राज , संकल्पमां सिध्धिअे भरी रे …..जी ; ||26||

माडी. तुं तो रमझमता रथडामां , नेहडामां नीसरी रे……जी ;
माडी. आज सोळे सज्या शणगार , नोरतांनी नोबत वागे रे….. जी ; ||27||

माडी. तारे माथडे सांधेल तेल , सेंथामा सिंदुर पुर्या रे….जी ;
माडी. अेवी काळी बे वादळी वताळे , श्रावणनी संध्या खीली रे…..जी ; ||28||

माडी. अेवी तांत ने टीलडी शोभे , अकोटडे आंटी वळे रे……जी ;
माडी. तारी नथमां नरमळ मोती , चांदलीअे बीज शोभे रे……जी ; ||29||

माडी. गळे हींडळे हूलर हार , सीड ने सांकळी रे ……जी ;
माडी. पगे कांबी ने रुमझोळ रुडा , वींछीआ वातुं करे रे …..जी ; ||30||

माडी. तारां नेपुरनी घूघरी नाचे , हंसनां बाळक बोले रे ……जी ;
माडी. तारो चोसरो खळके चूडो , आभ अेने ओछो पडे रे…..जी ; ||31||

माडी. में तो कोई दी कीधां होय , पुण्य तारे पगे धरु रे ….जी ;
माडी. हुं तो उुपाडी एकलो हालुं , मारुं पापनुं पोटलु रे…..जी ; ||32||

माडी. मने अेटलां वरदान देजो , भोगवीने भव तरुं रे……जी ;
माडी. मारी दे”युं ने आगमां ओरुं , कायाने कंचन करुं रे ……जी ; ||33||

माडी. कोई दुखीयाना दु:खने दोरे , नट जेम नाच्या करुं रे…..जी ;
माडी. मारुं जीवतर होडमां हारुं , त्राजवडे माटी तोळुं रे… जी ; ||34||

माडी. मारे माथडे करवत मेलुं , वर्णना प्राछत वोरुं रे…..जी ;
माडी. तुंने पारखशे कोई पुण्यवाळो , अंतर आंख उुघडी रे……जी ; ||35||

माडी. अमे भमीअे रात – दी भेळा , जेम आउुमां ईंतडी रे…..जी ;
माडी. जेना ओला भवना अपराध , के आ भव आवी मळ्या रे…..जी ; ||36||

माडी. अेनां डा”पणनां नीर साव डोळा , भोळा संगे भूतडा रे…..जी ;
माडी. तुं तो आभथी अेवडी ऊुंची , आज मने खबर पडे रे ……जी ; ||37||

माडी. में तो गीतनो हारलो गुंथ्यो , पोगाडुं केम कंठडे रे…..जी ;
माडी. में तो आभमां मीटडी मांडी , आंखडियुं ओछी पडी रे …..जी , ||38||

माडी. हुं तो थाकी ग्यो दूबळी दे’ ये ,बेसी ग्यो तारे पाये पडी रे…..जी ;
मांडी. हुं तो आंख्युं वींचीने अकळाणो ; लोबडियाळी तेडी लीधो रे……जी .||38||

मांडी. आ तो नथी चमेली मोगरानां , वगडानां फूलडां रे…..जी ;
मांडी. मने शारदाअे फूलडा दीधां , फूलडांमां फोरं रे… …जी ; ||40||.

मांडी. आ छे शकि्तना चालीसा , शीखे ने जे सांभळे रे….जी ;
मांडी. जे वांचे विचारे ने पाळे , को सघळा संकट टळे रे ……जी ; ||41||.

मांडी. मने “”” काग “”” के रुदिये रे’जो , ध्यान तारा धामनुं रे……जी ;
मांडी. हुं तो छेल्ली घडीअे नव चूकुं , समरण सीता – रामनुं रे …..जी , ||42||

(भुल होयतो सुधारीने वांचवु )

:- रचियता कविश्री दुला भाया काग ( भगतबापु )
टाईप मां भुल होयतो क्षमां
साभार:- मनुदान गढवी – महुवा

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