Monthly Archives: December 2015

जूनागढ़ रा’ चुडासमा राजवंश / Junagadh Raa’ Chudasama Sarvaiya Rayjada Rajvansh

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> जुनागढ का नाम सुनते ही लोगो के दिमाग मे “आरझी हकुमत द्वारा जुनागढ का भारतसंघ मे विलय, कुतो के शोखीन नवाब, भुट्टो की पाकिस्तान तरफी नीति ” जैसे विचार ही आयेंगे, क्योकी हमारे देश मे ईतिहास के नाम पर मुस्लिमो और अंग्रेजो की गुलामी के बारे मे ही पढाया जाता है, कभी भी हमारे गौरवशाली पूर्खो के बारे मे कही भी नही पढाया जाता || जब की हमारा ईतिहास इससे कई ज्यादा गौरवशाली, सतत संघर्षपूर्ण और वीरता से भरा हुआ है ||

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> जुनागढ का ईतिहास भी उतना ही रोमांच, रहस्यो और कथाओ से भरा पडा है || जुनागढ पहले से ही गुजरात के भुगोल और ईतिहास का केन्द्र रहा है, खास कर गुजरात के सोरठ प्रांत की राजधानी रहा है || गिरीनगर के नाम से प्रख्यात जुनागढ प्राचीनकाल से ही आनर्त प्रदेश का केन्द्र रहा है || उसी जुनागढ पर चंद्रवंश की एक शाखा ने राज किया था, जिसे सोरठ का सुवर्णकाल कहा गया है || वो राजवंश चुडासमा राजवंश | जिसकी अन्य शाखाए सरवैया और रायझादा है ||

> मौर्य सत्ता की निर्बलता के पश्चात मैत्रको ने वलभी को राजधानी बनाकर सोरठ और गुजरात पर राज किया || मैत्रको की सत्ता के अंत के बाद और 14 शताब्दी मे गोहिल, जाडेजा, जेठवा, झाला जैसे राजवंशो के सोरठ मे आने तक पुरे सोरठ पर चुडासमाओ का राज था ||

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> भगवान आदिनारायण से 119 वी पीढी मे गर्वगोड नामक यादव राजा हुए, ई.स.31 मे वे शोणितपुर मे राज करते थे || उनसे 22 वी पीढी मे राजा देवेन्द्र हुए, उनके 4 पुत्र हुए,
1) असपत, 2)नरपत, 3)गजपत और 4)भूपत

असपत शोणितपुर की गद्दी पर रहे, गजपत, नरपत और भूपत ने एस नये प्रदेश को जीतकर विक्रम संवत 708, बैशाख सुदी 3, शनिवार को रोहिणी नक्षत्र मे ‘गजनी’ शहर बसाया || नरपत ‘जाम’ की पदवी धारण कर वहा के राजा बने, जिनके वंशज आज के जाडेजा है || भूपत ने दक्षिण मे जाके सिंलिद्रपुर को जीतकर वहां भाटियानगर बसाया, बाद मे उनके वंशज जैसलमेर के स्थापक बने जो भाटी है ||

> गजपत के 15 पुत्र थे, उसके पुत्र शालवाहन, शालवाहन के यदुभाण, यदुभाण के जसकर्ण और जसकर्ण के पुत्र का नाम समा था || यही समा कुमार के पुत्र चुडाचंद्र हुए || वंथली (वामनस्थली) के राजा वालाराम चुडाचंद्र के नाना थे || वो अपुत्र थे ईसलिये वंथली की गद्दी पर चुडाचंद्र को बिठाया || यही से सोरठ पर चुडासमाओ का आगमन हुआ, वंथली के आसपास का प्रदेश जीतकर चुडाचंद्र ने उसे सोरठ नाम दिया, जंगल कटवाकर खेतीलायक जमीन बनवाई, ई.स. 875 मे वो वंथली की गद्दी पर आये || 32 वर्ष राज कर ई.स. 907 मे उनका देहांत हो गया ||

वंथली के पास धंधुसर की हानीवाव के शिलालेख मे लिखा है :

|| श्री चन्द्रचुड चुडाचंद्र चुडासमान मधुतदयत |
   जयति नृप दंस वंशातस संसत्प्रशासन वंश ||

– अर्थात् जिस प्रकार चंद्रचुड(शंकर) के मस्तक पर चंद्र बिराजमान है, उसी प्रकार सभी उच्च कुल से राजा ओ के उपर चंद्रवंशी चुडाचंद्र सुशोभित है ||

## चुडासमा/रायझादा/सरवैया वंश की वंशावली ##

1.     श्री आदी नारायण
3.     अत्रि
5.     सोम
11.   ययाति
12.    यदु
59.    सुरसेन
60.    वसुदेव
61.    श्री कृष्ण
62.    अनिरुद्ध
63.    वज्रनाभ
140.  देवेन्द्र
141.  गजपत
142.  शालिवाहन
143.  यदुभाण
144.  जसकर्ण
145.  समाकुमार

••• 146.  चुडचंद्र (ई.स. 875-907)

••• हमीर

>> चुडचंद्र का पुत्र ||

••• मुलराज (ई.स. 907-915)

>> चुडचंद्र के पश्चात उनका पोत्र मुलराज वंथली की गद्दी पर आया || मुलराज ने सिंध पर चडाई कर किसी समा कुल के राजा को हराया था ||

••• विश्ववराह (ई.स. 915-940)

>> विश्ववराह ने नलिसपुर राज्य जीतकर सौराष्ट्र का लगभग समस्त भुभाग जीत लिया था ||

••• रा’ ग्रहरिपु (ई.स. 940-982)

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>> * विश्ववराह का पुत्र
* नाम – ग्रहार / ग्रहरिपु / ग्रहारसिंह / गारियो
* “रा’ / राह” पदवी धारन करने वाला प्रथम राजा (महाराणा/राओल/जाम जैसी पदवी जिसे ये राजा अपने नाम के पहले लगाते थे)
* कच्छ के राजा जाम लाखा फुलानी का मित्र
* मुलराज सोलंकी, रा’ग्रहरिपु और जाम लाखा फुलानी समकालिन थे
* आटकोट के युद्ध (ई.स. 979) मे मुलराज सोलंकी vs रा’ और जाम थे.
* जाम लाखा की मृत्यु उसी युद्ध मे हुई थी
* रा’ ग्रहरिपु की हार हुई और जुनागढ को पाटन का सार्वभौमत्व स्विकार करना पडा.

••• रा’ कवांट (ई.स. 982-1003)

>> ग्रहरिपु का बडा पुत्र, तलाजा के उगा वाला उसके मामा थे, जो जुनागढ के सेनापति बने. मुलराज सोलंकी को आटकोट युद्ध मे मदद करने वाले आबु के राजा को उगा वाला ने पकडकर जुनागढ ले आये….रा’ कवांट ने उसे माफी देकर छोड दिया… रा’ और मामा उगा के बीच कुछ मनभेद हुए इससे दोनो मे युद्ध हुआ और उगा वाला वीरगति को प्राप्त हुए ||

••• रा’ दियास (ई.स. 1003-1010)

>>  अबतक पाटन और जुनागढ की दुश्मनी काफी गाढ हो चुकी थी | पाटन के दुर्लभसेन सोलंकी ने जुनागढ पर आक्रमन कीया | जुनागढ का उपरकोट तो आज भी अजेय है, इसलिये दुर्लभसेन ने रा’ दियास का मस्तक लानेवाले को ईनाम देने लालच दी | रा’ के दशोंदी चारन बीजल ने ये बीडा उठाया, रा’ ने अपना मस्तक काटकर दे दिया |

(ई.स. 1010-1025) – सोलंकी शासन

••• रा’ नवघण (ई.स. 1025-1044)

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>> * रा’ दियास के पुत्र नवघण को एक दासी ने बोडीदर गांव के देवायत आहिर के घर पहुंचा दिया, सोलंकीओ ने जब देवायत को रा’ के पुत्र को सोंपने को कहा तो देवायत ने अपने पुत्र को दे दिया, बाद मे अपने साथीदारो को लेकर जुनागढ पर रा’ नवघण को बिठाया|
* गझनी ने ई.स 1026 मे सोमनाथ लुंटा तब नवघण 16 साल का था, उसकी सेना के सेनापति नागर ब्राह्मन श्रीधर और महींधर थे, सोमनाथ को बचाते हुए महीधर की मृत्यु हो गई थी |
* देवायत आहिर की पुत्री और रा’ नवघण की मुंहबोली बहन जाहल जब अपने पति के साथ सिंध मे गई तब वहां के सुमरा हमीर की कुदृष्टी उस पर पडी, नवघण को यह समाचार मिलते ही उसने पुरे सोरठ से वीरो को ईकठ्ठा कर सिंध पर हमला कर सुमरा को हराया, उसे जीवतदान दिया | (संवत 1087)

••• रा’ खेंगार (ई.स. 1044-1067)

>> रा’ नवघण का पुत्र, वंथली मे खेंगारवाव का निर्माण किया |

••• रा’ नवघण 2 (ई.स. 1067-1098)

>> * पाटन पर आक्रमन कर जीता, समाधान कर वापिस लौटा | अंतिम समय मे अपनी चार प्रतिज्ञाओ को पुरा करने वाले पुत्र को ही राजा बनाने को कहा | सबसे छोटे पुत्र खेंगार ने सब प्रतिज्ञा पुरी करने का वचन दिया इसलिये उसे गद्दी मिली |
* नवघण के पुत्र :
• सत्रसालजी – (चुडासमा शाखा)
• भीमजी – (सरवैया शाखा)
• देवघणजी – (बारैया चुडासमा शाखा)
• सवघणजी – (लाठीया चुडासमा शाखा)
• खेंगार – (जुनागढ की गद्दी)

••• रा’ खेंगार 2 (ई.स. 1098-1114)

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>> * सिद्धराज जयसिंह सोलंकी का समकालिन और प्रबल शत्रु |
* उपरकोट मे नवघण कुवो और अडीकडी वाव का निर्माण कराया |
* सती राणकदेवी खेंगार की पत्नी थी |
* सिद्धराज जयसिंह ने जुनागढ पर आक्रमन कीया 12 वर्ष तक घेरा लगाया लेकिन उपरकोट को जीत ना पाया |
* सिद्धराज के भतीजे जो खेंगार के भांजे थ़े देशल और विशल वे खेंगार के पास ही रहते थे, सिद्धराज जयसिंह ने उनसे दगा करवाकर उपरकोट के दरवाजे खुलवाये |
* खेंगार की मृत्यु हो गई, सभी रानीयों ने जौहर किये, रानी रानकदेवी को सिद्धराज अपने साथ ले जाना चाहता था लेकिन वढवाण के पास रानकदेवी सति हुई, आज भी वहां उनका मंदीर है |

(ई.स. 1114-1125) – सोलंकी शासन

••• रा’ नवघण 3 (ई.स. 1125-1140)

>> अपने मामा जेठवा नागजी और मंत्री सोमराज की मदद से जुनागढ जीतकर पाटन को खंडणी भर राज किया |

••• रा’ कवांट 2 (ई.स. 1140-1152)

>> पाटन के कुमारपाल से युद्ध मे मृत्यु |

••• रा’ जयसिंह (ई.स. 1152-1180)

>> * संयुक्ता के स्वयंवर मे गये थे, जयचंद को पृथ्वीराज के साथ युद्ध मे सहायता की थी |

••• रा’ रायसिंहजी (ई.स. 1180-1184)

>> जयसिंह का पुत्र |

••• रा’ महीपाल (ई.स. 1184-1201)

>> ईनके समय घुमली के जेठवा के साथ युद्ध होते रहे |

••• रा’ जयमल्ल (ई.स. 1201-1230)

>> इनके समय भी जुनागढ और घुमली के बीच युद्ध होते रहे |

••• रा’ महीपाल 2 (ई.स. 1230-1253)

>>  * ई.स.1250 मे सेजकजी गोहिल मारवाड से सौराष्ट्र आये, रा’ महिपाल के दरबार मे गये |
* रा’महीपाल का पुत्र खेंगार शिकार पर गया, उसका शिकार गोहिलो की छावनी मे गया, इस बात पर गोहिलो ने खेंगार को केद कर उनके आदमियो को मार दिया, रा’ ने क्षमा करके सेजकजी को जागीरे दी, सेजकजी की पुत्री का विवाह रा’ महीपाल के पुत्र खेंगार से किया |

••• रा’ खेंगार 3 (ई.स. 1253-1260)

>> अपने पिता की हत्या करने वाले एभल पटगीर को पकड कर क्षमादान दीया जमीन दी |

••• रा’ मांडलिक (ई.स. 1260-1306)

>> रेवताकुंड के शिलालेख मे ईसे मुस्लिमो पर विजय करनेवाला राजा लिखा है |

••• रा’ नवघण 4 (ई.स. 1306-1308)

>> राणजी गोहिल (सेजकजी गोहिल के पुत्र) रा’ नवघण के मामा थे, झफरखान के राणपुर पर आक्रमण करने के समय रा’ नवघण मामा की सहाय करने गये थे, राणजी गोहिल और रा’ नवघण उस युद्ध वीरोचित्त मृत्यु को प्राप्त हुए | ( ये राणपुर का वही युद्ध है जिसमे राणजी गोहिल ने मुस्लिमो की सेना को हराकर भगा दिया था, लेकिन वापिस लौटते समय राणजी के ध्वज को सैनिक ने नीचे रख दिया और वहा महल के उपर से रानीयो ने ध्वज को नीचे गीरता देख राणजी की मृत्यु समजकर कुवे मे गीरकर जौहर किया ये देख राणजी वापिस अकेले मुस्लिम सेना पर टुट पडे और वीरगति को प्राप्त हुए )

••• रा’ महीपाल 3 (ई.स. 1308-1325)

>> सोमनाथ मंदिर की पुनःस्थापना की |

••• रा’ खेंगार 4 (ई.स. 1325-1351)

>> सौराष्ट्र मे से मुस्लिम थाणो को खतम किया, दुसरे रजवाडो पर अपना आधिपत्य स्थापित किया |

••• रा’ जयसिंह 2 (ई.स. 1351-1373)

>> पाटन से झफरखान ने जुनागढ मे छावनी डाली, रा’ को मित्रता के लिये छावनी मे बुलाकर दगे से मारा, रा’जयसिंह ने तंबु मे बैठे झफरखां के 12 सेनापतिओ को मार दिया, उन सेनापतिओ कि कबरे आज जुनागढ मे बाराशहिद की कबरो के नाम से जानी जाती है |

••• रा’ महीपाल 4 (ई.स. 1373)

>> झफरखाँ के सुबे को हराकर वापिस जुनागढ जीता, सुलतान से संधि करी |

••• रा’ मुक्तसिंहजी (भाई) (ई.स. 1373-1397)

>> रा’ महिपाल का छोटा भाई , दुसरा नाम – रा’ मोकलसिंह |

••• रा’ मांडलिक 2 (ई.स. 1397-1400)

>> अपुत्र मृत्यु |

••• रा’ मेंलंगदेव (भाई) (ई.स. 1400-1415)

>> * मांडलिक का छोटा भाई |
* वि.सं. १४६९ ज्येष्ठ सुदी सातम को वंथली के पास जुनागढ और गुजरात की सेना का सामना हुआ, राजपुतो ने मुस्लिमो को काट दिया, सुलतान की हार हुई |
* ईसके बाद अहमदशाह ने खुद आक्रमन करा, राजपुतो ने केसरिया (शाका) किया, राजपुतानीओ ने जौहर किये, रा’ के पुत्र जयसिंह ने नजराना देकर सुलतान से संधि की |

••• रा’ जयसिंहजी 3 (ई.स.1415-1440)

>> गोपनाथ मंदिर को तोडने अहमदशाह की सेना जब झांझमेर आयी तब झांझमेर वाझा (राठौर) ठाकुरो ने उसका सामना किया, रा’जयसिंह ने भी अपनी सेना सहायार्थे भेजी थी, ईस लडाई मे भी राजपुत मुस्लिमो पर भारी पडे, सुलतान खुद सेना सहित भाग खडा हुआ |

••• रा’ महीपाल 5 (भाई) (ई.स.1440-1451)

>> पुत्र मांडलिक को राज सौंपकर संन्यास लेकर गिरनार मे साधना करने चले गये |

••• रा’ मांडलिक 3 (ई.स. 1451-1472)

>> * जुनागढ का अंतिम हिन्दु शासक |
* सोमनाथ का जिर्णोद्धार कराया |
* ई.स.1472 मे गुजरात के सुल्तान महमुद शाह (बेगडा) ने जुनागढ पर तीसरी बार आक्रमण किया, जुनागढ की सेना हारी, राजपुतो ने शाका और राजपुतानीयो ने जौहर किये,  दरबारीओ के कहने पर रा’मांडलिक युद्ध से नीकलकर कुछ साथियो के साथ ईडर जाने को निकले ताकी कुछ सहाय प्राप्त कर सुल्तान से वापिस लड शके, सुल्तान को यह बात पता चली, उसने कुछ सेना मांडलिक के पीछे भेजी और सांतली नदी के मेदान मे मांडलिक की मुस्लिमो से लडते हुए मृत्यु हुई |

√√√√√ रा’मांडलिक की मृत्यु के पश्चात जुनागढ हंमेशा के लिये मुस्लिमो के हाथ मे गया, मांडलिक के पुत्र भुपतसिंह के व्यक्तित्व, बहादुरी व रीतभात से प्रभावित हो महमुद ने उनको बगसरा (घेड) की चौरासी गांवो की जागीर दी, जो आज पर्यंत उनके वंशजो के पास है |

* रा’मांडलिक के पुत्र भुपतसिंह और उनके वंशज ‘रायजादा’ कहलाये, रायजादा मतलब राह/रा’ का पुत्र |

••• रायजादा भुपतसिंह (ई.स. 1471-1505)

>> रायजादा भुपतसिंह के वंशज आज सौराष्ट्र प्रदेश मे रायजादा राजपुत कहलाते है,

* चुडासमा, सरवैया और रायजादा तीनो एक ही वंश की तीन अलग अलग शाख है | तीनो शाख के राजपुत खुद को भाई मानते है, अलग अलग समय मे जुदा पडने पर भी आज एक साथ रहते है |

> मध्यकालीन समय की दृष्टी से ईतिहास को देखे तो यह समय ‘राजपुत शासनकाल’ का सुवर्णयुग रहा | समग्र हिन्दुस्तान मे राजकर्ता ख्यातनाम राजपुत राजा ही थे | ईन राजपुत राजाओ मे सौराष्ट्र के प्रसिद्ध और समृद्ध राजकुल मतलब चुडासमा राजकुल, जिसने वंथली, जुनागढ पर करीब 600 साल राज किया, ईसिलिये मध्यकालिन गुजरात के ईतिहास मे चुडासमा राजपुतो का अमुल्य योगदान रहा है ||

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° चुडासमा सरवैया रायजादा राजपूतो के गांव °

( रायजादा के गांव )

1. सोंदरडा 2. चांदीगढ 3. मोटी धंसारी
4. पीपली 5. पसवारिया 6. कुकसवाडा
7. रुपावटी 8. मजेवडी 9. चूडी- तणसा के पास
10. भुखी – धोराजी के पास 11. कोयलाणा (लाठीया)

( सरवैया के गांव )

सरवैया (केशवाला गांव भायात)

1. केशवाला 2. छत्रासा 3. देवचडी
4. साजडीयाली 5. साणथली 6. वेंकरी
7. सांढवाया 8. चितल 9. वावडी

सरवैया ( वाळाक के गांव)

1. हाथसणी 2. देदरडा 3. देपला
4. कंजरडा 5. राणपरडा 6. राणीगाम
7. कात्रोडी 8. झडकला 9. पा
10. जेसर 11. चिरोडा 12. सनाला
13. राजपरा 14. अयावेज 15. चोक
16. रोहीशाळा 17. सातपडा 18. कामरोल
19. सांगाणा 20. छापरी 21. रोजिया
22. दाठा 23. वालर 24. धाणा
25. वाटलिया 26. सांखडासर 27. पसवी
28. मलकिया 29. शेढावदर

सरवैया के और गांव जो अलग अलग जगह पर हे

1. नाना मांडवा 2. लोण कोटडा 3. रामोद
4. भोपलका 6. खांभा ( शिहोर के पास ) 7. विंगाबेर. 8. खेडोई

( चुडासमा के गांव )

🔺जो चुडासमा को उपलेटा-पाटणवाव विस्तार की ओसम की चोराशी राज मे मीली वो लाठीया और बारिया चुडासमा के नाम से जाने गए

बारिया चुडासमा के गांव

1. बारिया 2. नवापरा 3. खाखीजालिया
4. गढाळा 5. केराळा 6. सवेंतरा
7. नानी वावडी 8. मोटी वावडी 9. झांझभेर
10. भायावदर 11. कोलकी

लाठिया चुडासमा के गांव

1. लाठ 2. भीमोरा 3. लिलाखा
4. मजीठी 5. तलगणा 6. कुंढेच
7. निलाखा

चुडासमा के गांव ( भाल विस्तार, धंधुका )

1. तगडी 2. परबडी 3. जसका
4. अणियारी 5. वागड 6. पीपळी
7. आंबली 8. भडियाद 9. धोलेरा
10. चेर 11. हेबतपुर 12. वाढेळा
13. बावलियारी 14. खरड 15. कोठडीया
16. गांफ 17. रोजका 18. उचडी
19. सांगासर 20. आकरू 21. कमियाळा
22. सांढिडा 23. बाहडी (बाड़ी) 24. गोरासु
25. पांची 26. देवगणा 27. सालासर
28. कादिपुर 29. जींजर 30. आंतरिया*
31. पोलारपुर 33. शाहपुर
33. खमीदाणा, जुनावडा मे अब कोइ परिवार नही रहेता

चुडासमा के अन्य गांव

1. लाठीया खखावी 2. कलाणा 3. चित्रावड
4. चरेल (मेवासिया चुडासमा) 5. बरडिया

• संदर्भ •
( गुजराती ग्रंथ)

*  गुजराती मध्यकालीन राजपुत साहित्यनो ईतिहास – ले. दुर्गाशंकर शास्त्री
* सौराष्ट्रनो ईतिहास – ले. शंभुप्रसाद ह. देसाई
* यदुवंश प्रकाश – ले. मावदानजी रत्नु
* दर्शन अने ईतिहास – ले. डो.राजेन्द्रसिंह रायजादा
* चुडासमा राजवंशनी प्रशस्ति कविता – ले. डो.विक्रमसिंह रायजादा
* प्रभास अने सोमनाथ – ले. शंभुप्रसाद देसाई
* सोरठ दर्शन – सं. नवीनचंद्र शास्त्री
* सोमनाथ – ले. रत्नमणीराव भीमराव
* तारीख ए सोरठ – दीवान रणछोडजी
* चक्रवर्ती गुर्जरो – ले. कनैयालाल मुन्शी

(हिन्दी ग्रंथ)

* कहवाट विलास – सं. भाग्यसिंह शेखावत
* रघुवर जस प्रकाश – सीताराम कालस
* मांडलिक काव्य – गंगाधर शास्त्री

(सामयिको की सुची)

* पथिक (खास सौराष्ट्र अंक) (May/June 1971)
* उर्मी नवरचना (1971, 1988, 1989)
* राजपुत समाज दर्पण (August 1990)
* क्षत्रियबंधु (June 1992)
* चित्रलेखा (30/03/1992)

(हस्तप्रतो की सुची)

* सौराष्ट्र युनि., गुजराती भाषा – साहित्य भवन, राजकोट के हस्तप्रतभंडार से…
* बोटाद कवि विजयकरण महेडु के हस्तप्रतसंग्रह से…
* स्व श्री बाणीदानजी बारहठ (धुना) के हस्तप्रतभंडार से…

_/\_ समाप्त _/\_

History & Literature

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धर्मादा के गाँव की मिट्टी भी नही ले वही असल राजपूती / Kachchh Maharao Shri Khengarji Bawa Or Jangal Khatadhikari Vaghubha Gohil

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“धर्मादा के गाँव की मिट्टी भी नही ले वही असल राजपूती”
          सौंदर्य रस के पंथ पर चड़ी नवयौवना के आँखों की रंग जैसा संध्या का पालव कच्छ धरा पर झूल रहा है। मानवदशा से देवरूप को प्राप्त करने पद्मासन में बेठे योगी समान भुजिया पर्वत डूब रहे सूर्य के अंतिम किरणों से अभिभूत हो रहा था,

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          पर्वतीय प्रदेश की रम्य भूमि पर संध्या जेसे छुपाछुपी खेल रही हो, ऐसे समय कच्छ के महाराव जाडेजा अपनी कुलदेवी माँ आशापुरा के दर्शन कर भुज तरफ परत आ रहे थे, धूल के डम्मर उड़ाती मोटर कार चलती जा रही थी, मोटर चालक के बाजू में खड़खाता (वनखाता)के अधिकारी वाघजी भा गोहिल बेठे थे। महाराव के ख़ास और मित्र वाघजी भा  वाघुभा के नाम से जाने जाते थे,
          वाघुभा के पिताजी भी खड़खाता के वडा थे, वाघुभा पांच साल के थे तब वे परलोक सिधार गए थे, उस समय कच्छ की गादी पर विराजमान महाराव खेंगारजी बावा ने वाघुभा के पिताजी से घुड़सवारी और शिकार की तालीम ली थी जिसे याद रख कर पांच साल के वाघुभा के जीवन विकास का खुद ध्यान रखने लगे। वाघुभा की जरूरियात अनुसार उन्हें अंग्रेजी का ज्ञान भी दिया, घुड़सवारी और निशांनबाजी तो वाघुभा को वारसागत मिली थी, सोलह साल की उम्र में वाघजीभा सामंतसिंहजी गोहिल को महाराव खेंगारजी ने कच्छ जंगलखाता के वडा के पद पर नियुक्त किया, वफादारी जिनकी नस नस में समाई थी ऐसे वाघुभा ने पिताजी का खाता संभाल ने कमर कसी,
          परिणाम स्वरुप अश्वविद्या, कुस्तीशाष्त्र को वाघुभा घोल कर पि गए थे। वाघुभा की एक नजर अश्व के लक्षणों को जान लेती थी, जंगल के पेड़पौधे और जीवजन्तु के जानकार थे, आफ्रिका के जंगलो में शिकार समय वाघुभा साथ रहे थे।
          मोटर कार धूल भरी रस्ते पर भुज का रास्ता काट रही थी, पीछे बेठे महाराव अपने कुल परंपरा राज्य की भूमि पर नजर गड़ाये जा रहे थे, नखत्राणा पीछे छोड़ मोटर आगे बढ़ रही थी, हरेभरे खेत में लहराती फसलो पर महाराव की नजरे थी,
          वेरान वन में लहराती फसल देख महाराव का मन ललचाया, और कहा : वाघुभा ! इस गाँव की उपज बढ़िया है, भुज पहुँच कर इस गाँव का कर बढ़ाने का हुकुम याद दिलाना, वाघुभा ने कच्छ के सुवांग धणी के शब्दों को सूना पर प्रत्युत्तर न दिया,
          इस लिए महाराव ने फसलो पर नजर बनाये रखे ही कहा: वाघुभा, कुछ उत्तर तो दीजिये,
          वाघुभा ने पीछे मुड़कर कहा: जियेरा..! मेने आपके मनसूबे को सूना,
          और तब तक मोटर उस गाँव की सिमा से आगे निकल चुकी थी, इसलिए वाघुभा ने महाराव से अरज की: बावा..! मोटर खड़ी रखवाईये जरा.
          कच्छ के कीर्तिवंत राजवी ने मोटर चालक को मोटर रोकने कहा, पीछे धूल उड़ाती हुई मोटर खड़ी रही, वाघुभा कार से निचे उतरे, पर अपने पालवपछेडी से कार पर लगी मिट्टी पोछने लगे, उन्हें देख कर महाराव ने कारण पूछा की यह क्या कर रहे हो?
          तब शब्दोंसे जेसे राजपूती छलक रही हो ऐसा प्रत्युत्तर दिया : बावा..! अभी हम जिस गाँव से निकले वह गाँव राज ने धर्मादा में दिया हुआ है, उस गाँव की धूल-मिट्टी भी हम कैसे ले शकते है?
          वाघुभा की बात का मर्म जानकर कच्छ के महाराव खेंगारजी बावा ने आभार व्यक्त कर कहा, वाह वाघुभा अभी मुझसे बहोत बड़ा अनर्थ हो जाता, और वह कलंक कच्छ के कपाल से कभी मिटता नही, वाघुभा ने धर्मादा दिए गाँव की मोटर पर लगी तमाम मिट्टी झपट कर साफ़ कर गाडी में बैठ गए।

नोंध -> श्री वाघुभा के परिवार का कोई एक सभ्य पिछले 125 सालो से जंगल खाता में अपनी फर्ज बजाते आये है, कच्छ महाराव के मित्र और जंगल का जतन करने वाले श्री वाघुभा का स्वर्गवास 17/11/’74 में हुआ।
सौजन्य : दौलतभाई भट्ट

History & Literature

जाडेजा ठाकोर हरिसिंहजी : जिन्होंने अकाल से अपनी प्रजा बचाने पूरा खजाना खाली कर दिया/ Jadeja Thakor Harisinhji

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गुजरात के ध्रोल नगर की यह बात है जब छप्पनिया अकाल में राजा ने अपनी प्रजा के लिए पूरा खजाना खाली कर दिया…

          छप्पनिया अकाल ने इतनी दहशत फेलाई थी की ध्रोल नगर में जेसे हाथ में यमपाश लिए मानव पशु पक्षी को भक्ष करने राक्षस की तरह घूम रहा हो, प्रजा अन्न-जल के लिए आश लगाए बेठी है, सब जगह मानव मृतदेह से भरी ध्रोल की धरती कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद की जमीन जेसी लग रही थी…
          हब्सी के मुह जेसी काली रात छाने लगी थी, सन्नाटे की चादर बिछ रही थी, भूखेप्यासे भी निंद्रा की शरण में और कुछ चिरनिंद्रा में सो रहे थे…
         बस जाग रहे थे तो एक ही व्यक्ति वे थे ध्रोल के सुवांग धणी जाडेजा ठाकोर हरिसिंहजी, जगह जगह जल रहे अग्निदाह की अग्नि से उनका आत्मा भी जल रहा था, प्रजा की पीड़ा से वे दुखी हो रहे थे, काळ के कराल पंजे की झपट से प्रजा को बचाने वे आतुर हुए, मनोमंथन बढ़ने लगा, महल के आलिशान पलंग पर सो रहे थे पर आँखों में नींद नही आ रही, प्रजा हे तो राजा है, प्रजा के हित में आज उपयोग किया धन कल वापस आये ना आये पर प्रजा को आज इस आफत से बचाना राजा का धर्म है, फिर चाहे अपना शरीर भी क्यों ना बेचना पड़े… तभी में सगी अर्थ में राजा कहलाऊँ…”

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Jadeja Thakor Harisinhji Of Dhrol

          मनोमन ऐसा संकल्प कर दरियादिल राजा घड़ीभर नींद कर लेते है, रक्तभरा लाल सूर्य अँधेरे के गढ़ को तोड़ता हुआ ध्रोल की धरती पर सूर्योदय हुआ, रणयोद्धा की रक्तरंजित तलवार से तेजकिरणो ने आसमान भर दिया,ठाकोर हरिसिंहजी ने दरबार बुलाया, दीवान, महेता पर सभासदों के सामने अपना मनसूबा बताया की “प्रजा की पीड़ा दूर करना अपना धर्म है” राजा की आवाज में अंतर का दर्द भरा हुआ था, प्रजा प्रेम उभर रहा रहा था,
लेकिन बापू, यह तो कुदरती आफत है…! राजा के प्रजाप्रेम को पीछे धकेल देने वाला उत्तर एक सभासद ने दिया,
ऐसा उत्तर देने वाले पर क्रोधित दृस्टि कर जिस के ह्रदय में हरी ने स्थान ले लिया ऐसे राजा ने कहा : मुझे मेरी प्रजा को बचाना हे, अबोल पशुओ को मृत्यु के मुख से बचाना है, यह मेरा अफर निर्णय हे।
लेकिन इतनी बड़ी आफत से हम नही निपट सकते, किसी सभासद ने फिर कहा, राज का तीसरा हिस्सा भायातो के पास है,
राजा हरिसिंहजी अपनी बात पर अडग रहे, में प्रजा के लिए अपने आप को बेचने भी तैयार हु, भायात भी मेरी प्रजा ही है, में निस्पक्ष सारी प्रजा के हिट का कार्य करना चाहता हु, राज के पास जो धन है वः प्रजा ने ही कमा कर दिया है, वही धन प्रजा को बचाने की लिए खर्च करना है, आप लोगो को पूरी निष्ठां से काम करना होगा, किसी ने भी दगा किया उसे कड़ी सजा होगी, यह याद रखना,
उसी घड़ी से राजा ने दानापानी की सुविधा प्रजा के लिए खुल्ली कर दी,
          राहतकाम शुरू करने का फरमान दे दिया गया, खारवा और वांकिया गाँव की सीमा में पाळ का काम शुरू किया गया, दूसरी तरफ सरपदड से वणपरि गाँव तक पक्की सड़क निर्माण का काम शुरू हुआ, ध्रोल में दो कुए का खोदकाम आरंभ हुआ, गरेडिया में तालाब बनाया गया, राजवी रैयत के लिए हरिसिंहजी ने दिल के दरवाजे खुले छोड़ दिए, ध्रोल के पादर मे खुदवाये दोनो कुए मे पानी उमट पडा, उस पर नौ कोंस जोंते गये, दिलावर दिल के राजा पर वरुणदेव भी प्रसन्न हुए, लोगो को रोजी-रोटी मिली, पीडीत प्रजा का पोकार शमने लगा, लोगो की जान मे जान आयी, ठाकोर हरिसिंहजी की जयजयकार होने लगी, ध्रोल ने अकाल को परास्त किया ये बात चारोओर फैल गयी, ये बात सुन अंग्रेज अमलदार मि.मोरिसन, मि.वुड और चमनराय हरराय ध्रोल पहुंचे और ठाकोर हरिसिंहजी को प्रजा के लिये पैसो को पानी की तरह बहाने के लिये धन्यवाद दिये |

            अकाल जब खत्म हुआ तब राज का खजाना खाली था, पैसे नही थे लेकिन प्रजा के सीने मे जान थी यही ठाकोर हरिसिंहजी के मन बडी बात थी |

>> नोंध :-

* ठाकोर हरिसिंहजी उनके पिता जयसिंहजी की मृत्यु के बाद ता. 4-11-1886 के रोज गद्दी पर बैठे |
* वे संस्कृत के जानकार थे |
* उन्होने ध्रोल मे धर्मशाला, दरबारगढ मे सुशोभित महल, सरपदड मे एक कचहरीहोल बनवाये थे |
* उनका विवाह पालिताणा, लाठी और दरेड की राजकुमारीओ के साथ हुआ था |
* भोपाल की बेगम को चांद दिलाने के लिये मुंबई मे आयोजित दरबार मे 1876 मे प्रिन्स ओफ वेल्स से वे मिले थे ||
सौजन्य : दौलत भाई भट्ट

History & Literature

Maharana Shri Vijaysinhji Of Rajpipla State Narmada/महाराणा श्री विजयसिंहजी छ्त्रसिंहजी गोहिल (1890-1951) राजपीपला स्टेट (नर्मदा)

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Maharana Shri Vijaysinhji Of Rajpipla

महाराणा श्री
विजयसिंहजी छ्त्रसिंहजी गोहिल (1890-1951)
राजपीपला स्टेट (नर्मदा)
राजपीपला राज्य के महाराणा लेफ्टिनेंट कर्नल श्री विजयसिंहजी छत्रसिंहजी गोहिल का जन्म ई.स. 1890 में नांदोद (राजपीपला) में हुआ था और उन्होंने राजकुमार कोलेज, राजकोट और इम्पीरियल कैडेट कोर, देहरादून से शिक्षा प्राप्त की थी ।
महाराणा श्री विजयसिंहजी घोडेस्वारी में गहरी दिलचस्पी रखते थे । उन्होंने अपने अश्वो के साथ 1919 में भारतीय डर्बी (Indian Derby) (तिपस्ट/Tipster), 1926 में आयरिश डर्बी (Irish Derby) (एम्बारगो/Embargo), 1927 में ग्रान्ड प्रिक्स (Grand Prix) (एम्बारगो/Embargo), और 1934 में एप्सम डर्बी (Epsom Derby) (विंडसर लेड/Windsor Lad) जैसी घोडेस्वारी प्रतियोगीताए जीती है । एप्सम डर्बी को दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित घोडदोड़ प्रतियोगीता माना जाता है जिसकी शरुआत 1780 में हुई थी । यह प्रतियोगीता का आयोजन हर साल जून मास के पहले सप्ताहांट में एप्सम डाउंस रेसकोर्स (Epsom Downs Race Course), एप्सम इग्लेण्ड में किया जाता है ।
एप्सम डर्बी जितना एक जबरदस्त उपलब्धि है । एप्सम डर्बी जितना और विश्व कप (World Cup) या विंबलडन (Wimbledon) जितना एक सामान बात है ।
1780 आज तक एप्सम डर्बी जितने वालो में महाराणा लेफ्टिनेंट कर्नल श्री विजयसिंहजी छत्रसिंहजी गोहिल ही एकमात्र भारतीय है जिन के अश्व विंडसर लेड ने 6 जून 1934 को एप्सम डर्बी दोड़ जीता था । आज तक अन्य कोई भारतीय व्यक्ति को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है ।

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महाराणा श्री विजयसिंहजी ऑफ़ राजपिपला

वे अच्छे घुड़सवार थे । उनका घोडा प्रतिबंघे 1926 में आईरिश डर्बी और बेल्जियम 1927 में ग्रैंड प्रिक्स और अन्य स्पर्धा ऐ जीती, विंडसर LA वो बोम्बे स्थित कई पुरस्कार वर्थ तेवो ऐ जीता., Melesigenes जेसे, 1934 और सिंह घोड़े में एपसन डर्बी जीती. पुणे और अन्य भारतीय मैदानों , और 1932-33 में ते भारत में रेसिंग घटनाओ में सबसे ऊपर था. राजा और रानी ब्रिटेन की और अंग्रेजी मैदान पर उनकी जीत के सम्मान लेकिन। इंग्लैंड, वह इस मौसम का ज्यादा खर्च, और कहा कि फुटबॉल, हॉकी और क्रिकेट की तरह आउटडोर खेल सर्दियों में भारत लौटे प्रोत्साहित है। खेल राजपिपला राज्य के छात्रों के लिए अनिवार्य कर दिया गया था। वह (शुरुआत के रूप में यह कभी नहीं देखा) के रूप में राज्य के 1948 ईसवी में विलय कर दिया गया था, एक पूरी तरह कार्यात्मक और परिचालन एरोड्रम से लैस राजपिपला के लिए पोलो ग्राउंड और जिमखाना क्लब महाराजा सपनों 150 एकड़ था। हैरानी की बात है, उसकी लंबे समय से यूरोप में sojourns और ब्रिटिश ताज के प्रति वफादारी के लिए जाना जाता था, गांधीवादी सिद्धांतों और मानदंडों के खिलाफ भावनगर जीत के महाराजा और 1940 में राष्ट्रवादी आंदोलन के अपने साथी गोहिल राजपूत शासकों की तरह……..
जय माताजी
जय एकलिंगजी
जय हरसिद्धि माँ
सह आभार ; भयपालसिंहजी गोहिल, गोहिलराज ग्रुप में से…

अंजार – अजेपाल दादा, Anjar Ajepar Dada

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Anjar Shaher

કચ્છની ધીંગી ધરા પર વસવાટ કરતી ખમીરવંતી પ્રજાના લોકસાહિત્યમાંથી સાંપડતી ટચુકડી કહેવત અંજાર નગર અને ત્યાંના લોકોની ઓળખ આમ આપે છે ઃ
‘અંજાર શહેર અને અજેપાળ ધણી
વસતી થોડી ને અદેખાઈ ઘણી’
આ કહેવત સાંભળ્યા પછી એના મૂળ સુધી પહોંચવાની મારી મથામણ શરૃ થઇ. એમાંથી અનેક કિંવદંતીઓ, કથાઓ અને તથ્યો ઉજાગર થયાં. અંજાર શહેરનું તોરણ બાંધનાર અજ-બકરાપાલક અજેપાળ ચૌહાણ અનેક સદીઓ પૂર્વે થઇ ગયા. એ કાળે કદાચ અંજારમાં વસતી ઓછી હશે અને અદેખાઈ વધુ હશે. આજે પરિસ્થિતિ એથી ઊલટી છે. અંજારની વસતી ઘણી વધી ગઈ છે. જેસલપીર અને તોરલની સમાધિને કારણે અંજાર યાત્રાનું ધામ બની ગયું છે. મારે આજે વાત કરવી છે અંજાર નગરની થાંભલી રોપી અંજાર વસાવનાર કચ્છી લોકજીવનમાં પૂજાતા લોકદેવ ને અજેપાળની.
અજેપાળ મૂળે અજમેરના રાજાના ભાઈ હતા, એમ બોમ્બે ગેઝેટિયરની નોંધ બોલે છે. એમના અંગેની રસપ્રદ દંતકથા એવી છે કે સંવતના આઠમા સૈકામાં રાજસ્થાનના અજમેર શહેર નજીક આવેલા પુષ્કર તીર્થની પાસેના ગામના એક ગરીબ ખોરડામાં રાજપૂત જ્ઞાાતિનો કિશોર રહેતો હતો. પૂર્વજન્મના ધાર્મિક સંસ્કારો લઇને જન્મેલો આ કિશોર તીર્થમાં આવતા જતા સાધુ સંતો મહાત્માઓની સેવા કરતો. એવામાં પુષ્કરમાં એક દૂધાધારી મહાત્મા (દૂધ ઉપર જ જીવનારા) આવી ચડયા. ત્યાં પીવા પૂરતું દૂધ ન મળવાથી તેઓ નિરાશ થઇ તીર્થ છોડીને ચાલી નીકળ્યા. આ જાણીને કિશોરની આંતરડી કકળી ઉઠી. તે તીર્થના કારભારી પાસે ગયો ને બોલ્યો ઃ આપણા તીર્થમાં દૂધ ન મળવાથી મહાત્માઓ પાછા જાય એ સારું ન કહેવાય. હું ગરીબ છું. મારી પાસે એટલા પૈસા નથી નઇંતર હું સાધુ મહાત્માઓને દૂધ પૂરું પાડું.
આ ધાર્મિકવૃત્તિના સેવાભાવી યુવાનની વાત સાંભળીને પ્રભાવિત થયેલા કારભારીએ, બાળકના હાથમાં થોડા રૃપિયા મૂકીને કહ્યું ઃ ‘આ સેવા હવેથી તું કર્ય.’ રાજપૂત બાળકે લાંબો વિચાર કરીને એ પૈસામાંથી થોડીક બકરીઓ ખરીદ કરી અને એનું દૂધ સાધુ સંતોને પહોંચાડવા માંડયો. પછી તો બકરીઓનો વસ્તારવેલો ખૂબ જ વધ્યો. આમ બે ત્રણ વર્ષનું વહાણું વાઈ ગયું. એવામાં પેલા દૂધાધારી સંત ફરતા ફરતા પુષ્કરમાં આવી પહોંચ્યા. આ બાળકે એમની સેવા શરૃ કરી રોજનું દૂધ પહોંચાડવા લાગ્યો. આથી પ્રભાવિત થયેલા સંત મહાત્માએ તેને કહ્યું ઃ ‘ભવિષ્ય મેં તું પ્રભાવશાલી રાજા બનેગા યે મેરા વચન હૈ.’ એ પછી તીર્થમાં આવનારા સાધુ સંતોએ આ યુવાનનું ‘અજ’ એટલે બકરાં અને ‘પાળ’ એટલે પાળનાર એવું અજેપાળ નામ ઠેરાવી દીધું.
એ પછી સિધ્ધપુરુષના આશીર્વાદને સાચા પાડવા માટે અજેપાળે પુરુષાર્થ કરવાનો પ્રારંભ કર્યો. નજીકના ગામમાં રહેતા તેના મામા પાસે જઇને શસ્ત્રવિદ્યા શીખવા માંડી. થોડાં વરસોમાં એમાં પારંગત બનતાં નાનકડું લશ્કર તૈયાર કર્યું અને પુષ્કરની આસપાસના પંથકમાં પોતાની આણ વરતાવવાનો પ્રારંભ કર્યો. ત્યાર પછી એણે સર્પગિરિ નામના પહાડની તળેટીમાં પોતાના નામ ઉપરથી ‘અજપુર’ નગર વસાવીને મધ્ય રાજસ્થાનનો મોટાભાગનો પ્રદેશ પોતાની હકૂમત નીચે આણ્યો. એ અજપુર એ આજનું અજમેર કહેવાય છે.
રાજા બન્યા પછી યે અજેપાળ પુષ્કર તીર્થના મેળામાં નિયમિત રીતે જતો અને સાધુ સંતોની સેવા કરતો. એવામાં પાછા પેલા દૂધાધારી સંતનો એને પાછો ભેટો થયો. એણે સંતના ચરણે પડીને કહ્યું ‘ગુરુજી ! હવે મને ૬૦ વર્ષ પૂરાં થયાં છે. શેષજીવન તીર્થ સ્થળે જઇને શાંતિથી પસાર કરવું છે.’ ગુરુની આજ્ઞાા મળતાં અજપુરનું રાજ્ય પોતાના નાનાભાઈને સોંપીને હરિદ્વારમાં જઇ સંન્યાસી વેશે રહેવા લાગ્યા. ચાર પાંચ વર્ષ પછી અજેપાળને ઉડતા સમાચાર મળ્યા કે સિંધ અને કચ્છ ઉપર સમુદ્રમાર્ગેથી વિધર્મી આરબોએ હુમલો કર્યો છે અને જુલમ ગુજારે છે. આ વાત સાંભળતાં જ અજેપાળની રોમરાઈ (રુંવાડાં) અવળી થઇ ગઇ ભાઈ.
અજેપાળે ધર્મની રક્ષા કરવા કાજે તીર્થમાં વસતા યુધ્ધકળા જાણતા સાધુ સંતોની ધર્મસેના ઊભી કરી. આ સેનાને લઇને તેઓ કચ્છ પહોંચી ગયા. ત્યાં અંજારથી થોડે દૂર આરબો અને સન્યાસીઓની ધર્મસેના વચ્ચે ધમસાણ યુધ્ધ થયું. યુધ્ધમાં આરબો હાર્યા અને ઊભી પૂંછડિયે ભાગ્યા પણ સંન્યાસી સૈન્યના સેનાપતિ અજેપાળ વીરગતિને વર્યા. આ અજેપાળની યાદમાં હાથમાં ભાલો ધારણ કરી યુધ્ધક્ષેત્રે વિચરતા અજેપાળનો ઘોડેસ્વાર પાળિયો કોતરવામાં આવ્યો. તેઓ જ્યાં વીરગતિને વર્યા હતા ત્યાં મૂકવામાં આવ્યો, આ સ્થળે આજે અજેપાળ મહાદેવનું મંદિર શૂરવીરની યશપતાકા લહેરાવતું
ઊભું છે.
અજેપાળના મૃત્યુ પછી એમણે રચેલી ધર્મસેનાની પરંપરા ભારત વર્ષમાં ચાલુ રહી. વિદેશીઓ અને આક્રમણખોરો સામે લડવાની જરૃર પડે ત્યારે લડવૈયા સાધુઓનું સૈન્ય આપોઆપ ઊભું થઇ જતું. એ સેનાના સેનાધિપતિનું નામ અજેપાળ રાખવામાં આવતું. એ મૃત્યુ પામે તો અજેપાળના જેવી જ પથ્થરની મૂર્તિ કંડારીને મૂકવામાં આવતી. ગુજરાત અને રાજસ્થાનમાં અજેપાળની અસંખ્ય મૂર્તિઓ મળી આવે છે. ડો. હરિભાઈ ગૌદાની નોંધે છે કે ગુજરાતમાં દહેગામ તાલુકાના હરસોલી ગામના ખોડિયાર માતાના સ્થાનક પાસે, કપડવંજ તાલુકાના પીઠાઈ ગામના રામજી મંદિરમા, દસક્રોઇ તાલુકાના કુહા ગામ પાસે મેશ્વો નદીના કિનારે, મહેસાણા જિલ્લાના પાળજ ગામના શીતળા માતાના ઓટલા ઉપર અને પાટણ શહેરનાઘેલગાત્રેશ્વરી માતાના મંદિરના પરિસરમાં અજેપાળની આવી પ્રતિમાઓ જોવા મળે છે.
સૌરાષ્ટ્ર અને કચ્છમાં શૂરાપૂરા અને શૂરવીરોની પૂજા અને બાધા માનતાઓ જૂનાકાળથી ચાલતી આવી છે. એના સ્થાનકો સાથે ઘણીવાર ચમત્કારિક દંતકથાઓ પણ જોડાઈ જતી હોય છે. શ્રી વિભાકર ધોળકિયાની નોંધ અનુસાર કચ્છના રાજવી રાવ દેશળજીને એક રાત્રે અજેપાળ સ્વપ્નમાં આવ્યા અને જ્યાં એ વીરગતિને વર્યા હતાં ત્યાં પોતાનું સ્થાનક બનાવવાનો આદેશ આપ્યો. એ સમયે દેશળજી ઉપર નાથપંથી સાધુઓનું વર્ચસ્વ સારું હતું. રાવ દેશળજીએ અજેપાળનું પાકું મંદિર ચણાવીને એની પૂજા અને કારોબાર નાથપંથી સાધુઓને સોંપ્યા.
કચ્છમાં અજેપાળના મંદિરનો વહીવટ કોણ કરે છે તથા તે મંદિર કોણે બંધાવ્યું, કૂવો કોણે કરાવ્યો તે વિશેના બે શિલાલેખો મંદિરની દીવાલમાં જડેલા જોવા મળે છે. સંવત ૧૭૪૨નો શિલાલેખ રાવશ્રી રાયઘણજીના કુંવર પ્રાગજીએ અંજાર શહેર ફરતો ગઢ બંધાવ્યો તેને લગતો છે. જ્યારે બીજો શિલાલેખ હિંદી લિપિમાં છે. તે શ્રી નાગજીભાઈ ભટ્ટીએ આ મુજબ નોંધ્યો છે ઃ
‘શ્રી ગણેશાય નમઃ’ સંવત ૧૮૭૭ તરાના વરષે શાકે ૧૭૪૨ પ્રવર્તમાને શ્રાવણ માસે શુક્લ પક્ષે અષ્ટમી ગુરુવાસરે શ્રી અંજારે કદ મધ્યે રાઉશ્રી દેસલવારમા પીરશ્રી જાત્રા કમગરે અજપાળના બે દેરા કરાવ્યું છે. પૂજારી માનગર પુજા કરે છે કડાયોકરસન દેવ રાજલી દેરુ અણુ છે. અંજાર મધ્યે અજેપાલ સત છે.’
અજેપાળની પ્રતિમાથી થોડે દૂર ઉભડક પગવાળી નંદીની પથ્થરની પ્રતિમા જોવા મળે છે. એની પણ એક ચમત્કારિક દંતકથા ધોળકિયાને આ મુજબ આલેખી છે.
ગુરુ દત્તાત્રેયને સાગરમલજી, સંગ્રામગરજી, મુલતાન પુરીજી અને લક્કડ પુરીજી નામના સિધ્ધ શિષ્યો હતાં. એમ કહેવાય છે કે સંગ્રામગરજીએ ચમત્કાર બતાવીને મસ્જિદ ખસેડી હતી. મુલ્તાનપુરીએ ધરતીકંપ પ્રગટાવીને મુલ્તાનની ધરતીને હચમચાવી હતી. લક્કડપુરી લાકડાની સળગાવેલી ચિતા પર કલાકો સુધી બેસી રહ્યા હતા, જ્યારે સિધ્ધસાગરજી અંબાજીનું મંદિર ભદ્રેશ્વરથી ખસેડીને અંજારમાં લાવ્યા હતા.
એક દિવસના સમયે સિધ્ધસાગરજી મંદિરના પરિસરમાં સમાધિમાં બેઠા હતા એ વખતે તેમને કાનફટા બનાવવા માટે બાવાઓએ એમના કાન પર ચપ્પુનો લસરકો કર્યો. કાન ફાટતાં તેમાંથી લોહીને બદલે દૂધ નીકળ્યું. આથી કાનફટા બાવાઓ આશ્ચર્ય પામ્યા. તેમને જાદૂગર માનીને અંબાજી માતાના મંદિરની એક અંધારી ઓરડીમાં પૂરી દીધા ને મોટી ઘંટી ઉપર અનાજ દળાવવા માંડયું. એ વખતે સિધ્ધસાગરજીએ એક બાવાને ઘંટીમાં અનાજ નાખવા કહ્યું. ત્યારે બાવો તાડૂક્યો ઃ ‘હું કંઇ તારા બાપનો નોકર થોડો જ છું ?’ ત્યારે સિધ્ધસાગરજી કહે ‘હું ચક્કી ચલાવું છું. અનાજ હોય એટલું લાવો.’ પછી તો ઘંટી ઘરરાટ કરતી આપોઆપ અવળી ફરવા માંડી. આ ચમત્કાર જોઇને નાથપંથી બાવાઓ ઢીલા પડયા. એમણે ચમત્કાર બતાવવાનું કારણ પૂછ્યું ત્યારે સાગરગરજીએ કહ્યું ઃ ‘અજેપાળદાદાની પૂજા દસનામી બાવાઓ જ કરશે. આનું નિરાકરણ કરવા માટે હું અજેપાળદાદાને ખુદને બોલાવીશ.’

આ માટેનો દિવસ નક્કી કરવામાં આવ્યો. આ પ્રસંગને નિહાળવા કચ્છના રાજવી દેશળજી પંડે હાજર થયા. સિધ્ધસાગરજીના ચમત્કારોથી નાથપંથી પૂજારી ખૂબ જ ગભરાઈ ગયો. એણે એક છોકરાને થોડીક કોરિયું (કચ્છી સિક્કા) આપીને ભોંયરામાં પૂરી દીધો ને પોપટની જેમ પઢાવી દીધો. કોઈ સવાલ પૂછે તો ઉત્તર આપવાનો કે ‘મારી પૂજા નાથપંથી બાવા કરશે.’
હજારો માનવીની મીટ આ પ્રસંગ પર મંડાઈ રહી. સિધ્ધસાગરજીએ પૂજારીને કહ્યું ઃ ‘તમે દાદાને ત્રણવાર પૂછી જુઓ. તેઓ આદેશ આપે તો તમે પૂજા કરજો. તમને આદેશ આપશે તો હું અંજાર છોડીને ચાલ્યો જઇશ અને જો દાદા દસનામી સાધુઓને પૂજા કરવાનો આદેશ આપે તો તમારે કચ્છ છોડીને ચાલ્યા જવું. પછી પૂજારી નાથબાવાએ પ્રશ્ન કર્યો ત્યારે ભોંયરામાં સંતાડેલો છોકરો બોલ્યો ઃ ”નાથપંથી મારી પૂજા કરે.’ આ સાંભળીને રાવ દેશળજી નાથબાવાને વંદન કરી રહ્યા. બીજી વાર પ્રશ્ન પૂછાયો ત્યારે એ જ જવાબ મળ્યો. હાજર રહેનાર સૌ દંગ થઇ ગયા. સિધ્ધસાગરજીને કાવતરાની ગંધ આવી ગઈ. ત્રીજીવારનો આદેશ થાય તે પહેલાં સિધ્ધસાગરજી ગર્જ્યા ઃ ‘તને કાળોતરો કરડે.’
નાથપંથી પૂજારીએ વિશ્વાસપૂર્વક ત્રીજીવાર પ્રશ્નને રમતો મૂક્યો ઃ ‘અજેપાળદાદાની પૂજા કોણ કરે ?’ ત્યાં તો ભોંયરામાં પૂરેલા છોકરાને સર્પદંશ થતાંની સાથે મરણ પામ્યો, એટલે કોઈ જવાબ ન મળ્યો. ત્યારે સિધ્ધસાગરજીએ અજેપાળદાદા તરફ ફરીને પૂછ્યું ઃ ‘દાદા, આપની પૂજા કોણ કરે ? ત્યારે આકાશમાંથી ગેબી અવાજ આવ્યો ઃ ‘મારી પૂજા હવે પછી દસનામી બાવાઓ જ કરે.”
પોતાના હાથ હેઠા પડતાં હતાશ થયેલા નાથબાવાએ રાવ દેશળજી તરફ ફરીને કહ્યું ઃ ‘બાવા (બાપુ), આ મહાત્માની માયાજાળમાં ફસાવા જેવું નથી. એ બહુ મોટા સિધ્ધપુરુષ હોય તો આ મંદિરના પથ્થરના પોઠિયાને ઘાસ ખવરાવી બતાવે.’ ત્યારે મહારાવ બોલ્યા ઃ સિધ્ધસાગરજી, આપ આ પોઠિયાને ઘાસ ખવરાવી બતાવો  તો તમારી વાત માનું. ત્યારે સિધ્ધસાગરજી એટલું જ બોલ્યા ઃ ‘બાવા, મારા હાથમાં કંઇક જાદુમંતર હશે એવો કદાચ આપને વહેમ ન આવે એટલા માટે આપ જ પોઠિયાને ઘાસ ખવરાવો.’ આટલું બોલીને સિધ્ધે હવામાં હાથ હલાવ્યો ત્યાં જુવારની લીલી પૂળીઓ હાજર થઇ. મહારાવે પૂળીઓ હાથમાં લીધી ત્યારે પોઠિયા તરફ ફરીને ‘ચલ બેટા, ઘાસ ખા લે.’ બોલીને સિધ્ધસાગરજીએ પોઠિયાની પીઠ થાબડી. ત્યાં તો મહારાવથી ત્રણ ગજ છેટે ઉભેલો પથ્થરનો પોઠિયો ત્યાં જઇને મહારાવના હાથનું ઘાસ ખાવા લાગ્યો. પછી પોદળો કરીને પોતાની જગ્યાએ ગયો. ત્યાં બેસવા જતો હતો ત્યારે સિધ્ધસાગરજી બોલ્યા ઃ ‘જરા ઠહરના બેટા !’ પોઠિયો ઉભડક પગે એ જ હાલતમાં ત્યાં રહી ગયો, જે આજે ય ત્યાં જોવા મળે છે.
કચ્છી લોકજીવનમાં એવી એક લોકમાન્યતા પ્રચલિત છે કે આ ચમત્કાર પછી સિધ્ધસાગરજી અંબાજી માતાના મંદિરની અગાશી પર જઇને ઢોલિયા પર બેસીને અદ્રશ્ય થઇ ગયેલા. તેઓ ભવિષ્યે અહીં પાછા ફરશે ને પોઠિયાને બેસાડી જશે.
અંજાર શહેરમાં જેસલ-તોરલની સમાધિ અને અંબાજી માતાનામંદિરની બાજુમાં આવેલી ઝુંડ તરીકે ઓળખાતી જગ્યા પાસે અજેપાળદાદાનું સદીઓ પુરાણું મંદિર આવેલું છે. આંબલીના ઊંચા વૃક્ષની ઘટા વચ્ચે શોભતા આ મંદિર પાસે પુરાતન વાવ છે. મંદિરમાં અખંડ જ્યોત પ્રગટે છે. અજેપાળદાદાના મંદિર પાસેના ભોંયરામાં સંતાડેલા અને સર્પદંશથી મૃત્યુ પામેલા છોકરાની સમાધિ મોજૂદ છે. મંદિરથી થોડે દૂર આવેલા અંબાજી માતાના મંદિરની અગાશીમાં સદીઓ જૂનો સિધ્ધસાગરજીનો ઢોલિયો આજ પણ લોકજીવનમાં શ્રધ્ધા અને ભક્તિભાવપૂર્વક પૂજાય છે. આમ દંતકથાઓ અને ચમત્કારો મઢ્યું વ્યક્તિત્વ ધરાવતા વીર અજેપાળ દાદા કચ્છના લોકજીવનમાં આગવું સ્થાન ધરાવે છે. ભૂકંપ પછી અહીં નવું મંદિર બનાવવામાં આવ્યું છે. આ ચમત્કારોને આજે કોઈ યાદ કરતું નથી.
સૌજન્ય : જોરાવરસિંહ જાદવ

પોસ્ટ : દિવ્યરાજસિંહ સરવૈયા

Rajputi Rit Prashasti: Divyrajsinh Sarvaiya, राजपूती रीत प्रशस्ति काव्य

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़            “राजपूती रीत प्रशस्ति”
                    छंद : सारसी
         रचना : दिव्यराजसिंह सरवैया

वट वचनने वीरता सभर वातो अमारा देश नी,
शगती उपासे शिव सुवासे वरण गासे वेश नी,
सत देख समरांगणे शूरता तजी मन ना मीत जी,
तन गहन घावे लड़े दिव्य राजपूती रीत जी,

गौरव कुळ गोहिल नु ज्यां मरद पाक्या मोभियो,
सेजक समां शूरवीर ने राणोजी रण में शोभियो,
महावीर महिपत मोखडोये मोत पर लइ जित जी,
विण मथ्थ धड़ लड़ धरण दिव्य राजपूती रीत जी.

वर्षा समें वावणी काजे हणी दख चारण तणी,
जुतियो बळद जोड़े हळे धन्य धन देपाळो धणी,
पच्चीस वरहे देह पाडु टेक मरणी प्रीत जी,
साचवी गोहिल सवो दिव्य राजपूती रीत जी.

वाळा तणा वलभी तळाजा वसुधे विख्यात छे,
नेहड़ी साईं काज सोंपण माथ एभल भ्रात छे,
भाणेजनी भीती ज भांगे उगो उगीने नीत जी,
खांभी खड़ी खोडाय दिव्य राजपूती रीत जी,

मन कूड़ा हेवा ढांक लेवा सुबा मनसुबा घड़े,
तातार खानो गढ़जुनानो दळ कटक लइने चड़े,
नागल्ल मानो वेण जानो सरतानो हीत जी,
कुळदेवी किरपा करे दिव्य राजपूती रीत जी,

समरे अकेला बनी घेला वंश वाघेला वडो,
वीरधवल हांके मुघल फाके धूळ डंमर नो धड़ो,
अणनम शहीदी राय करणे लीधी मोत सहित जी,
संघजी समोवड अडग दिव्य राजपूती रीत जी.

वाघण बनी अंबा उछेरे बाळ व्याघरदेव ने,
माळवा जेवा पाडीया विशळदेवे खेव ने,
खानो न मानो एक साथो बार जुधा जीत जी,
चांदा तणा चड़ शीश दिव्य राजपूती रीत जी,

परमार माता जोमबाई मुंज ने लखधीर जी,
तेतर काजे जंग बाजे चभाड़ा को चीर जी,
केसर काने पकड़ दाने दीये चांचो चीत थी,
परदुख्खभंजण राज दिव्य राजपूती रीत जी,

मूळी तणे पादर परमारो कुंवर रमत्यु रमे,
दइ आशरो जत कुटुंबने लइ वेर सिंधीनो खमे,
दळ कटक ना कटका करी भड़वीर लड़ परहित जी,
लखधीर राख आशरो दिव्य राजपूती रीत जी,

सुर समीरसूत ना पुत सपुतो जेठवा राणा जहां,
गढ़ घुमली छांया मोरबीने राणपुर गादी तहां,
ठाम अंते पोरबंदर थायी त्यां जइ थीत जी,
वर्षो पूराणों वंश दिव्य राजपूती रीत जी,

नागाजणो तो वीर न्यां हाकल हलामण गूंजती,
विकमत राणो वीर ज्यां धरणी धराहर धृजती,
शृंगार शहीदीनो सजी शणगार शोभे शीत जी,
राणी कलाबा जगवती दिव्य राजपूती रीत जी.

मदमत्त गज गांड़ो थयो ज्यां बाळ नाना खेलता,
गढ़ झरुखेथी शकत कर लंबावी कुंवरो झिलता,
झालीया थी झाला थया हरपाल बेटा चीत जी,
मखवान मरदो महा दिव्य राजपूती रीत जी.

अड़ीखम महाराणो उभो जे घाट हल्दी समर मां,
विण नोतरी विपती चड़ी ती कसी खांडा कमर मां,
सिंह मान झाला लइ भाला सिधावो रण शीत जी,
भेरू तणी ए भीत दिव्य राजपूती रीत जी,

जंगे जगेता भगे भे ता रणे रेता राजीयो,
आभे अड़ेजा कुळ कलेजा एव जाडेजा जियो,
आशा पुरा परचो पुरा मोमाई मोरा हीत जी,
खत्री खरा रखवट दिव्य राजपूती रीत जी,

अबडो उगारी शरण सुमरी लाज रण पोढ़ी गया,
कुंवर अजोजी वरण मांडव मरण जुधे जइ वया,
लाखा फुलाणी तेग ताणी जरा पण माँ जित नी,
अजराअमर इतिहास दिव्य राजपूती रीत जी,

पिता तणा ले पाट धरणी चावड़ा ऐ चापिया,
वन वने भटकी चाप चटकी राज पाटण थापिया,
अणहिल्ल भेरू खरो मेरु समोवडियो चीत जी,
वनराज राजा वडो दिव्य राजपूती रीत जी,

उपमा अटंकी वात वंकी वंश सोलंकी शूरा,
मुळराज गुर्जर राज राख्या धजा कुकुटी नी धुरा,
जयसिंह पाड़ी भींह अरिपर लींह कीर्ति शीत सी,
तलवार थी ये तीखी दिव्य राजपूती रीत जी,

पंथक पिछाणे गढ़ जुनाणे राह्’ कुळरा बेसणा,
दळबळ थकी लइ लेव जेवी कैक नृप नी एषणा,
यदुकुल रीती नही भीति सही निति चीत नी,
दानी जबानी दिसे दिव्य राजपूती रीत जी,

हारेल होडे शीश बीजल दियासे दीधा हता,
बेनी बचावण भूप नवघण सिंध जिव लीधा हता,
कवियों हुलासे एक श्वासे गाय तमणा गीत जी,
खेंगार खेंचे खडग दिव्य राजपूती रीत जी,
– दिव्यराजसिंह सरवैया कृत छंद सारसी माँ “राजपूती रीत प्रशस्ति”