Daily Archives: December 12, 2015

धर्मादा के गाँव की मिट्टी भी नही ले वही असल राजपूती / Kachchh Maharao Shri Khengarji Bawa Or Jangal Khatadhikari Vaghubha Gohil

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“धर्मादा के गाँव की मिट्टी भी नही ले वही असल राजपूती”
          सौंदर्य रस के पंथ पर चड़ी नवयौवना के आँखों की रंग जैसा संध्या का पालव कच्छ धरा पर झूल रहा है। मानवदशा से देवरूप को प्राप्त करने पद्मासन में बेठे योगी समान भुजिया पर्वत डूब रहे सूर्य के अंतिम किरणों से अभिभूत हो रहा था,

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          पर्वतीय प्रदेश की रम्य भूमि पर संध्या जेसे छुपाछुपी खेल रही हो, ऐसे समय कच्छ के महाराव जाडेजा अपनी कुलदेवी माँ आशापुरा के दर्शन कर भुज तरफ परत आ रहे थे, धूल के डम्मर उड़ाती मोटर कार चलती जा रही थी, मोटर चालक के बाजू में खड़खाता (वनखाता)के अधिकारी वाघजी भा गोहिल बेठे थे। महाराव के ख़ास और मित्र वाघजी भा  वाघुभा के नाम से जाने जाते थे,
          वाघुभा के पिताजी भी खड़खाता के वडा थे, वाघुभा पांच साल के थे तब वे परलोक सिधार गए थे, उस समय कच्छ की गादी पर विराजमान महाराव खेंगारजी बावा ने वाघुभा के पिताजी से घुड़सवारी और शिकार की तालीम ली थी जिसे याद रख कर पांच साल के वाघुभा के जीवन विकास का खुद ध्यान रखने लगे। वाघुभा की जरूरियात अनुसार उन्हें अंग्रेजी का ज्ञान भी दिया, घुड़सवारी और निशांनबाजी तो वाघुभा को वारसागत मिली थी, सोलह साल की उम्र में वाघजीभा सामंतसिंहजी गोहिल को महाराव खेंगारजी ने कच्छ जंगलखाता के वडा के पद पर नियुक्त किया, वफादारी जिनकी नस नस में समाई थी ऐसे वाघुभा ने पिताजी का खाता संभाल ने कमर कसी,
          परिणाम स्वरुप अश्वविद्या, कुस्तीशाष्त्र को वाघुभा घोल कर पि गए थे। वाघुभा की एक नजर अश्व के लक्षणों को जान लेती थी, जंगल के पेड़पौधे और जीवजन्तु के जानकार थे, आफ्रिका के जंगलो में शिकार समय वाघुभा साथ रहे थे।
          मोटर कार धूल भरी रस्ते पर भुज का रास्ता काट रही थी, पीछे बेठे महाराव अपने कुल परंपरा राज्य की भूमि पर नजर गड़ाये जा रहे थे, नखत्राणा पीछे छोड़ मोटर आगे बढ़ रही थी, हरेभरे खेत में लहराती फसलो पर महाराव की नजरे थी,
          वेरान वन में लहराती फसल देख महाराव का मन ललचाया, और कहा : वाघुभा ! इस गाँव की उपज बढ़िया है, भुज पहुँच कर इस गाँव का कर बढ़ाने का हुकुम याद दिलाना, वाघुभा ने कच्छ के सुवांग धणी के शब्दों को सूना पर प्रत्युत्तर न दिया,
          इस लिए महाराव ने फसलो पर नजर बनाये रखे ही कहा: वाघुभा, कुछ उत्तर तो दीजिये,
          वाघुभा ने पीछे मुड़कर कहा: जियेरा..! मेने आपके मनसूबे को सूना,
          और तब तक मोटर उस गाँव की सिमा से आगे निकल चुकी थी, इसलिए वाघुभा ने महाराव से अरज की: बावा..! मोटर खड़ी रखवाईये जरा.
          कच्छ के कीर्तिवंत राजवी ने मोटर चालक को मोटर रोकने कहा, पीछे धूल उड़ाती हुई मोटर खड़ी रही, वाघुभा कार से निचे उतरे, पर अपने पालवपछेडी से कार पर लगी मिट्टी पोछने लगे, उन्हें देख कर महाराव ने कारण पूछा की यह क्या कर रहे हो?
          तब शब्दोंसे जेसे राजपूती छलक रही हो ऐसा प्रत्युत्तर दिया : बावा..! अभी हम जिस गाँव से निकले वह गाँव राज ने धर्मादा में दिया हुआ है, उस गाँव की धूल-मिट्टी भी हम कैसे ले शकते है?
          वाघुभा की बात का मर्म जानकर कच्छ के महाराव खेंगारजी बावा ने आभार व्यक्त कर कहा, वाह वाघुभा अभी मुझसे बहोत बड़ा अनर्थ हो जाता, और वह कलंक कच्छ के कपाल से कभी मिटता नही, वाघुभा ने धर्मादा दिए गाँव की मोटर पर लगी तमाम मिट्टी झपट कर साफ़ कर गाडी में बैठ गए।

नोंध -> श्री वाघुभा के परिवार का कोई एक सभ्य पिछले 125 सालो से जंगल खाता में अपनी फर्ज बजाते आये है, कच्छ महाराव के मित्र और जंगल का जतन करने वाले श्री वाघुभा का स्वर्गवास 17/11/’74 में हुआ।
सौजन्य : दौलतभाई भट्ट

History & Literature

जाडेजा ठाकोर हरिसिंहजी : जिन्होंने अकाल से अपनी प्रजा बचाने पूरा खजाना खाली कर दिया/ Jadeja Thakor Harisinhji

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गुजरात के ध्रोल नगर की यह बात है जब छप्पनिया अकाल में राजा ने अपनी प्रजा के लिए पूरा खजाना खाली कर दिया…

          छप्पनिया अकाल ने इतनी दहशत फेलाई थी की ध्रोल नगर में जेसे हाथ में यमपाश लिए मानव पशु पक्षी को भक्ष करने राक्षस की तरह घूम रहा हो, प्रजा अन्न-जल के लिए आश लगाए बेठी है, सब जगह मानव मृतदेह से भरी ध्रोल की धरती कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद की जमीन जेसी लग रही थी…
          हब्सी के मुह जेसी काली रात छाने लगी थी, सन्नाटे की चादर बिछ रही थी, भूखेप्यासे भी निंद्रा की शरण में और कुछ चिरनिंद्रा में सो रहे थे…
         बस जाग रहे थे तो एक ही व्यक्ति वे थे ध्रोल के सुवांग धणी जाडेजा ठाकोर हरिसिंहजी, जगह जगह जल रहे अग्निदाह की अग्नि से उनका आत्मा भी जल रहा था, प्रजा की पीड़ा से वे दुखी हो रहे थे, काळ के कराल पंजे की झपट से प्रजा को बचाने वे आतुर हुए, मनोमंथन बढ़ने लगा, महल के आलिशान पलंग पर सो रहे थे पर आँखों में नींद नही आ रही, प्रजा हे तो राजा है, प्रजा के हित में आज उपयोग किया धन कल वापस आये ना आये पर प्रजा को आज इस आफत से बचाना राजा का धर्म है, फिर चाहे अपना शरीर भी क्यों ना बेचना पड़े… तभी में सगी अर्थ में राजा कहलाऊँ…”

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Jadeja Thakor Harisinhji Of Dhrol

          मनोमन ऐसा संकल्प कर दरियादिल राजा घड़ीभर नींद कर लेते है, रक्तभरा लाल सूर्य अँधेरे के गढ़ को तोड़ता हुआ ध्रोल की धरती पर सूर्योदय हुआ, रणयोद्धा की रक्तरंजित तलवार से तेजकिरणो ने आसमान भर दिया,ठाकोर हरिसिंहजी ने दरबार बुलाया, दीवान, महेता पर सभासदों के सामने अपना मनसूबा बताया की “प्रजा की पीड़ा दूर करना अपना धर्म है” राजा की आवाज में अंतर का दर्द भरा हुआ था, प्रजा प्रेम उभर रहा रहा था,
लेकिन बापू, यह तो कुदरती आफत है…! राजा के प्रजाप्रेम को पीछे धकेल देने वाला उत्तर एक सभासद ने दिया,
ऐसा उत्तर देने वाले पर क्रोधित दृस्टि कर जिस के ह्रदय में हरी ने स्थान ले लिया ऐसे राजा ने कहा : मुझे मेरी प्रजा को बचाना हे, अबोल पशुओ को मृत्यु के मुख से बचाना है, यह मेरा अफर निर्णय हे।
लेकिन इतनी बड़ी आफत से हम नही निपट सकते, किसी सभासद ने फिर कहा, राज का तीसरा हिस्सा भायातो के पास है,
राजा हरिसिंहजी अपनी बात पर अडग रहे, में प्रजा के लिए अपने आप को बेचने भी तैयार हु, भायात भी मेरी प्रजा ही है, में निस्पक्ष सारी प्रजा के हिट का कार्य करना चाहता हु, राज के पास जो धन है वः प्रजा ने ही कमा कर दिया है, वही धन प्रजा को बचाने की लिए खर्च करना है, आप लोगो को पूरी निष्ठां से काम करना होगा, किसी ने भी दगा किया उसे कड़ी सजा होगी, यह याद रखना,
उसी घड़ी से राजा ने दानापानी की सुविधा प्रजा के लिए खुल्ली कर दी,
          राहतकाम शुरू करने का फरमान दे दिया गया, खारवा और वांकिया गाँव की सीमा में पाळ का काम शुरू किया गया, दूसरी तरफ सरपदड से वणपरि गाँव तक पक्की सड़क निर्माण का काम शुरू हुआ, ध्रोल में दो कुए का खोदकाम आरंभ हुआ, गरेडिया में तालाब बनाया गया, राजवी रैयत के लिए हरिसिंहजी ने दिल के दरवाजे खुले छोड़ दिए, ध्रोल के पादर मे खुदवाये दोनो कुए मे पानी उमट पडा, उस पर नौ कोंस जोंते गये, दिलावर दिल के राजा पर वरुणदेव भी प्रसन्न हुए, लोगो को रोजी-रोटी मिली, पीडीत प्रजा का पोकार शमने लगा, लोगो की जान मे जान आयी, ठाकोर हरिसिंहजी की जयजयकार होने लगी, ध्रोल ने अकाल को परास्त किया ये बात चारोओर फैल गयी, ये बात सुन अंग्रेज अमलदार मि.मोरिसन, मि.वुड और चमनराय हरराय ध्रोल पहुंचे और ठाकोर हरिसिंहजी को प्रजा के लिये पैसो को पानी की तरह बहाने के लिये धन्यवाद दिये |

            अकाल जब खत्म हुआ तब राज का खजाना खाली था, पैसे नही थे लेकिन प्रजा के सीने मे जान थी यही ठाकोर हरिसिंहजी के मन बडी बात थी |

>> नोंध :-

* ठाकोर हरिसिंहजी उनके पिता जयसिंहजी की मृत्यु के बाद ता. 4-11-1886 के रोज गद्दी पर बैठे |
* वे संस्कृत के जानकार थे |
* उन्होने ध्रोल मे धर्मशाला, दरबारगढ मे सुशोभित महल, सरपदड मे एक कचहरीहोल बनवाये थे |
* उनका विवाह पालिताणा, लाठी और दरेड की राजकुमारीओ के साथ हुआ था |
* भोपाल की बेगम को चांद दिलाने के लिये मुंबई मे आयोजित दरबार मे 1876 मे प्रिन्स ओफ वेल्स से वे मिले थे ||
सौजन्य : दौलत भाई भट्ट

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