धर्मादा के गाँव की मिट्टी भी नही ले वही असल राजपूती / Kachchh Maharao Shri Khengarji Bawa Or Jangal Khatadhikari Vaghubha Gohil

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“धर्मादा के गाँव की मिट्टी भी नही ले वही असल राजपूती”
          सौंदर्य रस के पंथ पर चड़ी नवयौवना के आँखों की रंग जैसा संध्या का पालव कच्छ धरा पर झूल रहा है। मानवदशा से देवरूप को प्राप्त करने पद्मासन में बेठे योगी समान भुजिया पर्वत डूब रहे सूर्य के अंतिम किरणों से अभिभूत हो रहा था,

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          पर्वतीय प्रदेश की रम्य भूमि पर संध्या जेसे छुपाछुपी खेल रही हो, ऐसे समय कच्छ के महाराव जाडेजा अपनी कुलदेवी माँ आशापुरा के दर्शन कर भुज तरफ परत आ रहे थे, धूल के डम्मर उड़ाती मोटर कार चलती जा रही थी, मोटर चालक के बाजू में खड़खाता (वनखाता)के अधिकारी वाघजी भा गोहिल बेठे थे। महाराव के ख़ास और मित्र वाघजी भा  वाघुभा के नाम से जाने जाते थे,
          वाघुभा के पिताजी भी खड़खाता के वडा थे, वाघुभा पांच साल के थे तब वे परलोक सिधार गए थे, उस समय कच्छ की गादी पर विराजमान महाराव खेंगारजी बावा ने वाघुभा के पिताजी से घुड़सवारी और शिकार की तालीम ली थी जिसे याद रख कर पांच साल के वाघुभा के जीवन विकास का खुद ध्यान रखने लगे। वाघुभा की जरूरियात अनुसार उन्हें अंग्रेजी का ज्ञान भी दिया, घुड़सवारी और निशांनबाजी तो वाघुभा को वारसागत मिली थी, सोलह साल की उम्र में वाघजीभा सामंतसिंहजी गोहिल को महाराव खेंगारजी ने कच्छ जंगलखाता के वडा के पद पर नियुक्त किया, वफादारी जिनकी नस नस में समाई थी ऐसे वाघुभा ने पिताजी का खाता संभाल ने कमर कसी,
          परिणाम स्वरुप अश्वविद्या, कुस्तीशाष्त्र को वाघुभा घोल कर पि गए थे। वाघुभा की एक नजर अश्व के लक्षणों को जान लेती थी, जंगल के पेड़पौधे और जीवजन्तु के जानकार थे, आफ्रिका के जंगलो में शिकार समय वाघुभा साथ रहे थे।
          मोटर कार धूल भरी रस्ते पर भुज का रास्ता काट रही थी, पीछे बेठे महाराव अपने कुल परंपरा राज्य की भूमि पर नजर गड़ाये जा रहे थे, नखत्राणा पीछे छोड़ मोटर आगे बढ़ रही थी, हरेभरे खेत में लहराती फसलो पर महाराव की नजरे थी,
          वेरान वन में लहराती फसल देख महाराव का मन ललचाया, और कहा : वाघुभा ! इस गाँव की उपज बढ़िया है, भुज पहुँच कर इस गाँव का कर बढ़ाने का हुकुम याद दिलाना, वाघुभा ने कच्छ के सुवांग धणी के शब्दों को सूना पर प्रत्युत्तर न दिया,
          इस लिए महाराव ने फसलो पर नजर बनाये रखे ही कहा: वाघुभा, कुछ उत्तर तो दीजिये,
          वाघुभा ने पीछे मुड़कर कहा: जियेरा..! मेने आपके मनसूबे को सूना,
          और तब तक मोटर उस गाँव की सिमा से आगे निकल चुकी थी, इसलिए वाघुभा ने महाराव से अरज की: बावा..! मोटर खड़ी रखवाईये जरा.
          कच्छ के कीर्तिवंत राजवी ने मोटर चालक को मोटर रोकने कहा, पीछे धूल उड़ाती हुई मोटर खड़ी रही, वाघुभा कार से निचे उतरे, पर अपने पालवपछेडी से कार पर लगी मिट्टी पोछने लगे, उन्हें देख कर महाराव ने कारण पूछा की यह क्या कर रहे हो?
          तब शब्दोंसे जेसे राजपूती छलक रही हो ऐसा प्रत्युत्तर दिया : बावा..! अभी हम जिस गाँव से निकले वह गाँव राज ने धर्मादा में दिया हुआ है, उस गाँव की धूल-मिट्टी भी हम कैसे ले शकते है?
          वाघुभा की बात का मर्म जानकर कच्छ के महाराव खेंगारजी बावा ने आभार व्यक्त कर कहा, वाह वाघुभा अभी मुझसे बहोत बड़ा अनर्थ हो जाता, और वह कलंक कच्छ के कपाल से कभी मिटता नही, वाघुभा ने धर्मादा दिए गाँव की मोटर पर लगी तमाम मिट्टी झपट कर साफ़ कर गाडी में बैठ गए।

नोंध -> श्री वाघुभा के परिवार का कोई एक सभ्य पिछले 125 सालो से जंगल खाता में अपनी फर्ज बजाते आये है, कच्छ महाराव के मित्र और जंगल का जतन करने वाले श्री वाघुभा का स्वर्गवास 17/11/’74 में हुआ।
सौजन्य : दौलतभाई भट्ट

History & Literature

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