देशी रजवाडा दांता के देव समान राज साहेब महोबतसिंहजी

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देशी रजवाडा दांता के देव समान राज साहेब महोबतसिंहजी

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Danta State Of Parmar Rajputs

          अरवल्ली और आरासुर पर अपना आधिपत्य रखनेवाला पराक्रमी और पटाधर परमार वंश का राज्य दांता राज्य की यह बात है, राजकुमार की उम्र छोटी होने की वजह से राज साहेब महोबतसिंहजी को राज्य का कारभार सौंपा गया था।
          सिर्फ दस्तखत कर शके उतने ही शिक्षित राजकुमार के चाचा राजसाहेब ने जो राज्यसंचालन कर दिखाया उसे देख अंग्रेज अमलदार भी ताज्जुब थे। राज्य के किसी अमलदार से नाराज होकर गाँव से कोई जाना चाहे तब पिता समान वात्सल्य भाव से राज साहेब उनको मनाते और उनका इंसाफ परंपरागत प्रणाली मुताबिक ही चलता। प्रजा की छोटीमोटी मुसीबते वे दरवाजे की पाट पर बैठ के बिना किसी ठाठमाठ के सरलता से ही करते। वहा चपरासी या वकीलो की जरूरत नही पड़ती, और दोनों पक्षों को ध्यान से सुनकर ही फैंसला देते, इसीलिए प्रजा में वे “पोताबापजी” के लाडले नाम से भी जाने जाते थे।
         राज्य में नए आये अमलदारने सलाह देते कहा की क्रिमिनल प्रोसेस आधारित वादी-प्ररिवादि पर कायदेसर केस चले तो ज्यादा अच्छा है, तब राजसाहेब ने प्रत्युत्तर दिया की : दांता की गरीब प्रजा को में कायदे की खर्चाल जाल में फंसाना नही चाहता, किसान और भील जेसे वादी-प्रतिवादी को अर्जी स्टाम्प के खर्चे में उतरना पड़े, उपरसे मुद्दत की तारीख आये, फरियादी और साक्ष्य को धक्के खाने पड़े तब खेती का काम बिगड़े उसका तो ज़रा विचार करो..!!
          अमलदार के पास उसका जवाब नही था। राज्य के आरासूरी अंबा मंदिर के वहिवट पर उनकी सीधी देखरेख रहती, माता के पवित्र तीर्थधाम की पवित्रता बनी रहे इस बाबत का सख्त बंदोबस्त रखते… स्त्री पुरुष यात्री ओ का संबंध वह भाई बहन जैसा रहता, चोरी या छेड़ती की घटना वहा कभी नही होती थी, बावजूद अगर कभी छेड़ती की घटना बने तो अपराधी के मुंह पर काली पोतकर जूट का हार पहनाकर गधे पर बिठा कर दांडी पिट कर सभी यात्री ओ के सामने बेआबरू किया जाता था। इस लिए कोई गुनाह के इरादे से इस मंदिर में प्रवेश करने की हिम्मत नही करता था। यह राजसाहेब महोबतसिंहजीकी राजनीती का प्रताप था।
          कुशल राज्य संचालक और असल राजवीसमान राजसाहेब के अंग्रेज अफसर कर्नल वुड हाऊस, मेजर मिक और मी. गॉर्डन उनके अंगत मित्र थे।
          एकबार उन्होंने पोलिटिकल एजेंट को कहा था : सरकार राजकुंवरो की शिक्षा पर बहोत खर्चा कर रही उसके लिए आभार मानता हु, पर छोटे रजवाडो के राजकुंवरो को यह भारी पड़ता है, क्योंकि बाद में वे बहोत खर्चालु हो जाते है, दो रूपये के जूतो के बजाये पच्चीस रुपयो के विलायती बूट पहनने लग जाते है, आठ आना की दारू की बोतल के बदले बिस रुपये की विलायती शराब इन लगते है, इस से राज्य की प्रजा पर बौझ बढ़ता है, यस सर और नो सर के आलावा कुछ बोलना आता नही है, कामदार, फौजदार, तहसीलदार के दफ्तरों को देख शके उतनी भी शिक्षा प्राप्त नही कर शकते।
          पोलिटिकल कर्नल स्कॉट को उन्होंने कहा था : राजा-महाराजाओ की विलायत मुलाकात-प्रवास लाभ करता नही पर हानिकारक बनता है, कोई विदेशी फर्नीचर के शोखीन बनते है, तो वह के महंगे कुत्ते और घोड़े ले आते है, कोई गोरे अमलदार अगर गोरी नर्स ले आते है, अब आप ही बताओ की इसमें राजा या राज्य क्या कमाई करेंगे…?
          महिकांठा के पोलिटिकल एजेंट पद पर आये कर्नल कार्टर से संवाद किया था उसमे बालविवाह और गलत जोड़े की शादी का मुद्दा था, राजसाहेब ने कहा : बालविवाह और कजोडा शादी हानिकारक है, परंतु सगीर उम्र के कुंवरो इक्कीस वर्ष की उम्र तक कुंवारे रखे जाते है, वह भई हानिकारक है, विलायत के और यहाँ के हवा-पानी में तफावत है, इस लिए अठारह से ज्यादा कुंवारों के शरीर में कई विकार उत्पन्न होते है, जिस से हमेशा की व्याधि रहती है, या बलहीन हो जाते है…!
          स्वदेशी की बात जिनके रोम रोम में थी और उसका अमल कर आचरण करते थे, विदेशी माल की आयत से वे व्यथित रहते थे, और कहते की यहाँ के देशी कारीगर बेहाल होते जा रहे है, उनका रक्षण अगर कोई कर शकता है तो देशी राज्य ही कर शकते है…
          अपने 18 साल के राज्य संचालन में उन्होंने देशी कसब, कापड, सोना- चांदी के कलात्मक गहने, हिरा-माणेक के जड़े अलंकार, तलवारे, भाला, काष्ट और पाषाण की कलात्मक कृतियों बड़े प्रमाण में खरीदी कर देशी कला को उत्तेजन दिया था।
          नए आये कामदार ने कहा : दरबार में बहोत सी वस्तु कृतियां इकट्ठी हो गई है, इस लिए उनके निकाल का विचार करना चाहिए, अब तो विलायती बंदूको और अन्य वस्तुए नमुनेदार आती है, तो उनकी खरीदी का सोचना चाहिए।
          राजसाहेब ने गुस्से से कहा : वस्तुए भले बिगड़ जाए, आपको उनकी चिंता नही करनी है, देसी कारीगरों की वस्तु राजा नही खरीदते तो कोण खरीदेगा? आप विलायती बंदूको की बात करते हो तो क्या यह जानते हो की गोलेबारुद और कारतूस के लिए कितनी लिखापटी करनी पड़ती है? अगर गोलेबारुद का परवाना रद हुआ तो क्या हाल होगा? बाद में तो आपकी पांच हजार की बन्दुक बांस की लकड़ी जितना भी काम नही देगी। राजसाहेब का जवाब सुन नया कामदार चुप हो गया।
          प्रजापरस्त इस राजवी की जीवनशैली सादी और सरल थी, जैसा बोलते वेसा ही जीवन जीते थे, बहोत बार राज्य की और से मोटर और घोड़ागाड़ी का उपयोग करने के लिए कहा गया पर उन्होंने तो घुड़सवारी पर ही राज्यसंचालन कर दिखाया।

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  1. Pingback: દાંતા રજવાડું | History & Literature

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