Daily Archives: February 20, 2016

Togaji Rathore / तोगारी तलवार

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कटार अमरेस री, तोगा री तलवार !
हाथल रायसिंघ री , दिल्ली रे दरबार !!
तोगारी तलवार..

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तोगाजी का विवाह भट्टी राजकुमारी से होना तय हुवा और राजकुमारी को इस समाचार का पता चला तो वे भी हर्षीत हुइ के उनके पीताने विरोचीत मृत्यु को स्वीकार करने स्वयं जाने वाले तोगाजी के लीये उनको चुना और राजपुती शान के लीये उन्हो ने खुद पती के मृत्यु के बाद सती होना स्वीकार किया..
रजवट राखण माण , रखण माण मीर खानजा;
ग्रहण भटीयाणी पाण, तेगां घर तोगो चाल्यो.
महाराजा गजसिंह ने जोधपुर से एक शाहि विवाह तोगाजी का शाहि विवाह सजाया. विवाह बाद कि प्रथम रात्री पर तोगाजी भटीयाणी के डेरे पर ना गये और राजपुतो के साथे छावनी मे बेठे.. इधर कुछ राजपुतो ने मीरखान को कहा कि आप बादशाह से १२-१३ मास कि अवधी बढा लो जीससे तोगाजी जेसे विर और भतीयाणी जेसी सती का वंश बच जाय, और राजपुतो ने यह बात तोगाजीसे भी कहि,
तोगाजी ने मना कर दिया और नियत अवधी पर हि आग्रा कि सवारी करने को कहा.
लेकीन आखीरकार उनको राजपुतो की जीद माननी पडी और दुसरी रात्री वे अपनी धर्म पत्नी से मीलने हवेली पहोचे.. यहा भट्टीयाणी जान चुकि थी कि बादशाह से अधिक अवधी लेने का फेसला हुवा हे, उन्होने एक विरांगना क्षत्राणी के भाती अपने पती को उदबोधन किया कि, “हे स्वामीनाथ! आप हघळा सरदारो से कहलवा दो कि अधीक मुदत लेने पर इन मुदतमे आपण दोनु मे से कोइ एक कि अगर मृत्यु हो जाइ तो?” और फिर आप शीर उतार ने लडवारा बस्ते तयार हो और मु. मारा स्वामी आप कि साथ मे सती होवारा बास्ते तयार हु. और इस कारण आपने और मेरे पीताजी ने बीडा उठाया था.
भट्टीयाणी के द्रढता भरे वचन सुनकर तोगाजी गदगदीत थे लेकीन उनको एक विचार हुआ कि भट्टीयाणीजी को यह सवाल हुआ कि अधीक अवधी लेने पर आग्रा कुच से पहले १२-१३ मास कि ज्यादा अवधी लेने पर उस अवधी पर हि किसी कि मृत्यु हो गइ तो क्योंकि आखीरकार जीना मरना तो इश्वर के हाथ मे हे,
और इसके बाद वे अपनी माता से आर्शीवाद लेने गये और उसके बाद छावणी मे जाकर सरदारो से यहि बात रखी और कहा कि अब आग्रा पर कुच करनी हे महाराजा गजसिंहजी को संदेशा भीजवा दिया जाय कि कोइ मुद्दत नहि लेनी.
तोगाजी कि सवारी आग्रा आ पहुंची.
“अठै सुजस प्रभुता उठे, अवसर मरियां आय;
मरणो धररौ मांजीया, जम न नरक लै जाय”

प्रातकाल होने पर सुर्यवंशी राठोड विर तोगाजी प्राण अपर्ण करने के लीये सज्ज थे, सभी राजपुत के रोम रोम मे क्षत्रीय कुल का अभीमान गर्जना कर रहा था,
राजपुतो के पडाव से बादशाह को समाचार भीजवाया गया, “आपको ठीक लगे इस प्रकार आग्रा का बंदोबस्त करो, राजपुतो के साथ तोगाजी तुम सभी को क्षात्रवट दिखाने को आयेगे.”
इस के बाद राजपुतो ने तैयारी चालु कर दि, सभी उमराव , गजसिंह और तोगाजी हाथी पर सवार हुवे और आग्रा मे हाथीओ कि सवारी नीकली जीनकि दोनो तरफ चार चार घुडसवार योध्धा थे विर तोगाजी के जयजयकार के घोष के साथ सवारी आगे बढ रहि थी राजपुतो ने भारी दबदबे के साथ दरबार मे प्रवेश किया, वहा तोगाजी ने आसन जमाया बादशाह ने दगलबाजी का इंतजाम भी कर रखा था, उन्हो एक एक्के को इशार कर तोगाजी का सर पीछे से काटने को कहा.. तोगाजी सचेत थे खडे हो गये और इसके साथ और गजसिंह और सभी राजपुत खडे हो गये महाराजा ने सोने का थाल आगे किया तोगाजी ने त्वरीत अपनी तलवार से अपना सर काट थाल मे उतारा और तोगाजी के धड ने उस एक्के को मार गीराया,
पध्धरी छंद
“तोगाजी आया दरबार मांह, बैठउ रख्यो आसन ज्याह,
पतशाह एक परपंच किन, नीज एक्का को अस समज दीन…
तुरंत तोगा कर माह धार, आये कर थाल धार,
वंदि महाराज बार बार, तिहि चाल माह दीन शिर उतार,
प्रथमहि एक्काको किन दोय, महाराज कह्यो दिशी वाम जोय,
जह तुर्क नको बैठो समाज, तिहि दिशी फिर्यो राठोडराज.
महाराज संग रहिके बिरदाय, तोगाजु तेग कठीन चलाय,
भगेउ तुर्क लखि तोणा तेग, सैयद पठान मोग्गल बेग. ”

छंद नाराचः
भगे तुरक्क जे बचे निरख्ख काल निज को,
परज्यु तेग भान होत मानु घाव बिज्ज्को;
जुधाणनाथ कह्यो “न तुर्के कोउ अठे ”
कंबध विर को कबंध चाल्यो शाहजहा हे जठे..

विर तोगाजी के कंबध ने बादशाह के एक्के को मारा , महाराजा गजसिंहने कहा “रंग मरदा रंग, क्षात्रावटरा तेज न रंग हे.” अब आपरी डाबी बाजु पधारो, अठे यवन बैठा हे.”
तोगाजी के धड को देख कोन तुर्क कोन पठान , मुगल या बैग सभी तुर्क भागने लगे.जो बचे वो तोगाजी कि तलवार से मारे गये.
भगे तुरक्क जे बचे निरख्ख काल निज को,
परज्यु तेग भान होत मानु घाव बिज्ज्को;
जुधाणनाथ कह्यो “न तुर्के कोउ अठे ”
कंबध विर को कबंध चाल्यो शाहजहा हे जठे..
गजसिंह ने कहा अब यहा कोइ तुर्क नहि इससे तोगाजी शाहजहा को मारने आगे बढे शाहजहा घबराकर हुरमखाने मे भाग गया और तोगाजी वहा नहि जा सके क्योकि उनकि क्षत्रीय धर्म कि ये मर्यादा थी और
प्रतच्छ काल भाल के हुर्र्मखाने ‘सा’बस्यो,
कबंध ताहिके पिछे हुरम्म खाने मे घस्यो;
लुकाय बेठ शाह जा हुरर्र्म शरण्य मै,
कबंध क्रोधवत भौ कैसे करु बरण्य में
शाहजहा ने गजसिंह से विंनती कि और तोगाजी से खुद को बचाने को कहा,
गजसिंह ने कहा कि हे बाप..! क्षत्रीयो के ताज..! आप बजार मे पधारे
दोहाः
सुने बेन जब शाह के , दया हुइ महाराज;
कह बिरदाय कंबध को, पलट बजारहि राज.
सुनी बैन नरनाह के, पलटायो तुरंत कबंध;
सकल तुर्क लुकगे मनौ, करिके प्रथम प्रबंध.

बजार मे कोइ यवन नहि था सिर्फ क्षत्रीय हि थे उन्होने कंबध को देख विरहाक गर्जना कि
छंद नाराचः

बजार मांह ठाम ठाम छत्री वीर राजींत,
कबन्ध क्रोधवंत देखि बिर हाक बाजित;

चले चरं सुशिवके सुलेन शिर विरको ,
राठोर कालसे खडे न देखी धीर धीरको.
करे प्रपंच सो अति न वीर धीर से चल,
राठोर निज ध्यानते कंबध शिर ना टले.

और वहा कोइ यवन नहि मीलने पर तोगाजी और आगे बढे और अग्रा कि गलीयो मे जाकर सभी यवनो को मारने लगे उनके साथे सभी राठोड सरदार भी साथ चल पडे. अनेक यवनो का खात्मा कर तोगाजी और पीछे पीछे गजसिंह और राजपुती सेना एक गली मे दाखील हुइ. उस जगह पर गलीयारे मे नीले रंग का प्रवाहि जो कपडा सफेद करने को काम आता हे(indigo) और क्षत्रीय जीसे अपवित्र समजते हे उस से तोगाजी स्पर्श हुआ और वे अचेतन हो गये महाराजा गजसिंह ने उनके शांत पडे धड को संभाला..
तोगाजी कि मृत्यु के बाद अब भट्टीयाणी ने अपने स्वामी के साथ जमुनाजी के किनारे सती हुइ.

सर कटने के बाद धड लड सकता हे इस कारण राठोडो को कम्ध्वज कहा जाता हे,
एसे विर योध्धाओ मे अगर गुजरात के काठीयावाड कि बात करे तो मोखडाजी गोहिल, वत्सराज सोंलकि ने बिना सर के युध्ध किया था. काठी क्षत्रीयो मे विर चांपराजवाळा(जेतपुर) और गोदड खाचर ने भी बिना शीष युध्ध किया था
क्षत्रीयो सबसे अधिक बलशाली और धर्म रक्षक जाती हे, लेकीन क्षत्रीय आज भी एकता नहि साध पाये आज क्षत्रीयो को एकता कि दिशा मे काम करना जरुरी हे. हम क्षत्रीय सिर्फ एसी कथाओ से बडाइ ना हांके बलके हमारे संस्कार और हमारे पुर्वजो के बारे मे सोचे. नशा का त्याग करे उच्च शीक्षा प्राप्त करे लेकीन साथ हि हमारे क्षत्रीय इतीहास का उजागर करना और और स्मारको कि दशा पर भी ध्यान देना चाहिए..
जय क्षत्रीय धर्म
जय माताजी
इती शुभम

Togaji Rathore / तोगारी तलवार

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तोगाजी राठोडः

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कटारी अमरेशरी(१),तोगारी(२) तलवार;
हथ्थल रायां(रायसिंहजी) संघरी(३),दिल्लीरा दरबार.
प्रस्तुत दोहे मे ३ क्षत्रीयो जीन्होने दिल्ली के बादशाहो को अपनी शक्ति हतप्रभ कर दिया,
जिसमे
(१)अमरसिंह राठोडःनागौर के राव अमरसिंह ने अपनी कटार से शाहजहा की कचेरी मे शाहजहा के साले सलाबत खां को मारडाला,और शाहजहा खुद को जेसे तेसे बचा कर भागा। (काठीयावाड ग्लोरी मे यह स्टोरी रखी गइ थी। )
(२)तोगाजी राठोडःआज कि हमारी वार्ता के नायक जिन्होने राजपुतो का सिर लडने के बाद भी धड युध्ध कर सकता हे ये साबित करने के लीये खुद का सिर कटाकर यवन सेना पर हमला कर दिया और अपनी तलवार से कइ यवनो को समाप्त कर दिया।
(३) रायसिंह जालाः काठीयावाड के धांग्रधा के रियासत के रायसिंहजी जाला अकबर के आमंत्रण पर दिल्ली गये थे ,वहा उन्होने अकबर के एक शक्तिशाली मल्ल(पहेलवान)को अपने हथेली के पंजे से पकडकर दिवाल पर पटक के मार दिया।
इ.स. १६२० से १६३८ के मध्य कि हकिकत हे यह कथा..
तब जोधपुर मे महाराजा गजसिंह का शासन था और तोगाजी राठोड रोहिण्डी ठिकाने के जागीरदार थे।
दिल्ली के दरबार मे कचहरी मे कोइ प्रश्न या विषय पर चर्चा विद्वानो मे होती रहेती थी।
उस समय मे भी एसी हि एक सभा मे जीसमे ७० खान, ७२ उमराव अन्य सरदार, दिवान, मंत्री, पटावत, पटावरी, काजी, पंडित अपने नियत स्थान पर बिराजमान थे। दिल्ली का शहनशाह शाहजहा मयुरासन पर बेठा था।
शहनशाह बोलाः “तुम खान, उमराव लोग सब मेरे दरबार मे शामील हो, मुजको एक एसा सवाल हुवा हे कि मुसलमान बादशाहत होने के बावजुद यहा पहले से ७२ हिन्दु उमराव और ७० खान क्यो? संख्या मे खान कम क्यो हे?
बादशाह के एसे वचन सुनकर अंतवेद जील्ले का सुबा मीर खानजा खान खडा हुआ उसने कहा कि दो काम हिन्दु कर सकते हे वो मुसलमान नहि कर सकते इस कारण हिन्दु उमरावो कि संख्या ज्यादा हे,
वो कोन सी दो बाते मीर? आप मुजे सुनाओ.. जो सिर्फ हिन्दु हि कर सकते हे.. आपको पुरी खातरी हे क्या..?
खानजाः बराबर खातरी हे, और मे हिम्मत से कह भी सकता हु. वो दोनो बाते खुली हि १)राजपुत अपना सर धड से अलग होने के बाद भी लडते हे और २)और इनकी पत्नी चीता मे उनके साथ जलकर सती होती हे
शाहजाहा न कहाः तो आपको यह दिखाकर भी साबित करना होगा तुम को छह माह दिया जाता हे, वरना तुम को मार दिया जायेगा और तुम्हारा शब शाहि हवाल किया जायेगा।
मिरखानजा को हुवा यह बादशाह का केसा काम? सवाल करना और जवाब से हठ कर परेशान करना? सिर्फ इसी कारण से मे किसको मरने के लीये तैयार करु..?

“जो नृपपै अधिकार ले,करे न पर उपकार;
तौ ताके अधिकार मे, रहे ना आदि ओमकार”

जोधपुर के महाराजा गजसिंह भी सभा मे मोजुद थे उनको बादशाह के वर्तन से खेद हुआ कि क्षत्रीयो कि विरता कि बाते उजागर करने से मिरखान आफत मे आ गये..उन्होने मदद देने कि ठानी और अपने मुकाम पर आये और सभी उमरावो को निमंत्रण दिया..और साथ मे मिरखान जी को भी निमंत्रण देने के लीये चोबेदार को भेजा..!
नियत समय पर सभी इकठ्ठे हुए. और महाराजा ने क्षत्रीयो के सभा मे कहाः
“आपणा हघळा राजा लोग आजरा दरबार मे हाजर हा, अर आपाणा हघळांरी हजुर में, या मीर खानजा खानरी सघळी बाते बादशाहसुं से हुइ. इण मे मीर साहबरो कोइ बातरो लाभ हो नहि, परंतु मात्र राजपुंतरो राजपुतणो मुसलमान से तेज हे, इतरो दिखवाणरा बास्ते इनोंने बादशाहसुं सघळी हकिकत हि सों करी, जीससे बादशाह नाखुश हुयगो. अर खानजा को ६ महिनो्मे हकिकत सत्य करके दिखवाणरो कह्यों. इससे आपणे इण बाबत ने मिरखानजी कि मदद करणी हे। ”
सभी उमराव सहमत थे इससे खानजा सरदार बोलेः
“हुजुर! खुदा सच कि साथ मे रहता हे, अगर यह बात सच ना होती तो आप के दिलो मे मेरे लीये इतनी महेरबानी कहासे होती”
इस सभा के बाद सभी अपने मुकाम पर गये थोडे दिनो मे महाराजा गजसिंह और मिरखान जोधपुर मे मीले।
काछद्रढा, कर बरसणा, मन चंगा, मुख मिठ्ठ;
रणसुरा, जगवल्ल्भा, सो मे बिरला दिठ्ठ
जोधपुर दरबार मे सभी सरदार उपस्थीत थे, और क्षत्रीयो को अपना सर कटाकर युध्ध लडने का बिडा फिराया गया तीन बाद बिडा फिरने पर विर तोगाजी राठोड खडे हुए उन्होने कहा कि मुजे विश्वास हे कि मेरा सर कटने के बाद भी धड लड सकता हे, परंतु मारो लग्न होवो कोय नहि,जीणसु मोरे पीछु सती होनेवाला कोइ नहि. मे शीर उतारने लडवारा बास्ते मे या बीडा उठावुहु.
महाराजाः “रंग हे, थाने रंग हे जाजा रंग हे..” तोगाजी कि शादि के हेतु एक और बिडा सभा मे फिराया गया, और ओसिया के एक भाटी कुल के सरदार ने वो बीड़ा उठाया और अपनी पुत्री का बियाह तोगाजी से निश्व्त किया,
भाटी कुल री रीत ,आ आनंद सु आवती !
करण काज कुल कीत, भटीयानिया होवे सती !!

Vankaner State / वांकानेर का रणजीत विलास पैलेस

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गरवी गुजरात मध्ये इष्टदेश झालावाड

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Ranjit Vilas Palace

झाला राजवंशीयौ की गुजरात मे सात रियासते है इनमे से ऐक है गढ वांकानेर की रियासत और उस राज्य मै खडा गगन चुंबी ” रणजित विलास ” महेल इस पेलेस की गणना पुरे सौराष्ट्र और गुजरात मै अव्वल है वांकानेर के महाराजा श्री अमरसिंहजी ने इ.स १९०७ मै शुरु करवाया था दो मजहब वाले इस पेलेस को बनाने मै धोलपुरी गुलाबी पथ्थर , इटालीका संगे मरमर , राजस्थान के श्वेत पथ्थर बेल्यिम के काले पथ्थर का उपयोग हुवा है,, महल के टावर मै लगी विशाल घडी इंग्लेड सै मंगवायी थी,,महेल का काम पुरे २० साल तक चला और इ.स १९२७ मै पुरा हुवा महाराजा अमरसिंहजी के मित्र और रिस्तेदार विश्वप्रसिध्ध क्रिकेटर जामश्री रणजितसिंहजी ( जाम रणजी ) के नाम पर इस गगन चुंबी इमारत का नाम ” रणजित विलास ” रख्खा ,,
जय हरशक्ति,,,, जय झालावाड
History of Zalawad

Halwad state / हलवद राज्य की स्थापना

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” गरवी गुजरात मध्ये इस्टदेश झालावाड ”

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परं झालावाड महामंडल मै झाला राजवंशीयौ की ७ रियासत है इनमै सै प्रमुख राजवंश सोढाणवंश के २२ मे झल्लेश्वर महाराजा श्रीराज राज्जोधरजीदेव इ. स १४८६ मै गढ कंकावटी के श्रीराज थै ऐक दिन महाराजा राज्जोधरजीदेव कंकावटी के उतर~पूवँ के जंगलो मै शिकार करने निकले तो उनके घोडे के सामने खरगोस दिखा फिर शिकार करने के लियै उन्होने अपना भाला खरगोस के सामने उठाया तो बहादुर खरगोस ने अपने आगेके दोनो पैरो को उपर उठाके राज्जोधरजीदेव का सामना करने की कोशिश की श्रीराज सोचते रहै और खरगोस चला गया श्रीराज राज्जोधरजीदेव ने वहा पै निशान करके गढ कंकावटी आके जंगल में बनी खरगोस की घटनाका का सभि राजदरबारी और सांमतो के साथ विचार विमसँ करके उस भुमी के खरगोस के शौयँ,, बहादुरी और पराक्रम को देख इ. स १४८८ मै गढ कंकावटी से हलधरपट्ट पर अपनी नई राजधानी गढ हळवद का निमाँण किया,,,,, अस्तु,,,, ओम,,,शांति,  जय हरशक्ति,,,,, जय झालावाड.
( फोटो सौजन्य ~ महाराज कुमार श्रीजयसिंहजीदेव ओफ धांगधरा स्टेट )
( माहीती स्तोत्र ~ झाला राजवंशीयौ के राजबारोट की वही मैसे )
History of Zalawad

भारत का प्रथम राष्ट्रध्वज / First flag of india

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स्वतंत्र भारत का प्रथम राष्ट्रध्वज आजादी के ४० साल पहेले झाला राजवंशी मांगुजी शाखा लिंबडी भायात कंथारीया गांवके क्रांन्तिकारी सरदारसिंहजी रवाजी झाला ( राणा ) ने मेडम भिखायजी कामा के साथ लहेराया था ,,,,जय हिन्द,,,जय,,,गुजरात,,, जय सौराष्ट्र,,,,,जय झोमवंती झालावाड,,,,

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झाला वंश कीर्तिगाथा / History of Zala

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जाला वंश किर्ति कथाः(काठियावाड ग्लोरी)
पार्ट २ (जालावंश स्थापक हरपाळदेव)

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ZALA-RANA SHAKHAGOTRA

गाम मशाली तणे, बिरद रावण बोलाव्यो;
अंग थकि औदिच्य, तेणे मंगळ वर्ताव्यो.
पोहो पाटण परणियो, जगत को नात ना जाणी,
हुवा देव हरपाळ, शक्ति रीजी थइ गइ राणी.
संसार वात राखी सही, अमरवेल उतपन्न करी;
सोढो, मांगो, ने शेखरो , बा उमादे दिकरी.

हरपाळदेव ने पिताकी मृत्यु के बाद कुछ समय पराश्रय मे व्यतीत किया..

एक दिन करणदेव को परेशान करने वाले बाबरा से युध्ध कर हराया. बाबरा सुर माता के उपासक और अलोकीक शक्ति का ग्याता थे, उनको हराने के बाद वचन लीया जब मे याद करु तब मेरे कार्य मे मदद को आना होगा।
    बाबरा से लडाइ के बाद हरपाळ्देव को बहोत भुख लगी और अपने साथ दो बकरे खाने के लीये स्मशान गये (दुसरे विद्वान कहते हे श्मसान मे कोइ अनुष्ठान के लीये गये) ,  तब उस स्मशान मे रहने वाली भैरवीदेवी अदर्श्य रहकर  भोजन की मांग की हरपाळ ने दोनो बकरे दे दिये। देवी ने कहा और भोजन चाहिये तब हरपाळ ने अपनी जंघा काट मांस दिया। हरपालजी के इस व्यवहार से देवी प्रसन्न हुइ और प्रगट होकर कहा हरपाळजी आप शीव के अंश हे और पार्वतीजी का अंश ने पाटण मे हि प्रतापसिंह सोंलकी की पुत्री स्वरुप जन्म लीया हे आप उन से विवाह करो
  (कुछ विध्वानो का कहना हे बाबरा को हराने से पहेले हरपालजी स्मशान गये थे और देवी ने प्रसन्न होकर बाबरा को हराने का वरदान दिया था।)

     दुसरे दिन राजा करण सोलकि के दरबार मे बाबरा को हराने की बात पर बहोत प्रंशषा हुइ और करणदेव ने कुछ मांगने को कहा। हरपाळजी ने कहा की एक रात मे जीतने गांवे के तोरण बांधलु उतने गांव मुजे दे देना।
   राजाने हा कहि इसके बाद हरपाळ ने बाबरा के सहाय से २३०० गांवो मे तोरण बांध लीये. पहेला गांव पाटडी था और अगली सुबह से पहेले बांधा हुवा २३०० मा गांव दिधडियु  कहलाया। और मशाली गांव मे हरपाळजी ने शक्तिदेवी से शादि कि। पाटडी को राजधानी बनाकर हरपाळजी शासन करने लगे। और भाल परगणा के ५०० गांव फुलादेवी को बहन मान विरपसली के रुप मे को वापीस कर दिये।  पाटडी को राजधानी बनाकर वि.सन ११५६ मे बाबरा के द्वारा गढ बांध राज शासन का शीलान्यांस करते हे।

तु सुण्यो सांमत, दैत्य सब भाग्या डोटे,
तु सुण्यो सांमत, चडपडे लीधा चोटे;
तु सुण्यो सांमत, शक्ति राखी करी राणी;
तु सुण्यो सांमत, अढारसे घर घर आणी;

हरपाळ वडो जमरो हथो, दिन दिन अधीको दाखीये,
तुंआरो तोल केसर तणो, इला सामंत ना चाखीये।

एक दिन गजशाला मे से हाथी छुट गया. और रास्ते मे हरपाळजी के कुंवर खेल रहे थे। तब देवी शक्ति ने महल की बारी से हि अपने  हाथ  द्वारा कुंवरो को एक तरफ कर दिया, और एक चारण बाल को टपरी मार दुर कर दिया(उस चारण के वंशज टपारीया चारण कहेलाने लगे।) और हरपाळ्जी के वंशज जाला कहलवाने लगे।

पाटडी ए पोहोपाट, महेल कीधो मकवाणे,
राणी गोख रहंत, गतीको शक्ति न जाणे।
राय् तणा गजराज , मेह छुट्या मदमंता,
दूर पंथ देखीया, राजवि कुंवर रमता;
सोढो, मांगो , ने शेखरो , लांबे कर जाली लीया,
ओ आपे शक्ति आपणी, कुंवर शाख जाला किया।

धांग्रधा राज्य के हळवद मे बाबरा का स्मारक हे, और वो स्थान पीठड के नाम से जाना जाता हे। और हळवद दरबार मे मां शक्ति का मंदिर हे.  इस दोनो स्थान पर जाला कुटुंब विवाह अवसर पर दर्शन पर आते हे।
   भाट चारण लीखते हे कि हरपाळ वंश की ९ शाखा हुइ,

मकवाणा राणींग, बहो बाबल बरदाळा,
लज्जावंत लूणंग, भला बलो अचभाइ;
खतरवट राखण खांट, जके पाराकर जाणु,
विठोड ने हापेव,  जके  जलराव वखाणु;

नवशाखा नवखंड मां, मकवाणा दसमो मणी,
एटली शाखा उजळतल, तिलक शाख जाला तणी.

शक्ति देवी उपरांत हरपाळजी ने थरपाकर के सोढा राजकुंवरी राजकुंवरबा से विवाह किया था। हरपाळजी ने १०९० से ११३० तक ४० साल तक शासन किया।
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Jhalawad Makvana shree Harpaldev JanmJayanti/झालावाड़ स्थापक श्री हरपालदेव जी

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आजे महा सुद तेरस (हरप्रभाव तेरस) एटले पावन भूमि इष्टदेश झालावाड़ प्रांत ना स्थापक श्री राज हरपाळदेवजी दादा ना 951 मी जन्मजयंति ना पावन अवसर पर तमाम झाला भाइओ अने झालावाडीओ ने जय हरशक्ति
जय झालावाड़
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हरपाळ वडो जमरो हथो, दिन दिन अधीको दाखीये,
तुंआरो तोल केसर तणो,  इला  सामंत ना  चाखीये।

तु सुण्यो सांमत, दैत्य सब भाग्या डोटे,
तु सुण्यो सांमत, चडपडे लीधा चोटे;

तु सुण्यो सांमत, शक्ति राखी करी राणी;
तु सुण्यो सांमत, अढारसे घर घर आणी;
    
👏आजे झाला-राणा परीवारना पिताक्ष्रि ने शिवना अंश अवतार ने झालावाडना राजा एवा हरपालदादा नो जन्म दिवस छे तो ए मंगल दिवसे दादा हरपाल देव ने कोटी👏कोटी वंदन.

     जय हर शक्ति
🚩जय झालावाड🚩

जय माताजी