Togaji Rathore / तोगारी तलवार

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कटार अमरेस री, तोगा री तलवार !
हाथल रायसिंघ री , दिल्ली रे दरबार !!
तोगारी तलवार..

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तोगाजी का विवाह भट्टी राजकुमारी से होना तय हुवा और राजकुमारी को इस समाचार का पता चला तो वे भी हर्षीत हुइ के उनके पीताने विरोचीत मृत्यु को स्वीकार करने स्वयं जाने वाले तोगाजी के लीये उनको चुना और राजपुती शान के लीये उन्हो ने खुद पती के मृत्यु के बाद सती होना स्वीकार किया..
रजवट राखण माण , रखण माण मीर खानजा;
ग्रहण भटीयाणी पाण, तेगां घर तोगो चाल्यो.
महाराजा गजसिंह ने जोधपुर से एक शाहि विवाह तोगाजी का शाहि विवाह सजाया. विवाह बाद कि प्रथम रात्री पर तोगाजी भटीयाणी के डेरे पर ना गये और राजपुतो के साथे छावनी मे बेठे.. इधर कुछ राजपुतो ने मीरखान को कहा कि आप बादशाह से १२-१३ मास कि अवधी बढा लो जीससे तोगाजी जेसे विर और भतीयाणी जेसी सती का वंश बच जाय, और राजपुतो ने यह बात तोगाजीसे भी कहि,
तोगाजी ने मना कर दिया और नियत अवधी पर हि आग्रा कि सवारी करने को कहा.
लेकीन आखीरकार उनको राजपुतो की जीद माननी पडी और दुसरी रात्री वे अपनी धर्म पत्नी से मीलने हवेली पहोचे.. यहा भट्टीयाणी जान चुकि थी कि बादशाह से अधिक अवधी लेने का फेसला हुवा हे, उन्होने एक विरांगना क्षत्राणी के भाती अपने पती को उदबोधन किया कि, “हे स्वामीनाथ! आप हघळा सरदारो से कहलवा दो कि अधीक मुदत लेने पर इन मुदतमे आपण दोनु मे से कोइ एक कि अगर मृत्यु हो जाइ तो?” और फिर आप शीर उतार ने लडवारा बस्ते तयार हो और मु. मारा स्वामी आप कि साथ मे सती होवारा बास्ते तयार हु. और इस कारण आपने और मेरे पीताजी ने बीडा उठाया था.
भट्टीयाणी के द्रढता भरे वचन सुनकर तोगाजी गदगदीत थे लेकीन उनको एक विचार हुआ कि भट्टीयाणीजी को यह सवाल हुआ कि अधीक अवधी लेने पर आग्रा कुच से पहले १२-१३ मास कि ज्यादा अवधी लेने पर उस अवधी पर हि किसी कि मृत्यु हो गइ तो क्योंकि आखीरकार जीना मरना तो इश्वर के हाथ मे हे,
और इसके बाद वे अपनी माता से आर्शीवाद लेने गये और उसके बाद छावणी मे जाकर सरदारो से यहि बात रखी और कहा कि अब आग्रा पर कुच करनी हे महाराजा गजसिंहजी को संदेशा भीजवा दिया जाय कि कोइ मुद्दत नहि लेनी.
तोगाजी कि सवारी आग्रा आ पहुंची.
“अठै सुजस प्रभुता उठे, अवसर मरियां आय;
मरणो धररौ मांजीया, जम न नरक लै जाय”

प्रातकाल होने पर सुर्यवंशी राठोड विर तोगाजी प्राण अपर्ण करने के लीये सज्ज थे, सभी राजपुत के रोम रोम मे क्षत्रीय कुल का अभीमान गर्जना कर रहा था,
राजपुतो के पडाव से बादशाह को समाचार भीजवाया गया, “आपको ठीक लगे इस प्रकार आग्रा का बंदोबस्त करो, राजपुतो के साथ तोगाजी तुम सभी को क्षात्रवट दिखाने को आयेगे.”
इस के बाद राजपुतो ने तैयारी चालु कर दि, सभी उमराव , गजसिंह और तोगाजी हाथी पर सवार हुवे और आग्रा मे हाथीओ कि सवारी नीकली जीनकि दोनो तरफ चार चार घुडसवार योध्धा थे विर तोगाजी के जयजयकार के घोष के साथ सवारी आगे बढ रहि थी राजपुतो ने भारी दबदबे के साथ दरबार मे प्रवेश किया, वहा तोगाजी ने आसन जमाया बादशाह ने दगलबाजी का इंतजाम भी कर रखा था, उन्हो एक एक्के को इशार कर तोगाजी का सर पीछे से काटने को कहा.. तोगाजी सचेत थे खडे हो गये और इसके साथ और गजसिंह और सभी राजपुत खडे हो गये महाराजा ने सोने का थाल आगे किया तोगाजी ने त्वरीत अपनी तलवार से अपना सर काट थाल मे उतारा और तोगाजी के धड ने उस एक्के को मार गीराया,
पध्धरी छंद
“तोगाजी आया दरबार मांह, बैठउ रख्यो आसन ज्याह,
पतशाह एक परपंच किन, नीज एक्का को अस समज दीन…
तुरंत तोगा कर माह धार, आये कर थाल धार,
वंदि महाराज बार बार, तिहि चाल माह दीन शिर उतार,
प्रथमहि एक्काको किन दोय, महाराज कह्यो दिशी वाम जोय,
जह तुर्क नको बैठो समाज, तिहि दिशी फिर्यो राठोडराज.
महाराज संग रहिके बिरदाय, तोगाजु तेग कठीन चलाय,
भगेउ तुर्क लखि तोणा तेग, सैयद पठान मोग्गल बेग. ”

छंद नाराचः
भगे तुरक्क जे बचे निरख्ख काल निज को,
परज्यु तेग भान होत मानु घाव बिज्ज्को;
जुधाणनाथ कह्यो “न तुर्के कोउ अठे ”
कंबध विर को कबंध चाल्यो शाहजहा हे जठे..

विर तोगाजी के कंबध ने बादशाह के एक्के को मारा , महाराजा गजसिंहने कहा “रंग मरदा रंग, क्षात्रावटरा तेज न रंग हे.” अब आपरी डाबी बाजु पधारो, अठे यवन बैठा हे.”
तोगाजी के धड को देख कोन तुर्क कोन पठान , मुगल या बैग सभी तुर्क भागने लगे.जो बचे वो तोगाजी कि तलवार से मारे गये.
भगे तुरक्क जे बचे निरख्ख काल निज को,
परज्यु तेग भान होत मानु घाव बिज्ज्को;
जुधाणनाथ कह्यो “न तुर्के कोउ अठे ”
कंबध विर को कबंध चाल्यो शाहजहा हे जठे..
गजसिंह ने कहा अब यहा कोइ तुर्क नहि इससे तोगाजी शाहजहा को मारने आगे बढे शाहजहा घबराकर हुरमखाने मे भाग गया और तोगाजी वहा नहि जा सके क्योकि उनकि क्षत्रीय धर्म कि ये मर्यादा थी और
प्रतच्छ काल भाल के हुर्र्मखाने ‘सा’बस्यो,
कबंध ताहिके पिछे हुरम्म खाने मे घस्यो;
लुकाय बेठ शाह जा हुरर्र्म शरण्य मै,
कबंध क्रोधवत भौ कैसे करु बरण्य में
शाहजहा ने गजसिंह से विंनती कि और तोगाजी से खुद को बचाने को कहा,
गजसिंह ने कहा कि हे बाप..! क्षत्रीयो के ताज..! आप बजार मे पधारे
दोहाः
सुने बेन जब शाह के , दया हुइ महाराज;
कह बिरदाय कंबध को, पलट बजारहि राज.
सुनी बैन नरनाह के, पलटायो तुरंत कबंध;
सकल तुर्क लुकगे मनौ, करिके प्रथम प्रबंध.

बजार मे कोइ यवन नहि था सिर्फ क्षत्रीय हि थे उन्होने कंबध को देख विरहाक गर्जना कि
छंद नाराचः

बजार मांह ठाम ठाम छत्री वीर राजींत,
कबन्ध क्रोधवंत देखि बिर हाक बाजित;

चले चरं सुशिवके सुलेन शिर विरको ,
राठोर कालसे खडे न देखी धीर धीरको.
करे प्रपंच सो अति न वीर धीर से चल,
राठोर निज ध्यानते कंबध शिर ना टले.

और वहा कोइ यवन नहि मीलने पर तोगाजी और आगे बढे और अग्रा कि गलीयो मे जाकर सभी यवनो को मारने लगे उनके साथे सभी राठोड सरदार भी साथ चल पडे. अनेक यवनो का खात्मा कर तोगाजी और पीछे पीछे गजसिंह और राजपुती सेना एक गली मे दाखील हुइ. उस जगह पर गलीयारे मे नीले रंग का प्रवाहि जो कपडा सफेद करने को काम आता हे(indigo) और क्षत्रीय जीसे अपवित्र समजते हे उस से तोगाजी स्पर्श हुआ और वे अचेतन हो गये महाराजा गजसिंह ने उनके शांत पडे धड को संभाला..
तोगाजी कि मृत्यु के बाद अब भट्टीयाणी ने अपने स्वामी के साथ जमुनाजी के किनारे सती हुइ.

सर कटने के बाद धड लड सकता हे इस कारण राठोडो को कम्ध्वज कहा जाता हे,
एसे विर योध्धाओ मे अगर गुजरात के काठीयावाड कि बात करे तो मोखडाजी गोहिल, वत्सराज सोंलकि ने बिना सर के युध्ध किया था. काठी क्षत्रीयो मे विर चांपराजवाळा(जेतपुर) और गोदड खाचर ने भी बिना शीष युध्ध किया था
क्षत्रीयो सबसे अधिक बलशाली और धर्म रक्षक जाती हे, लेकीन क्षत्रीय आज भी एकता नहि साध पाये आज क्षत्रीयो को एकता कि दिशा मे काम करना जरुरी हे. हम क्षत्रीय सिर्फ एसी कथाओ से बडाइ ना हांके बलके हमारे संस्कार और हमारे पुर्वजो के बारे मे सोचे. नशा का त्याग करे उच्च शीक्षा प्राप्त करे लेकीन साथ हि हमारे क्षत्रीय इतीहास का उजागर करना और और स्मारको कि दशा पर भी ध्यान देना चाहिए..
जय क्षत्रीय धर्म
जय माताजी
इती शुभम

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