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भारतीय राष्ट्रीय संवत – शक संवत ( Saka Era ) >>>डा. सुशील

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भारतीय राष्ट्रीय संवत – शक संवत ( Saka Era )
>>>डा. सुशील भाटी                                         
Kanishka’s Emblem

शक संवत भारत का राष्ट्रीय संवत हैं| इस संवत को कुषाण/कसाना सम्राट कनिष्क महान ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में 78 इस्वी में चलाया था| इस संवत कि पहली तिथि चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होती हैं जोकि भारत के विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान के राज्य रोहण की वर्ष गाठ हैं| शक संवत में कुछ ऐसी विशेषताए हैं जो भारत में प्रचलित किसी भी अन्य संवत में नहीं हैं जिनके कारण भारत सरकार ने इसे “भारतीय राष्ट्रीय संवत” का दर्ज़ा प्रदान किया हैं|

भारत नस्लीय, भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता वाला विशाल देश हैं, जिस कारण आज़ादी के समय यहाँ अलग-अलग प्रान्तों में विभिन्न  संवत चल रहे थे| भारत सरकार के सामने यह समस्या थी कि किस संवत को  भारत का अधिकारिक संवत का दर्जा दिया जाए| वस्तुत भारत सरकार ने सन 1954 में संवत सुधार समिति(Calendar Reform Committee) का गठन किया जिसने देश प्रचलित 55 संवतो की पहचान की| कई बैठकों में हुई बहुत विस्तृत चर्चा के बाद संवत सुधार समिति ने स्वदेशी संवतो में से शक संवत को अधिकारिक राष्ट्रीय संवत का दर्जा प्रदान करने कि अनुशंषा की, क्योकि  प्राचीन काल में यह संवत भारत में सबसे अधिक प्रयोग किया जाता था| शक संवत भारतीय संवतो में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, सही तथा त्रुटिहीन हैं, शक संवत प्रत्येक साल 22 मार्च को शुरू होता हैं, इस दिन सूर्य विश्वत रेखा पर होता हैं तथा दिन और रात बराबर होते हैं| शक संवत में साल 365 दिन होते हैं और इसका ‘लीप इयर’ ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ के साथ-साथ ही पड़ता हैं| ‘लीप इयर’ में यह 23 मार्च को शुरू होता हैं और इसमें ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ की तरह 366 दिन होते हैं|

पश्चिमी ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ के साथ-साथ, शक संवत भारत सरकार द्वारा कार्यलीय उपयोग लाया जाना वाला अधिकारिक संवत हैं| शक संवत का प्रयोग भारत के ‘गज़ट’ प्रकाशन और ‘आल इंडिया रेडियो’ के समाचार प्रसारण में किया जाता हैं| भारत सरकार द्वारा ज़ारी कैलेंडर, सूचनाओ और संचार हेतु भी शक संवत का ही प्रयोग किया जाता हैं|

जहाँ तक शक संवत के ऐतिहासिक महत्त्व कि बात हैं, इसे भारत के विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में चलाया था| कनिष्क एक बहुत विशाल साम्राज्य का स्वामी था| उसका साम्राज्य मध्य एशिया स्थित काला सागर से लेकर पूर्व में उडीसा तक तथा उत्तर में चीनी तुर्केस्तान से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैला हुआ था| उसके साम्राज्य में वर्तमान उत्तर भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान के हिस्सा, तजाकिस्तान का हिस्सा और चीन के यारकंद, काशगर और खोतान के इलाके थे| कनिष्क भारतीय इतिहास का एक मात्र सम्राट हैं जिसका राज्य दक्षिणी एशिया के बाहर मध्य एशिया और चीन के हिस्सों को समाये था| वह इस साम्राज्य पर चार राजधानियो से शासन करता था| पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) उसकी मुख्य राजधानी थी| मथुरा, तक्षशिला और बेग्राम उसकी अन्य राजधानिया थी| कनिष्क इतना शक्तिशाली था कि उसने चीन के सामने चीनी राजकुमारी का विवाह अपने साथ करने का प्रस्ताव रखा, चीनी सम्राट द्वारा इस विवाह प्रस्ताव को ठुकराने पर कनिष्क ने चीन पर चढाई कर दी और यारकंद, काशगार और खोतान को जीत लिया|

कनिष्क के राज्य काल में भारत में व्यापार और उद्योगों में अभूतपूर्व तरक्की हुई क्योकि मध्य एशिया स्थित रेशम मार्ग जिससे यूरोप और चीन के बीच रेशम का व्यापार होता था उस पर कनिष्क का कब्ज़ा था| भारत के बढते व्यापार और आर्थिक उन्नति के इस काल में तेजी के साथ नगरीकरण हुआ| इस समय पश्चिमिओत्तर भारत में करीब 60 नए नगर बसे और पहली बार भारत में कनिष्क ने ही बड़े पैमाने सोने के सिक्के चलवाए|

कुषाण/कसाना समुदाय एवं उनका नेता कनिष्क मिहिर (सूर्य) और अतर (अग्नि) के उपासक थे| उसके विशाल साम्राज्य में विभिन्न धर्मो और रास्ट्रीयताओं के लोग रहते थे| किन्तु कनिष्क धार्मिक दृष्टीकोण से बेहद उदार था, उसके सिक्को पर हमें भारतीय, ईरानी-जुर्थुस्त और ग्रीको-रोमन देवी देवताओं के चित्र मिलते हैं| बाद के दिनों में कनिष्क बोद्ध मत के प्रभाव में आ गया| उसने कश्मीर में चौथी बोद्ध संगति का आयोज़न किया, जिसके फलस्वरूप बोद्ध मत कि महायान शाखा का उदय हुआ| कनिष्क के प्रयासों और प्रोत्साहन से बोद्ध मत मध्य एशिया और चीन में फ़ैल गया, जहाँ से इसका विस्तार जापान और कोरिया आदि देशो में हुआ| इस प्रकार गौतम बुद्ध, जिन्हें भगवान विष्णु का नवा अवतार माना जाता हैं, उनके मत का प्रभाव पूरे एशिया में व्याप्त हो गया और भारत के जगद गुरु होने का उद् घोष विश्व की हवाओ में गूजने लगा|

कनिष्क के दरबार में अश्वघोष, वसुबंधु और नागार्जुन जैसे विद्वान थे| आयुर्विज्ञानी चरक और श्रुश्रत कनिष्क के दरबार में आश्रय पाते थे| कनिष्क के राज्यकाल में संस्कृत सहित्य का विशेष रूप से विकास हुआ| भारत में पहली बार बोद्ध साहित्य की रचना भी संस्कृत में हुई| गांधार एवं मथुरा मूर्तिकला का विकास कनिष्क महान के शासनकाल की ही देन हैं|
    
मौर्य एवं मुग़ल साम्राज्य की तरह कुषाण/कसाना वंश ने लगभग दो शताब्दियों (५०-२५० इस्वी) तक उनके जितने ही बड़े साम्राज्य पर शान से शासन किया| कनिष्क का शासनकाल इसका चर्मोत्कर्ष था| कनिष्क भारतीय जनमानस के दिलो दिमाग में इस कदर बस गया की वह एक मिथक बन गया| तह्कीके – हिंद का लेखक अलबरूनी १००० इस्वी के लगभग भारत आया तो उसने देखा की भारत में यह मिथक प्रचलित था कि कनिष्क की ६० पीढियों ने काबुल पर राज किया हैं| कल्हण ने बारहवी शताब्दी में कश्मीर का इतिहास लिखा तो वह भी कनिष्क और उसके बेटे हुविष्क कि उपलब्धियों को बयां करता दिखलाई पड़ता हैं| कनिष्क के नाम की प्रतिष्ठा हजारो वर्ष तक कायम रही, यहाँ तक कि भारत के अनेक राजवंशो की वंशावली कुषाण काल तक ही जाती हैं| क्या ये महज़ एक इत्तेफाक हैं कि मेवाड़ के सिसोदिया और टिहरी के पंवार अपना पूर्वज किसी कनक को मानते हैं? शाकुम्भरी के चौहान अपना पूर्वज किसी वासुदेव को मानते हैं, जबकि कनिष्क के पौत्र का नाम भी वासुदेव था|

शक संवत का भारत में सबसे व्यापक प्रयोग अपने प्रिय सम्राट के प्रति प्रेम और आदर का सूचक हैं, और उसकी कीर्ति को अमर करने वाला हैं| प्राचीन भारत के महानतम ज्योतिषाचार्य वाराहमिहिर (५०० इस्वी) और इतिहासकार कल्हण (१२०० इस्वी) अपने कार्यों में शक संवत का प्रयोग करते थे| उत्तर भारत में कुषाणों और शको के अलावा गुप्त सम्राट भी मथुरा के इलाके में शक संवत का प्रयोग करते थे| दक्षिण के चालुक्य और राष्ट्रकूट और राजा भी अपने अभिलेखों और राजकार्यो में शक संवत का प्रयोग करते थे|

मध्य एशिया कि तरफ से आने वाले कबीलो को भारतीय सामान्य तौर पर शक कहते थे, क्योकि कुषाण भी मध्य एशिया से आये थे इसलिए उन्हें भी शक समझा गया और कनिष्क कुषाण/कसाना द्वारा चलाया गया संवत शक संवत कहलाया| इतिहासकार फुर्गुसन के अनुसार अपने कुषाण अधिपतियो के पतन के बाद भी उज्जैन के शको द्वारा कनिष्क के संवत के लंबे प्रयोग के कारण इसका नाम शक संवत पड़ा|

शक संवत की लोकप्रियता का एक कारण इसका उज्जैन के साथ जुड़ाव भी था, क्योकि यह नक्षत्र विज्ञानं और ज्योतिष का भारत में सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था| मालवा और गुजरात के जैन जब दक्षिण के तरफ फैले तो वो शक संवत को अपने साथ ले गए, जहाँ यह आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं| दक्षिण भारत से यह दक्षिण पूर्वी एशिया के कम्बोडिया और जावा तक प्रचलित हो गया| जावा के राजदरबार में तो इसका प्रयोग १६३३ इस्वी तक होता था, जब वहा पहली बार इस्लामिक कैलेंडर को अपनाया गया| यहाँ तक कि फिलीपींस से प्राप्त प्राचीन ताम्रपत्रों में भी शक संवत का प्रयोग किया गया हैं

                        शक संवत एवं विक्रमी संवत

शक संवत और विक्रमी संवत में महीनो के नाम और क्रम एक ही हैं- चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, आसाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, पौष, अघन्य, माघ, फाल्गुन| दोनों ही संवतो में दो पक्ष होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष| दोनों संवतो में एक अंतर यह हैं कि जहाँ विक्रमी संवत में महीना पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष से शुरू होता हैं, वंही शक संवत में महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होते हैं| उत्तर भारत में दोनों ही संवत चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को आरम्भ होते हैं, जोकि शक संवत के चैत्र माह की पहली तारीख होती हैं, किन्तु यह विक्रमी संवत के चैत्र की १६ वी तारीख होती हैं, क्योकि विक्रमी संवत के चैत्र माह के कृष्ण पक्ष के पन्द्रह दिन बीत चुके होते हैं| गुजरात में तो विक्रमी संवत कार्तिक की अमावस्या के अगले दिन से शुरू होता हैं|

                                              सन्दर्भः
    U P  Arora , Ancient India: Nurturants of Composite culture,  Papers from The Aligarh Historians Society , Editor Irfan Habib, Indian History Congress, 66th sessions , 2006.
    A L Basham, The wonder that was India, Calcutta, 1991.
    Shri Martand Panchangam, Ruchika Publication, Khari Bawli, Delhi, 2012.
    Rama Shankar Tripathi, History of Ancient India, Delhi, 1987.
    D N Jha & K M Shrimali, Prachin Bharat ka  Itihas, Delhi University, 1991.
    Prameshwari lal Gupta, Prachin Bhartiya Mudrae,Varanasi, 1995.
    Lalit Bhusan, Bharat Ka Rastriya Sanvat- Saka Sanvat,Navbharat Times, 11 April 2005.

History & Literature

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विक्रम संवत

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हिन्दू नव वर्ष विक्रमी सम्वत 2073
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तदनुसार
08 अप्रैल 2016 को आरम्भ हो रहा है।

नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनायें !

शकों के अत्याचार से भारत को मुक्त
किया सम्राट विक्रमादित्य ने !

ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भूमि पर
एक साम्राज्य था मालव गण।
मालव गण की राजधानी थी भारत की
प्रसिद्ध नगरी उज्जैन ।
उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था ।

प्रजा वात्सल्य राजा नाबोवाहन की
मृत्यु केपश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने
“महाराजाधिराज मालवाधिपति”की
उपाधि धारण करके मालव गण को
राजतन्त्र में बदल दिया ।

उस समय भारत में चार शक शासको का
राज्य था।
शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ
सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश
हो गया।

एक बार मालव गण की राजधानी में एक
जैन साध्वी पधारी।
उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण
गंधर्व सेन भी उनके दर्शन करने पहुँच गया।

साध्वी के रूप ने उन्हें कामांध बना दिया।
महाराज ने साध्वी का अपहरण कर लिया
तथा साध्वी के साथ जबरदस्ती विवाह
कर लिया।

अपनी बहन साध्वी के अपहरण के
बाद उनके भाई जैन मुनि कलिकाचार्य
ने राष्ट्रद्रोह करके बदले की भावना से
शक राजाओं को उज्जैन पर हमला
करने के लिए तैयार कर लिया।

शक राजाओं ने चारों ओर से आक्रमण
करके उज्जैन नगरी को जीत लिया।

शोषद वहाँ का शासक बना दिया गया।
गंधर्व सेन साध्वी और अपनी रानी
सोम्यादर्शन के साथ विन्ध्याचल के
वनों में छुप गये।

साध्वी सरस्वती ने महारानी सोम्या से बहुत
दुलार पाया तथा साध्वी ने भी गंधर्व सेन
को अपना पति स्वीकार कर लिया ।

वनों में निवास करते हुए,सरस्वती ने एक
पुत्र को जन्म दिया,जिसका नाम भर्तृहरि
रक्खा गया।

उसके तीन वर्ष पश्चात महारानी सोम्या
ने भी एक पुत्र को जन्म दिया।
जिसका नाम विक्रम सेन रक्खा गया।

विंध्याचल के वनों में निवास करते हुए
एक दिन गंधर्व सेन आखेट को गये,
जहाँ वे एक सिंह का शिकार हो गये।

वहीं साध्वी सरस्वती भी अपने भाई
जैन मुनि कलिकाचार्य के राष्ट्रद्रोह से
क्षुब्ध थी।

महाराज की मृत्यु के पश्चात उन्होंने भी
अपने पुत्र भर्तृहरि को महारानी को
सौंपकर अन्न का त्याग कर दिया।
और अपने प्राण त्याग दिए।

उसके पश्चात महारानी सोम्या दोनों पुत्रों
को लेकर कृष्ण भगवान् की नगरी चली गई,
तथा वहाँ पर अज्ञातवास काटने लगी।

दोनों राजकुमारों में भर्तृहरि चिंतनशील
बालक था,तथा विक्रम में एक असाधारण
योद्धा के सभी गुण विद्यमान थे।

अब समय धीरे धीरे समय अपनी काल
परिक्रमा पर तेजी से आगे बढने लगा।

दोनों राजकुमारों को पता चल चुका था
कि शको ने उनके पिता को हराकर
उज्जैन पर अधिकार कर लिया था,
तथा शक दशको से भारतीय जनता
पर अत्याचार कर रहे है।

विक्रम जब युवा हुआ तब वह एक
सुगठित शरीर का स्वामी व एक
महान योद्धा बन चुका था।

धनुषबाण,खडग,असी,त्रिशूल व परशु
आदि में उसका कोई सानी नही था।

अपनी नेतृत्व करने की क्षमता के कारण
उसने एक सैन्य दल भी गठित कर लिया था।

अब समय आ गया था की भारतवर्ष को
शकों से छुटकारा दिलाया जाय।

वीर विक्रमसेन ने अपने मित्रो को संदेश
भेजकर बुला लिया।

सभाओं व मंत्रणा के दौर शुरू हो गए।

निर्णय लिया गया की,सर्वप्रथम उज्जैन
में जमे शक राजा शोशाद व उसके भतीजे
खारोस को युद्ध में पराजित करना होगा।

परन्तु एक अड़चन थी कि उज्जैन पर
आक्रमण के समय सौराष्ट्र का शकराज
भुमक व तक्षशिला का शकराज कुशुलुक
शोशाद की सहायता के लिए आयेंगे।

विक्रम ने कहा कि शक राजाओं के पास
विशाल सेनायें है,संग्राम भयंकर होगा।

उसके मित्रो ने उसे आश्वासन दिया कि
जब तक आप उज्जैन नगरी को नही
जीत लेंगे,तब तक सौराष्ट्र व तक्षशिला
की सेनाओं को हम आपके पास फटकने
भी न देंगे।

विक्रम सेन के इन मित्रों में सौवीर गणराज्य
का युवराज प्रधुम्न,कुनिंद गन राज्य का
युवराज भद्रबाहु,अमर्गुप्त आदि प्रमुख थे।

अब सर्वप्रथम सेना की संख्या को बढ़ाना
व उसको सुदृढ़ करना था।

सेना की संख्या बढ़ाने के लिए गावं गावं
के शिव मंदिरों में #भैरव_भक्त के नाम
से गावों के युवकों को भर्ती किया जाने
लगा।

सभी युवकों को त्रिशूल प्रदान किए गए।
युवकों को पास के वनों में शस्त्राभ्यास
कराया जाने लगा।
इस कार्य में वनीय क्षेत्र बहुत सहायता
कर रहा था।
इतना बड़ा कार्य होने के बाद भी शकों
को कानोकान भनक भी नही लगी।

कुछ ही समय में #भैरव_सैनिकों की
संख्या लगभग ५० सहस्त्र हो गई।

भारत वर्ष के वर्तमान की हलचल देखकर
भारत का भविष्य अपने सुनहरे वर्तमान
की कल्पना करने लगा।

लगभग दो वर्ष भागदौड़ में बीत गए।

इसी बीच विक्रम को एक नया सहयोगी
मिल गया “अपिलक”।
अपिलक आन्ध्र के महाराजा शिवमुख
का अनुज था।

अपिलक को भैरव सेना का सेनापति बना
दिया गया।
धन की व्यवस्था का भार अमरगुप्त को
सोपा गया।

अब जहाँ भारत का भविष्य एक चक्रवर्ती
सम्राट के स्वागत के लिए आतुर था,वहीं
चारो शक राजा भारतीय जनता का शोषण
कर रहे थे और विलासी जीवन में लिप्त थे।

ईशा की प्रथम शताब्दी में महाकुम्भ के
अवसर पर सभी भैरव सैनिकों को साधू
-संतो के वेश में उज्जैन के सैकडो गावों
के मंदिरों में ठहरा दिया गया।

प्रत्येक गाँव का मन्दिर मानो शिव के तांडव
के लिए भूमि तैयार कर रहा था।

महाकुम्भ का स्नान समाप्त होते ही सैनिकों
ने अपना अभियान शुरू कर दिया।

भैरव सेना ने उज्जैन व विदिशा को घेर
लिया गया।
भीषण संग्राम हुआ।
विदेशी शकों को बुरी तरह काट डाला गया।
उज्जैन का शासक शोषद भाग खड़ा हुआ।

मथुरा के शासक का पुत्र खारोश विदिशा
के युद्ध में मारा गया।
इस समाचार को सुनते ही सौराष्ट्र व मथुरा
के शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया।

अब विक्रम के मित्रों की बारी थी,
उन्होंने सौराष्ट्र के शासक भुमक को
भैरव सेना के साथ राह में ही घेर लिया,
तथा उसको बुरी तरह पराजित किया,
तथा अपने मित्र को दिया वचन पूरा
किया।

मथुरा के शक राजा राज्बुल से विक्रम
स्वयं टकरा गया और उसे बंदी बना
लिया।
आंध्र महाराज सत्कारणी के अनुज
अपिलक के नेतृत्व में पूरे मध्य भारत
में भैरव सेना ने अपने तांडव से शक
सेनाओं को समाप्त कर दिया।

विक्रमसेन ने अपने भ्राता भर्तृहरि को
उज्जैन का शासक नियुक्त कराया।

तीनो शक राजाओं के पराजित होने के
बाद तक्षशिला के शक राजा कुशुलुक ने
भी विक्रम से संधि कर ली।

मथुरा के शासक की महारानी ने विक्रम
की माता सौम्या से मिलकर क्षमा मांगी
तथा अपनी पुत्री हंसा के लिए विक्रम
का हाथ मांगा।

महारानी सौम्या ने उस बंधन को तुंरत
स्वीकार कर लिया।

विक्रम के भ्राता भर्तृहरि का मन शासन
से अधिक ध्यान व योग में लगता था
इसलिए उन्होंने राजपाट त्याग कर
सन्यास ले लिया।
उज्जैन नगरी के राजकुमार ने पुन: वर्षों
पश्चात गणतंत्र की स्थापना की व्यवस्था
की परन्तु मित्रों व जनता के आग्रह पर
विक्रमसेन को महाराजाधिराज विक्रमादित्य
के नाम से सिंहासन पर आसीन होना पडा।

लाखों की संख्या में शकों का यज्ञोपवीत
हुआ।
शक हिंदू संस्कृति में ऐसे समा गए जैसे
एक नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व
खो देती है।

विदेशी शकों के आक्रमणों से भारत मुक्त
हुआ तथा हिंदू संस्कृती का प्रसार समस्त
विश्व में हुआ।

इसी शक विजय के उपरांत ईशा से ५७ वर्ष
पूर्व महाराजा विक्रमादित्य के राज्याभिषेक
पर “विक्रमी-संवत” की स्थापना हुई।

आगे आने वाले कई चक्रवर्ती सम्राटों ने
इन्ही सम्राट विक्रमादित्य के नाम की
उपाधि धारण की।
–#साभार_संकलित;
भारतवर्ष के ऐसे वीर शिरोमणि सम्राट
विक्रमादित्य को शत-शत प्रणाम !

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,

सदा सर्वदा सुमंगल ,,,
हर हर महादेव,,,
जय भवानी,,,
जय श्री राम

History & Literature

नागा साधू / Naagaa Baawaa

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आखिर कौन होते हैं नागा साधू????

जाने उनका रहस्य……..

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खुद को मूलनिवासी कहने वाले ये नकली बौद्ध अगर अपनी माँ को भी बच्चे को स्तन से दूध पिलाते हुए देखेंगे तो उसमें भी उन्हें अश्लीलता ही नजर आऐगी क्योंकि इन्होंने सनातन धर्म के संस्कार तो पढे नहीं हैं जो नागा साधुओं ने तन के कपडे भी त्याग दिऐ उनका त्याग इन्हें समझ नहीं आ सकता….

अक्सर मुस्लिम और अंबेडकर वादी नागा साधूओं की तस्वीर दिखा कर हिन्दु धर्म के साधूओं का अपमान करने की और हिन्दुओं को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं उन लोगों को नागा साधूओं का गौरवशाली इतिहास पता नहीं होता जानें नागा साधूओं का गौरवशाली इतिहास और उसकी महानता।
नागा साधूओं का इतिहास 
नागा साधु हिन्दू धर्मावलम्बी साधु हैं जो कि नग्न रहने तथा युद्ध कला में माहिर होने के लिये प्रसिद्ध हैं। ये विभिन्न अखाड़ों में रहते हैं जिनकी परम्परा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गयी थी।
नागा साधूओं का इतिहास
भारतीय सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आदिगुरू शंकराचार्य ने रखी थी। शंकर का जन्म ८वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था जब भारतीय जनमानस की दशा और दिशा बहुत बेहतर नहीं थी। भारत की धन संपदा से खिंचे तमाम आक्रमणकारी यहाँ आ रहे थे। कुछ उस खजाने को अपने साथ वापस ले गए तो कुछ भारत की दिव्य आभा से ऐसे मोहित हुए कि यहीं बस गए, लेकिन कुल मिलाकर सामान्य शांति-व्यवस्था बाधित थी। ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्रों को तर्क, शस्त्र और शास्त्र सभी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्थापना के लिए कई कदम उठाए जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों का निर्माण करना। यह थीं गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ। इसके अलावा आदिगुरू ने मठों-मन्दिरों की सम्पत्ति को लूटने वालों और श्रद्धालुओं को सताने वालों का मुकाबला करने के लिए सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों की सशस्त्र शाखाओं के रूप में अखाड़ों की स्थापना की शुरूआत की।
नागा साधूओं का इतिहास 
आदिगुरू शंकराचार्य को लगने लगा था सामाजिक उथल-पुथल के उस युग में केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना काफी नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को सुदृढ़ बनायें और हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें। इसलिए ऐसे मठ बने जहाँ इस तरह के व्यायाम या शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा। आम बोलचाल की भाषा में भी अखाड़े उन जगहों को कहा जाता है जहां पहलवान कसरत के दांवपेंच सीखते हैं। कालांतर में कई और अखाड़े अस्तित्व में आए। शंकराचार्य ने अखाड़ों को सुझाव दिया कि मठ, मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर शक्ति का प्रयोग करें। इस तरह बाह्य आक्रमणों के उस दौर में इन अखाड़ों ने एक सुरक्षा कवच का काम किया। कई बार स्थानीय राजा-महाराज विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं का सहयोग लिया करते थे। इतिहास में ऐसे कई गौरवपूर्ण युद्धों का वर्णन मिलता है जिनमें ४० हजार से ज्यादा नागा योद्धाओं ने हिस्सा लिया। अहमद शाह अब्दाली द्वारा मथुरा-वृन्दावन के बाद गोकुल पर आक्रमण के समय नागा साधुओं ने उसकी सेना का मुकाबला करके गोकुल की रक्षा की।
नागा साधू
नागा साधुओं की लोकप्रियता है। संन्यासी संप्रदाय से जुड़े साधुओं का संसार और गृहस्थ जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता। गृहस्थ जीवन जितना कठिन होता है उससे सौ गुना ज्यादा कठिन नागाओं का जीवन है। यहां प्रस्तुत है नागा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी।
1.
नागा अभिवादन मंत्र : ॐ नमो नारायण
2.
नागा का ईश्वर : शिव के भक्त नागा साधु शिव के अलावा किसी को भी नहीं मानते।
*नागा वस्तुएं : त्रिशूल, डमरू, रुद्राक्ष, तलवार, शंख, कुंडल, कमंडल, कड़ा, चिमटा, कमरबंध या कोपीन, चिलम, धुनी के अलावा भभूत आदि।
3.
नागा का कार्य : गुरु की सेवा, आश्रम का कार्य, प्रार्थना, तपस्या और योग क्रियाएं करना।
4.
नागा दिनचर्या : नागा साधु सुबह चार बजे बिस्तर छोडऩे के बाद नित्य क्रिया व स्नान के बाद श्रृंगार पहला काम करते हैं। इसके बाद हवन, ध्यान, बज्रोली, प्राणायाम, कपाल क्रिया व नौली क्रिया करते हैं। पूरे दिन में एक बार शाम को भोजन करने के बाद ये फिर से बिस्तर पर चले जाते हैं।
5.
सात अखाड़े ही बनाते हैं नागा : संतों के तेरह अखाड़ों में सात संन्यासी अखाड़े ही नागा साधु बनाते हैं:- ये हैं जूना, महानिर्वणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा।
6.
नागा इतिहास : सबसे पहले वेद व्यास ने संगठित रूप से वनवासी संन्यासी परंपरा शुरू की। उनके बाद शुकदेव ने, फिर अनेक ऋषि और संतों ने इस परंपरा को अपने-अपने तरीके से नया आकार दिया। बाद में शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित कर दसनामी संप्रदाय का गठन किया। बाद में अखाड़ों की परंपरा शुरू हुई। पहला अखाड़ा अखंड आह्वान अखाड़ा’ सन् 547 ई. में बना।
7.
नाथ परंपरा : माना जाता है कि नाग, नाथ और नागा परंपरा गुरु दत्तात्रेय की परंपरा की शाखाएं है। नवनाथ की परंपरा को सिद्धों की बहुत ही महत्वपूर्ण परंपरा माना जाता है। गुरु मत्स्येंद्र नाथ, गुरु गोरखनाथ साईनाथ बाबा, गजानन महाराज, कनीफनाथ, बाबा रामदेव, तेजाजी महाराज, चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव आदि। घुमक्कड़ी नाथों में ज्यादा रही।
8.
नागा उपाधियां : चार जगहों पर होने वाले कुंभ में नागा साधु बनने पर उन्हें अलग अलग नाम दिए जाते हैं। इलाहाबाद के कुंभ में उपाधि पाने वाले को 1.नागा, उज्जैन में 2.खूनी नागा, हरिद्वार में 3.बर्फानी नागा तथा नासिक में उपाधि पाने वाले को 4.खिचडिया नागा कहा जाता है। इससे यह पता चल पाता है कि उसे किस कुंभ में नागा बनाया गया है।
उनकी वरीयता के आधार पर पद भी दिए जाते हैं। कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव उनके पद होते हैं। सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद सचिव का होता है।
10.
कठिन परीक्षा : नागा साधु बनने के लिए लग जाते हैं 12 वर्ष। नागा पंथ में शामिल होने के लिए जरूरी जानकारी हासिल करने में छह साल लगते हैं। इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूं ही रहते हैं।
11.
नागाओं की शिक्षा और ‍दीक्षा : नागा साधुओं को सबसे पहले ब्रह्मचारी बनने की शिक्षा दी जाती है। इस परीक्षा को पास करने के बाद महापुरुष दीक्षा होती है। बाद की परीक्षा खुद के यज्ञोपवीत और पिंडदान की होती है जिसे बिजवान कहा जाता है।
अंतिम परीक्षा दिगम्बर और फिर श्रीदिगम्बर की होती है। दिगम्बर नागा एक लंगोटी धारण कर सकता है, लेकिन श्रीदिगम्बर को बिना कपड़े के रहना होता है। श्रीदिगम्बर नागा की इन्द्री तोड़ दी जाती है।
12.
कहां रहते हैं नागा साधु : नाना साधु अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं। कुछ तप के लिए हिमालय या ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में जीवन बिताते हैं। अखाड़े के आदेशानुसार यह पैदल भ्रमण भी करते हैं। इसी दौरान किसी गांव की मेर पर झोपड़ी बनाकर धुनी रमाते हैं।
नागा साधू बनने की प्रक्रिया.
नागा साधु बनने की प्रक्रिया कठिन तथा लम्बी होती है। नागा साधुओं के पंथ में शामिल होने की प्रक्रिया में लगभग छह साल लगते हैं। इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूँ ही रहते हैं। कोई भी अखाड़ा अच्छी तरह जाँच-पड़ताल कर योग्य व्यक्ति को ही प्रवेश देता है। पहले उसे लम्बे समय तक ब्रह्मचारी के रूप में रहना होता है, फिर उसे महापुरुष तथा फिर अवधूत बनाया जाता है। अन्तिम प्रक्रिया महाकुम्भ के दौरान होती है जिसमें उसका स्वयं का पिण्डदान तथा दण्डी संस्कार आदि शामिल होता है।[2]

ऐसे होते हैं 17 श्रृंगार(नागा साधू)

बातचीत के दौरान नागा संत ने कहा कि शाही स्नान से पहले नागा साधु पूरी तरह सज-धज कर तैयार होते हैं और फिर अपने ईष्ट की प्रार्थना करते हैं। नागाओं के सत्रह श्रृंगार के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि लंगोट, भभूत, चंदन, पैरों में लोहे या फिर चांदी का कड़ा, अंगूठी, पंचकेश, कमर में फूलों की माला, माथे पर रोली का लेप, कुंडल, हाथों में चिमटा, डमरू या कमंडल, गुथी हुई जटाएं और तिलक, काजल, हाथों में कड़ा, बदन में विभूति का लेप और बाहों पर रूद्राक्ष की माला 17 श्रृंगार में शामिल होते हैं।
नागा साधू
सन्यासियों की इस परंपरा मे शामील होना बड़ा कठिन होता है और अखाड़े किसी को आसानी से नागा रूप मे स्वीकार नहीं करते। वर्षो बकायदे परीक्षा ली जाती है जिसमे तप , ब्रहमचर्य , वैराग्य , ध्यान ,सन्यास और धर्म का अनुसासन तथा निस्ठा आदि प्रमुखता से परखे-देखे जाते हैं। फिर ये अपना श्रध्या , मुंडन और पिंडदान करते हैं तथा गुरु मंत्र लेकर सन्यास धर्म मे दीक्षित होते है इसके बाद इनका जीवन अखाड़ों , संत परम्पराओं और समाज के लिए समर्पित हो जाता है,
अपना श्रध्या कर देने का मतलब होता है सांसरिक जीवन से पूरी तरह विरक्त हो जाना , इंद्रियों मे नियंत्रण करना और हर प्रकार की कामना का अंत कर देना होता है कहते हैं की नागा जीवन एक इतर जीवन का साक्षात ब्यौरा है और निस्सारता , नश्वरता को समझ लेने की एक प्रकट झांकी है । नागा साधुओं के बारे मे ये भी कहा जाता है की वे पूरी तरह निर्वस्त्र रह कर गुफाओं , कन्दराओं मे कठोर ताप करते हैं । प्राच्य विद्या सोसाइटी के अनुसार “नागा साधुओं के अनेक विशिष्ट संस्कारों मे ये भी शामिल है की इनकी कामेन्द्रियन भंग कर दी जाती हैं”। इस प्रकार से शारीरिक रूप से तो सभी नागा साधू विरक्त हो जाते हैं लेकिन उनकी मानसिक अवस्था उनके अपने तप बल निर्भर करती है ।
विदेशी नागा साधू
सनातन धर्म योग, ध्यान और समाधि के कारण हमेशा विदेशियों को आकर्षित करता रहा है लेकिन अब बडी तेजी से विदेशी खासकर यूरोप की महिलाओं के बीच नागा साधु बनने का आकर्षण बढ़ता जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर चल रहे महाकुंभ मेले में विदेशी महिला नागा साधू आकर्षण के केन्द्र में हैं। यह जानते हुए भी कि नागा बनने के लिए कई कठिन प्रक्रिया और तपस्या से गुजरना होता है विदेशी महिलाओं ने इसे अपनाया है।
आमतौर पर अब तक नेपाल से साधू बनने वाली महिलाए ही नागा बनती थी। इसका कारण यह कि नेपाल में विधवाओं के फिर से विवाह को अच्छा नहीं माना जाता। ऐसा करने वाली महिलाओं को वहां का समाज भी अच्छी नजरों से भी नहीं देखता लिहाजा विधवा होने वाली नेपाली महिलाएं पहले तो साधू बनती थीं और बाद में नागा साधु बनने की कठिन प्रक्रिया से जुड़ जाती थी।
नागा साधू 
कालांतर मे सन्यासियों के सबसे बड़े जूना आखाठे मे सन्यासियों के एक वर्ग को विशेष रूप से शस्त्र और शास्त्र दोनों मे पारंगत करके संस्थागत रूप प्रदान किया । उद्देश्य यह था की जो शास्त्र से न माने उन्हे शस्त्र से मनाया जाय । ये नग्ना अवस्था मे रहते थे , इन्हे त्रिशूल , भाला ,तलवार,मल्ल और छापा मार युद्ध मे प्रशिक्षिण दिया जाता था । इस तरह के भी उल्लेख मिलते हैं की औरंगजेब के खिलाफ युद्ध मे नागा लोगो ने शिवाजी का साथ दिया था 
नागा साधू 
जूना के अखाड़े के संतों द्वारा तीनों योगों- ध्यान योग , क्रिया योग , और मंत्र योग का पालन किया जाता है यही कारण है की नागा साधू हिमालय के ऊंचे शिखरों पर शून्य से काफी नीचे के तापमान पर भी जीवित रह लेते हैं, इनके जीवन का मूल मंत्र है आत्मनियंत्रण, चाहे वह भोजन मे हो या फिर विचारों मे
नागा साधू
बात 1857 की है। पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बज चुका था। यहां पर तो क्रांति की ज्वाला की पहली लपट 57 के 13 साल पहले 6 जून को मऊ कस्बे में छह अंग्रेज अफसरों के खून से आहुति ले चुकी थी। 
एक अप्रैल 1858 को मप्र के रीवा जिले की मनकेहरी रियासत के जागीरदार ठाकुर रणमत सिंह बाघेल ने लगभग तीन सौ साथियों को लेकर नागौद में अंग्रेजों की छावनी में आक्रमण कर दिया। मेजर केलिस को मारने के साथ वहां पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद 23 मई को सीधे अंग्रेजों की तत्कालीन बड़ी छावनी नौगांव का रुख किया। पर मेजर कर्क की तगड़ी व्यूह रचना के कारण यहां पर वे सफल न हो सके। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता को झांसी जाना चाहते थे पर उन्हें चित्रकूट का रुख करना पड़ा। यहां पर पिंडरा के जागीरदार ठाकुर दलगंजन सिंह ने भी अपनी 1500 सिपाहियों की सेना को लेकर 11 जून को 1958 को दो अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर उनका सामान लूटकर चित्रकूट का रुख किया। यहां के हनुमान धारा के पहाड़ पर उन्होंने डेरा डाल रखा था, जहां उनकी सहायता नागा साधु-संत कर रहे थे। लगभग तीन सौ से ज्यादा नागा साधु क्रांतिकारियों के साथ अगली रणनीति पर काम कर रहे थे। तभी नौगांव से वापसी करती ठाकुर रणमत सिंह बाघेल भी अपनी सेना लेकर आ गये। इसी समय पन्ना और अजयगढ़ के नरेशों ने अंग्रेजों की फौज के साथ हनुमान धारा पर आक्रमण कर दिया। तत्कालीन रियासतदारों ने भी अंग्रेजों की मदद की। सैकड़ों साधुओं ने क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों से लोहा लिया। तीन दिनों तक चले इस युद्ध में क्रांतिकारियों को मुंह की खानी पड़ी। ठाकुर दलगंजन सिंह यहां पर वीरगति को प्राप्त हुये जबकि ठाकुर रणमत सिंह गंभीर रूप से घायल हो गये।
करीब तीन सौ साधुओं के साथ क्रांतिकारियों के खून से हनुमानधारा का पहाड़ लाल हो गया।
महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के अधिष्ठाता डा. कमलेश थापक कहते हैं कि वास्तव में चित्रकूट में हुई क्रांति असफल क्रांति थी। यहां पर तीन सौ से ज्यादा साधु शहीद हो गये थे। साक्ष्यों में जहां ठाकुर रणमतिसह बाघेल के साथ ही ठाकुर दलगंजन सिंह के अलावा वीर सिंह, राम प्रताप सिंह, श्याम शाह, भवानी सिंह बाघेल (भगवान् सिंह बाघेल ), सहामत खां, लाला लोचन सिंह, भोला बारी, कामता लोहार, तालिब बेग आदि के नामों को उल्लेख मिलता है वहीं साधुओं की मूल पहचान उनके निवास स्थान के नाम से अलग हो जाने के कारण मिलती नहीं है। उन्होंने कहा कि वैसे इस घटना का पूरा जिक्र आनंद पुस्तक भवन कोठी से विक्रमी संवत 1914 में राम प्यारे अग्निहोत्री द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘ठाकुर रणमत सिंह’ में मिलता है। इस प्रकार मैं दावे के साथ कह सकता हु की नागा साधू सनातन के साथ साथ देश रक्षा के लिए भी अपने प्राणों की आहुति देते आये है और समय आने पर फिर से देश और धर्म के लिए अपने प्राणों की आहुति दे सकते है …पर कुछ पुराव्ग्राही बन्धुओ को नागाओ का यह त्याग और बलिदान क्यों नहीं दिखाई देता है?

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હોળી અને 23 માર્ચ

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જય માતાજી

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આજરોજ હોળી નો તહેવાર છે… ભક્તરાજ પ્રહલાદ સાથે સંકળાયેલ તહેવાર હોળી… હિરણ્યકશિપુ એ પ્રહલાદ ને બાળવા હેતુ બહેન હોલિકા નાં સાથે લાકડા અને છાણાં પર બેસી પ્રહલાદ ને બાળવા માટે કારસુ રચ્યું પણ રામ રાખે એને કોણ ચાખે એ મુજબ હોલિકા પોતે બળી ગઈ અને પ્રહલાદ ક્ષેમકુશળ અગ્નિ માંથી બહાર આવ્યા,
          આ ઉપરાંત વસંત નાં આગમન ની ખુશી માં પણ હોળી નો તહેવાર મનાવાય છે. ભગવાન શિવે કામદેવ ને ભસ્મ કર્યો માટે પણ હોળી મનાવાય છે.
          વૈજ્ઞાનિક દ્રષ્ટિકોણ થી પણ હોળી નો તહેવાર ઉપયોગી છે. ગાય ના છાણાં થી પ્રગટાવેલી હોળી વાતાવરણ શુદ્ધ કરે છે. હવા માં રહેલ સૂક્ષ્મ કીટાણું નો નાશ થાય છે.
          હોળી પ્રગટયા બાદ તેમાં હોમેલા નાળિયેર ની ઉજાણી થાય છે. પ્રસાદી રૂપે હોળી નાં તાપ માં શેકાયેલ નાળિયેર ખાવાથી શરીર ની તંદુરસ્તી માં ઉપયોગી છે. અને એ નાળિયેર થી રમત પણ રમાય છે.
          કાલે રંગો નો તહેવાર ધુળેટી ની પણ શુભકામનાઓ…

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          આજે હોળી ઉપરાંત 23 માર્ચ. શહિદ દિવસ પણ. ભારત ની આઝાદી માટે હસતા હસતા મોત ને બાથ ભરનાર ભગતસિંહ સુખદેવ અને રાજગુરુ ને અંગ્રેજ સરકાર દ્વારા રાતોરાત ફાંસી આપી દેવાઈ હતી. લાલા લજપતરાય પર થયેલ લાઠી ચાર્જ થી ભગતસિંહ ના માનસ પર ઊંડી અસર થયેલી. સભામાં બૉમ્બ વિસ્ફોટ કર્યો. અને શહીદી વહોરી.

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હસ્તી (હાથી)

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☆હસ્ત (હાથી) ☆
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પ્રાચીન સમય થી હાથી નો ઉપયોગ થતો આવે છે દુનિયા માં સહું થી પહેલાં હાથી નો ઉપયોગ પ્રાચીન ભારત માં યુદ્ધ માટે થતો,  હાથી ને એક માંગલિક પ્રાણી ગણવામાં આવતો શુભ કાર્ય માં હાથી સારો કહેવાતો ..!!

પુરાણ અને શાસ્ત્ર માં હાથી હાથી નું વર્ણન થયું છે અગ્નિ પુરાણ, ગરૂડ પુરાણ, વિષ્ણુ ધર્મોતર પુરાણ , માં હાથી ના લક્ષણ, ચીકિત્સા વગેરે નું વર્ણન આવે છે ,  પુરાણ પ્રમાણે હાથી ની ઉત્પતિ ઐરાવત માંથી થઇ છે ..!!

અને ઐરાવત ની ઉત્પતિ સમુદ્ર મંથન માંથી થઇ છે,  પ્રાચીન સમય માં પાલકાપીયા નામના મૂની એ હાથી ઉપર ગજશાસ્ત્ર ,  હસ્તી આયુર્વેદ જેવાં ગ્રંથો ની રચના કરી હતી, અગ્નિ પુરાણ અને ગરૂડ પુરાણ માં પણ ગજ વિદ્યા નો ઉલ્લેખ મળે છે તેમાથી અમુક લેખ આ પ્રમાણે છે..!!

અગ્નિ પુરાણ ના 287 ના અધ્યાય નિ અમૂક વિગત….!!

” લાંબી સુંઢ વાળા લાંબો શ્ર્વાસ લેવા વાળા વીશ અથવા અઢાર નખ વાળા હાથી ઉતમ કહેવાય છે ..!!

જેનો જમણો દાંત ઉચ્ચો હોય, જેની મેઘ સમાન ગર્જના હોય તે હાથી ઉતમ કહેવાય…!!

હાથી ની પરીક્ષા સાત ગુણ થી થાય છે …!!
1- વર્ણ 2 – સત્વ 3- બળ 4- રૂપ 5- કાન્તિ  6- શારીરીક બાંધો  અને 7- વેગ …!!

પ્રાચીન ભારત માં મગધ ખૂબ શકિતશાળી સામ્રાજ્ય તરીકે ઉભર્યુ એનું કારણ ત્યાંનું હસ્તીદલ હતું જે અન્ય રાજાઓ પાસે ન હતું એવું ભારતીય ઇતિહાસ માં છે ….!!

•☆• સીંકદર ભારત માં આવ્યો ત્યારે તે એ જોઇ ને ગભરાઇ ગયો કે આટલું મોટું હાથીદળ આ સૈનિકો એ જોયું પણ નહોતું  અને તેના પુરાવા સંશોધીત ઇતિહાસ માં મળે છે

સાભાર – અનિરૂધ્ધ ભાઇ ધાધલ
ધર્મરાજ સિંહ વાઘેલા (છબાસર)

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☆અશ્ર્વ નાં આરાધ્ય દેવ☆ ” રૈવંતદેવ”

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☆અશ્ર્વ નાં આરાધ્ય દેવ☆
           ” રૈવંતદેવ”

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બધી વિષય વસ્તુ ના એક-એક આરાધ્ય દેવ હોય છે,  જેમ કે ધન ના દેવી લક્ષ્મીજી હોય છે,  સોનાના દેવ કુબેર હોય છે વિદ્યા ના દેવી સરસ્વતી હોય છે…!!

તેમજ અશ્ર્વ ના આરાધ્ય દેવ હોય છે જે હાલ માં ભૂલાઈ ગયાં છે તેમનું નામ છે “રૈવંતદેવ”  પ્રાચીન સમય માં રાજવીઓ સારા અશ્ર્વ મેળવવા માટે “રૈવંતદેવ” નું અનુષ્ઠાન કરતાં…!!

“રૈવંતદેવ” નું વર્ણન રૂગવેદ , વિષ્ણુ પુરાણ,  માર્કન્ડેય પુરાણ,  તેમજ બીજા અનેક ગ્રંથો માં મળે છે ,  રૈવંતદેવ ને સુર્યદેવ અને સંજનાદેવી(રાંદલ માઁ ) ના પુત્ર અને અને અશ્ર્વીની કુમાર ના સગા ભાઇ તરીકે ઓળખવામાં આવે છે…!!

સુર્યદેવ ની કૃપાથી “રૈવંતદેવ” ને ગૃહયાકા (કુબેર નો ગૃપ્ત ભંડાર ) ના મંત્રી અને અશ્ર્વ ના આરાધ્ય દેવ તરીકે સ્થાપવામાં આવે છે, સૌર ધર્મ માં “રૈવંતદેવ” નું ખાસ સ્થાન હોય છે , અશ્ર્વ પુજા માં “રૈવંતદેવ” મુખ્ય આરાધ્ય હોય છે અશ્ર્વ શાસ્ત્ર ના બીજા અધ્યાય માં સારા અશ્ર્વ મેળવવા માટે “રૈવંતદેવ” ની પુજા કરવા કિધું છે અને રૈવંત સ્ત્રોત નું વર્ણન પણ કર્યું છે…!!

અલગ-અલગ પુરાણો માં સારા ઉતમ અશ્ર્વ મેળવવા માટે “રૈવંતદેવ” ની આરાધના કરવાનો સંકેત દિધો છે,  પ્રાચીન સમય માં સારા અશ્ર્વ માટે “રૈવંતદેવ” ની પૂજા કરવાની પ્રંથા હતી,  પણ હાલ માં તે પ્રંથા લુપ્ત થઇ ગઇ છે ભાગવત ગીતા માં શ્રી કૃષ્ણ કહે છે કે “બધા અશ્ર્વમાં હું “ઉચ્ચસૈસર્વસ” છું,  દેવી પુરાણ માં “રૈવંતદેવ’ ને “ઉચ્ચસૈસર્વસ” ની સવારી કરતાં દેખાડવામાં આવ્યા છે…!!

દેવ અશ્ર્વ વર્ણ….અશ્ર્વ શાસ્ત્ર પ્રમાણે અશ્ર્વ ત્રિલોક માં બધી જગ્યા છે,  દેવો પાસે પણ પોતાના અશ્ર્વ હોય છે , તેના અલગ-અલગ વર્ણ હોય છે ..!!

ચંદ્ર દેવ -શ્ર્વેત
ઇન્દ્ર દેવ – સુવર્ણ
યમરાજ – કાળો
વિષ્ણુ દેવ – કર્ક (શ્ર્વેત વર્ણ ઉપર બીજા કલર ના ધાબા )
સુર્યદેવ – પોપટી લીલો
વરૂણ દેવ – મેધ વર્ણ
કુબેર – વાદળી
(નકુલ કૃત અશ્ર્વ શાસ્ત્ર અધ્યાય -વીશ)
ભવિષ્ય પુરાણ , મત્સ્ય પુરાણ,  જેવા પુરાણો માં સુર્યદેવ ના સાત અશ્ર્વો નું વર્ણન મળે છે ..!!

•☆•તે પ્રમાણે સુર્યદેવ ના સાત અશ્ર્વ હોય છે અને તેમનો કલર લીલો હોય છે સુર્યદેવ નું એક નામ “સપ્ત વાહાન ”  છે એટલે કે જેને સાત વાહાન છે…!!
સાત અશ્ર્વો ના નામ ..
ગાયત્રી,  બ્રહતી, ઉષ્નીક, જગતી,  ત્રીસ્તુપ,  અનુસ્તુપ,  અને પંકિત છે , આ સાત અશ્ર્વો ને સાત છંદ પણ કહેવાય છે ..!!

સાભાર- અનિરૂધ્ધ ભાઇ ધાધલ
સૌજન્ય – રાજભા ઝાલા

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એક રાજા હતો અને એને 4 રાણીઓ હતી.

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એક રાજા હતો અને એને 4 રાણીઓ હતી.

પ્રથમ નંબરની રાણીને રાજા બહુ જ પ્રેમ કરતો અને તેની સંભાળ પણ ખુબ રાખતો.

બીજા નંબરની રાણી બહું રૂપાળી હતી આથી રાજા જ્યારે બહાર કોઇ પાર્ટીમાં કે કાર્યક્રમમાં જાય ત્યારે આ બીજા નંબરની રાણીને સાથે રાખે જેથી રાજાનો વટ પડે.

ત્રીજા નંબરની રાણી સાથે થોડું ઓછુ બોલવાનું થાય પણ રાજાને જ્યારે કોઇ બાબત પર નિર્ણય લેવાનો હોઇ કે કોઇ મૂંજવણ હોય ત્યારે રાજા આ ત્રીજી રાણી સાથે ચર્ચા કરે અને તેની સલાહ મેળવે.

ચોથી રાણીને તો ભાગ્યે જ મળવાનું થાય અને એ પણ સામેથી રાજા ક્યારેય મળવા ના જાય એ તો જ્યારે રાણી સામેથી રસ્તામાં મળી જાય તો હાય હેલ્લો થાય.

રાજા જ્યારે મરણ પથારીએ પડ્યો ત્યારે રાજાએ પોતાની બધી રાણીઓને પોતાની સાથે આવવા માટે વિનંતિ કરી.

પ્રથમ રાણીએ તો સીધી જ ના પાડી દીધી

બીજી રાણી તો એથી એક ડગલુ આગળ હતી એણે તો એવુ જ કહ્યુ કે સાથે આવવાની ક્યાં વાત કરો છો હું તો તમારી વિદાય થતા તુરંત જ બીજા લગ્ન કરી લઇશ

ત્રીજી રાણીએ કહ્યુ કે મારી લાગણીઓ અને પ્રેમ તમારી સાથે છે પણ હુ સાથે નહી આવી શકું.

રાજાને ચોથી રાણી પાસેથી તો કોઇ અપેક્ષા હતી જ નહી પણ ચોથી રાણીએ સામેથી કહ્યુ કે તમે મને
ના પાડશો તો પણ હું તમારી સાથે આવીશ જ.

વાર્તાની શીખ :
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મિત્રો, આપણે બધા પણ લાઈફમાં આ ચાર રાણીને પરણ્યા છીએ.

પ્રથમ રાણી તે આપણું શરીર જેને આપણે ખુબ સાચવીએ છીએ અને પ્રેમ કરીએ છીએ.

બીજી રાણી તે આપણી સંપતિ અને પદ જેને બહાર બીજાને દેખાડવામાં આપણે ગૌરવ અનુભવીએ છીએ અને આપણી વિદાયની ક્ષણે જ એ સંપતિ બીજાની થઇ જાય છે.

ત્રીજી રાણી તે આપણો પરિવાર

અને

ચોથી રાણી તે આપણો આત્મા…!!

આ વાર્તાને દીવાદાંડી રૂપ રાખી લાઈફમાં અગ્રીમતા સેટ કરજો ! જીવન ધન્ય થઇ જશે! વિચાર જો ……

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હાથી નું વયોજ્ઞાન…

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વાંકાનેર ના રહીશ મીઠુમીંયા ઇલ્હાયી બક્સ કે જેવો વાંકાનેર રાજ માં હાથી ની ફોજદારી ની જગ્યા પર હતાં અને જેવો વંશ પરંપરા થી હાથી ના દાક્તર તરીકે ઘણુંજ ઉમદા કામ કરેલું તેવોની પાસે એક “સુખ દર્શન ” નામનું પ્રાચીન પુસ્તક છે તે પુસ્તક ની અંદર હાથી સંબંધી પુષ્કળ માહિતી છે કે જે કોઇ પણ સ્થળે આજદિન સુધી પ્રસિધ્ધ થયેલ નથી આ ફોજદાર વાંકાનેર રાજવી શ્રી ની માંગણી ઉપર થી તે ગ્રંથ ની કેટલીક જાણવાજોગ માહિતી શ્રી ઝાલા વંશ વારીધી માં આપેલી છે ..!!

હાથી નું  વયોજ્ઞાન
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જયારે હાથળી અઢાર વર્ષ ની અવસ્થા એ પહોંચે છે ત્યારે તેને વિવિધ પ્રકાર ના જંગલી મેવા ખાવાથી ગરમી વધે છે અને રુતું પ્રાપ્ત થાય છે,  હાથણી ને ગર્ભ રહ્યાં બાદ નવ કે દશ મહિને પ્રસવ થાય છે ..!!

જન્મ વખતે હાથી ના દાંત બીલકુલ બહાર દેખાતા નથી,  પરંતુ જયારે તે અઢી અથવા ત્રણ વર્ષનો થાય છે ત્યારે તેની દંતલી બાહર નિકળે છે,  એ દંતલી જયારે જરા ઝાડી થાય ત્યારે તેની અવસ્થા સાત અથવા આઠ વર્ષ ની,  નખો ની ખોળ ઉતરે તથાં પૂંછ ના વાળ ખરી ફરી ઝાડા વાળ ઉગે ત્યારે તેર વર્ષની, શરીર ઉપર સળ પડે અને ચહેરા ઉપર સફાઇ તથાં ગફરી આવે ત્યારે અઢાર વર્ષ ની ગણવી..!!

દાંત વધારે ઝાડા તથાં કાપવા લાયક થાય અને કર્ણની લોળ વળી જાય તેમજ જરા-જરા મદ નિકળવા લાગે અને ગંડ-સ્થલ માં ખાડા પડી જાય ત્યારે ત્રીશ વર્ષ ની અવસ્થા જાણવી,  હાથી ત્રીશ વર્ષ નો થયાં છતાં જો મદ ન ઝરે તો તે કપટી છે એમ સમજવું  જયારે હાથી ચાલીશ વર્ષ નો થાય છે ત્યારે તેનાં દાંત અત્યંત ઝાડા થઇ જાય છે અને ગલોફા બેસી જાય છે અને શરીર ભારે તથાં સખ્ત બને છે ..!!

પચાસ વર્ષ ની અવસ્થા એ પહોંચેલો હાથી મદ વિના નો હોય ત્યારે ધીરે ચાલે છે અને મદ ઝરતી વખતે ઉતાવળો કદમ ઉઠાવે છે તથાં તે નિરોગી છતાં તેનાં આગલા પગનાં સાંધા બે વર્ષ ની અંદર ઉપરા ઉપરી બંધાઈ જાય છે ..!!

જયારે આંખો નું તેજ ઓછું થાય અને કાનની લોળ કઠિન છતાં વળી જાય તથાં નખ ઉપર પીળાં ચાઠાં પડે ત્યારે તેની અવસ્થા સાઠ વર્ષ ની ,   જયારે સમગ્ર શરીર ઢીલું પડી જાય અર્થાત્ ખલખળી જાય નશાખોર ની માફક નયનો નિચાં ઢળી જાય અને પૂંછ ના વાળ વધતાં બંધ થાય ત્યારે સીતેર વર્ષ ગણવા.,  ચાલ બિલકુલ મંદ થઇ જાય અને વારંવાર રોગ નો ઉપદ્રવ થવા લાગે ત્યારે એંશી વર્ષની ગણવી ..!!

ચાલતાં અતી શ્ર્વાસ ચડે ચારો બરાબર ચરી ન શકે તેમજ તમામ દાંઢો પડી જાય ત્યારે નેવું વર્ષ ની અને જયારે મદ તદ્દન નષ્ટ થાય નેત્ર અને શરીર બીલકુલ ક્ષીળ બની જાય તથાં પાચનશક્તિ જરા પણ ન રહેં ત્યારે તેની અવસ્થા શત (સો) વર્ષ ની થઇ એમ સમજવું…!!

શતવર્ષ ઉપર ની અવસ્થા એ પહોંચેલા હાથી નું શરીર તમામ જર્જર બની જાય છે, તે દાણા કે ચારા ને ચાવી શક્તો નથી, તેના માં તોફાન નું નામ પણ રહેતું નથી તે અંનત પ્રકાર ના વ્યાધીથી ઘેરાય છે,  વધારે વ્યાકુળતા થી તથાં કાંઈ ચેન ન પડવા થી અંતે પ્રાણને તજે છે…!!

•☆• હાથી નું પરમ આયુષ્ય શત વર્ષ નું અંકાઇ છે..!!
જન્મ પામ્યા પછી દાંતવાળો હાથી છ વર્ષ પર્યંત ધાવે છે અર્થાત્. .માતા ના પય નું પાન કરે છે ..!!

મકનો હાથી દાંતવાળા હાથી કરતાં ચાર વર્ષ વધારે અર્થાત્. ..જન્મ્યાં પછી દશ વર્ષ માતા ના પય નું પાન કરે છે …!!

સંદર્ભ – શ્રી ઝાલાવંશ વારીધી
સાભાર – રાજભા ઝાલા

History & Literature

અશ્ર્વની તેમજ અશ્ર્વશાસ્ત્ર્ ની ઉત્પતી ની રોચક કથા

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પુરાણ અનુસાર જયારે સમુદ્ર મંથન થયું તેમાં થી  ”  ઉચ્ચસૈસર્વસ ”  નામનો પહેલો અશ્ર્વ તેમાથી નિકળેલ ..!!

આ અશ્ર્વ માંથી બીજા અશ્ર્વો ની ઉત્પતિ થયેલી આ અશ્ર્વો પાંખુ વાળા હતાં અને ઉડી શક્તા,  પ્રાચીન કાળ માં આ અશ્ર્વો ચારે દિશામાં પરીભ્રમણ કરતાં હતાં,  આ બળ સંપન્ન અને પાણીયારા અશ્ર્વો ને જોઇ ને ઇન્દ્રદેવ નજીક માં નિવાસ કરતાં શાલીહોત્ર મૂની પાસે જાય છે,

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અને નિવેદન કરે છે કે ” હે ભગવાન ” દ્વિજ શ્રેષ્ઠ તમારા માટે આ ત્રીભોવન માં કાંઈ અપ્રાપ્ત નથી તમે આ અશ્ર્વો ની પાંખો કાપી નાખો ..!

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આ અશ્ર્વો કાયમ યુદ્ધ કાળ વખતે દાનવો ના રથને ખેંચે છે,  જે સારા હાથી માટે પણ અશકય છે ..!

શાલીહોત્ર મૂની એ ઇન્દ્ર દેવ ની વાત માની ને “ઇષીકાસ્ત્ર”  થી બધા અશ્ર્વો ની પાંખો કાપી નાખે છે, 

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કપાય ગયેલ પાંખો વાળા અશ્ર્વો લોહી થી પલળેલાં અને દુ:ખી થઈ ને શાલીહોત્ર મૂની ના શરણ માં આવે છે ..!!

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અને કહે છે કે “હે ભગવાન” તમે અમારી આ દશા કેમ કરી ..? સજ્જન વ્યક્તિ નિર્દોષ સાથે આવો વ્યવહાર નથી કરતાં “હે મૂની શ્રેષ્ઠ” તમે અમને ગતી આપો અમને સુખી કરો એવી અમારી પ્રાર્થના છે ..!!

શાલીહોત્ર મૂની કરૂણાં થી દ્રવિત થઇ ને દુ:ખી અશ્ર્વો ને કહે છે કે ઇન્દ્ર દેવ ના કહેવાથી મેં આ પીડાદાયક કર્મ કર્યું છે, હવે હું એવું કાર્ય કરીશ જેનાથી આપ સુખ , દેહ માં પુષ્ટિ અને ત્રીલોક માં ગૌરવ મલશે..!!

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તમે સુર્ય, ઇન્દ્ર, ઇત્યાદિ દેવતા અને રાજા ના વાહન તરીકે સુશોભિત થશો, જે રાજા તમને ધાસ,  પાણી , અને બીજી સુવિધા થી પુષ્ટ રાખશે તે રાજા અજય રહેશે, કમલનેત્ર વાળી ભૂલક્ષ્મી તેનો કયારેય ત્યાગ નહીં કરે પછી ભલે ને તે શત્રુઓ થી ઘેરાયેલ હોય…!!

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એમાં કોઇ શંકા નથી હવે હું અશ્ર્વો ની પુષ્ટિ, રોગ,ની શાંન્તિ માટે અને મનુષ્ય ના હિત માટે અશ્ર્વ ની પરમ ચીકિત્સા પ્રગટ કરીશ ..!!

મારો આદેશ છે કે તમે બધા અશ્ર્વો પોતાની રૂચી પ્રમાણે સ્વર્ગલોક , ભૂલોક,  અને પાતાળલોક તરફ પ્રસ્થાન કરો , જેનાથી તમને પરમ શાંન્તિ થાય ..!!

તે સમય થી આ ભૂલોક પર અશ્ર્વો ફરે છે ..!!

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•☆•પછી શાલીહોત્ર મૂની એ 18000 શ્ર્લોક વાળા અશ્ર્વશાસ્ત્ર ની રચના કરી , અને શાલીહોત્ર મૂની ના પ્રભાવથી ઉત્પન્ન અશ્ર્વ ની ચીકિત્સા વિજ્ઞાન આ લોક માં પ્રકાશીત છે
(અશ્ર્વશાસ્ત્ર અધ્યાય -2- 1/17 )
સાભાર….અનિરૂધ્ધ ભાઇ ધાધલ
સૌજન્ય  : રાજભા ઝાલા

History & Literature

અશ્વ વિશે માહિતી…

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અશ્ર્વ ની ઉમર અને આયુષ્ય
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અશ્ર્વ ને ગર્ભ ધારણ કર્યાં પછી અગીયાર મેં મહિને પ્રસવ થાય છે , બચ્ચાં નો જન્મ થતાં જ તેને ખૂરથી જાનુ પર્યન્ત માપતાં જેટલી ઉંચાઈ જણાય તેથી ત્રણ ગુણી ઉંચાઈ તેની યુવાવસ્થામાં થાય છે ..!

વછેરો અથવા વછેરી નો જન્મ થતી વખતે તેના મુખીની સામે ના ભાગ માં  એક દાંત હોતો નથી , પરંતુ જડબા ને બન્ને કિનારે બે દાઢ અને બીજા બે મળી કુલ ચાર પેષળ દંત નિકળે છે ..!

તેમાં એક ને પ્રથમ પેષળદંતની અને બીજા ને દ્રિતીય પેષળદંતની કહે છે,   અશ્ર્વ બાલની અવસ્થા એક અઠવાડિયા ની થતાં તેના મુખાગ્ર ભાગમાં ઉપર ના બે તથાં નિચે ના બે મળી કુલ ચાર  છેદનદંત ઉગે છે અને પાંચ અઠવાડિયા બાદ અર્થાત સવા મહિના પછી મૂખ ના અગ્ર ભાગમાં બીજા બે છેદનદંત અને ત્રીજો પેષળદંત નિકળે છે ..!

આઠ મહિના સુધી માં એજ સ્થળે બીજા બે છેદનદંત ઉગે છે ,  એ સર્વે દાંત અત્યંત શ્ર્વેત અને ચોખ્ખા હોય છે અને તેના ઉપર એક ન્હાનો સરખો કાળો ખાડો પણ હોય છે ..!!

એક વર્ષ પૂર્ણ થતાં ચોથો પેષળદંત,  બીજા વર્ષમાં પાંચમો અને ત્યાર બાદ સ્વપ્ન સમજ માંજ છઠ્ઠો પેષળદંત નિકળે છે ,  જયારે બે વર્ષ ઉપર આઠ કે નવ મહિના ની અવસ્થા થાય ત્યારે વચ્ચે ની બે ખીલી પડી તેની જગ્યા એ બીજા બે સ્થાયી દાંત નિકળે છે તે શ્ર્વેત અને ઉપર ખાડાવાળા હોય છે,  છ મહિના પછી તેની પાસે ના બીજા બે દાંત પડી અને બીજા બે મ્હોટાં સ્થાયી દાંત ઉગે છે …!!

અને ચાર વર્ષ ઉપરાંત છ મહિના ની અવસ્થા થતાં બાકી ના બે દાંત પડી જાય છે અને તે સ્થળે બીજા બે મ્હોટાં દાંત નિકળે છે અને એજ અરશા માં નેશ ઉપર તથા નિચે અર્થાત બન્ને જડબામાં ઉગે છે ,  જો નેશ ન નિકળે તો દરેક જડબામાં અઢાર અને જો નેશ નિકળે તો વીશ દાંત હોય છે ..!!

આ લક્ષણ થી જન્મ થી આરંભી પાંચ વર્ષ પર્યન્ત ની અવસ્થા બતાવી શકાય છે ,  છઠ્ઠે વર્ષે વચલા બે સ્થાયી છેદન દંત ઉપર ના ખાડા માં ભરાય જાય છે અને તેની કાળાશ તદ્દન નષ્ટ થઇ જાય છે ,  આઠ્ઠમાં વર્ષ માં બાકી ના છેદનદંત ની એજ સ્થીતી થાય છે ..!

નવમે વર્ષે બધાં દાંત પીળાં થવા માંડે છે તે અગ્યાર વર્ષ સુધી સાવ પીળા બની જાય છે,  ફરી તે ચૌદ માં વર્ષ થી શ્ર્વેત થવા લાગે છે અને સોળ વર્ષ સુધીમાં તમામ શીશા ની માફક સફેદ બની જાય છે,   સતર માં વર્ષ થી મક્ષીકા જેવો રંગ થવા માંડે છે અને વીશ માં વર્ષ માં શંખની માફક  શુન્ન બની જાય છે ..!!

અશ્ર્વ ને સ્થાયી દાંત નિકળ્યા પછી દર વર્ષે જરા જરા વૃદ્ધિ પામતાં જાય છે અને તે ત્રેવીશ વર્ષ ની અવસ્થા એ બહું મોટાં જણાય આવે છે ,  છ વીસ માં વર્ષ પછી અશ્ર્વ ના દાંત ડગવા લાગે છે અને ઓગળત્રીશ મેં વર્ષે તમામ દાંત પડી જાય છે ..!!

કેટલાક પંડીત લોકો ચાલીસ વર્ષ નું આયુષ્ય કહે છે ..

જન્મ થી ચાર વર્ષ અશ્ર્વ ની બાલ અવસ્થા ગણાય છે ..!

પાંચ થી આઠ વર્ષ સુધી યુવાવસ્થા ગણાય છે ..!

નવ થી વીશ વર્ષ પ્રૌઢ અવસ્થા લેખાય છે અને ત્યારબાદ તેને વૃદ્ધા અવસ્થા પ્રાપ્ત થાય છે !!

•☆• કેટલાક અંગ્રેજ લોકો ની એવી માન્યતા હતી કે અશ્ર્વ પચ્ચીસ થી ત્રીશ વર્ષ પર્યન્ત નું વધારે માં વધારે આયુષ્ય ભોગવે છે

સંદર્ભ -શ્રી ઝાલાવંશ વારીધી
સૌજન્ય – રાજભા ઝાલા

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