Daily Archives: March 31, 2016

भारतीय राष्ट्रीय संवत – शक संवत ( Saka Era ) >>>डा. सुशील

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भारतीय राष्ट्रीय संवत – शक संवत ( Saka Era )
>>>डा. सुशील भाटी                                         
Kanishka’s Emblem

शक संवत भारत का राष्ट्रीय संवत हैं| इस संवत को कुषाण/कसाना सम्राट कनिष्क महान ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में 78 इस्वी में चलाया था| इस संवत कि पहली तिथि चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होती हैं जोकि भारत के विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान के राज्य रोहण की वर्ष गाठ हैं| शक संवत में कुछ ऐसी विशेषताए हैं जो भारत में प्रचलित किसी भी अन्य संवत में नहीं हैं जिनके कारण भारत सरकार ने इसे “भारतीय राष्ट्रीय संवत” का दर्ज़ा प्रदान किया हैं|

भारत नस्लीय, भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता वाला विशाल देश हैं, जिस कारण आज़ादी के समय यहाँ अलग-अलग प्रान्तों में विभिन्न  संवत चल रहे थे| भारत सरकार के सामने यह समस्या थी कि किस संवत को  भारत का अधिकारिक संवत का दर्जा दिया जाए| वस्तुत भारत सरकार ने सन 1954 में संवत सुधार समिति(Calendar Reform Committee) का गठन किया जिसने देश प्रचलित 55 संवतो की पहचान की| कई बैठकों में हुई बहुत विस्तृत चर्चा के बाद संवत सुधार समिति ने स्वदेशी संवतो में से शक संवत को अधिकारिक राष्ट्रीय संवत का दर्जा प्रदान करने कि अनुशंषा की, क्योकि  प्राचीन काल में यह संवत भारत में सबसे अधिक प्रयोग किया जाता था| शक संवत भारतीय संवतो में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, सही तथा त्रुटिहीन हैं, शक संवत प्रत्येक साल 22 मार्च को शुरू होता हैं, इस दिन सूर्य विश्वत रेखा पर होता हैं तथा दिन और रात बराबर होते हैं| शक संवत में साल 365 दिन होते हैं और इसका ‘लीप इयर’ ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ के साथ-साथ ही पड़ता हैं| ‘लीप इयर’ में यह 23 मार्च को शुरू होता हैं और इसमें ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ की तरह 366 दिन होते हैं|

पश्चिमी ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ के साथ-साथ, शक संवत भारत सरकार द्वारा कार्यलीय उपयोग लाया जाना वाला अधिकारिक संवत हैं| शक संवत का प्रयोग भारत के ‘गज़ट’ प्रकाशन और ‘आल इंडिया रेडियो’ के समाचार प्रसारण में किया जाता हैं| भारत सरकार द्वारा ज़ारी कैलेंडर, सूचनाओ और संचार हेतु भी शक संवत का ही प्रयोग किया जाता हैं|

जहाँ तक शक संवत के ऐतिहासिक महत्त्व कि बात हैं, इसे भारत के विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में चलाया था| कनिष्क एक बहुत विशाल साम्राज्य का स्वामी था| उसका साम्राज्य मध्य एशिया स्थित काला सागर से लेकर पूर्व में उडीसा तक तथा उत्तर में चीनी तुर्केस्तान से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैला हुआ था| उसके साम्राज्य में वर्तमान उत्तर भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान के हिस्सा, तजाकिस्तान का हिस्सा और चीन के यारकंद, काशगर और खोतान के इलाके थे| कनिष्क भारतीय इतिहास का एक मात्र सम्राट हैं जिसका राज्य दक्षिणी एशिया के बाहर मध्य एशिया और चीन के हिस्सों को समाये था| वह इस साम्राज्य पर चार राजधानियो से शासन करता था| पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) उसकी मुख्य राजधानी थी| मथुरा, तक्षशिला और बेग्राम उसकी अन्य राजधानिया थी| कनिष्क इतना शक्तिशाली था कि उसने चीन के सामने चीनी राजकुमारी का विवाह अपने साथ करने का प्रस्ताव रखा, चीनी सम्राट द्वारा इस विवाह प्रस्ताव को ठुकराने पर कनिष्क ने चीन पर चढाई कर दी और यारकंद, काशगार और खोतान को जीत लिया|

कनिष्क के राज्य काल में भारत में व्यापार और उद्योगों में अभूतपूर्व तरक्की हुई क्योकि मध्य एशिया स्थित रेशम मार्ग जिससे यूरोप और चीन के बीच रेशम का व्यापार होता था उस पर कनिष्क का कब्ज़ा था| भारत के बढते व्यापार और आर्थिक उन्नति के इस काल में तेजी के साथ नगरीकरण हुआ| इस समय पश्चिमिओत्तर भारत में करीब 60 नए नगर बसे और पहली बार भारत में कनिष्क ने ही बड़े पैमाने सोने के सिक्के चलवाए|

कुषाण/कसाना समुदाय एवं उनका नेता कनिष्क मिहिर (सूर्य) और अतर (अग्नि) के उपासक थे| उसके विशाल साम्राज्य में विभिन्न धर्मो और रास्ट्रीयताओं के लोग रहते थे| किन्तु कनिष्क धार्मिक दृष्टीकोण से बेहद उदार था, उसके सिक्को पर हमें भारतीय, ईरानी-जुर्थुस्त और ग्रीको-रोमन देवी देवताओं के चित्र मिलते हैं| बाद के दिनों में कनिष्क बोद्ध मत के प्रभाव में आ गया| उसने कश्मीर में चौथी बोद्ध संगति का आयोज़न किया, जिसके फलस्वरूप बोद्ध मत कि महायान शाखा का उदय हुआ| कनिष्क के प्रयासों और प्रोत्साहन से बोद्ध मत मध्य एशिया और चीन में फ़ैल गया, जहाँ से इसका विस्तार जापान और कोरिया आदि देशो में हुआ| इस प्रकार गौतम बुद्ध, जिन्हें भगवान विष्णु का नवा अवतार माना जाता हैं, उनके मत का प्रभाव पूरे एशिया में व्याप्त हो गया और भारत के जगद गुरु होने का उद् घोष विश्व की हवाओ में गूजने लगा|

कनिष्क के दरबार में अश्वघोष, वसुबंधु और नागार्जुन जैसे विद्वान थे| आयुर्विज्ञानी चरक और श्रुश्रत कनिष्क के दरबार में आश्रय पाते थे| कनिष्क के राज्यकाल में संस्कृत सहित्य का विशेष रूप से विकास हुआ| भारत में पहली बार बोद्ध साहित्य की रचना भी संस्कृत में हुई| गांधार एवं मथुरा मूर्तिकला का विकास कनिष्क महान के शासनकाल की ही देन हैं|
    
मौर्य एवं मुग़ल साम्राज्य की तरह कुषाण/कसाना वंश ने लगभग दो शताब्दियों (५०-२५० इस्वी) तक उनके जितने ही बड़े साम्राज्य पर शान से शासन किया| कनिष्क का शासनकाल इसका चर्मोत्कर्ष था| कनिष्क भारतीय जनमानस के दिलो दिमाग में इस कदर बस गया की वह एक मिथक बन गया| तह्कीके – हिंद का लेखक अलबरूनी १००० इस्वी के लगभग भारत आया तो उसने देखा की भारत में यह मिथक प्रचलित था कि कनिष्क की ६० पीढियों ने काबुल पर राज किया हैं| कल्हण ने बारहवी शताब्दी में कश्मीर का इतिहास लिखा तो वह भी कनिष्क और उसके बेटे हुविष्क कि उपलब्धियों को बयां करता दिखलाई पड़ता हैं| कनिष्क के नाम की प्रतिष्ठा हजारो वर्ष तक कायम रही, यहाँ तक कि भारत के अनेक राजवंशो की वंशावली कुषाण काल तक ही जाती हैं| क्या ये महज़ एक इत्तेफाक हैं कि मेवाड़ के सिसोदिया और टिहरी के पंवार अपना पूर्वज किसी कनक को मानते हैं? शाकुम्भरी के चौहान अपना पूर्वज किसी वासुदेव को मानते हैं, जबकि कनिष्क के पौत्र का नाम भी वासुदेव था|

शक संवत का भारत में सबसे व्यापक प्रयोग अपने प्रिय सम्राट के प्रति प्रेम और आदर का सूचक हैं, और उसकी कीर्ति को अमर करने वाला हैं| प्राचीन भारत के महानतम ज्योतिषाचार्य वाराहमिहिर (५०० इस्वी) और इतिहासकार कल्हण (१२०० इस्वी) अपने कार्यों में शक संवत का प्रयोग करते थे| उत्तर भारत में कुषाणों और शको के अलावा गुप्त सम्राट भी मथुरा के इलाके में शक संवत का प्रयोग करते थे| दक्षिण के चालुक्य और राष्ट्रकूट और राजा भी अपने अभिलेखों और राजकार्यो में शक संवत का प्रयोग करते थे|

मध्य एशिया कि तरफ से आने वाले कबीलो को भारतीय सामान्य तौर पर शक कहते थे, क्योकि कुषाण भी मध्य एशिया से आये थे इसलिए उन्हें भी शक समझा गया और कनिष्क कुषाण/कसाना द्वारा चलाया गया संवत शक संवत कहलाया| इतिहासकार फुर्गुसन के अनुसार अपने कुषाण अधिपतियो के पतन के बाद भी उज्जैन के शको द्वारा कनिष्क के संवत के लंबे प्रयोग के कारण इसका नाम शक संवत पड़ा|

शक संवत की लोकप्रियता का एक कारण इसका उज्जैन के साथ जुड़ाव भी था, क्योकि यह नक्षत्र विज्ञानं और ज्योतिष का भारत में सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था| मालवा और गुजरात के जैन जब दक्षिण के तरफ फैले तो वो शक संवत को अपने साथ ले गए, जहाँ यह आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं| दक्षिण भारत से यह दक्षिण पूर्वी एशिया के कम्बोडिया और जावा तक प्रचलित हो गया| जावा के राजदरबार में तो इसका प्रयोग १६३३ इस्वी तक होता था, जब वहा पहली बार इस्लामिक कैलेंडर को अपनाया गया| यहाँ तक कि फिलीपींस से प्राप्त प्राचीन ताम्रपत्रों में भी शक संवत का प्रयोग किया गया हैं

                        शक संवत एवं विक्रमी संवत

शक संवत और विक्रमी संवत में महीनो के नाम और क्रम एक ही हैं- चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, आसाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, पौष, अघन्य, माघ, फाल्गुन| दोनों ही संवतो में दो पक्ष होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष| दोनों संवतो में एक अंतर यह हैं कि जहाँ विक्रमी संवत में महीना पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष से शुरू होता हैं, वंही शक संवत में महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होते हैं| उत्तर भारत में दोनों ही संवत चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को आरम्भ होते हैं, जोकि शक संवत के चैत्र माह की पहली तारीख होती हैं, किन्तु यह विक्रमी संवत के चैत्र की १६ वी तारीख होती हैं, क्योकि विक्रमी संवत के चैत्र माह के कृष्ण पक्ष के पन्द्रह दिन बीत चुके होते हैं| गुजरात में तो विक्रमी संवत कार्तिक की अमावस्या के अगले दिन से शुरू होता हैं|

                                              सन्दर्भः
    U P  Arora , Ancient India: Nurturants of Composite culture,  Papers from The Aligarh Historians Society , Editor Irfan Habib, Indian History Congress, 66th sessions , 2006.
    A L Basham, The wonder that was India, Calcutta, 1991.
    Shri Martand Panchangam, Ruchika Publication, Khari Bawli, Delhi, 2012.
    Rama Shankar Tripathi, History of Ancient India, Delhi, 1987.
    D N Jha & K M Shrimali, Prachin Bharat ka  Itihas, Delhi University, 1991.
    Prameshwari lal Gupta, Prachin Bhartiya Mudrae,Varanasi, 1995.
    Lalit Bhusan, Bharat Ka Rastriya Sanvat- Saka Sanvat,Navbharat Times, 11 April 2005.

History & Literature

विक्रम संवत

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हिन्दू नव वर्ष विक्रमी सम्वत 2073
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तदनुसार
08 अप्रैल 2016 को आरम्भ हो रहा है।

नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनायें !

शकों के अत्याचार से भारत को मुक्त
किया सम्राट विक्रमादित्य ने !

ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भूमि पर
एक साम्राज्य था मालव गण।
मालव गण की राजधानी थी भारत की
प्रसिद्ध नगरी उज्जैन ।
उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था ।

प्रजा वात्सल्य राजा नाबोवाहन की
मृत्यु केपश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने
“महाराजाधिराज मालवाधिपति”की
उपाधि धारण करके मालव गण को
राजतन्त्र में बदल दिया ।

उस समय भारत में चार शक शासको का
राज्य था।
शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ
सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश
हो गया।

एक बार मालव गण की राजधानी में एक
जैन साध्वी पधारी।
उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण
गंधर्व सेन भी उनके दर्शन करने पहुँच गया।

साध्वी के रूप ने उन्हें कामांध बना दिया।
महाराज ने साध्वी का अपहरण कर लिया
तथा साध्वी के साथ जबरदस्ती विवाह
कर लिया।

अपनी बहन साध्वी के अपहरण के
बाद उनके भाई जैन मुनि कलिकाचार्य
ने राष्ट्रद्रोह करके बदले की भावना से
शक राजाओं को उज्जैन पर हमला
करने के लिए तैयार कर लिया।

शक राजाओं ने चारों ओर से आक्रमण
करके उज्जैन नगरी को जीत लिया।

शोषद वहाँ का शासक बना दिया गया।
गंधर्व सेन साध्वी और अपनी रानी
सोम्यादर्शन के साथ विन्ध्याचल के
वनों में छुप गये।

साध्वी सरस्वती ने महारानी सोम्या से बहुत
दुलार पाया तथा साध्वी ने भी गंधर्व सेन
को अपना पति स्वीकार कर लिया ।

वनों में निवास करते हुए,सरस्वती ने एक
पुत्र को जन्म दिया,जिसका नाम भर्तृहरि
रक्खा गया।

उसके तीन वर्ष पश्चात महारानी सोम्या
ने भी एक पुत्र को जन्म दिया।
जिसका नाम विक्रम सेन रक्खा गया।

विंध्याचल के वनों में निवास करते हुए
एक दिन गंधर्व सेन आखेट को गये,
जहाँ वे एक सिंह का शिकार हो गये।

वहीं साध्वी सरस्वती भी अपने भाई
जैन मुनि कलिकाचार्य के राष्ट्रद्रोह से
क्षुब्ध थी।

महाराज की मृत्यु के पश्चात उन्होंने भी
अपने पुत्र भर्तृहरि को महारानी को
सौंपकर अन्न का त्याग कर दिया।
और अपने प्राण त्याग दिए।

उसके पश्चात महारानी सोम्या दोनों पुत्रों
को लेकर कृष्ण भगवान् की नगरी चली गई,
तथा वहाँ पर अज्ञातवास काटने लगी।

दोनों राजकुमारों में भर्तृहरि चिंतनशील
बालक था,तथा विक्रम में एक असाधारण
योद्धा के सभी गुण विद्यमान थे।

अब समय धीरे धीरे समय अपनी काल
परिक्रमा पर तेजी से आगे बढने लगा।

दोनों राजकुमारों को पता चल चुका था
कि शको ने उनके पिता को हराकर
उज्जैन पर अधिकार कर लिया था,
तथा शक दशको से भारतीय जनता
पर अत्याचार कर रहे है।

विक्रम जब युवा हुआ तब वह एक
सुगठित शरीर का स्वामी व एक
महान योद्धा बन चुका था।

धनुषबाण,खडग,असी,त्रिशूल व परशु
आदि में उसका कोई सानी नही था।

अपनी नेतृत्व करने की क्षमता के कारण
उसने एक सैन्य दल भी गठित कर लिया था।

अब समय आ गया था की भारतवर्ष को
शकों से छुटकारा दिलाया जाय।

वीर विक्रमसेन ने अपने मित्रो को संदेश
भेजकर बुला लिया।

सभाओं व मंत्रणा के दौर शुरू हो गए।

निर्णय लिया गया की,सर्वप्रथम उज्जैन
में जमे शक राजा शोशाद व उसके भतीजे
खारोस को युद्ध में पराजित करना होगा।

परन्तु एक अड़चन थी कि उज्जैन पर
आक्रमण के समय सौराष्ट्र का शकराज
भुमक व तक्षशिला का शकराज कुशुलुक
शोशाद की सहायता के लिए आयेंगे।

विक्रम ने कहा कि शक राजाओं के पास
विशाल सेनायें है,संग्राम भयंकर होगा।

उसके मित्रो ने उसे आश्वासन दिया कि
जब तक आप उज्जैन नगरी को नही
जीत लेंगे,तब तक सौराष्ट्र व तक्षशिला
की सेनाओं को हम आपके पास फटकने
भी न देंगे।

विक्रम सेन के इन मित्रों में सौवीर गणराज्य
का युवराज प्रधुम्न,कुनिंद गन राज्य का
युवराज भद्रबाहु,अमर्गुप्त आदि प्रमुख थे।

अब सर्वप्रथम सेना की संख्या को बढ़ाना
व उसको सुदृढ़ करना था।

सेना की संख्या बढ़ाने के लिए गावं गावं
के शिव मंदिरों में #भैरव_भक्त के नाम
से गावों के युवकों को भर्ती किया जाने
लगा।

सभी युवकों को त्रिशूल प्रदान किए गए।
युवकों को पास के वनों में शस्त्राभ्यास
कराया जाने लगा।
इस कार्य में वनीय क्षेत्र बहुत सहायता
कर रहा था।
इतना बड़ा कार्य होने के बाद भी शकों
को कानोकान भनक भी नही लगी।

कुछ ही समय में #भैरव_सैनिकों की
संख्या लगभग ५० सहस्त्र हो गई।

भारत वर्ष के वर्तमान की हलचल देखकर
भारत का भविष्य अपने सुनहरे वर्तमान
की कल्पना करने लगा।

लगभग दो वर्ष भागदौड़ में बीत गए।

इसी बीच विक्रम को एक नया सहयोगी
मिल गया “अपिलक”।
अपिलक आन्ध्र के महाराजा शिवमुख
का अनुज था।

अपिलक को भैरव सेना का सेनापति बना
दिया गया।
धन की व्यवस्था का भार अमरगुप्त को
सोपा गया।

अब जहाँ भारत का भविष्य एक चक्रवर्ती
सम्राट के स्वागत के लिए आतुर था,वहीं
चारो शक राजा भारतीय जनता का शोषण
कर रहे थे और विलासी जीवन में लिप्त थे।

ईशा की प्रथम शताब्दी में महाकुम्भ के
अवसर पर सभी भैरव सैनिकों को साधू
-संतो के वेश में उज्जैन के सैकडो गावों
के मंदिरों में ठहरा दिया गया।

प्रत्येक गाँव का मन्दिर मानो शिव के तांडव
के लिए भूमि तैयार कर रहा था।

महाकुम्भ का स्नान समाप्त होते ही सैनिकों
ने अपना अभियान शुरू कर दिया।

भैरव सेना ने उज्जैन व विदिशा को घेर
लिया गया।
भीषण संग्राम हुआ।
विदेशी शकों को बुरी तरह काट डाला गया।
उज्जैन का शासक शोषद भाग खड़ा हुआ।

मथुरा के शासक का पुत्र खारोश विदिशा
के युद्ध में मारा गया।
इस समाचार को सुनते ही सौराष्ट्र व मथुरा
के शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया।

अब विक्रम के मित्रों की बारी थी,
उन्होंने सौराष्ट्र के शासक भुमक को
भैरव सेना के साथ राह में ही घेर लिया,
तथा उसको बुरी तरह पराजित किया,
तथा अपने मित्र को दिया वचन पूरा
किया।

मथुरा के शक राजा राज्बुल से विक्रम
स्वयं टकरा गया और उसे बंदी बना
लिया।
आंध्र महाराज सत्कारणी के अनुज
अपिलक के नेतृत्व में पूरे मध्य भारत
में भैरव सेना ने अपने तांडव से शक
सेनाओं को समाप्त कर दिया।

विक्रमसेन ने अपने भ्राता भर्तृहरि को
उज्जैन का शासक नियुक्त कराया।

तीनो शक राजाओं के पराजित होने के
बाद तक्षशिला के शक राजा कुशुलुक ने
भी विक्रम से संधि कर ली।

मथुरा के शासक की महारानी ने विक्रम
की माता सौम्या से मिलकर क्षमा मांगी
तथा अपनी पुत्री हंसा के लिए विक्रम
का हाथ मांगा।

महारानी सौम्या ने उस बंधन को तुंरत
स्वीकार कर लिया।

विक्रम के भ्राता भर्तृहरि का मन शासन
से अधिक ध्यान व योग में लगता था
इसलिए उन्होंने राजपाट त्याग कर
सन्यास ले लिया।
उज्जैन नगरी के राजकुमार ने पुन: वर्षों
पश्चात गणतंत्र की स्थापना की व्यवस्था
की परन्तु मित्रों व जनता के आग्रह पर
विक्रमसेन को महाराजाधिराज विक्रमादित्य
के नाम से सिंहासन पर आसीन होना पडा।

लाखों की संख्या में शकों का यज्ञोपवीत
हुआ।
शक हिंदू संस्कृति में ऐसे समा गए जैसे
एक नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व
खो देती है।

विदेशी शकों के आक्रमणों से भारत मुक्त
हुआ तथा हिंदू संस्कृती का प्रसार समस्त
विश्व में हुआ।

इसी शक विजय के उपरांत ईशा से ५७ वर्ष
पूर्व महाराजा विक्रमादित्य के राज्याभिषेक
पर “विक्रमी-संवत” की स्थापना हुई।

आगे आने वाले कई चक्रवर्ती सम्राटों ने
इन्ही सम्राट विक्रमादित्य के नाम की
उपाधि धारण की।
–#साभार_संकलित;
भारतवर्ष के ऐसे वीर शिरोमणि सम्राट
विक्रमादित्य को शत-शत प्रणाम !

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,

सदा सर्वदा सुमंगल ,,,
हर हर महादेव,,,
जय भवानी,,,
जय श्री राम

History & Literature