हठीळो राजस्थान

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नान्हां गीगा-गीगली, जामण, कामण गेह ।
भड़ बाल्या निज हाथ सूँ, करतब ऊंचौ नेह ॥

( जौहर के अवसर पर दूध-मुँहें बच्चों, निज जननी तथा अपनी भार्या को अग्नि की लपटों के समर्पित कर वीरों ने यह सिद्ध कर दिया है, कि कर्तव्य प्रेम से भी बड़ा होता है । )

कुटम कबीलो आपरौ, सह पाळै संसार ।
भड़ बाळै करतब तणौ, क्षात्र-धर्म बलिहार ॥

( अपने परिवार का पालन पोषण तो सारा संसार ही करता है, परन्तु वीर तो कर्तव्य की वेदी पर अपने परिवार को भी झोंक देते हैं । निश्चय ही हम इस क्षात्र-धर्म पर बलिहारी हैं । )

भाजण पूत बुलावियो, दूध दिखावण पाण ।
छोड़ी हांचळ धार इक, फाट गयो पाखाण ॥

( युद्ध क्षेत्र से भागने वाले अपने पुत्र को माँ ने अपने दूध का पराक्रम दिखाने के लिए बुलाया और अपने स्तनों से दूध की धार पत्थर पर छोड़ी तो वह भी फट गया । )

जी सी वाही जातडी, लड़सी झाड़ो झाड़ ।
लड़ै पड़ै, पड़-पड़ लड़ै, पटकै अन्त पछाड़ ॥

( संसार में वही जाति जीवित रहेगी जो कदम-कदम पर संघर्ष करने को उद्यत है । जो जाति युद्ध करती है, पराजित होने पर फिर उठ खड़ी होती है, फिर लड़ती है व अन्त में शत्रु पर विजय प्राप्त करती है, वही दीर्घकाल तब जीवित रहती है । )

-स्वर्गीय आयुवानसिंघ जी हुडील की पुस्तक  ‘हठीळो राजस्थान’ से साभार

History & Literature

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