इंडोनेशिया की रामकथा:

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शिला चित्रों में रुपादित रामायण

जो कथा किसी भाषा के माध्यम से कही जाती है, उसे उस भाषा के जानने वाले ही समझ पाते हैं, किंतु जो कथा चित्रों में रुपायित होती है, उसे सब समझ सकते हैं। संभवत: इसी कारण दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक स्थलों पर शिलाचित्रों में रामकथा की अभिव्यक्ति हुई है। कई देशों में शिलाचित्र श्रृंखलाओं में रामचरित का वर्णन हुआ है। उनमें जवा के प्रम्बनान तथा पनातरान, कंपूचित्रा के अंकारेवाट और थाईलैंड के जेतुवन विहार के नाम उल्लेखनीय हैं।जावा के हरे-भरे मनमोहक मैदान में अवस्थित प्रम्वनान का पुरावशेष चंडी सेवू के नाम से विख्यात है। इसे चंड़ी लाराजोंगरांग भी कहा जाता है। इस परिसर में २३५ मंदिर के मग्नावशेष हैं। इसके वर्गाकार आंगन के मध्य भाग में उत्तर से दक्षिण पंक्तिवद्ध तीन मंदिर हैं। बीच में शिव मंदिर है। शिव मंदिर के उत्तर ब्रह्मा तथा दक्षिण में विष्णु मंदिर हैं। शिव और ब्रह्मा मंदिर में राम कथा और विष्णु मंदिर में कृष्ण लीला के शिलाचित्र हैं। चंडी लाराजोंगरंग के मंदिरों का निर्माण दक्ष नामक राजकुमार ने नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में करवाया था।प्रम्बनान के मंदिरों को १५४९ई. के आस-पास मेरापी ज्वालामुखी के विस्फोट में काफी क्षति पहुँची। वे सदियों तक ज्वालामुखी के लावा के नीचे दबे रहे। योग्यकार्टा के पुरातत्व विभाग द्वारा १८८५ई. में उसकी खुदाई शुरु हुई। फिर तो, उसके अवशेष को देख कर लोग अचंभित हो गये। तीन सौ वर्षों से मुसलमान बने लोग मंदिर में धूप-दीप लेकर पूजा अर्चना करने दौड़ पड़े। इस घटना का चश्मदीद गवाह फ्रांसीसी यात्री जूल ने हाजियों को भी हिंदू मंदिर में पूजा करते देखा था।१इंडोनेशिया के पुरातत्व विभाग ने १९१९ई. में पूरे मनोयोग के साथ प्रम्बनान मंदिर परिसर स्थित विशाल शिवालय के पुनर्निमाण का कार्य पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति से आरंभ किया। इस कार्य में अनेक यूरोपीय विद्वानों ने सक्रिय रुप से सहयोग किया। सन् १९५३ई. में यह दु:साध्य कार्य पूरा हुआ। इसे वास्तव में पुरातत्त्व अभियंत्रण का चमत्कार ही कहा जा सकता है। इसके अंदर रामायण शिलाचित्रों को यथास्थान स्थापित कर दिया गया है। जर्मन विद्वान विलेन स्टूरहाइम ने इन रामायण शिलाचित्रों का अध्ययन किया है।प्रम्बनान के शिव मंदिर में रामकथा के ४२ और ब्रह्मा मंदिर में ३० शिला चित्र हैं। इस प्रकार ७२ शिलाचित्रों में यहाँ संपूर्ण राम कथा रुपायित हुई है।२ प्रम्बनान के शिलाचित्रों में उत्कीर्ण राम कथा में आदि कवि की रचना से अनेक स्थलों पर भिन्नता है। इनमें सीता हरण के समय रावण द्वार दानव की पीठ पर स्थापित यान से यात्रा करना, सीता द्वारा जटायु को अंगूठी देना, सेतु निर्माण के समय मछलियों द्वारा पत्थरों को निगलना, रावण के दरबार में अंगद का कान काटा जाना आदि प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं हैं। इस विशाल श्रृंखला में कुछ चित्र ऐसे भी हैं जहाँ व्याख्याकारों को उसी प्रकार अंटक जाना पड़ता है, जिस प्रकार महाभारत के लिपीकार को व्यास के दृष्टिकूटों को समझने के लिए कलम रोकनी पड़ती थी।प्रम्बनान के शिलाचित्रों की स्थापना के चार सौ वर्ष बाद पूर्वी जावा में पनातरान के शिला शिल्प में पुन: राम कथा की अभिव्यक्ति हुई है। चंडी पनातरान ब्लीटार जिला में केतुल पर्वत के पास दक्षिण-पश्चिम की तलहटी में स्थित है। यहाँ चारों ओर से वृत्ताकार दीवार से घिरा एक शिव मंदिर है जिसका मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है। इसका निर्माण कार्य मजपहित वंश के राजकुमार हयमबुरुक की माता जयविष्णुवर्धनी के राजत्व काल में १३४७ई. में पूरा हुआ था, किंतु इसका आरंभ किसी पूर्ववर्ती सम्राट ने ही किया था।चंडी पनातरान में राम कथा के १०६ शिला चित्र है।३ इनमें मुख्य रुप से हनुमान के पराक्रम को प्रदर्शित किया गया है। इसका आरंभ हनुमान के लंका प्रवेश से हुआ है और कुंभकर्ण की मृत्यु के बाद यहाँ की कथा समाप्त हो जाती है। प्रम्बनान के शिलाचित्र हिंदू-जावानी शैली में उत्कीर्ण है, जबकि पनातरान का शिलाशिल्प पूरी तरह जावानी है। इनमें चित्रित वस्राभूषण तथा अस्र-शस्र के साथ पात्रों की आकृतियों पर भी जापानी शैली का प्रभाव है।कंपूचिया स्थित अंकोरवाट मंदिर का निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (१११२-५३ई.) के राजत्वकाल में हुआ था। इस मंदिर के गलियारे में तत्कालीन सम्राट के बल-वैमन का साथ स्वर्ग-नरक, समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश तथा रामायण से संबद्ध अनेक शिलाचित्र हैं। यहाँ के शिलाचित्रों में रुपायित राम कथा बहुत संक्षिप्त है। इन शिलाचित्रों की श्रृंखला रावण वध हेतु देवताओं द्वारा की गयी आराधना से आरंभ होती है। उसके बाद सीता स्वयंवर का दृश्य है। बालकांड की इन दो प्रमुख घटनाओं की प्रस्तुति के बाद विराध एवं कबंध वध का चित्रण हुआ है। अगले शिलाचित्र में राम धनुष-बाण लिए स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। इसके उपरांत सुग्रीव से राम की मैत्री का दृश्य है। फिर, वालि और सुग्रीव के द्वेंद्व युद्ध का चित्रण हुआ है। परवर्ती शिलाचित्रों में अशोक वाटिका में हनुमान की उपस्थिति, राम-रावण युद्ध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम की अयोध्या वापसी के दृश्य हैं।४ अंकोरवाट के शिलाचित्रों में रुपायित राम कथा यद्यपि अत्यधिक विरल और संक्षिप्त है, तथापि यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी प्रस्तुति आदिकाव्य की कथा के अनुरुप हुई है।राम कथा के शिलाचित्रों में थाईलैंड का भी महत्वपूर्ण स्थान है। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक के राजभवन परिसर के दक्षिणी किनारे पर वाट-पो या जेतुवन विहार है। इसके दीक्षा कक्ष में संगमरमर के १५२ शिलापटों पर राम कथा के चित्र उत्तीर्ण हैं। जे.एम. कैडेट की पुस्तक ‘रामकियेन’ में उनके चित्र हैं और उनका अध्ययन भी किया गया है। इस ग्रंथ में उन शिलाचित्रों को नौ खंडों में विभाजित कर उनका विश्लेषण किया गया है- (१) सीता-हरण, (२) हनुमान की लंका यात्रा, (३) लंका दहन, (४) विभीषण निष्कासन, (५) छद्म सीता प्रकरण, (६) सेतु निर्माण, (७) लंका सर्वेक्षण, (९) कुंभकर्ण तथा इंद्रजीत वध और (९) अंतिम युद्ध।दक्षिण-पूर्व एशिया के रामायण शिलाचित्रों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत में वैष्णव और शैव विचारों का समन्वय की प्रवृत्ति मध्यकाल में विकसित होते है, जबकि इस क्षेत्र में इस परंपरा का आरंभ प्रम्बनान के शिवालय से ही हो जाता है जिसकी तिथि नौवीं शताब्दी है। इसके साथ ही यहाँ वैष्णव और शैव के साथ बौद्ध आस्था का भी समन्वय हुआ है।

इंडोनेशिया की रामकथा: रामायण का कावीन

इंडोनेशिया के नब्बे प्रतिशत निवासी मुसलमान हैं, फिर भी उनकी संस्कृति पर रामायण की गहरी छाप है। फादर कामिल बुल्के १९८२ई. में लिखते हैं, ‘पैंतीस वर्ष पहले मेरे एक मित्र ने जावा के किसी गाँव में एक मुस्लिम शिक्षक को रामायण पढ़ते देखकर पूछा था कि आप रामायण क्यों पढ़ते है? उत्तर मिला, ‘मैं और अच्छा मनुष्य बनने के लिए रामायण पढ़ता हूँ।’१रामकथा पर आधारित जावा की प्राचीनतम कृति ‘रामायण काकावीन’ है। यह नौवीं शताब्दी की रचना है। परंपरानुसार इसके रचनाकार योगीश्वर हैं। यहाँ की एक प्राचीन रचना ‘उत्तरकांड’ है जिसकी रचना गद्य में हुई है। चरित रामायण अथवा कवि जानकी में रामायण के प्रथम छह कांडों की कथा के साथ व्याकरण के उदाहरण भी दिये गये हैं।२ बाली द्वीप के संस्कृत साहित्य में अनुष्ठभ छंद में ५० श्लोकों की संक्षिप्त रामकथा है। रामकथा पर आधारित परवर्ती रचनाओं में ‘सेरतकांड’, ‘रामकेलिंग’ और ‘सेरी राम’ का नाम उल्लेखनीय है। इनके अतिरिक्त ग्यारहवीं शताब्दी की रचना ‘सुमनसांतक’ में इंदुमती का जन्म, अज का विवाह और दशरथ की जन्मकथा का वर्णन हुआ है। चौदहवीं शताब्दी की रचना अर्जुन विजय की कथावस्तु का आधार अर्जुन सहस्त्रवाहु द्वारा रावण की पराजय है।रामायण काकावीन की रचना कावी भाषा में हुई है। यह जावा की प्राचीन शास्रीय भाषा है। काकावीन का अर्थ महाकाव्य है। कावी भाषा में कई महाकाव्यों का सृजन हुआ है।उनमें रामायण काकावीन का स्थान सर्वोपरि है। रामायण का कावीन छब्बीस अध्यायों में विभक्त एक विशाल ग्रंथ है, जिसमें महाराज दशरथ को विश्वरंजन की संज्ञा से विभूषित किया गया है और उन्हें शैव मतावलंबी कहा गया है। इस रचना का आरंभ राम जन्म से होता है। विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण के प्रस्थान के समय अष्टनेम ॠषि उनकी मंगल कामना करते हैं और दशरथ के राज प्रसाद में हिंदेशिया का वाद्य यंत्र गामलान बजने लगता है।द्वितीय अध्याय का आरंभ बसंत वर्णन से हुआ है। यहाँ भी इंडोनेशायाई परिवेश दर्शनीय है। तुंजुंग के फूल खिले हुए हैं। सूर्य की किरणें सरोवर के जल पर बिखरी हुई हैं। उसका सिंदूरी वर्ण लाल-लाल लक्षा की तरहा सुशोभित है। लगता है मानो सूर्य की किरणे पिघल-पिघल कर स्वच्छ सरोवर के जल में परिवर्तित हो गयी है।१
विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण के यात्रा-क्रम में हिंदेशिया की प्रकृति का भव्य चित्रण हुआ है।विश्वामित्र आश्रम में दोनों राजकुमारों को अस्र-शस्र एवं ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जाती है और ताड़का वध के बाद विष्णु का अवतार मान कर उनकी वंदना की जाती है।इस महाकाव्य में मिथिला गमन, धनुभर्ंग और विवाह का वर्णन अत्यंत संक्षिप्त है। तीनों प्रसंगों का वर्णन मात्र तेरह पदों में हुआ है। इसके अनुसार देवी सीता का जिस समय जन्म हुआ था, उस समय पहले से ही उनके हाथ में एक धनुष था। वह भगवान शिव का धनुष था और उसी से त्रिपुर राक्षस का संहार हुआ था।रामायण काकावीन में परशुराम का आगमन विवाह के बाद अयोध्या लौटने के समय वन प्रदेश में होता है। उनका शरीर ताल वृक्ष के समान लंबा है। वे धनुभर्ंग की चर्चा किये बिना उन्हें अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए ललकारते हैं, किंतु राम के प्रभाव से वे परास्त होकर लौट जाते हैं। इस महाकाव्य में श्री राम के अतिरिक्त उनके अनेय किसी भाई के विवाह की चर्चा नहीं हुई है।अयोध्याकांड की घटनाओं की गति इस रचना में बहुत तीव्र है। राम राज्यभिषेक की तैयारी, कैकेयी कोप, राम वनवास, राजा दशरथ की मृत्यु और भरत के अयोध्या आगमन की घटनाएँ यहाँ पलक झपकते ही समाप्त हो जाती हैं। अयोध्या लौटने पर जब भरत को जानकारी मिलती है कि उनकी माता कैकेयी के कारण भीषण परिस्थिति उत्पन्न हुई, तब वे उस पर कुपित होते है। फिर, वे नागरिकों और गुरुजनों को बुलाकर चंद्रोदय के पूर्व पिता का श्राद्ध करने के उपरांत सदल-बल श्री राम की खोज में वन-प्रस्थान करते हैं।मार्ग में गंगा-यमुना के संगम पर भारद्वाज आश्रम में उनका भव्य स्वागत होता है। दूसरे दिन एक पवित्र सरोवर मिलता है जिनका नाम मंदाकिनी है। उसी स्थल पर उन्हें एक नग्न तपस्वी से भेंट होती है जिनसे उन्हें श्रीराम के निवास स्थान की पूरी जानकारी मिलती है। यात्रा के अंतिम चरण में उनकी भेंट राम, लक्ष्मण और सीता से होती है। अयोध्याकांड की घटनाओं के बीच मंथरा और निषाद राज की अनुपस्थिति निश्चय ही बहुत खटकती है।अयोध्या लौटने के पूर्व श्रीराम भरत को अपनी चरण पादुका देते हैं और उन्हें शासन संचालन और लोक कल्याण से संबद्ध विधि-निषेधपूर्ण लंबा उपदेश देते हैं। वह किसी भी देश अथवा कान के लिए प्रासंगिक है। श्रीराम के उपदेश का सारांश यह है कि राजा की योग्यता और शक्ति की गरिमा प्रजा के कष्टों का निवारण कर उनका प्रेमपूर्वक पालन करने में निहित है।भरत की अयोध्या वापसी के बाद श्रीराम कुछ समय महर्षि अत्रि के सत्संग में बिता कर दंडक वन की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में विराध वध के बाद महर्षि सरभंग से उनकी भेंट होती है। वे योगबल से अपने शरीर को भ कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। उन्हीं के परामर्श से वे सुतीक्ष्ण के आश्रम के निकट पर्णकुटी बना कर रहने लगते हैं और तपस्वियों की रक्षा में संलग्न रहते हैं।रामायण का कावीन में शूपंणखा प्रकरण से सीता हरण तक की घटनाओं का वर्णन वाल्मीकीय परंपरा के अनुसार हुआ है। ॠष्यसूक पर्वत की ओर जाने के क्रम में श्रीराम की भेंट तपस्विनी शबरी से होती है। उसने पेड़ की छाल से अपने शरीर को ढक रखा है। उसका रंग काला है। वह श्रीराम को मधु और फल खाने के लिए देती है। वह कहती है कि रुद्रदेव ने जब उसको शाप दिया था, उस समय वे लिंग रुप में थे। विष्णु उस समय मधुपायी की अवस्था में थे। उन्होंने बाराह रुप धारण किया हुआ था। उसके बाद उन्होंने देवी पृथ्वी से विवाह कर लिया। फिर वे बाराह रुप में प्रकट हुए और एक पर्वत पर जाकर मोतियों की माला खाने लगे। तदुपरांत उस बाराह की मृत्यु हो गयी। उसके मृत शरीर को हम लोगों ने खा लिया। इसी कारण हम सबका शरीर नीलवर्ण का हो गया।१ श्रीराम के स्पर्श से वह शाप मुक्त हो गयी। सीता की प्राप्ति हेतु वह उन्हें सुग्रीव से मित्रता करने की सलाह देकर लुप्त हो गयी।सुग्रीव मिलन और बालिवध की घटनाओं का वर्णन वाल्मीकीय परंपरा के अनुसार हुआ है। सातवें अध्याय में वर्षा ॠतु का विषद वर्णन हुआ है जिसपर स्थानीय परिवेश का प्रभाव स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है। श्वेत वर्ण के कूनतूल पक्षी धान के खेतों में वापस लौट आये हैं। खद्योतों की चमक मशाल की तरह प्रकाश विखेरती नज़र आती है। चूचूर पक्षी का स्वर वेदना को जागृत करता है। यही स्थिति वेयो पक्षी की है। वर्षा वर्णन के उपरांत शरद ॠतु का चित्रण हुआ है।सीतान्वेषण और राम-रावण युद्ध का इस महाकाव्य में बहुत विस्तृत वर्णन हुआ है। रावण वध और विभीषण के राज्याभिषेक के बाद श्रीराम ‘मेघदूत’ के यक्ष की तरह हनुमान से काले-काले बादलों को भेदकर आकाश मार्ग से अयोध्या जाने का आग्रह करते हैं। वे कहते हैं कि समुद्र पार करने पर उन्हें महेंद्र पर्वत के दर्शन होंगे। उत्तर दिशा की ओर जाते हुए वे मलयगिरि का अवलोकन करेंगे। उसका सौंदर्य मनोहारी एवं चित्ताकर्षक होगा उसके निकट ही उत्तर दिशा में विंध्याचल है। वहाँ किष्किंधा पर्वतमाला का सौंदर्य दर्शनीय है। मार्ग में सघन और भयानक दंडक वन मिलेगा जिसमें लक्ष्मण के साथ उन्होंने प्रवेश किया था। घने वृक्ष की शाखाओं में लक्ष्मण की गर्दन बार-बार उलझ जाती थी। इसी प्रकार चित्रकूट से अयोध्या तक के सारे घटना स्थलों तथा नदियों का विस्तृत वर्णन हुआ है। यक्ष की तरह वे माता कौशल्या और भरत से लंका विजय के साथ अपने आगमन का संदेश देने के लिए कहते हैं।राम राज्योभिषेक के बाद महाकवि रामकथा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं। उनकी मान्यता है कि राम चरित्र जीवन की संपूर्णता का प्रतीक है। राम के महान आदर्श का अनुकरण जनजीवन में हो, इसी उद्देश्य से इस महाकाव्य की रचना की गयी है। राम के जनानुराग की चरण धूलि के रुप में यह कथा संसार की महानतम पवित्र कथाओं में एक है।१ इस रचना के अंत में महाकवि योगीश्वर अपनी विनम्रता का परिचय देते हुए उत्तम विचार वाले सभी विद्वानों से क्षमा याचना करते हैं।

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