Daily Archives: July 13, 2016

छंद

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जूना काळे कवियों द्वारा रमाती एक रमत जे पाद पूर्ति कहेवाय, जेमा एक कवी कोई छंद नी एक चरण/पंक्ति आपे अने बीजो कवी तेने पुरू करे, भाव न बदलाय तो ज कवि नी कसोटी सफल गणाय, गत रात्रि इ मौजे दरिया ग्रुप माँ आ रमत चाली हती… जेमा चार पंक्तियों ना छंद ने चार कवि द्वारा सफल पादपूर्ति करी हती…

🙏🏻 पाद पूर्ति 🙏🏻

( सारसी छंद )
उगीयां तरणां जर्यां जरणां नवां परणां वृक्ष मां,
जळबोळ जंखी, चांच पंखी, चेतना थैं पक्ष मां,
गाळीन् गरणा भर्या भरणा भोमका ना कक्ष मां,
चिन्ता न करणा,काज सरणा,चमन फरणा दक्ष मां  |

– चमनराय, आनंदराय,
दिव्यराजसिंह,  काळूसिंह  |
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पंचमुखी सवैयो

गड़डाट किधो नभ आंगणिये चपला चमकी झबकी ज रही,
दमकी चमकी नभ मंडळ विजळ आय उजास दही ज रही,
पिय कें हिय कीं जल हेली बढी बहुरी बहेकी बहती ज रही,
धडेडाट घारोडांय धोध धर्यो धरणी धरकी तद फेंण धही.
पियु आये नहीं तब झाँखी भई  सरवैया नही सुख सेज सही.
[ दिव्यराजसिंह, चमनराय, आनंदराय, कवीराज जोगीदानजी, काळूसिंह जी ]
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[ पाद पूर्ति कवीत ]
घोर घन घोर घुम घमक्यो गगनां परे,
दिन रो उजास फेरी कीयो अंधकार है |
घनन कीं घोर दोर थनगन मन मोर
ठमठम बुंद शोर धरा सत्कार हैं |
मेंढक उठाय मुख, चातक बिछाय चोंच
नाचत है मोर जोर, पंख को पसार है |
सर सर शब्द शोर जल बरसत जोर,
होवत चमन जद अखंडित धार है |

-चमनराय, आनंदराय, दिव्यराजसिंह, काळूसिंह |

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पाद पूर्ति छंद : चर्चरी

घमकत घन गगन घोर, कडडड नभ होत शोर,
जलल जलधार जोर, मोर गीत गावे |
देखें तरूनीय बाट, हींचे नीज हिय खाट
राज पाट कें  कपाट, खोल खलक आवै  |
पुलकित प्रत्येक पंद, मुस्काती मन्द मन्द,
गहेके गिरनार कंद, अंग  मरडावे |
रमती रमझोळ छोळ हरखी ने होळ होळ,
करती चित्त में किलोळ बादळ बरसावे।

-चमनराय, आनंदराय, दिव्यराजसिंह, काळूसिंह |
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पाद पूर्ति – रेणकी छंद

दर दर मत भटक झटक कर दरसन,नत हर समरण कर नरवर।
फड फड फड फडक धडक हिय धरकत पाप पुंज पद धर सियवर |
हर हर मन जपन मनन तन भर भर जर सरकत रह धर रघुवर |
भर भर मन हरख परख सत तण कर हर हर कर नत साद उचर  |

-काळूसिंह जी, आनंदराय, दिव्यराजसिंह, चमनराय |

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पाद पूर्ति – सपाखरू

वादळां मंडाणी हार धार मेध वार छुटी,
सार धार धुंआधार बुंद बुंद बाण |
ताण के कबाण जळ तीर सम छोड़ तबै,
मार त्राळ धाड़ पड़ी बादळा केंकांण  ||

-चमनराय, आनंदराय, काळूसिंह दिव्यराजसिंह |

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पाद पूर्ति – झूलणा छंद

आवियो अषाढो गडेडी अडेडी, हडेडी आभमां देत डंका |
कडेडी विजळी वादळा वचेथी, खडेडी कांगरे कैक वंका  ||
सलिल पर समिर नीं आंगळी ज्यां फरफरीं, झरमरीं जोर सें छांड शंका |
बरसवा बै घड़ी आव आ भीड़ पड़ी,खेत ने देयो खड़ी हे खलंका||

-चमनराय, दिव्यराजसिंह, आनंदराय, काळूसिंह |

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पाद पूर्ति – झूलणा नंबर – २

खेडुतो खेतरे करगरे एम कई, लुंटाशे अमारी साव लंका |
नांगर्या नाव डुबाडशो ना हवे, मेघराजा बीर आव बंका  ||
सांभळी मेधडों हडीयु काढतों,
अभ्र तोखार का दांत चमका  |
युं चडी आवीयो वादळां दळ करी, ज्युं चडे वीर घणनाद हमका  ||

-चमनराय, दिव्यराजसिंह, आनंदराय, चमनराय | 
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ગઝલ

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શું કહું હું આપને ક્યાં ક્યાંય શોધી હું વળ્યો,
મળ્યા અંતે હૃદય મુજને જ્યા પ્રણય ને પોષવા.

સાંભળું જ્યાં સાદ મીઠો સિતારો નાં રાગ સો,
આપની આશા મહીં ગુમાવીયા સહુ હોંશ હા.

મજધાર વચ્ચે નાવ શા કાજે નમાવું એ કહો,
રાખશો મુજ વાતનો કોઈ દિલે નવ રોષ નાં.

ખેલવા ફાગણ પ્રણય નાં રંગ હાથે મેં ધર્યા,
છુપાશો નાં ભાગશો કે દેખશો કો દોષ ના.

વિશ્વાસ રાખો અચળ તારો ધ્રુવ નો કયો તો બનું,
અનંત વાટે એકલા આવો કહું આગોશ માં…
– દિવ્યરાજસિંહ સરવૈયા