छंद

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जूना काळे कवियों द्वारा रमाती एक रमत जे पाद पूर्ति कहेवाय, जेमा एक कवी कोई छंद नी एक चरण/पंक्ति आपे अने बीजो कवी तेने पुरू करे, भाव न बदलाय तो ज कवि नी कसोटी सफल गणाय, गत रात्रि इ मौजे दरिया ग्रुप माँ आ रमत चाली हती… जेमा चार पंक्तियों ना छंद ने चार कवि द्वारा सफल पादपूर्ति करी हती…

🙏🏻 पाद पूर्ति 🙏🏻

( सारसी छंद )
उगीयां तरणां जर्यां जरणां नवां परणां वृक्ष मां,
जळबोळ जंखी, चांच पंखी, चेतना थैं पक्ष मां,
गाळीन् गरणा भर्या भरणा भोमका ना कक्ष मां,
चिन्ता न करणा,काज सरणा,चमन फरणा दक्ष मां  |

– चमनराय, आनंदराय,
दिव्यराजसिंह,  काळूसिंह  |
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पंचमुखी सवैयो

गड़डाट किधो नभ आंगणिये चपला चमकी झबकी ज रही,
दमकी चमकी नभ मंडळ विजळ आय उजास दही ज रही,
पिय कें हिय कीं जल हेली बढी बहुरी बहेकी बहती ज रही,
धडेडाट घारोडांय धोध धर्यो धरणी धरकी तद फेंण धही.
पियु आये नहीं तब झाँखी भई  सरवैया नही सुख सेज सही.
[ दिव्यराजसिंह, चमनराय, आनंदराय, कवीराज जोगीदानजी, काळूसिंह जी ]
🌺🌻🌺🌹

[ पाद पूर्ति कवीत ]
घोर घन घोर घुम घमक्यो गगनां परे,
दिन रो उजास फेरी कीयो अंधकार है |
घनन कीं घोर दोर थनगन मन मोर
ठमठम बुंद शोर धरा सत्कार हैं |
मेंढक उठाय मुख, चातक बिछाय चोंच
नाचत है मोर जोर, पंख को पसार है |
सर सर शब्द शोर जल बरसत जोर,
होवत चमन जद अखंडित धार है |

-चमनराय, आनंदराय, दिव्यराजसिंह, काळूसिंह |

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पाद पूर्ति छंद : चर्चरी

घमकत घन गगन घोर, कडडड नभ होत शोर,
जलल जलधार जोर, मोर गीत गावे |
देखें तरूनीय बाट, हींचे नीज हिय खाट
राज पाट कें  कपाट, खोल खलक आवै  |
पुलकित प्रत्येक पंद, मुस्काती मन्द मन्द,
गहेके गिरनार कंद, अंग  मरडावे |
रमती रमझोळ छोळ हरखी ने होळ होळ,
करती चित्त में किलोळ बादळ बरसावे।

-चमनराय, आनंदराय, दिव्यराजसिंह, काळूसिंह |
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पाद पूर्ति – रेणकी छंद

दर दर मत भटक झटक कर दरसन,नत हर समरण कर नरवर।
फड फड फड फडक धडक हिय धरकत पाप पुंज पद धर सियवर |
हर हर मन जपन मनन तन भर भर जर सरकत रह धर रघुवर |
भर भर मन हरख परख सत तण कर हर हर कर नत साद उचर  |

-काळूसिंह जी, आनंदराय, दिव्यराजसिंह, चमनराय |

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पाद पूर्ति – सपाखरू

वादळां मंडाणी हार धार मेध वार छुटी,
सार धार धुंआधार बुंद बुंद बाण |
ताण के कबाण जळ तीर सम छोड़ तबै,
मार त्राळ धाड़ पड़ी बादळा केंकांण  ||

-चमनराय, आनंदराय, काळूसिंह दिव्यराजसिंह |

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पाद पूर्ति – झूलणा छंद

आवियो अषाढो गडेडी अडेडी, हडेडी आभमां देत डंका |
कडेडी विजळी वादळा वचेथी, खडेडी कांगरे कैक वंका  ||
सलिल पर समिर नीं आंगळी ज्यां फरफरीं, झरमरीं जोर सें छांड शंका |
बरसवा बै घड़ी आव आ भीड़ पड़ी,खेत ने देयो खड़ी हे खलंका||

-चमनराय, दिव्यराजसिंह, आनंदराय, काळूसिंह |

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पाद पूर्ति – झूलणा नंबर – २

खेडुतो खेतरे करगरे एम कई, लुंटाशे अमारी साव लंका |
नांगर्या नाव डुबाडशो ना हवे, मेघराजा बीर आव बंका  ||
सांभळी मेधडों हडीयु काढतों,
अभ्र तोखार का दांत चमका  |
युं चडी आवीयो वादळां दळ करी, ज्युं चडे वीर घणनाद हमका  ||

-चमनराय, दिव्यराजसिंह, आनंदराय, चमनराय | 
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