🔴मैं उज्ज्वल क्षात्र-परम्परा हूँ 🔴

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                      © महेंद्र सिंह सिसोदिया
                           छायण,जैसलमेर(राज.)

                    Mob.no.-9587689188
मैं उज्ज्वल क्षात्र-परम्परा हूँ । मेरी ही रक्षा के लिए रण बांकुरो ने अप्रतिम बलिदान दिये हैं। सतयुग से लेकर आज तक न जानें कितने ही नाम-अनाम सर्वस्व होम कर गये। जब गजनवी ने यहाँ आक्रमण किया था ।सोमनाथ मंदिर को तोड़ा,तब वह भीमदेव मेरे ही रक्षण हेतु उस आततायी से जा भिड़ा था। उससे भी पूर्व बापा रावल व नागभट्ट प्रतिहार विधर्मियो की छाती पर केशरिया-केतू गाढ आये थे।यह तो मध्यकाल की एक झलक हैं ,जिसे इतिहासकार स्वर्ण-काल कहते हैं। यह तो मेरी पतनावस्था हैं। वह चौहान प्रथ्वीराज गौरी के समक्ष मेरे लिये चट्टान बनकर डटा रहा। मेरे लाडले अनवरत मुझे गौरवशाली बनाने उत्सर्ग करते रहे। हर मगरा-घाटी,थलिया-धौरे मेरे प्राणप्यारे तनुजो की वीरता की साख भरते हैं। हाँ ! इसी बालू रेत पर उन्होनें मेरे खातिर कीर्ति के धवल पग मांडणे मांडे,जो अतीत का गौरवशाली अध्याय हैं। 

       मैं जोगणपुर(दिल्ली) की तख्तापलट राजनीति को कैसे भूल सकती हैं? इस तख्त पर बैठने वाले हर शख्स ने बर्बरता  व क्रूरता से मुझे ध्वंस करना चहा। पर,मेरी गोद में खेलने वाले सिंह शावक भी कम न थे, उन्होने उनसे दो-दो हाथ करते हुए यमलोक का रस्ता दिखा दिया। वो अल्लाउद्दीन तो मुझे समूल मिटाने को कृत संकल्पित था। लेकिन मैं इतनी सहजता से कैसे समाप्त होती? मेरे हठी हमीर ने उसे सीधी चुनौती दे डाली। रणत भंवर में केसरिया करके वह अंतिम श्वास तक मेरी रक्षा हेतु लड़ता रहा। इतिहास साक्षी हैं रंगदेवी के नेतृत्व में मेरी काची कूंपलो ने जौहर व्रत का आलिंगन किया। वह मेरी लाडकी कन्या देवलदे तो जलजौहर कर बैठी। उस दिन ऐसा त्याग देखकर यमराज भी रो उठा था । फिर जाबालिपुर में कान्हड़देव ,जैसलगिरा में मूलराज व चित्तौड़ दुर्ग में रावल रतन सिंह ने इसी कर्तव्य-पथ को दुबारा दोहराया। पदमिनी के नेतृत्व में ललनाओ ने हँसते- हँसते अग्नि-ज्वाला में अपने को समर्पित कर  दिया। फिर तो मैं गिनते-गिनते ही थक गई इतने जौहर व साके हुए।फिर दूदा जसहड़,कुम्भा, सांगा, मालदेव,चन्द्रसेन,प्रताप न जाने कितने ही सूरमा मेरी रक्षा हेतू आगे आये और सर्वस्व अर्पित कर गये।

             अतीत मेरी आंखो में वात्याचक्र सा घूमने लगता हैं-एक के बाद एक नारी नक्षत्र स्वधर्म, मान-मर्यादा के लिये यहाँ हरावल में लड़ने आया। हाँ ! मेरे लिए ही अनेकों माताओ की कोख खाली हो गई,ललनाओ के माँग का सिंदूर लुट गया,बच्चो के सिर से बाप का साया उठ गया। यह सब याद करती हूँ तो आंखो में आंसू उमड़ आते हैं। लोग मुझे कठोर व निर्दय कहते हैं क्योंकि इतने बलिदानो को देखकर भी मेरा ह्रदय नहीं पसीजता। पर, उन्हें नहीं पता कि ये दारूण दृश्य देखकर मेरा दिल कितना रोता हैं? न जाने कितनी बार प्राणो की बाजी लगाते छोटे से बच्चो को देखकर धरती माता का ह्रदय फट गया। पर, हाँ ! ऊपर से मुझे कठोर बनना पड़ता हैं नहीं तो ये देश,संस्कृति सब कुछ कब का मिट गया होता ।

        आज कई सदियां बीत गई हैं पर, मेरे लाडले आज भी मेरी अस्मिता बचाने कभी मेजर पीरू सिंह, कभी शैतान सिंह और कभी नरपत सिंह व शहीद प्रभू सिंह बनकर हिमालय के उत्तुंग शिखर से लेकर थार की थलियो तक जूझ रहे हैं। ऐसे रण बांकुरो के कारण ही मैं जीवित हूँ। मैं क्षात्र-परम्परा अपने इन्हीं नौनिहालो के गर्व पर इतराती हूँ। ये मुझे कभी लज्जित नहीं होने देंगे। 

        

           
⭕परमवीर प्रभु प्रकास⭕

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           (१)

मौद  हुवै   मन आंगणै,

देखंता      इण   देस|

जबरा पग-पग जन्मिया,

दीपण अणत  दिनेस||
           (२)

सांमधरम राखण  सदा,

अड़िया   हो  अगवांण|

कटिया पण हटिया नहीं,

अनमी   राखी   आंण||
          (३)

सूरधरा  ओ     शेरगढ,

परतख    दे    परमांण|

गांव – गांव    रै   गौरवे,

थप्यौड़ा  इथ      थान||
            (४)

हँस- हँस  दिया  हरोल,

माथा   जिकां    महांण|

कदै  न  भूलै  कमधजां,

जगचावौ       जोधाण||
            (५)

आया    देव   ऊतावलां,

जौवण      जबरी   जंग|

प्रभु     दिखाया   पैंतरा,

सूरापण     रै       संग||
             (६)

दुसमी  सांप्रत   देखियौ,

खिरजां      वालौ  खार|

रग-रग   ऊबलियौ रगत,

वैरी      दिया     विडार||
            (७)

गोगादे       की   गरजणा, 

हिंयै        भरी     हूँकार|

ऊभौ     आगल   जायनै,

दुसमण    नै    ललकार||
            (८)

रजपूती      राखी   रगां,

करियौ  कमधज   कौप|

रण   चढतै  रणधीर  सूं,

खायौ   अरियां    खौप||

  

          (९)

राखी  रजवट    रीतड़ी,

इला   ऊजालण  आंण|

माछिल  सैक्टर  मांयनै,

प्रभू      सूम्पिया  प्राण||
           (१०)

कुल  री  राखी  कीरती,

मही     वधायौ    मांण|

शान     बढाई   सांतरी,

प्रभू       सूम्पनै   प्राण||
             (११)

गरबीजै    गौरव   लिया,

मीठौड़ो      मरू    देस|

जाहर    नाहर  ऐथ  रा,

जा      जूँझै     परदेस||
                   – महेंद्र सिंह सिसोदिया

                     छायण,जैसलमेर(राज.)

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