​-:||:- वीर पनराजसिंह भाटी -:||:-

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|| रचनाकार:- कवि धार्मिकभा गढवी ||

(छंद:- सोरठा)
भाटी कुळ भडवीर, गौ ब्राह्मणको गावमें

मथता लेवा मिर, पड आडो पनराजसिंह  (१)
ब्राह्मण गणियण बेन, भाटी ग्यो तो भेटवा

धण तुर्को ल्ये धेन, पोचे तब पनराजसिंह  (२)
भाटी लीधो भाग, इक्का संगे आथडी

इंदुवंशी आग, पंडे तम पनराजसिंह  (३)
घमसाणे तम घा, करियल एवो कायरे

कर मस्तक कटका, पाछळथी पनराजसिंह  (४)
बहु मोटे बंगाळ, अभियाने जई आथड्यो

वांको थ्यो नइ वाळ, भुजा उखाडी भाटिया  (५)
पत काजे तुं पथ्थ, पनराज रणमें पुगियो

भाटी ते भारथ्थ, कर्यो कांगणराउत  (६)
भड्यो जाणे भीम, दुर्योधन सह दळ वचे

ढाळे तुर्का ढीम, कटका कांगणराउत  (७)
डग्यो आखर देह, वीरगती को वारिया

मडदा तणोय मेह, कर्यो कांगणराउत  (८)
(छंद:- चंचळा)
कांगणा तणाय सूत देवकंवरीय मात

जादवा कुळे रु चंद्रवंश री असल्ल जात

सैनकंथ तुं वडा अडाभडाय सामराज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (९)
धर्म काज राख जंग साम दाम दंड भेद

खेल जुद्ध राजपूत्त सेल हाथ नाह खेद

काय आरपार धार हो अपार खार दाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१०)
धेनने उठावता धरार मीर लूंटफाट

घाट छांट छांटके रुधीर खागरी थपाट

गाव गाव ठेर ठेर हौत संग सैन साज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (११)
मानती बहेन घेर ब्राह्मणी तणा गयेल

गाव काठडी कु पालवालणी रही वसेल

बाजियो बकोरशोर ढोल चार कोर गाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१२)
बंध द्वारको करी रगी जवा न द्ये बहेन

क्षात्र सूत हुं भलो पडे नही जरीय चैन

द्वार तोड भागियो रणे अटंक वीर आज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१३)
मार मार ना लगार वार थंभतीय जंग

पाडतो पताकनी डगेमगे रिपुय दंग

अल्ल अल्ल कल्लबल्ल होय मीररो समाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१४)
जीत जंग सामटी फरे घरेय धेन संग

जीवतो छताय आरपार घाव अंग अंग

हर्ष रो हुलास गावरा घरे घरे अवाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१५)
गाव दिश आवतो बहार पट्ट एकलोय

पीठ वार कायरा करेल तुर्क तक्क जोय

शिष कट्ट ग्यो छता जरी न पास जम्मराज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१६)
मोतको ना भेटियु लडी रह्यु छता कबंध

आखरे गळीकु फेकता थयुं हतुंय बंध

पूत छात्ररा रणे मरे सदा सदाय छाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१७)
हेमखेम हिंदवी रखी खमाखमा हंमेश

लेखणी करीय वंदतो रखुं न सेज लेश

छंद चंचळा तणोय “धारियो” चडाव ताज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१८)
(छंद:- छप्पय)
भाटी रा भडवीर, शिर रणमां तुं सोंपे

भाटी रा भडवीर, तीर के डरे न तोपे

भाटी रा भडवीर, धीर ते रखी न धींगे

भाटी रा भडवीर, मीर ने मार्या जंगे

धन धन्य कहुं धार्मिक हुं, भाटी रा भडवीरने

सह वंदन लाखो वेरतो, हिंद तणा ए हिरने  (१९)
(छंद:- कुंडळियो)
धेनुं काजे धारिया, अरी परे अपंग

लड्यो पण हट्यो नही, जीवन धरियल जंग

जीवन धरियल जंग, अडे गा कोण अडाभड

नोची नाखुं नैण, कटावुं खागे थी धड

नाम न राखु लेश, प्रजानी मांही भैनुं

आवे भाटी खडो, अडी जोवो अब धेनुं  (२०)
-कवि धार्मिकभा गढवी रचित
इतिहास:-
श्री पनराज जी का जीवन परिचय– महारावल विजयराज लांझा (जिनको “उत्तर भड़ किवाड़” की पदवी मिली थी ) के द्वितीय पुत्र राहड़जी (रावल भोजदेव के छोटे भाई), राहड़जी के भूपतजी, भूपतजी के अरड़कजी, अरड़कजी के कांगणजी व कांगणजी के पुत्र के रूप में व माता देवकंवर की कोख से वीर पनराज का जन्म 13वीं सदी के अंतिम चरण में हुआ…

श्री पनराज जी जैसलमेर महारावल घड़सी जी के समकालीन थे तथा वे उनके प्रमुख सलाहकार भी थे, क्षत्रियोचित संस्कारो से अलंकृत पनराज जी बचपन से ही होनहार व विशिष्ट शोर्य व पराक्रम की प्रतिमुर्ति थे, 

श्री पनराजजी ने घड़सीजी के बंगाल अभियान में भाग लेकर गजनी बुखारे के बादशाह के इक्के की मल्लयुद्ध में उसकी भुजा उखाड़कर उसे पराजित कर अपने अद्भुत शोर्य का परिचय दिया, जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने घड़सी जी को “गजनी का जैतवार” का खिताब दिया..
— शूरवीर पनराज का बलिदान — 

एक दिन की बात हैं, काठौड़ी गांव में वीर पनराजजी की धर्मबहिन पालीवाल ब्राह्मण बाला रहती थी, एक दिन पनराजजी अपनी धर्म बहन से मिलने काठौड़ी गांव गए तो उन्होंने देखा कि कई मुसलमान वहां लूटपाट करके उनकी गायों को ले जा रहे थे ,

लोगो की चीख पुकार सुन व अपनी धर्म बहिन को रोते देख उस रणबांकुरे की त्यौरियां चढ़ गई व भृकुटी तन गई, वीर पनराजजी ने अपनी बहिन व समस्त लोगों को वचन दिया कि मैं तुम्हारी पूरी गायें वापस ले आऊंगा..उनकी बहिन ब्राह्मण बाला ने पनराज को युद्ध में जाने से रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन यह तो क्षत्रियता की परीक्षा थी जिसमें वीर पनराज जैसा रणबांकुरा कैसे पीछे हट सकता था….

शूरवीर पनराज अपने नवलखे तुरंग पर सवार होकर दुश्मन की दिशा मेँ पवन वेग से बढ़ चले ,घमासान युद्ध छिड़ गया, शूरवीर पनराज की तलवार दुश्मनों के रक्त से प्यास बुझाती हुई उन्हे यमलोक भेज रही थी..

वीर पनराज के हुँकारो से सारा वातावरण गुंजायमान हो रहा था..

पनराज के रणकौशल से शत्रु सेना मे भगदड़ मच गई, तुर्क मौत को नजदीक पाकर गायों को छोड़कर भागने लगे, वीर पनराज सम्पूर्ण गायों को मुक्त करवाकर विजयी चाल से वापस लौट रहा था, वीर की धर्मबहिन ब्राह्मण बाला अपने भाई की जीत की खुशी में फूला नही समा रही थी, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, विधाता को कुछ और ही मंजुर था, एक तुर्क ने छल कपट से काम लेते हुए पीछे से वार कर वीर पनराज का सिर धड़ से अलग कर दिया …

लेकिन यह क्या…वीर पनराज का बिना सिर का धड़ अपने दोनों हाथो से तलवार चलाकर शत्रुओं के लिए प्रलय साबित हो रहा था, 

सिर कट जाने के बाद भी तुर्कों को मौत के घाट उतारता हुआ शूरवीर का सिर बारह कोस तक बहावलपुर (पाक) तक चला गया ,वीर पनराज की तलवार रणचण्डी का रूप धारण कर शत्रुओं के रक्त से अपनी प्यास बुझा रही थी, तुर्को मे त्राहि-त्राहि मच गई और वे अल्लाह-अल्लाह चिल्लाने लगे, तब किसी वृद्ध तुर्क की सलाह पर वीर पनराज के शरीर पर नीला(गुळी) रंग छिड़क दिया गया ,वीर पनराज का शरीर ठंडा पड़कर धरती मां की गोद मे समा गया, 

उसी स्थान (बहावलपुर) पर वीर पनराज का स्मारक बना हुआ है जहां मुस्लिम उनकी ‘मोडिया पीर’ व ‘बंडीया पीर’ के नाम से पूजा करते है…..

प्रणवीर पनराज ने क्षात्र धर्म का पालन करते हुए गौ माता व ब्राह्मणों की रक्षार्थ अपना बलिदान दिया तथा अपने पूर्वज विजयराज लांझा से प्राप्त पदवी ” उत्तर भड़ किवाड़ भाटी ” को गौरवान्वित किया…….

यह एक विडम्बना ही रही या तत्कालीन शासकों की लेखन कार्यों में अरुचि कह सकते है कि शूरवीर पनराज की शौर्य गाथा जहां इतिहास के स्वर्णिम पन्नो में लिखी जानी थी वो स्थानीय चारण-भाट कवियों तक ही सीमित रह गई……

महारावल घड़सी जी को जैसलमेर की राजगद्दी पर बिठाने में पनराज जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी, घड़सी जी ने पनराज जी का सम्मान करते हुए उन्हें सोनार दुर्ग के उतर नें सूली डूंगर पर स्थित भुर्ज प्रदान की….

महारावल घड़सीजी ने पनराज जी को 45 कोस की सीमा मे घोड़ा घुमाने पर उन्हें 45 कोस की जागीर दी जो क्षैत्र अाज राहड़की के नाम से जाना जाता है तथा यहां राहड़ भाटियों के गांव स्थित है..

स्वयं पनराजजी द्वारा निर्मित पनराजसर तालाब, जहां उनका सिर गिरा था उस स्थान पर पीले रंग की मूर्ति स्वतः प्रकट हुई,इसी स्थान पर वर्ष में दो बार भाद्रपद व माघ सुदी दशम को भव्य मेला लगता है तथा हजारों श्रदालु यहां मन्नत मांगने आते है व दादाजी उनकी मुरादे पूरी करते है| 

रज उडी रजथाँण री, ग्रहया नर भुजंग |

दुश्मण रा टुकड़ा किया, रंग राहड़ पन्नड़ रंग||

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