​🚩॥नारायण नमण॥🚩

Standard

       —-:—-:—-:—-

    

सम्वत् 2074 आषाढ सुदी एकादशी अर्थात देवशयन एकादशी से चतुर्मास प्रारंभ ईश्वर आराधना विशै काव्य

  

     🍀-: दोहा :-🍀
एको ईसर एक है,अवर न कोई अलेप।

रोम रोम सब घट रमे,नारायण निर्लेप॥1
सो नारायण सांईया,पालक जग पतख्ख।

किम”काळू”कूड़ा कथौं,लिवना लगनी लख्ख॥2

  🌺 छंद चर्चरी🌺

          
           ( 1 )
      

अवल एक ही आधार,अलख नाम ओऽमकार।

सुमरण तत्त सार-सार,परथम पैलां।

राम-राम रणुंकार,शिव,शिव,शिव हर संभार।

परमात्तम कूं पुकार,हरदम हैला।

आखिर अवतार एक,अनंत रूप में अनेक।

वरतों कर-कर विवेक,ठावा ठामी।

वंदन जुग वार-वार,हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार,नारण नांमीं॥1
             ( 2 )
विरंची विष्णु विशैस,शंकर सुरसत सुरेश।

गवरी सुत नित गणेश,सुरगण सारे।

ध्यावत नारद धनेश,अरुण वरुण यम अहेश।

खोजत धावत खगेश,हद हद हारे।

पावत कोई न पार ईसर महिमा अपार।

तूंहीं इक तारणार संतन सांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार,नारण नांमीं॥
           ( 3 )
गंधर्व नित करत गान,बरनत चारन बखान।

ध्यानी मुनि धरत ध्यान,ईश अराधे।

योगी जन सो यज्ञान,विरले कर कर विधान,

साधक जिम समाधान,साधन साधे।

परमतत्व तुझ पिछान,मौलिक रीति महान।

जानूं किम हूँ अजान,केवल कांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार,नारण नांमीं॥3 
           ( 4 )
कारण कर्ता कहात,हरपल तूंहीं हैयात।

विश्वनाथ है विख्यात,त्रिकम त्राता।

परतख न जात पांत,नाहीं को गोत्र नात।

संतन जमात साथ,भक्तन भ्राता।

सत्तचित्त आनंद सरूप,अविनाशी हे अनूप।

भूपन के महा भूप गारुड़ गांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार,नारण नामी॥4 
              ( 5 )
शक्ति स्वरूप श्याम,र रे म मे राम राम।

कलाकार पूर्ण काम,केशव काळा।

तूंहीं जाणे तमाम,माधव तेरा मुकाम।

ठाकर सु नाम ठाम,बंशी वाळा।

देखत न लेत दाम,आपे सबकूं अवाम।

सार वार सुबै शाम,जाजम जांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार नारण नामी॥5
              ( 6 )
कीड़ी कूं देत कन्न,महंगळ कूं देत मन्न।

चाहत पंखिन्न चुन्न,भोजन भारी।

अजगर न लेत अन्न,जीवे किम कर जतन्न।

वाह रे वाह रे विशन्न,थापन थारी।

जळ थळ सारे जहान,सरबस रहता समान।

मालिक तूं मेहरबांन,खलत न खांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार नारण नांमीं॥6
             ( 7 )
सात वार कर सलाम,निर्मल मन जपूं नाम।

धरा गगन परे धाम,विरला वासी।

कपटी को नहीं काम,आरत को आठूंयाम।

मिलता ताही मुकाम,दरदी दासी।

चावो चर्चरी छंद,प्रभू करीये पसंद।

“काळू” आनंद कंद,हरखे हांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार नारण नांमीं॥7

चरण रज 

काळूसिंह गंगासरा🌺🌺🌺🙏🙏🙏
7 जुलाई 2017

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s