Daily Archives: July 12, 2017

दुनिया की बेहतरीन कहानी अच्छी लगे तो जरूर पढ़े और शेयर करें

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_માત્ર કેવા ખાતર નહીં પણ મને ખૂબ ગમ્યું એટલે ફેસબુક પરથી શેર કરી રહ્યો છું._

शहर में एक वैधजी हुआ करते थे, जिनका मकान  एक पुरानी सी इमारत में था। वैधजी रोज  सुबह दुकान जाने से पहले पत्नी को कहते कि जो कुछ आज के दिन के लिए तुम्हें आवश्यकता है एक चिठ्ठी में लिख कर दे। पत्नी लिखकर दे देती । आप दुकान पर आकर पहले वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होती। उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही हुक्म के अनुसार में तेरी बंदगी  छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। ज्योंही तू मेरी आज की जरूरी पैसो की व्यवस्था कर देगा।उसी समय यहां से उठ जाऊँगा और फिर यही होता। कभी सुबह साढ़े नौ, कभी दस बजे वैधजी रोगियों की समाप्ति कर वापस अपने घर चले जाते।

एक दिन वैधजी ने दुकान खोली। रकम का  हिसाब के लिए चिठ्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आंखों के सामने तारे चमकते हुए नजर आ गए लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने तंत्रिकाओं पर काबू पा लिया। आटे दाल चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, बेटी के दहेज का सामान। कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की कीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा ” यह काम परमात्मा का हे, परमात्मा जाने।”

एक दो मरीज आए थे। उन्हें वैधजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दुकान के सामने आकर रुकी। वैधजी ने कार या साहब को कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे।

दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेडबूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैधजी ने कहा कि अगर आप अपने लिए दवा लेनी है तो उधर स्टूल पर आ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन  करे। वह साहब कहने लगे वैधजी मुझे लगता है आपने मुझे पहचाना नहीं। लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आप की दुकान पे आया हूँ

आप को पिछली मुलाकात सुनाता हूँ फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहां आया था तो में खुद नहीं आया था ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि दिल्ली से सुंदरनगर अपनी कार में अपने पैतृक घर जा रहा था। सही दुकान के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर कराने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में में कार के पास खड़ा हूँ। आप मेरे पास आए और दुकान की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अंधा क्या चाहे दो आँखें। मैं शुक्रिया अदा किया और कुर्सी पर आकर बैठ गया।

ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी। एक छोटी सी बच्ची भी यहाँ अपनी मेज के पास खड़ी थी और बार बार कह रही थी ” चलें नां, मुझे भूख लगी है। आप इसे कह रहे थे बेटी थोड़ा सब्र करो चलते हैं।

मैं यह सोच कर कि इतनी देर आप के पास बैठा हूँ। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी साहब में 5,6 साल से इंग्लैंड में हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चों के सुख से वंचित हूँ। यहां भी इलाज किया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत में निराशा के सिवा और कुछ नहीं देखा। आपने कहा मेरे भाई! माफ करो और अपने भगवान से निराश न हो  । याद रखें उसके खजाने में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। औलाद, माल व इज्जत और ग़मी खुशी, जीवन मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। किसी वैधजी या डॉक्टर के हाथ नहीं होती और न ही किसी दवा में  होती है। अगर होनी है तो भगवान के हुक्म से होनी है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे और साथ पुड़ीया भी बना रहे थे। सभी दवा आपने 2 भागों में विभाजित कर लिफाफा में डाली फिर मुझसे पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? मैंने बताया कि मेरा नाम कृष्णलाल है। आप ने एक लिफाफा पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखा। फिर दोनों लिफाफे एक बड़े लिफाफा रख दवा का उपयोग करने का तरीका बताया। मैंने बेदिली से दवाई ले ली क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पूछा कितने पैसे? आपने कहा बस ठीक है। मैं जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है।

मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी रकम वैधजी ने भगवान से मांगी थी वह गुरु ने दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते। कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में शर्मिंदा हुआ कि मेरे कितने घटिया विचार था और यह सरल वैधजी कितने महान व्यक्ति है। मैं जब घर जा कर बीवी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। वैधजी आज मेरे घर में तीन तीन फूल खेल रहे हैं।

हम जीवन साथी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। जब भी इंडिया में छुट्टी में आया। कार उधर रोकी लेकिन दुकान बंद पाया। कल दोपहर भी आया था दुकानबंद थी। एक आदमी पास ही खड़ा हुआ था। उसने कहा कि अगर आप वैधजी से मिलना है तो सुबह 9 बजे अवश्य पहुंच जाएं वरना उनके मिलने की कोई गारंटी नहीं। इसलिए आज सवेरे सवेरे आपके पास आया हूँ।
वैधजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड सेटल हो चुका है। केवल हमारे एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ इंडिया में रहती है। हमारी भांजी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी थी। इस भांजी की शादी का सारा खर्च मैंने अपने ज़िम्में लिया था। 10 दिन पहले इसी कार में उसे मैं दिल्ली अपने रिश्तेदारों के पास भेजा कि शादी के लिए जो चीज़ चाहे खरीद ले। उसे दिल्ली जाते ही बुखार हो गया लेकिन उसने किसी को नहीं बताया। बुखार की गोलियाँ डिस्प्रिन आदि खाती और बाजारों में फिरती रही। बाजार में फिरते फिरते अचानक बेहोश होकर गिरी। वहां से उसे अस्पताल ले गए। वहां जाकर पता चला कि इसे 106 डिग्री बुखार है और यह गर्दन तोड़ बुखार है। वह कोमा की हालत ही में इस दुनिया से चली गयी ।

इसके मरते ही न जाने क्यों मुझे और मेरी पत्नी को आपकी बेटी का ख्याल आया। हमने और हमारे पूरे परिवार ने फैसला किया है कि हम अपनी भांजी के सभी दहेज का साज़-सामान आपके यहां पहुंचा देंगे। शादी जल्दी हे तो व्यवस्था खुद करेंगे और अगर अभी कुछ देर है तो सभी खर्चों के लिए पैसा आप को नकदी पहुंचा देंगे। आप को ना नहीं करनी। अपना घर दिखा दें ताकि माल ट्रक वहां पहुंचाया जा सके।
वैधजी हैरान-परेशान हुए  बोले ” कृष्णलाल जी आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा, मेरा इतना मन नहीं है। मैं तो आज सुबह जब पत्नी के हाथ की लिखी हुई चिठ्ठी यहाँ आकर खोलकर देखा तो मिर्च मसाला के बाद जब मैंने ये शब्द पढ़े ” बेटी के दहेज का सामान ” तो तुम्हें पता है मैंने क्या लिखा। आप खुद यह चिठ्ठी जरा देखें।   वहां उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ” बेटी के दहेज ” के सामने लिखा हुआ था *” यह काम परमात्मा का हे, परमात्मा जाने।”*

कृष्ण जी, यकीन करो आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था कि पत्नी ने चिठ्ठी पर बात लिखी हो और भगवान ने उसका उसी दिन व्यवस्था न कर दिया हो। 

वाह भगवान वाह। तू  महान है तू मेहरबान है। आपकी भांजी की मौत का दुःख है लेकिन ईश्वर के रंगों से हैरान हूँ कि वे कैसे अपने रंग दिखाता है। 

वैधजी ने कहा जब से होश संभाला एक ही पाठ पढ़ा कि सुबह परमात्मा का आभार  करो शाम को अच्छे दिन गुजरने का आभार करो  , खाने समय उसका  आभार करो ,आभार मेरे मालिक तेरा बहुत बहुत आभार।

દેહુમલ જાડેજા

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(કાઠીયાવાડ ના ગામડાઓ માં જેઠ માસ ના દર રવિવારે ગામડાની કન્યાઓ દેહુમલ(દેદો) કુટે છે.ગામ ના નહેરા માં દેદા ની કાલ્પનીક ખાંભી માંડી છાજીયા લે છે.જેમા કુંવારીકાઓ દેદાની પરીવાર નુ કોઇ સભ્ય બની વિંટળાય કુટતી મરશીયા ગાય છે.

   ‘દેદાને દસ આંગળીએ વેઢ રે

    દેદો મરાણો લાઠી ના ચોકમાં

   દેદાને પગ પીળી મોજડી રે

   દેદા ને જમણે હાથે મીંઢોળ રે.. દેદો…

   દેદાના માથે છે કેસરી પાઘડી રે

   દેદા ના ખંભે ખંતીલો ખેસ રે… દેદો..’……
*રાજપુત  દેદા જાડેજા ની બલિદાની કથા નુ સાહિત્ય શ્રી નાનાભાઇ જેબલીયા દ્વારા એમની કથા શ્રેણી મા થયુ હતુ જે અહિ પ્રસ્તુત છે.*)

        ઉગમણા આભની ઝાંયલીએ હેમંતઋતુ ના સોહાગી સૂરજ નારાયણ અજવાળા ની ગાડી જોડી ને આવ્યા કે ગઢાળી ગામ ની બજારમાં જાન ઉઘલવાનો ઢોલ વાગ્યો. શરણાઇઓએ રાજપૂતી લગ્નગીતો ની તરજ છોડી.ઉંમરે વરસ અઢાર નો આંબા ના રોપ જેવો રુપાળો વરરાજો દેહુમલ જાડેજો છલાંગ મારી ને ઘોડે ચડ્યો. ગઢાળી ના ગોહિલો અને દેહુમલ ના મામાઓ બાંધ્યા હથીયારે ઘોડે ચડ્યા. ગઢાળી ના ગોહિલો આજ પોતાના ભાણેજ દેહુમલ ને પરણાવા કેરીઆના સોલંકિ ના માંડવે જાન જોડી ને સાબદા થયા હતા. ડાયરો ભારે ઉમંગ મા છે. કેસરી,લીલી,પીળી અને ગુલાબી પાઘડીઓ ના તોરણ બંધાયા છે.સાફાઓ,સીગરામો,ડમણીઆં અને બળદગાડીઓ મી હેડ્ય લાગી છે. ગરાસણીઓ ના તીણા મધુર કંઠે ભાણુભા નાં લગ્નગીતો ગવાયાં છે.પાછળના ભાગે ઘોડા ના મોવડ અને ઉંટ ના ફંદા ઝૂલે છે.ગઢાળી દાયરા ને આજ પોતાનુ આયખું લેખે લાગે છે.કચ્છ ના જાડેજા સાસરા માથી દુખાઇને,દુભાઇ ને આવેલી એક ની એક વિધવા બહેન નો લાડકો દિકરો અાજ પીઠી ચોળી ને પરણવા જાય છે.કુદરત ની ગતી ન્યારી છે.કચ્છ મા જાડેજા કુળ મા પરણાવેલી સજુબાનો સંસારરથ સુખ ની વાડીના છાયડાં મા મહાલતો હતો.ઉપરવાળા એ કારમી થપાટ મારી બહેન સજુબાના સેથાનુ સિંદુર ભુંસાઇ ગયુ.સજુબા ની નણંદે ગુસપુસ કરી જાણી લિધુ કે ભોજાઇ સજુબા ને ચોથો મહિનો જાય છે, આખા પરિવારમાં કૂડ-કોળ નો વાયરો વાઇ ગયો કે પુત્ર જનમશે તો ગિરાસ માં ફાડિયું માંગશે અને પુત્રી જન્મશે તો ઘરમાંથી ખીલી ખેંચી ને પણ કરીયાવર માં લઇ જશે.પરિવારે આકંડા ભીડીને સંતાપ ની કૂડી ચોપાટ પાથરી દિધી.સજુબા કુવો હવાડો કરે તો ગિરાસમાંથી ડાભોળીયું જાય અને સજુબા માથે જુલમ ના ઝાડ ઊગ્યાં,બાઇ નાં અન્નપાણી અગરાજ થઇ ગયાં.

        સજુબા એ પિયર ગઢાળી છાનો છપનો માણસ  અવદશા ના સંદેશા સાથે મોકલ્યો કે ,’વીરા ને માલુમ થાય કે બહેનનું મોઢુ જોવુ હોય તો છેલ્લી વેળા ના આવી જાઓ.બાકિ મારે તો ઉંચે આભ અમે નીચે ધરતી સીવાય કોઇ આધાર નથી. ભાઇઓ પોતાની દુખીયારી બહેન ને પીયર તેડી આવ્યા. સજુબાને ફુલ ની જેમ સાચવી ને હૈયાળી આપી.પિયર ના આંગણે લાડકિ બહેનના ભાણા ના પારણા બંધાણા.બહેન ના રુપાળા ભાણા ને નજર ના લાગે માટે મામાઓ એ ઉડસડ નામ ‘દેદો’ પાડ્યુ.મોસાળ મા રમતો દેદો જાડેજો સમજણો થયો ત્યારે એને કચ્છ ના જાડેજા કુળ ની ઓળખાણ આપવામાં આવી,જનેતા ના અન્યાય ને કાનસ્થ કરી દેદો અઢાર ની ઉમરે પહોંચ્યો ત્યારે કચ્છ મા જઇ પોતાની જાગીર સંભાળવા તૈયારી કરી.જનેતા ના દુખ ને ત્રાજવે તોળી તલવાર સજાવી,મોસાળ ને પોરસ થયો પણ કુંવારા ભાણેજ ને રણમેદાને ના મોકલવાના ઇરાદા સાથે અમરેલી ના કેરીઆ ગામની સોંલકી રાજપુતની દિકરી જોડ્યે ભાણા ના વેવીશાળ નક્કિ કર્યા,જાન હરખ ના મોજા છલકાવતી કેરીઆ જવા રવાના થઇ.વરરાજા ની ઘોડી સૌથી આગળ છે અને પાછળ જાનૈયા. લાઠી ગામનો સીમાડો આવતા વરરાજા ના કાને વા વળોટ ઝીણી ઝીણી ચીસો ના,હિબકા ના,રુદનના ટુકડા અથડાયા.

   દેહુમલે આથમણી દિશા મા આંખો નાખી. ધૂળની ડમરીઓ ઉડાડતા સીગરામો દોડતા દેખાયા આગળ પાછળ હથીયારધારી સિપાઇઓ ના લશ્કરી ખાખી ફેંટા જોયા. વાતની વસમાણને પામીને વરરાજે ઘોડી ધૂળ ની  ડમરીઓ તરફ મારી મુકિ.

     સિપાહિઓ ની લગોલગ થઇને જમાદાર ને પુછ્યુ 

‘આ સિગરામ માં કોણ છે?!’

      ‘ભાઇ,!બાપા! ,સીગરામમાંથી બાળા ના સાદના બોકાસા ઉઠ્યા ‘અમને બચાવો! આ કાણીઓ જમાદાર અમને વટલાવા જુનાગઢ લઇ જાય છે.’

      વાત એમ હતી કે લાઠી લુંટવા આવેલ આ સેનાએ લાઠી ને એ દિવસે નધણીયાતી ભાળી ગામમાંથી કુંવારી કન્યાઓ ને પકડી સિગરામ મા પુરી દિધી એનો વિરોધ કરનાર ને કત્લ કરી નાંખ્યા.કુલ ચાલીસેક કન્યાઓ ને 

પકડી હતી.

      રકઝક મા જાનૈયાઓ પણ પહોંચી ગયા, ‘મારો, મારો’ નો ગોકિરો થયો,સમશેરો થી જંગ મંડાણો. સિપાહિઓ મર્યા અને અમુક ભાગી છુટ્યા.પાંચ સીગરામ માંથી ચાલીસેક કન્યાઓ મુક્ત થઇ, 

   ‘વીરા,મારા ભાઇ’! અમારા પરિવાર મા કોઇ નથી અમને જાન મા તેડી જાઓ.’ કન્યાઓ એ હાથ જોડતા કહ્યુ.

    ‘હાલો! હવે તમે જ મારી બહેનો, અને અપહરણ ના સીગરામ જાન ના વાહન બન્યા,જાન આગળ ચાલી. લાઠી ના પાદર પહોંચતા દેહમલ ઘોડીએ થી નીચે પડ્યો,નાસી ગયેલ કાણીઓ રાજપુતી પોશાક પાઘડી ધારણ કરી જાન મા ભળી ગયો તો અને લાગ મળતા વરરાજા પાસે જઇ પેડુ મા તલવાર હુલાવી દિધી.જાનૈયાઓ એ કાણીઆ ના ટુકડા કરી નાખ્યા પણ દેદો શહિદ થઇ ગયો.લગ્નગીતો કારમા રુદન ના મરશીયા મા ફેરવાઇ ગયા.ચાલિસે કન્યાઓ એ દેહમલ ની મૈયત ફરતે કુંડાળે વળી છાજીયા લિધા.સદિઓ થી ચાલી આવેલી મૃત્યુની પરંપરાએ નવો વળાંક લિધો. કુંવારી કન્યાઓએ તે દિ છાતી કુંટી બહેનપણા નો ચિલો પાડ્યો! લાઠી મા એની દેરી પુજાય છે.

   વિગતઃવાઘજીભાઇ પરમાર(ભોરીંગડા)