जहांआरा और शत्रुसाल की प्रेम कथा

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जहांआरा शाहजहां की बेटी थी और शत्रुसाल बुंदी के राजकुमार थे।
         
सन् 1631 के फरवरी का महीना। गजब की ठंड पड़ी थी उस साल। फरवरी महीना होने के बावजूद कड़ाके की सर्दी जारी थी। बादशाह शाहजहां अपनी प्यारी बेगम की मौत के बाद पहली बार बुरहानपुर किले के दिवान-ए-आम में तशरीफ लाए थे। अभी सिर्फ छह महीने पहले ही तो उनकी बेगम मुमताज-उल-जमानी का इंतकाल हुआ था और उसे बुरहानपुर के जैनाबादी बाग में दफ्न कर दिया गया था। 29 जनवरी, 1631 को मुमताज महल के ताबूत को जैनाबादी बाग से निकाल कर आगरा के सिकंदराबाद में दफनाया गया। बादशाह के आने से दिवान फाजिल खां और अन्य मनसबदारों के चेहरे खिले हुए थे। इस बीच एक दुखद घटना हुई। जिस दिन बुरहानपुर से मुमताज महल के ताबूत को रवाना किया गया, उसी दिन शाहजहां को खबर मिली कि बालाघाट में उनके वफादार मनसबदार बुंदी के राजा राव रतन हाड़ा गुजर गए। शाहजहां ने फौरन ही रतन हाड़ा के पुत्र शत्रुसाल को बुंदी फरमान भेजकर  उसे तीन हजारी जात, दो हजार सवार का मनसब का खिताब बख्शा और फौरन बुरहानपुर पहुंचने का हुक्मनामा जारी किया। हुक्मनाना मिलने के दो महीने के अंदर ही बुरहानपुर के नजदीक ताप्ती के उस पार आ पहुंचा और अगले दिन बुरहानपुर शहर में अपने दादा के बनावाए महल में दाखिल हो गया।
              दिवान-ए-आम में तशरीफ लाने वाले मनसबदारों समेत किलेदार तक को मालूम था कि बुंदी के राजा शत्रुसाल बादशाह की कदमबोशी के लिए आ रहा है। जैसे ही चोबदार ने रोबदार अंदाज में आवाज दी – ‘ बुंदी के मरहूम राजा रतन हाड़ा के पुत्र और नए राजा राव शत्रुसाल आलमपनाह को अपनी नजर पेश करने के लिए दिवान-ए-आम में हाजिर हो रहे हैं ’, सभी सभासदों की नजरें सीढ़ियों की तरफ उठ गईं। सबने देखा कि लंबी कद-काठी का एक अत्यंत खूबसूरत 20 वर्षीय बांका नौजवान, जिसने केसरिया रंग का अंगरखा रहन और केसरिया रंग ही पायजामा पहन रखा था। उसका कसरती बदन उसके पोशाक से बाहर भी साफ-साफ दिखाई दे रहा था। चीते की तरह चौंकन्नी चाल और गजनफर-सा निडर वह धीरे कदमों से दिवान-ए-आम की तरफ बढ़ता आ रहा था। उसका चौड़ा माथा, सुतवां नाक, कानों में लटकते कुंडल और हल्की ऐंठी हुई उसकी मूंछें उसकी खूबसूरती को चार चांद लगा रही थीं। जहां सिर पर कलगीदार केसरिया पगड़ी उसके आन-बान और शान की गवाही दे रहे थे, वहीं कमर में लटकी सोने की मूंठवाली तलवार उसके मिजाज का बयान थी। पांच लड़ियों की मोतियों का कंठहार उसके गले में लिपट कर अपने को धन्य महसूस कर रहा था। दिवान-ए-आम में पहुंच कर शत्रुसाल ने बादशाह शाहजहां को तीन बार शाही कोर्निश की और फिर दाराशिकोह, औरंगजेब और मुरादबश को भी कोर्निश बजाई। उसकी मासूमियत सबके दिल को छू गई।
         दिवान-ए-आम में तो सबकी निगाहें शत्रुसाल पर टिकी ही हुई थीं, पर्दे के पीछे बैठी बेगमें और शहजादियां भी शत्रुसाल की अबोध मर्दाना सुंदरता को सराह रही थीं। इन्हीं बेगमों और शहजादियों के बीच बैठी थी जहांआरा। वह महज एक शहजादी ही नहीं थी, बल्कि बादशाह की सबसे चहेती बेटी भी थी। वह बादशाह शाहजहां का आंख-कान बनकर रहती थी। चाहे वह वलीअहद दाराशिकोह ही क्यों न हों, उसके हुक्म को नजरअंदाज करने की हिमाकत नहीं कर सकते थे। उन्हें बेगम शहजादी का खिताब स्वयं उसके वालिद शाहजहां ने दिया था। जहांआरा प्यार भरी नजरों से शत्रुसाल को अपलक देख रही थी, जबकि बेगमें और अन्य शहजादियां जहांआरा को देखे जा रही थीं। उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि जहांआरा के दिल में शत्रुसाल के लिए प्रेम का अंकुर फूट चुका है। शत्रुसाल को लेकर वे जहांआरा से शरारत भी करने लगीं। बहरहाल, राजा शत्रुसाल के दिवान-ए-आम से निकलते ही जहांआरा चमनी बेगम के साथ अपने महल को लौट चली। महल के नजदीक पहुंचने पर उसने देखा कि उसका खास वफादार और राजदार हिजड़ा हुस्नबानू भी पीछे-पीछे चला आ रहा है। पहले यह ख्वाजासरा दाराशिकोह की सेवा में तैनात था लेकिन पिछले तीन साल से वह शहजादी बेगम जहांआरा की खिदमत में लगा था। शहजादी के पास पहुंच कर हुस्नबानू ने जहांआरा को कोर्निश बजाया तो आंखों ही आंखों में जहांआरा ने पूछ लिया कि वह कहां से आ रहा है। हुस्नबानू ने बताया कि सलाम बजाने के लिए वह दाराशिकोह के महल पर गया था और वहीं से आ रहा है। इसके बाद उसने अपने चोगे से शेख-सादी की रुबाइयों की किताब निकाली और जहांआरा को सौंपते हुए कहा कि शहजादे ने आपके लिए भेजी है। किताब लेकर जहांआरा ने पूछा – ‘भाईजान का क्या हाल है?’ ‘ बेगम साहिबा, शहजादे बिलकुल अच्छे हैं और उन्होंने आपको आदाब बजाया है।’ बातों-बातों में हुस्नबानू ने जहांआरा को यह भी बताया कि आज दाराशिकोह के हुजूर में बुंदी का नया राजा राव शत्रुसाल भी मौजूद था और वह शहजादे को हिंदवी में कोई गजल सुना रहा था। मुझे भी उसकी गजल पसंद आई, लेकिन शहजादे तो उसकी हर सफे पर दाद दे रहे थे। जहांआरा ने चौंकते हुए पूछा, ‘क्या राजा हिंदवी में कविता करता है?’ ख्वाजासरा ने हामी भरी और कहा कि राजा ने बेगम साहिबा को आदाब बजाया है। जहांआरा ने सकुचाते हुए कहा, ‘सुना है बुंदी का राजा ताप्ती किनारे अपने दादा के महल में ठहरा है। उधर कभी जाना हो तो हमारा भी उसे आदाब कहना।’ तजुर्बेकार हुस्नबानू को माजरा समझते देर नहीं लगी। वह शाही महल के हर रंग-ढंग से वाकिफ था। वह बोला, ‘बेगम साहिबा, मैं कल ही बुंदी के राजा के पास जाकर आपका आदाब तो बोलूंगा ही, साथ में यह भी कहूंगा कि शहजादे की तरह वह बेगम शहजादी को अपनी हिंदवी कविता सुनाकर उनका दिल बहलाए। ठीक रहेगा न बेगम साहिबा।’ जहांआरा समझ गई कि हुस्नबानू उसके दिल की बात जान गया है लेकिन वह खामोश ही रही। जहांआरा को खामोश देखकर हुस्नबानू ने फिर कहा, ‘हमारे खयाल से कल आहूखाना बाग में दोपहर को राजा राव शत्रुसाल को आपके हुजूर में पेश किया जाए। अचानक प्रस्ताव से जहांआरा सकपका गई। ‘क्या हमारी इतनी जल्दी मुलाकात मुनासिब होगी,’ शहजादी ने पूछा। हुस्नबानू ने इठला कर कहा कि यह सब कुछ मुझ पर छोड़ दीजिए।
               अब शहजादी को महल काटने लगा था। वह बेचैन इधर-उधर टहल रही थी। शहजादी की बेचैनी देखकर उसकी खास बांदी कोयल ने आखिर पूछ ही लिया, ‘शहजादी आप इतनी परेशान क्यों है। आप मुझसे कुछ छिपा रही हैं। अगर आप बता सकें तो शायद मैं आपकी मदद कर पाऊं।’ शहजादी ने आखिरकार अपने दिल की बात कोयल को बता दिया। कोयल ने कहा कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है। आप किसी बहाने से शहजादे दाराशिकोह को भी आहूखाना बाग में बुला लें। शहजादे की मौजूदगी में आप राजा शत्रुसाल की कविता का आनंद भी उठा सकती हैं और उनसे आपकी मुलाकात भी हो जाएगी। इसके बाद शहजादी जहांआरा कोयल को लेकर दाराशिकोह के महल की ओर चल पड़ी। अपने महल में शहजादी जहांआरा को अचानक देखकर दाराशिकोह चौंक गया और पूछा कि सब खैरियत तो है। शहजादी ने कहा कि हां, सब खैरियत है। दरअसल, मैं आपको यह बताने आई हूं कि अब्बाहुजूर ने शाही मोहर ‘उजक’ नाना आसफ खां से लेकर हमें सौंपा है, इसलिए सोचा कि भाईजान को खबर कर दूं। इसके बाद अपने भाई को खुश करने के लिए जहांआरा ने एक डिबिया खोलकर काफी बड़ा हीरा शहजादे के हाथ पर रख दिया और अदब से कहा, ‘मेरी तरफ से एक छोटी-सी भेंट है, आप कुबूल करें।’ ‘आपाजान यह को अनमोल हीरा है, कहां से मिला आपको।’ शहजादी ने बताया कि यह हीरा उसे मरहूम मुमताज महल यानी उसकी मां ने दिया था। भाई को खुश देखकर जहांआरा ने बात का रुख बदला। वह जल्दी से जल्दी असली बात पर आना चाहती थी। वह बोली, ‘भाईजान, हमने सुना है कि बुंदी का राजा शत्रुसाल हिंदवी में बड़ी अच्छी कविता करता है, हालांकि वह अभी छोटी उम्र का ही है।’ ‘हां, वह हिंदवी में अच्छी कविता करता है लेकिन आपको कैसे मालूम हुआ।’ शहजादी ने बताया कि ख्वाजासरा हुस्नबानू से उसे पता चला। इसके बाद जहांआरा ने दाराशिकोह से राजी करने वाले अंदाज में पूछा, ‘ भाईजान, अगर आप मुनासिब समझें तो कल दोपहर में आहूखाना बाग में धूप का आनंद लिया जाए और राजा की कविता का भी।’ दाराशिकोह ने कहा कि इसमें भला उसे क्या ऐतराज हो सकता है। भाई के मुंह से इतनी बात सुनते ही जहांआरा ने ताली बजाई। ताली की आवाज सुनकर कोयल और ख्वाजासरा दोनों हाजिर हो गए। ‘शहजादे का इकबाल बुलंद हो, हमारे लिए क्या हुक्म है,’ हुस्नबानू ने अदब से पूछा। दाराशिकोह कुछ कहता उसके पहले ही जहांआऱा बोल पड़ी, ‘हुस्नबानू, आज बुंदी के राजा के महल चले जाना और कहना कि शहजादे कल दोपहर में आपकी कविता सुनने को ख्वहिशमंद हैं और कल आहूखाना बाग में आपका इंतजार करेंगे।’ इतना कहकर वह कोयल और हुस्नबानू को लेकर अपने महल की और रवाना हो गई।
             अगले दिन शहजादा दाराशिकोह और बेगम शहजादी जहांआरा आहूखाना बाग में राजा शत्रुसाल के इंतजार में टहल रहे थे। अचानक बाग के पूर्वी दरवाजे पर हल्की-सी आहट हुई, राजा बाग के अंदर आ चुका था। बाग के अंदर कगम रखते ही हुस्नबानू राजा को आदाब बजाते हुए बोला, ‘मुबारक हो राजा साहब, आज अच्छी साइत है, शहजादे के साथ-साथ बेगम शहजादी जहाआरा से आपकी मुलाकात मुबारक हो।’ बुंदी के राजा ने अपने अंगरखे की जेब से मोती निकाल कर हुस्नबानू की हथेली पर रख दिया। इसके बाद शहजादे और शहजादी राजा शत्रुसाल की मेजबानी के लिए आगे बढ़े। राजा भी तेज कदमों से उनकी ओर चला आ रहा था। पास पहुंच कर राजा ने दाराशिकोह और जहांआरा दोनों को कोर्निश बजाई। दोराशिकोह ने अपनी आपाजान से राजा का परिचय कराया और बताया कि आपकी कविता की शोहरत सुनकर वह यहां आई हैं और आपकी कविता सुनने की ख्वाहिशमंद हैं। इसके बाद सभी बाग में बिछाए गए कालीन पर बैठ गए। खामोशी जहांआरा ने ही तोड़ी। ‘राजा साहब, सुना है आप हिंदवी में बड़ी अच्छी कविता करते हैं?’ राजा ने सकुचाते हुए जवाब दिया, ‘ऐसी तो कोई बात नहीं, बस तुकबंदी कर लेता हूं।’ फिर शहजादे दाराशिकोह की गुजारिश पर राजा ने अपनी लिखी एक कविता सुनाई। जहांआरा को वह कविता बेहद पसंद आई। वह अपनी उंगली से अंगूठी निकालने लगी लेकिन ताकी राजा को भेंट कर सके लेकिन शर्म-ओ-हया के चलते हुम्मत नहीं जुटा पा रही थी। शहजादा दाराशिकोह अपनी आपाजान की उलझन समझ गया और बोल पड़ा, ‘आपाजान, जो आप करना चाहती हैं उसे फौरन से पेश्तर कर डालिए। वैसे राजा की कविता के लिए यह इनाम काफी नहीं है।’ शहजादी बोली, ‘ हां भाईजान आप सही फरमा रहे हैं लेकिन मैं इसे इनाम के रूप में इन्हें नहीं दे रही।’ इसके बाद जहांआरा ने अपनी उंगली से अंगूठी निकाली और कहा, ‘इसे इनाम नहीं बल्कि हमारी निशानी समझकर अपने पास रख लीजिए, शायद कभी आपके काम आ जाए।’ राजा ने बड़े अदब से झुककर अंगूठी अपने हाथ में ले ली। इस बीच शहजादी की उंगलियां राजा की उंगलियों से छू गईं। इस हल्की छुअन से शहजादी का पूरा वजूद सिहर उठा। उधर राजा शत्रुसाल की भी यही दशा थी।
               लेकिन नियति को शायद यह मंजूर नहीं था कि दोनों एक-दूसरे से मिलते-जुलते रहें। हुआ यह कि उसी समय दक्कन में थोड़ी बदअमनी फैल गई। उस समय दक्कन की कमान संभालने वाला कोई नहीं था, इसलिए महावत खां खानखाना वहां की कमान सौंपी गई। उसने बादशाह शाहजहां से बुंदी के राजा राव शत्रुसाल को भी अपनी मदद के लिए वहां भेजने की गुजारिश की, जिसे बादशाह ने मान लिया। जब जहाआरा ने सुना कि राजा शत्रुसाल भी दक्कन जा रहे हैं तो उसे अपनी दुनिया उजड़ती हुई नजह आई। उसके लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था। उसे महावत खां पर बेहद गुस्सा आ रहा था, उसका वश चलता तो वह महावत खां की दाढ़ी नोंच लेती। हालांकि वह चाहती तो शाहजहां से रिफारिश कर वह राजा शत्रुसाल को आगरा में ही कोई ओहदा दिलवा सकती थी लेकिन तब जहांआरा पर उंगलियां उठ सकती थीं। इसलिए वह चुपचाप अपने महल में आंसू बहाती रही। उसके दर्द को सिर्फ कोयल और हुस्नबानू ही समझ सकते थे, पर वे भी मजबूर थे। जहांआरा के मन में अमीर खुसरो की ये पंक्तियां उमड़-घुमड़ रही थीं –
        सजन सकारे जाएंगे, नैन मरेंगे रोय
        बिधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय।
             दक्कन में अमन कायम करने के बाद बादशाह शाहजहां के हुक्म के मुताबिक राजा शत्रुसाल दौलताबाद की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। बादशाह शाहजहां वहां पहले ही पहुंच चुका था और दौलताबाद की खास रक्कासा हैदरजान के आगोश में करार ढूंढ़ रहा था। बादशाह शाहजहां के साथ शहजादी जहांआरा भी दौलताबाद पहुंच चुकी थी और दौलताबाद किले को आबाद किया था। अगले दिन राव शत्रुसाल भी दौलताबाद आ पहुंचा। कोयल ने हुस्नबानू को बुंदी के राजा के खेमे में भेजा। राजा का खेमा दौलताबाद के किले से मील भर की दूरी पर गोदावरी नदी के किनारे लगा था। हुस्नबानू ने शत्रुसाल के खेमे के बाहर ही अपनी पालकी रुकवा दी और वह खुद शत्रुसाल से मिलने के लिए चल पड़ा, लेकिन खेमों की भीड़ में कहारों को पता नहीं चला कि हुस्नबानू किससे मिलने गया। जब वह शत्रुसाल के खेमे के पास पहुंचा तो पहरेदारों ने उसे रोका और उसका परिचय जानना चाहा। हुस्नबानू ने जब उन्हें शाही अंगूठी दिखाई तो पहरेदारों का सरदार अदब के साथ झुक गया और अंदर जाकर राजा शत्रुसाल को हुस्नबानू के आने की जानकारी दी। राजा ने उसे फौरन अपने खेमे के अंदर बुलाया। राजा को कोर्निश बजाने के बाद हुस्नबानू ने कहा, ‘बागम साहिबा शहजादी जहांआरा काफी दिनों से आपकी राह देख रही थी लेकिन आपने सफर में काफी वक्त लगा दिया। बेगम साहिबा जल्द से जल्द आपसे मिलने की ख्वाहिशमंद हैं।’ राजा समझ गए कि हुस्नबानू उनके इश्क की राजदार है। उन्होंने कहा, ‘मैं खुद भी यही चाहता हूं लेकिन शहजादी से मुलाकात कराने की जिम्मेदारी तो आप ही उठा सकते हैं।’ हुस्नबानू ने राजा को बताया कि वह दो दिन बाद दौलताबाद के किले में पीरवाड की दरगाह में शहजादी से मिलें। जब शत्रुसाल ने कहा कि यह कैसे संभव है तो, ख्वाजासरा ने मुस्कराते हुए बड़े विश्वास से कहा कि मुलाकात कराने की जिम्मेदारी हमारी है। इतना कहकर हुस्नबानू वहां से किले के लिए निकल पड़ा। चलते समय राजा शत्रुसाल ने उसे बिदाई में एक मुट्ठी अशर्फियां दीं। दोपहर बाद हुस्नबानू शहजादी जहांआरा के हुजूर में पहुंचा और उन्हें बताया कि राजा साहब परसों दोपहर में पीरवाड साहब की दरगाह में उनके रूबरू पेश होंगे।
           आज मुगल शहजादी बेहद खुश नजर आ रही थी, आती भी क्यों न, आखिर उसे अपने आशिक से मिलने का मौका जो मिला था। जहांआरा ने सुनहले रंग की जड़ाऊ पोशाक पहनी। कोयल ने आज अपने मन से शहजादी का श्रृंगार किया। आज शहजादी ने राजस्थानी लिवास पहन रखा था, जो उसके हुस्न के साथ मिलकर गजब ढा रहा था। जब शहजादी सज-धज कर तैयार हुई तो कोयल ने मुस्कराते हुए कहा, ‘बेगम साहिबा गुस्ताखी माफ हो, आगर आपकी इजाजत हो तो आपके चेहरे पर काला निशान बना दूं। कनीज को खौफ है कि शहजादी को कहीं किसी की नजर न लग जाए।’ उसकी बात सुनकर शहजादी भी अपनी हंसी नहीं रोक पाईं। हाथी पर सवार होकर शहजादी दौलताबाद किला देखने के बहाने राजा शत्रुसाल से मिलने के लिए गोदावरी तट की ओर चल पड़ी। शहजादी के ठीक पीछे एक दूसरे हाथी पर शहजादी की खास बांदी कोयल बैठी थी। उसके पास शहजादी की जरूरत में काम आनेवाले सामान रखे थे। खा बात यह थी कि वक्त जरूरत के लिए आज कोयल ने अपने पास एक जड़ाऊ कटार और तलवार भी रख लिया था। उधर बुंदी के राजा पहले से ही जहांआरा का इंतजार कर रहे थे। शहजादी जैसे ही हाथी से उतरी, राजा शत्रुसाल ने आगे बढ़कर उनकी खिदमत में तीन बार कोर्निश की, जिसका जवाब शहजादी ने सिर झुकाकर दिया। गोदावरी नदी में सैर के लिए राजा ने पहले से ही वहां एक खास नौका तैयार कर रखी थी। शहजादी शत्रुसाल के साथ उस खास नाव की तरफ बढ़ चली और कोयल को दूसरी नाव में बैठने के लिए कहा। शहजादी की तातारी बांदियां अपने नंगी तलवारें लेकर दूसरी नाव पर सवार हो गईं। आज के नौका-विहार की खास बात यह थी कि जिस नाव पर शहजादी सवार थी, उसे खुद राजा शत्रुसाल खे रहे थे। राजा को नाव खेते देखकर शहजादी मंद-मंद मुस्करा रही थी। नाव खेते-खेते राजा ने शहजादी पर पूरी निगाह डाली और यह देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ कि मुगल शहजादी ने राजस्थानी लिवास पहन रखा है। राजा ने कहा, ‘बेगम साहिबा, गुस्ताखी माफ हो, आपका इस कदर राजस्थानी वेश में आना….।’ शत्रुसाल ने अभी अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि शहजादी शरारत से बोल पड़ी, ‘क्यों आपको पसंद नहीं आया, क्या इसमें कोई कमी रह गई है।’ शहजादी की बात सुनकर शत्रुसाल हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने कहा, ‘नहीं…नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।’ शहजादी फिर शरारत से आंखे नचाते हुए कहा, ‘राजा साहब आप घबरा क्यों रहे हैं?’ ‘घबराने जैसी कोई बात तो नहीं लेकिन अगर बादशाह को यह पता चल गया तो उन्हें नागवार गुजरेगा। मुझे अपनी चिंता नहीं, लेकिन आपकी इज्जत पर कोई उंगली उठाए, मुझे बर्दाश्त नहीं। आप तो जानती ही हैं कि आपके छोटे भाई औरंगजेब और शहजादी रौशनआरा हमारा मिलन को बर्दाश्त नहीं कर सकते। हमारा मिलन मुगलिया शान बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।’ अचानक शहजादी ने शत्रुसाल का हाथ पकड़ लिया और कहा कि आप अपनी अहमियत समझिए, आप किसी के नौकर नहीं, बादशाह के आप मनसबदार हैं। क्या आपको बताना होगा कि मनसबदार क्या होता है। शहजादी के हाथ पकड़ने से राजा साहब का पूरा बदन कांप उठा, वह सिहर कर रह गए। थोड़ी देर के बाद जहांआरा ने फिर कहना शुरू किया, ‘राजा साहब, आपके बगैर हम नहीं जी सकते। अगर आप बुरा न मानें तो मैं अब्बा हुजूर से कहकर आपको आगरा बुलवा लेती हूं। फिर हमारे मिलने-जुलने में कोई कठिनाई नहीं होगी।’ राजा शत्रुसाल ने कहा कि वह ऐसा कोई काम नहीं करेंगी, जो बादशाह शाहजहां को नागवार गुजरे, वैसे भी हम बादशाह के हुक्म के गुलाम हैं। दोनों के बीच ये बातें हो ही रही थीं कि राजा का इशारा पाकर कोयल अपनी नाव उनकी नाव के पास ले आई। राजा साहब कुछ घबराए से लग रहे थे। कोयल ने शरारत से कहा, ‘राजा साहब, अभी मंजिल बहुत दूर है, इस तरह घबराएंगे तो कैसे काम चलेगा।’ कोयल ने राजा साहब को यह भी बताया कि शहजादी सच कह रही हैं कि वह आपके बिना नहीं रह पाएंगी, वह आपसे बेपनाह मुहब्बत करती हैं। राजा भी शहजादी को प्यार करने लगे थे लेकिन उनके मन में खटका था कि कहीं इस बात की भनक शाहजहां को लग गई तो आफत आ जाएगी। बादशाह बुंदी की ईंट से ईंट बजा देंगे, सल्तनत तबाह हो जाएगी। यह बात जब उन्होंने कोयल को बताया तो कोयल ने सिर्फ इतना ही कहा, ‘राजा साहब, आप तनिक फिक्र न करें। हमारे ऊपर विश्वास कीजिए, कोयल अपनी जान पर खेल जाएगी लेकिन आप दोनों को जुदा नहीं होने देगी।’ कोयल की बातों से राजा शत्रुसाल को तसल्ली मिली। कुछ दिनों तक दौलताबाद में रहने के बाद सभी आगरा लौट आए।
          आज शहजादी अपने मरहूम परदादा अकबर का मकबरा सिकंदरा का सैर करने निकली। शहर-ए-कोतवाल शहजादी के खास हाथी के साथ चलना चाहता था लेकिन शहजादी जहांआरा ने इसकी इजाजत नहीं दी। आज यह इज्जत खासतौर पर बुंदी के राजा शत्रुसाल को बख्शी गई थी। दोनों ने बादशाह अकबर की कब्र पर फूल चढ़ाकर बाहर आए। बातचीत में शत्रुसाल जहांआरा को बेगम साहिबा कहकर संबोधित कर रहा था, जो शहजादी को तनिक पसंद नहीं आ रहा था। इसलिए उसने राजा साहब से गुजारिश की कि वह उसे बेगम साहिबा कहकर न पुकारें, सिर्फ जहांआरा कहें। अंत में राजा ने शहजादी को जहांआरा कहकर जैसे ही पुकारा, उसने राजा साहब के दोनों हाथ पकड़ कर चूम लिए। राजा का बदन गनगना कर रह गया। अभी वे बातें कर ही रहे थे कि कोयल वहां दौड़ती हुई आ पहुंची और उन्हें बताया कि कोई जवान दीवार पर चढ़ रहा था, जिसे उसने तीर से घायल कर दिया। इस घटना के बावजूद दोनों काफी देर तक गुफ्तगू करते रहे। सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था। अब वे जब चाहते, मुलाकात कर लेते, लेकिन एक दिन एक दुर्घटना हो गई। जहांनारा वसंतोत्सव का गान सुन रही थी कि बादशाह शाहजहां ने उसे बुला भेजा। वह तेजी से अपने अब्बाहुजूर के महल की और चल पड़ी लेकिन गलियों में जल रही मोमबत्तियों की लौ से उसका इत्र में सराबोर दुपट्टा छू गया और उसमें आग लग गई। आग इतनी तेजी से फैली कि जबतक बुझायी गई, तबतक जहांआरा का बदन काफी जल चुका था। शहजादी के जलने की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई और सभी उसे देखने के लिए आने लगे।
              बुंदी के राजा शत्रुसाल भी बादशाह शाहजहां की इजाजत पाकर शहजादी जहांआरा को देखने आए। अपनी जांनशीं की हालत देखकर वह अपने आंसू नहीं रोक पाए। किले से वापस होने के बाद शत्रुसाल कई दिनों तक अपनी हवेली से बाहर नहीं निकले। वह बाहर तभी निकले, जब उन्हें पता चला कि जोधपुर के राजा जसवंत सिंह की अगुआई में औरंगजेब और मुराद की बागी सेना से लड़ने गई शाही फौज को धरमत के जंग में शिकश्त मिली है। औरंगजेब और मुराद की सम्मिलित फौज का मुकाबला करने के लिए दाराशिकोह की अगुआई में एक बड़ी फौज तैयार की गई। बुंदी के राजा शत्रुसाल मोर्चे पर जाने के पहले जहांआरा से एक बार मुलाकात करना चाहते थे। कोयल के सहयोग से मिलना तय हो गया। शहजादी जहांआरा बड़ी देर से और बड़ी बेसब्री से राजा साहब का इंतजार कर रही थी। वह बार-बार कोयल को खास दरवाजे की और दौड़ा रही थी। थोड़ी देर बाद कोयल ने शत्रुसाल के आने की खबर दी। महल में पहुचते ही राजा शहजादी की कदमबोशी के लिए झुक गए, लेकिन उनकी जबान से शहजादी की शान में एक भी लफ्ज नहीं निकला। लग रहा था, जैसे वे किसी खयाल में डूबे हुए हों। अचानक उन्हें इसका इल्म हुआ और अपनी गलती का एहसास भी। वह बोले, ‘बेगम शहजादी का इकबाल बुलंद हो। जब तक शत्रुसाल के हाथों में तलवार है, तब तक शहजादे औरंगजेब और मुरादबख्श वलीअहद शहजादे दाराशिकोह का बाल भी बांका नहीं कर सकते।’ इतना सुनते ही शहजादी की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। राजा बोले, ‘बेगम शहजादी, यह कमजोरी कैसी, मुगल शहजादियां और बेगमें तो शहजादों औऱ बादशाहों को मैदान-ए-जंग में मुस्करा कर भेजती रही हैं, फिर आपकी आंखों में आंसू क्यों।’ शहजादी ने कातर स्वर में कहा, ‘राजा साहब, पता नहीं, अब कब मुलाकात होगी….कौन जाने होगी भी कि नहीं। इसलिए एक बार, सिर् एक बार मुझे जहांआरा कहकर पुकारिए, हमारी और कोई तमन्ना नहीं है।’ राजा साहब की चुप्पी देखकर उसने कहा, ‘राजा साहब, मैं आपसे कोई ऐसी चीज नहीं मांग रही, जो आप हमें दे न सकें। क्या बिदाई के वक्त हमारी ख्वाहिश पूरी नहीं करेंगे।’ राजा शत्रुसाल ने जैसे ही शहजादी को जहांआरा कहकर पुकारा, खुशी के मारे वह एक साथ मुस्कराने औऱ रोने लगी। फिर संयत होकर उसने राजा शत्रुसाल के माथे पर रोली-चंदन का टीका लगाया और उस पर चावल के कुछ दानें भी टांक दिए। इसके बाद वह राजपूत रानियों की तरह शत्रुसाल के पैरों की ओर झुकने लगी। अनायास राजा साहब ने उसे अपनी मजबूत बाहों में भर लिया और शहजादी राजा के फौलादी सीने से चिपट गई। वर्षों की हसरत पूरी हुई….जिंदगी की साध मिट गई। जब राजा साहब ने कहा कि उन्हें अब जाना होगा तो, शहजादी ने अपने कांपते हाथों से जड़ाऊ तलवार उनके हाथों में सौंपते हुए कहा, ‘राजा साहब, अल्लाह से मेरी दुआ है कि मैदान-ए-जंग में आपको फतह नसीब हो।’ शहजादी से विदा लेकर जैसे राजा साहब बाहर निकले कि कोयल आती दिखाई दी। चलते-चलते ही राजा साहब ने कोयल से कहा, ‘कोयल, बेगम शहजादी का खयाल रखना।’ शत्रुसाल के वहां से जाते ही जहांआरा अपने पलंग पर धड़ाम से गिर पड़ी….आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी।
                जब वलीअहद शहजादे दाराशिकोह को अपने जासूस से खबर मिली तो, उसने तुरंत खलीलुल्लाह खान की अगुआई में सामूगढ़ के लिए फौज को रवाना करने का हुक्म दे दिया। इस युद्ध में बुंदी के राजा शत्रुसाल को हरावल दस्ते का कमान सौंपा गया। जैसे ही शाही सेना का बायां बाजू फिरोज जंग की कमान में हरकत में आया, बुंदी नरेश शत्रुसाल अपने हिरावल दस्ते को लेकर मुरादबख्श की फौज पर टूट पड़े। भयानक जंग हुई। राजा शत्रुसाल ने दुश्मन फौज के छक्के छुड़ाकर रख दिए। लेकिन अंत मे दुश्मनों की फौज ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। जबर्दस्त लड़ाई होने लगी। लड़ते-लड़ते उनका पूरा शरीर लहूलुहान हो गया, जिरह-बख्तर फट गए लेकिन इसके बावजूद शत्रुसाल दुश्मन के वश में नहीं आ रहा था। अंत में आजम खां नामक एक फौजी ने राजा की पीठ में जोर का भाला मार दिया। लेकिन वाह रे वीर…इसके बावजूद वह लड़ रहा था लेकिन यह देर तक चलने वाला नहीं था। जब राजा ने देखा कि उनका अंत करीब है तो अपने एक विश्वस्त सिपाही को जुबानी संदेश दिया, ‘बेगम साहिबा शहजादी जहांआरा से कहना कि हमने पीठ नहीं दिखाई।’ इतना कहकर वह अपने घोड़े से गिर पड़े। कायर आजम खां ने उनका सिर काट लिया।
           जब जहांआरा को शत्रुसाल के सामूगढ़ की जंग में लड़ते हुए मारे जाने की खबर मिली, तो कहते हैं कि उसे इतना गम हुआ कि वह नमाज पढ़ना भूल गई। इतना ही नहीं, वह इतनी जोर से रोई कि उसकी आवाज किले के बाहर तक गूंजने लगी। सभी सकते में आ गए। खुद बादशाह शाहजहां अपनी बेटी का रुदन सुनकर उसके महल में आ गए। कहा जाता है कि उस दिन के बाद जहांआरा ने कोई जेवर नहीं पहना और अपनी सारी कीमती पोशाक गरीबों में तक्सीम कर दिया। उसने अपने आब्बाहुजूर से सिर्फ इतना ही कहा, ‘ सामूगढ़ की जंग होने से पहले ही मैं मर गई होती तो अच्छा होता।’ बादशाह शाहजहां अपनी बेटी का दर्द जानते थे लेकिन उन्होंने चुप रहना ही मुनासिब समझा। अब जहांआरा अगर जिंदा थी तो सिर्फ अपने अब्बाहुजूर के लिए, क्योंकि औरंगजेब ने उन्हें कैद में डाल दिया, जहां उनकी सेवा के लिए किसी को नहीं तैनात किया गया था। शत्रुसाल की यादों में ही शहजादी की जिंदगी गुजर गई। जहांआरा को मुहब्बत तो नसीब हुई लेकिन मंजिल को तरसती ही रही।

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