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उत्तर भड़ किवाड़ भाटी

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।। अद्भुत योद्धा रावल भोजदेव ।।

( रावल विजयराज लांझा के पुत्र व राहड़ जी के बड़े भाई) 
काक नदी की पतली धारा किनारों से विरक्त सी होकर धीरे धीरे सरक रही थी, आसमान ऊपर चुपचाप पहरा दे रहा था और नीचे लुद्रवा देश की धरती, जिसे उत्तर भड़ किवाड़ भाटी आजकल जैसलमेर कहा जाता है ।

प्रभात काल में खूंटी तानकर सो रही थी, नदी के किनारे से कुछ दूरी पर लुद्रवे का प्राचीन दुर्ग गुमसुम सा खड़ा रावल देवराज का नाम स्मरण कर रहा था |

‘कैसा पराक्रमी वीर था !

अकेला होकर जिसने बाप का बैर लिया |

पंवारों की धार पर आक्रमण कर आया और यहाँ युक्ति, साहस और शौर्य से मुझ पर भी अधिकार कर लिया |

साहसी अकेला भी हुआ तो क्या हुआ ? 

हाँ ! अकेला भी अथक परिश्रम,ज्ञासाहस और सत्य निष्ठा से संसार को अपने वश में कर लेता है ….|

उसका विचार -प्रवाह टूट गया, वृद्ध राजमाता रावल भोजदेव को पूछ रही है

‘ बेटा गजनी के बादशाह की फौजे अब कितनी दूर होंगी ?’

‘ यहाँ से कोस भर दूर मेढ़ों के माल में |’

‘ और तू चुपचाप बैठा है ?’

‘ तो क्या करूँ ?

मैंने बादशाह को वायदा किया कि उसके आक्रमण की खबर आबू नहीं पहुंचाउंगा और बदले में बादशाह ने भी

वायदा किया है कि वह लुद्रवे की धरती पर लूटमार अथवा आक्रमण नहीं करेगा |’

राजमाता पंवार जी अपने १५-१६ वर्षीय इकलौते पुत्र को हतप्रद सी होकर एकटक देखने लगी, जैसे उसकी दृष्टि पूछ रही थी ‘ क्या तुम विजयराज लांजा के पुत्र हो ?

क्या तुमने मेरा दूध पिया है ? क्या तुम्ही ने इस छोटी

अवस्था में पचास लड़ाइयाँ जीती है ?

‘नहीं ! या तो सत्य झुंट हो गया या फिर झुंट सत्य का अभिनय कर रहा था |

परन्तु राजमाता की दृष्टि इतने प्रश्नों को टटोलने के बाद अपने पुत्र भोजदेव से लौट कर अपने वैधव्य पर आकर अटक गयी | लुद्रवे का भाग्य पलट गया है अन्यथा मुझे वैधव्य क्यों देखना पड़ता ?

क्या मै सती होने से इसलिए रोकी गई कि इस पुत्र को प्रसव करूँ |

काश ! आज वे होते |’ सोचते-सोचते राजमाता पंवार जी के दुर्भाग्य से हरे हुए साहस ने निराश होकर एक निश्वास डाल दिया |

क्यों माँ, तुम चुप क्यों हो ? क्या मेरी संधि तुम्हे पसंद नहीं आई ?

मैंने लुद्रवे को लुट से बचा लिया, हजारों देश वासियों की जान बच गई |’

‘आज तक तो बेटा, आन और बात के लिए जान देना पसंद करना पड़ता था |

तुम्हारे पिताजी को यह पसंद था इसलिए मुझे भी पसंद करना पड़ता था और अब वचन चलें जाय पर प्राण नहीं जाय यह बात तुमने पसंद की है इसलिए तुम्हारी माँ होने के कारण मुझे भी यह पसंद करना पड़ेगा |

हम स्त्रियों को तो कोई जहाँ रखे, खुश होकर रहना ही

पड़ता है |’

आगे राजमाता कुछ कहना ही चाहती थी किन्तु भोजराज ने बाधा देकर पूछा – ”

किसकी बात और किसकी आन जा रही है |

मुझे कुछ भी मालूम नहीं है | कुछ बताओ तो सही माँ ! ”

‘ बेटा ! जब तुम्हारे पिता रावलजी मेरा पाणिग्रहण करने आबू गए थे तब मेरी माँ ने उनके ललाट पर दही का तिलक लगाते हुए कहा था –

” जवांई राजा, आप तो उत्तर के भड़ किंवाड़ भाटी रहना |” 

तब तुम्हारे पिता ने यह बात स्वीकारी थी, आज तुम्हारे पिता की चिता जलकर शांत ही नहीं हुई कि उसकी उसकी राख को कुचलता हुआ बादशाह उसी आबू पर

आक्रमण करने जा रहा है और उत्तर का भड़-किंवाड़ चरमरा कर टुटा नहीं, प्राण बचाने की राजनीती में छला

जाकर अपने आप खुल गया |

इसी दरवाजे से निकलती हुई फौजे अब आबू पर आक्रमण करेंगी तब मेरी माँ सोचेगी कि मेरे जवांई को १०० वर्ष तो पहले ही पहुँच गए पर मेरा छोटा सा मासूम दोहिता भी इस विशाल सेना से युद्ध करता हुआ काम आया होगा,

वरना किसकी मजाल है जो भाटियों के रहते इस दिशा से चढ़कर आ जावे |

परन्तु जब तुम्हारा विवाह होगा और आबू में निमंत्रण के पीले चावल पहुंचेंगे, तब उन्हें कितना आश्चर्य होगा कि हमारा दोहिता तो अभी जिन्दा है |”

बस बंद करो माँ ! यह पहले ही कह दिया होता कि पिताजी ने ऐसा वचन दिया है, पर कोई बात नहीं , भोजदेव प्राण देकर भी अपनी भूल सुधारने की क्षमता

रखता है |

पिता का वचन मै हर कीमत चुका कर पूरा करूँगा |”

” नहीं बेटा ! तुम्हारे पिता ने तो मेरी माता को वचन दिया था परन्तु इस धरती से तुम्हारा जन्म हुआ है और तुम्हारा जन्म ही उसकी आन रखने का वचन है |

इस नीलाकाश के नीचे तुम बड़े हुए हो और तुम्हारा बड़ा होना ही इस गगन से स्वतंत्र्य और स्वच्छ वायु बहाने का वचन है | तुमने इस सिंहासन पर बैठकर राज्य सुख और वैभव का भोग भोग है और यह सिंहासन ही इस देश की आजादी का, इस देश की शान का, इस देश की स्त्रियों के सुहाग, सम्मान और सतीत्व की सुरक्षा का जीता जागता

जवलंत वचन है |

क्या तुम ……………………|

‘क्षमा करो माँ ! मैं शर्मिंदा हूँ, शत्रु समीप है |

तूफानों से अड़ने के लिए मुझे स्वस्थ रहने दो |

मैं भोला हूँ – भूल गया पर इस जिन्दगी को विधाता की भूल नहीं बनाना चाहता |’

झन न न न !

रावल भोजदेव ने घंटा बजाकर अपने चाचा जैसल को बुलाया |

‘चाचा जी ! समय काम है | रणक्षेत्र के लिये में जिन्दगी और वर्चस्व की बाजी लगानी पड़ेगी | आप बादशाह से मिल जाईये और मैं आक्रमण करता हूँ | कमजोर शत्रु पर अवसर पाकर आघात कर, हो सके तो लुद्रवा का पाट छीन लें अन्यथा बादशाह से मेरा तो बैर ले ही लेंगे |

जैसल ने इंकार किया, युक्तियाँ भी दी, किन्तु भतीजे की युक्ति, साहस और प्रत्युत्पन्न मति के सामने हथियार डाल

दिए | इधर जैसल ने बादशाह को भोजदेव के आक्रमण का भेद दिया और उधर कुछ ही दुरी पर लुद्रवे का नक्कारा सुनाई दिया |

मुसलमानों ने देखा १५ वर्ष का का एक छोटा सा बालक बरसात की घटा की तरह चारों और छा गया है |

मदमत्त और उन्मुक्त -सा होकर वह तलवार चला रहा था और उसके आगे नर मुंड दौड़ रहे थे |

सोई हुई धरती जाग उठी, काक नदी की सुखी हुई धारा सजल हो गई, गम सुम खड़े दुर्ग ने आँखे फाड़ फाड़ कर देखा – उमड़ता हुआ साकार यौवन अधखिले हुए अरमानों को मसलता हुआ जा रहा है |

देवराज और विजयराज की आत्माओं ने अंगडाई लेकर

उठते हुए देखा – इतिहास की धरती परषमिटते हुए उनके चरण चिन्ह एक बार फिर उभर आए है और उनके मुंह से बरबस निकल

पड़ा – वाह रे भोज , वाह !

दो दिन घडी चढ़ते चढ़ते बादशाह की पन्द्रह हजार फ़ौज में त्राहि त्राहि मच गई | उस त्राहि त्राहि के बीच रणक्षेत्र में भोजदेव का बिना सिर का शरीर लड़ते लड़ते थक कर सो गया – 

देश का एक कर्तव्य निष्ठ सतर्क प्रहरी सदा के लिए सो गया | भोजदेव सो गया, उसकी उठती हुई जवानी के उमड़ते हुए अरमान सो गए, उसकी वह शानदार जिन्दगी सो गई किन्तु आन नहीं सोई |

वह अब भी जाग रही है |

जैसल ने भी कर्तव्य की शेष कृति को पूरा किया, बादशाह को धोखा हुआ | उसने दुतरफी और करारी मात खाई | आबू लुटने के उसके अरमान धूल धूसरित हो गए |

सजधज कर दुबारा तैयारी के साथ आकर जैसल से बदला लेने के लिए वह अपने देश लौट पड़ा और जैसल ने भी उसके स्वागत के लिए एक नए और सुद्रढ़ दुर्ग को खड़ा कर दिया जिसका नाम दिया – जैसलमेर !

इस दुर्ग को याद है कि इस पर और कई लोग चढ़कर आये है पर वह कभी लौटकर नहीं आया जिसे जैसल और भोजदेव ने हराया |

आज भी यह दुर्ग खड़ा हुआ मन ही मन ”

उत्तर भड़ किंवाड़ भाटी ” के मन्त्र का जाप कर रहा है |

आज भी यह इस बात का साक्षी है कि जिन्हें आज देशद्रोही कहा जाता है,

वे ही इस देश के कभी एक मात्र रक्षक थे |

जिनसे आज बिना रक्त की एक बूंद बहाए ही राज्य, जागीर, भूमि और सर्वस्व छीन लिया गया है, एक मात्र वे ही उनकी रक्षा के लिए खून ही नहीं, सर्वस्व तक को बहा देने वाले थे |

जिन्हें आज शोषक, सामंत या सांपों की औलाद कहा जाता है वही एक दिन जगत के पोषक, सेवक और रक्षक थे | जिन्हें आज अध्यापकों से बढ़कर नौकरी नहीं मिलती, जिनके पास सिर छिपाने के लिए अपनी कहलाने वाली दो बीघा जमीन नसीब नहीं होती, जिनके भाग्य आज राजनीतिज्ञों की चापलूसी पर आधारित होकर कभी इधर और कभी उधर डोला करते है, वे एक दिन न केवल अपने भाग्य के स्वयं विधाता ही थे बल्कि इस देश के भी

वही भाग्य विधाता थे |

जिन्हें आज बेईमान, ठग और जालिम कहा जाता है वे भी एक दिन इंसान कहलाते थे | इस भूमि के स्वामित्व के लिए आज जिनके हृदय में अनुराग के समस्त स्रोत क्षुब्ध हो गए है वही एक दिन इस भूमि के लिए क्या नहीं करते थे |

लुद्रवे का दुर्ग मिट गया है जैसलमेर का दुर्ग जीर्ण हो गया है, यह धरती भी जीर्ण हो जाएगी पर वे कहानियां कभी

जीर्ण नहीं होगी जिन्हें बनाने के लिए कौम के कुशल कारीगरों ने अपने खून का गारा बनाकर लीपा है और वे कहानियां अब भी मुझे व्यंग्य करती हुई कहती है –

एक तुम भी क्षत्रिय हो और एक वे भी क्षत्रिय थे |

चित्रपट चल रहा था दृश्य बदलते जा रहे थे। 
साभार – अचलसिंह जी भाटी नाचना

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​-:||:- वीर पनराजसिंह भाटी -:||:-

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|| रचनाकार:- कवि धार्मिकभा गढवी ||

(छंद:- सोरठा)
भाटी कुळ भडवीर, गौ ब्राह्मणको गावमें

मथता लेवा मिर, पड आडो पनराजसिंह  (१)
ब्राह्मण गणियण बेन, भाटी ग्यो तो भेटवा

धण तुर्को ल्ये धेन, पोचे तब पनराजसिंह  (२)
भाटी लीधो भाग, इक्का संगे आथडी

इंदुवंशी आग, पंडे तम पनराजसिंह  (३)
घमसाणे तम घा, करियल एवो कायरे

कर मस्तक कटका, पाछळथी पनराजसिंह  (४)
बहु मोटे बंगाळ, अभियाने जई आथड्यो

वांको थ्यो नइ वाळ, भुजा उखाडी भाटिया  (५)
पत काजे तुं पथ्थ, पनराज रणमें पुगियो

भाटी ते भारथ्थ, कर्यो कांगणराउत  (६)
भड्यो जाणे भीम, दुर्योधन सह दळ वचे

ढाळे तुर्का ढीम, कटका कांगणराउत  (७)
डग्यो आखर देह, वीरगती को वारिया

मडदा तणोय मेह, कर्यो कांगणराउत  (८)
(छंद:- चंचळा)
कांगणा तणाय सूत देवकंवरीय मात

जादवा कुळे रु चंद्रवंश री असल्ल जात

सैनकंथ तुं वडा अडाभडाय सामराज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (९)
धर्म काज राख जंग साम दाम दंड भेद

खेल जुद्ध राजपूत्त सेल हाथ नाह खेद

काय आरपार धार हो अपार खार दाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१०)
धेनने उठावता धरार मीर लूंटफाट

घाट छांट छांटके रुधीर खागरी थपाट

गाव गाव ठेर ठेर हौत संग सैन साज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (११)
मानती बहेन घेर ब्राह्मणी तणा गयेल

गाव काठडी कु पालवालणी रही वसेल

बाजियो बकोरशोर ढोल चार कोर गाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१२)
बंध द्वारको करी रगी जवा न द्ये बहेन

क्षात्र सूत हुं भलो पडे नही जरीय चैन

द्वार तोड भागियो रणे अटंक वीर आज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१३)
मार मार ना लगार वार थंभतीय जंग

पाडतो पताकनी डगेमगे रिपुय दंग

अल्ल अल्ल कल्लबल्ल होय मीररो समाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१४)
जीत जंग सामटी फरे घरेय धेन संग

जीवतो छताय आरपार घाव अंग अंग

हर्ष रो हुलास गावरा घरे घरे अवाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१५)
गाव दिश आवतो बहार पट्ट एकलोय

पीठ वार कायरा करेल तुर्क तक्क जोय

शिष कट्ट ग्यो छता जरी न पास जम्मराज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१६)
मोतको ना भेटियु लडी रह्यु छता कबंध

आखरे गळीकु फेकता थयुं हतुंय बंध

पूत छात्ररा रणे मरे सदा सदाय छाज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१७)
हेमखेम हिंदवी रखी खमाखमा हंमेश

लेखणी करीय वंदतो रखुं न सेज लेश

छंद चंचळा तणोय “धारियो” चडाव ताज

रंग भाटिया खडो रणे खुखार पन्नराज  (१८)
(छंद:- छप्पय)
भाटी रा भडवीर, शिर रणमां तुं सोंपे

भाटी रा भडवीर, तीर के डरे न तोपे

भाटी रा भडवीर, धीर ते रखी न धींगे

भाटी रा भडवीर, मीर ने मार्या जंगे

धन धन्य कहुं धार्मिक हुं, भाटी रा भडवीरने

सह वंदन लाखो वेरतो, हिंद तणा ए हिरने  (१९)
(छंद:- कुंडळियो)
धेनुं काजे धारिया, अरी परे अपंग

लड्यो पण हट्यो नही, जीवन धरियल जंग

जीवन धरियल जंग, अडे गा कोण अडाभड

नोची नाखुं नैण, कटावुं खागे थी धड

नाम न राखु लेश, प्रजानी मांही भैनुं

आवे भाटी खडो, अडी जोवो अब धेनुं  (२०)
-कवि धार्मिकभा गढवी रचित
इतिहास:-
श्री पनराज जी का जीवन परिचय– महारावल विजयराज लांझा (जिनको “उत्तर भड़ किवाड़” की पदवी मिली थी ) के द्वितीय पुत्र राहड़जी (रावल भोजदेव के छोटे भाई), राहड़जी के भूपतजी, भूपतजी के अरड़कजी, अरड़कजी के कांगणजी व कांगणजी के पुत्र के रूप में व माता देवकंवर की कोख से वीर पनराज का जन्म 13वीं सदी के अंतिम चरण में हुआ…

श्री पनराज जी जैसलमेर महारावल घड़सी जी के समकालीन थे तथा वे उनके प्रमुख सलाहकार भी थे, क्षत्रियोचित संस्कारो से अलंकृत पनराज जी बचपन से ही होनहार व विशिष्ट शोर्य व पराक्रम की प्रतिमुर्ति थे, 

श्री पनराजजी ने घड़सीजी के बंगाल अभियान में भाग लेकर गजनी बुखारे के बादशाह के इक्के की मल्लयुद्ध में उसकी भुजा उखाड़कर उसे पराजित कर अपने अद्भुत शोर्य का परिचय दिया, जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने घड़सी जी को “गजनी का जैतवार” का खिताब दिया..
— शूरवीर पनराज का बलिदान — 

एक दिन की बात हैं, काठौड़ी गांव में वीर पनराजजी की धर्मबहिन पालीवाल ब्राह्मण बाला रहती थी, एक दिन पनराजजी अपनी धर्म बहन से मिलने काठौड़ी गांव गए तो उन्होंने देखा कि कई मुसलमान वहां लूटपाट करके उनकी गायों को ले जा रहे थे ,

लोगो की चीख पुकार सुन व अपनी धर्म बहिन को रोते देख उस रणबांकुरे की त्यौरियां चढ़ गई व भृकुटी तन गई, वीर पनराजजी ने अपनी बहिन व समस्त लोगों को वचन दिया कि मैं तुम्हारी पूरी गायें वापस ले आऊंगा..उनकी बहिन ब्राह्मण बाला ने पनराज को युद्ध में जाने से रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन यह तो क्षत्रियता की परीक्षा थी जिसमें वीर पनराज जैसा रणबांकुरा कैसे पीछे हट सकता था….

शूरवीर पनराज अपने नवलखे तुरंग पर सवार होकर दुश्मन की दिशा मेँ पवन वेग से बढ़ चले ,घमासान युद्ध छिड़ गया, शूरवीर पनराज की तलवार दुश्मनों के रक्त से प्यास बुझाती हुई उन्हे यमलोक भेज रही थी..

वीर पनराज के हुँकारो से सारा वातावरण गुंजायमान हो रहा था..

पनराज के रणकौशल से शत्रु सेना मे भगदड़ मच गई, तुर्क मौत को नजदीक पाकर गायों को छोड़कर भागने लगे, वीर पनराज सम्पूर्ण गायों को मुक्त करवाकर विजयी चाल से वापस लौट रहा था, वीर की धर्मबहिन ब्राह्मण बाला अपने भाई की जीत की खुशी में फूला नही समा रही थी, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, विधाता को कुछ और ही मंजुर था, एक तुर्क ने छल कपट से काम लेते हुए पीछे से वार कर वीर पनराज का सिर धड़ से अलग कर दिया …

लेकिन यह क्या…वीर पनराज का बिना सिर का धड़ अपने दोनों हाथो से तलवार चलाकर शत्रुओं के लिए प्रलय साबित हो रहा था, 

सिर कट जाने के बाद भी तुर्कों को मौत के घाट उतारता हुआ शूरवीर का सिर बारह कोस तक बहावलपुर (पाक) तक चला गया ,वीर पनराज की तलवार रणचण्डी का रूप धारण कर शत्रुओं के रक्त से अपनी प्यास बुझा रही थी, तुर्को मे त्राहि-त्राहि मच गई और वे अल्लाह-अल्लाह चिल्लाने लगे, तब किसी वृद्ध तुर्क की सलाह पर वीर पनराज के शरीर पर नीला(गुळी) रंग छिड़क दिया गया ,वीर पनराज का शरीर ठंडा पड़कर धरती मां की गोद मे समा गया, 

उसी स्थान (बहावलपुर) पर वीर पनराज का स्मारक बना हुआ है जहां मुस्लिम उनकी ‘मोडिया पीर’ व ‘बंडीया पीर’ के नाम से पूजा करते है…..

प्रणवीर पनराज ने क्षात्र धर्म का पालन करते हुए गौ माता व ब्राह्मणों की रक्षार्थ अपना बलिदान दिया तथा अपने पूर्वज विजयराज लांझा से प्राप्त पदवी ” उत्तर भड़ किवाड़ भाटी ” को गौरवान्वित किया…….

यह एक विडम्बना ही रही या तत्कालीन शासकों की लेखन कार्यों में अरुचि कह सकते है कि शूरवीर पनराज की शौर्य गाथा जहां इतिहास के स्वर्णिम पन्नो में लिखी जानी थी वो स्थानीय चारण-भाट कवियों तक ही सीमित रह गई……

महारावल घड़सी जी को जैसलमेर की राजगद्दी पर बिठाने में पनराज जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी, घड़सी जी ने पनराज जी का सम्मान करते हुए उन्हें सोनार दुर्ग के उतर नें सूली डूंगर पर स्थित भुर्ज प्रदान की….

महारावल घड़सीजी ने पनराज जी को 45 कोस की सीमा मे घोड़ा घुमाने पर उन्हें 45 कोस की जागीर दी जो क्षैत्र अाज राहड़की के नाम से जाना जाता है तथा यहां राहड़ भाटियों के गांव स्थित है..

स्वयं पनराजजी द्वारा निर्मित पनराजसर तालाब, जहां उनका सिर गिरा था उस स्थान पर पीले रंग की मूर्ति स्वतः प्रकट हुई,इसी स्थान पर वर्ष में दो बार भाद्रपद व माघ सुदी दशम को भव्य मेला लगता है तथा हजारों श्रदालु यहां मन्नत मांगने आते है व दादाजी उनकी मुरादे पूरी करते है| 

रज उडी रजथाँण री, ग्रहया नर भुजंग |

दुश्मण रा टुकड़ा किया, रंग राहड़ पन्नड़ रंग||

​!!””जोगीदास भाटी की कटारी””!!

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मारवाङ जिसे नर सांमद भी कहते है, मारवाङ के अनेकानेक सूरमाओंमे भाटी गोविन्ददासजी
का नाम अग्रिम पंक्ति में आता है सपूतसमझने वाले गोयंददास ने अति साधारण परिवार मे जन्म लेकर अपनी प्रतिभाबल से इतनी भारी कामयाबी, प्रतिष्ठा व प्रसिध्दि प्राप्त की थी कि इस समानता का उदाहरण इतिहास में कहींपर भी देखने को नहीं मिलता है जोधपुर महाराजा सूरसिंहजी ने अपने इस प्रधानामात्य को लवेरा गांव का पट्टा वि. संवत १६६३ में दिया था इस सरदार ने मारवाङ की शासन व्यवस्था मे बङा आमूलचूल परिवर्तन कर मुगलों की शासन की प्रणाली अपनाकर राजकोष को लबालब भर दिया था दीवान बख्शी हाकिम पोतदार खान सामा प्यादाबख्शीआदि अधिकारी नियुक्त कर कर दिए थे ! राजा के उमरावों की आठ मिसल कायमकर दांई बांई बैठक के नियम निर्धारित कर दिए थे तथा उसमें भी निश्चित नियम बना दिए थे महाराजा की ढाल तलवार तथा चंवर रखने वालों का भी नियम तयकर दिया था छंद निसाणी में गोयंददास की परिचायक पंक्ति !!!
गोयंदास गरज्जिया, सूर हंदै वारै !

कै थापै कै ऊथपै , मेवासां मारै !!
इनकी मृत्यु षडयंत्र में किसनगढ महाराजा ने करदी जिसका बदला महाराजा सूरसिंहजी व कुंवर गजसिंहजी ने चार छह घंटे बाद ही ले लिया था !! अस्तु !!
इनके पुत्र जोगीदास भाटी बङे वीर पुरुष हुए हैं और महाराजाके बङे विश्वस्त रहेहै और साहस में अपने पितासेभी बढकर हुऐ थे वि.सं.१६६८ में बादशाह जहाँगीरकी फौजे दक्षिण भारत की और कूच कर रही थी जिसमें सभी रियासतों की सेना भी शामिल थी और आगरा से दक्षिण में ऐक जगह पङाव में ऐक विचित्र घटना घटी आमेरके राजामानसिंहके ऐक उमरावका हाथी मदोन्मत हो गया था और संयोग से जोगीदास भाटी का उधर से घोङे पर बैठकर निकलना हो गया! उस मतगयंद ने आव देखा न ताव लपक कर जोगीदास को अपनी सूंडमें लपेटकर घोङे की पीठ से उठाकर नीचे पटका और अपने दो दांतों को जोगीदास की देह में पिरोकर उपरकी तरफ उठालिया !

       “”जोगीदासभाटी नें हाथी के दांतों में बिंधे और पिरोये हुये शरीर से भी अपनी कटारी को निकालकर तीन प्रहार कर उस मदांध हाथी का कुंभस्थल विदीर्ण कर डाला””
जोगीदास के साहसिक कार्य को देखकर वहां पर उपस्थित लोग दंग रह गये ! तथा मानसिंह राजा ने तो इससे प्रभावित होकर वह हाथी ही महाराजा सूरसिंह को भेंट कर दिया कुछ समय बाद उस हाथी को सूरसिंह ने शाहजादा खुर्रम को उदयपुर में भेंट कर दिया ! भाटी जोगीदास की कटारी वाली घटना उनदिनो राजपुताना के इतिहास में विशेष चर्चा का विषय बन गई और कवि कौविदौं को सृजन करनें का स्रौत बन गई समकालीन कवियों ने उस वीर की वीरता के व अदभुद साहसिक कार्य की भरपूर सराहना की ऐक दोहा दर्शनिय है !!

                !! दोहा !!

कुंभाथऴ बाही किसी, जोगा री जमदड्ढ !

जांण असाढी बिजऴी, काऴै बादऴ कड्ढ !!
इस ऐतिहासिक घटना की साक्षी में तीन प्रसिध समकालीन चारण कवियों ने डिंगऴगीत रचे हैं कैसोदासजी गाडण “गुण रूपक बंध” !!

                   !! गीत !!

गजदंत परे फूटै गज केहर,

                 गज चै कमऴ तङंतै गाढ !

जादव मांहि थकां जमदाढां,

                  जोगे आ वाही जमदाढ !!1!!

गोयंदऊत दाखवै गाढम, 

                      दंत दुआ सूं थाकै दऴ !

काऴ तणै वश थियै कटारी,

                      काऴ तणै वाही कमऴ !!2!!

भागै डील भली राव भाटी,

                     कुंजर धकै भयंकर काऴ !

आये जमरांणा मुख जंन्तर,

              मुख जम तणै जङी प्रतमाऴ !!3!!

आधंतर काढे अणियाऴी,

                    कुंभाथऴ वाही कर क्रोध !

अंतक सूं जोगै जिम आगै,

                  जुध कर मुऔ न कोई जोध !!4!!

अर्थातः…… हाथी के दांत शरीर के आरपार फूट जाने तथा गजमस्तक का जोर लगजाने के उपरांत भी भाटी (जादव) जोगीदास ने कटारी के प्रहार किये, मानो जम की दाढों मे होते हुऐ भी उसी जम पर जमदाढ (कटारी) भौंक दी हो गोयंददास के पुत्र जोगीदासने अपने साहस का परिचय देते हुऐ हाथी के दांतों में बिंध जाने पर भी कटारीके वार किये, मानो कालके वशीभूत व्यक्ति ने काल के ही मस्तक पर घाव किऐ हों टूटे हुए शरीर से भी उस भाटी यौध्दा ने कमाल कर डाला जब हाथी ने दांतों मे पिरोकर हवा में अधर घुमाया उस विकट स्थिति में भी कुंभथल पर क्रोध के साथ कटारी के तीक्ष्ण प्रहार करते हुए साक्षात यम से युध्द करते हुए ऐसी मौत कोई अन्य यौध्दा नहीं मरा जिसभांती मरण को जोगीदास ने वरण किया ! वस्तुतः यह अपने आप में इतिहास की अद्वितिय घटना थी !!
गीत जगमाल रतनूं कृत दूसरा !!

               !! गीत !!

फिरियै दिन डसण दुआं सूं फूटा,

गिरतै असि हूंतां औगाढ !

तैं गजरुप कमऴ गोदावत, 

जोगीदासा जङी जमदाढ !!1!!

उभै डसण नीसरै अणी सिर,

भाटी साराहै कर भूप !

वांकै दिन सूधी वाढाऴी,

रोपी सीस हसत जम रूप !!2!!

आतम डसण थियै आधंतर,

सूरांगुर कुऴवाट संभाऴ !

पांचाहरा गयंद सिर परठी,

तैं अंतरीख थकै अणियाऴ !!3!

दांतां विचै थकै जमदाढी,

अन नह वाही किणि एम !

जिम किअ सूर सांभऴी जोगी,

तैं किय दूजी अचङ तेम !!4!!

अर्थातः…..दिन फिरने पर हाथी के दोनों दांत शरीर के आरपार फूट जाने तथा अश्व से गिरने के उपरान्त भी गोयंददासके पुत्र जोगीदास तैने कुभंस्थल पर कटारी का प्रहार करने का अपूर्व साहस दिखलाया, हस्ती के उभय दशनों की अणी पार निकल गई, उस टेढे दिन मेंभी सीधी कटारी द्वारा यम रूपी हाथी के मस्तक पर घाव करने के कारण हे भाटी (जोगीदास) तेरे हस्त लाघव की सभी राजा महाराजा भी सराहना करते हैं तन का मध्यभाग गजदन्त में पिरोया जाने के पश्चात ऊपर आकाश में झूलते हुए भी पंचायण के वंशज उस वीर शिरोमणी ने अपने कुल गौरव को याद कर कुंजर के शीश पर जोर से कटारी मारी, हाथी दांतों में इस प्रकार बिंधे हुए अन्य किसी भी यौध्दा नें गजमस्तक पर इस प्रकार का वार नही किया ! हे जोगीदास तूनें सच्चे शूरवीर की भांति अतुलित साहस दिखा कर यशस्विता अर्जन की है !!
गीत तीसरा उदयसी वरसङा का कहा !!

                 !! गीत !!

राव राणां जोगीदास वदै रिण,

अचङां गौयंद का अवगाढ !

वाय हंस गये गयंद सिर वाही,

दांत दुआ सहुऐ जमदाढ !!1!!

कऴ कथ जरू रहावी कटके,

भाटी सूरत दीख भुजाऴ !

रमियै हंस कुभांथऴ रोपी,

पार डसण होतां प्रतमाऴ !!3!!

दूजां भङां आंवणी देसी,

रावत वट जोगा रिम राह !

सास गये गजराज तणैं सिर,

वणियै दांत कटारी वाह !!3!!

अर्थातः….. हे गोयंददास के पुत्र जोगीदास तेरा कीर्तिगान सभी राव और राणां इसलिए कर रहे हैं कि हाथी के दोनों दांतों में बिंध जाने पर मृत व निष्प्राण अवस्था में भी तूने गज मस्तक पर कटारी के वार किए ! भाटी के उस वीरत्व की कहानी सैन्यदल के द्वारा सर्वत्र प्रसिध्दि पा गई क्योंकि उसके प्रांणपंखेरु उडनेके साथही स्वंय दांतों में झूलते हुए कुभंस्थल पर कटारी भौंकी थी क्षात्रवट के अनुयायी वीर अन्य लोगों के सन्मुख इस वीर का उदाहरण प्रस्तुत करगें जो  कि शत्रु संहारक के रूप में हाथी के दांतों बीच में झूलती हुई देह में से सांस निकलनेके क्षण में कटारी के तीक्ष्ण घाव किए थे !!
गीत चौथा खीमा कविया का कहा हुआ !!

                !! गीत !!

ठवि डाडर डसण कढाया पूठी,

अविऴग हसती हीलै आंम !

जोगङा काढ कटारी जादम,

वाही दऴै मुजरौ वरियाम !!1!!

दऴ चीरियो विचि गज दांतां,

जमदढ वाहण ठौङ जिसौ !

दौलत निजर करै दैसोतां,

देखो जोगीदास दिसो !!2!!

ऊपङियौ हसती आधिंतर,

दांतूसऴ भेदिया दुवै !

गोयंद तणै साचवा गुंणकी,

हाडां हाड जुजुवै हुवै !!3!!

मैंगऴ डसण गयण माङेचा,

सूंरां आ वाही सम्मथ !

हिन्दु तुरक तणैं मुंह हुई,

कटक कटारी तणी कथ !!4!!

     भाटी जोगीदास के इस अद्वितिय शौर्य एंव साहस की प्रामाणिकता सिध्द करने वाले उस समय के कवियों के रचे हुए इन महत्वपूर्ण एंव अद्यावधि अज्ञात रहे डिंगऴ गीतों के अतिरिक्त “बांकीदासरी ख्यात” मेंभी इसका संक्षिप्त रूप में उल्लेख है यथाः…..
“”गोइंददास रै बेटौ जोगीदास, पटै गांमां च्यारां सूं गांम बीजवाङियौ, महाराजा सूरजसिंह जी रौ उमराव जिणांनूं राजा मान कछवाहा रा एक चाकर रा एक हाथी रा दांतां में पोयोङै कटारी तीन उणीज हाथी रै कुभांथऴ वाही, राम कह्यौ संवत १६६८ पातसाह री फौज दिखण में जावै जद””!!

     जोगीदास भाटी की कटारी का उक्त वृतान्त सुन कर सूर्यमल्ल मिश्रण कृत ‘वीरसतसई’ का यह दौहा सहज ही स्मरण हो आता है !!

              !! दोहा !!

साम्है भालै फूटतौ, पूग उपाङै दंत !

हूं बऴिहारी जेठरी, हाथी हाथ करंत !!
                ऐसे वीरों के कारण ही यह मरूधरा वीरवसुन्धरा के नाम और रूप मे विश्वविख्यात है !!
राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर  (राज.)

भाटी राजपूत राजवंश, Bhati Rajput Rajvansh

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•°•भाटी राजपुत राजवंश•°•

गढ़ चितौड़ गढ़ जालोर गढ़ कुंभलमेर ।
जैसलदे चणायो भाटीयों जग मे जैसलमेर ॥

गढ़ तणोट गढ़ मांडव गढ़ सांगानेर ।
महारावल चणायों भाटीयों भल गढ़ जैसलमेर ॥

गढ़ विजणोट गढ़ अर्बद देखो गढ़ अजमेर !
सोने रुपे झगमगे जग मे गढ़ जैसलमेर ॥

गढ़ बुंदी गढ़ मंडोवर महा गढ़ आमेर ।
मरुधरा गुणवंत गढ़ जैसलमेर ॥

गढ़ महेरान गढ़ नागोर खेड़गढ़ बाड़मेर ।
माड़ धरा महीपति जहाँ गढ़ जैसलमेर ॥

भाटियो का राव वंश वेलियो ,सोरम घाट ,आत्रेस गोत्र ,मारधनी साखा ,सामवेद ,गुरु प्रोहित ,माग्न्यार डगा ,रतनु चारण तीन परवर ,अरनियो ,अपबनो ,अगोतरो ,मथुरा क्षेत्र ,द्वारका कुल क्षेत्र ,कदम वृक्ष ,भेरव ढोल ,गनादि गुणेश ,भगवां निशान ,भगवी गादी ,भगवी जाजम ,भगवा तम्बू ,मृगराज ,सर घोड़ों अगनजीत खांडो ,अगनजीत नगारों ,यमुना नदी ,गोरो भेरू ,पक्षी गरुड़ ,पुष्पकर्णा पुरोहित ,कुलदेवी स्वांगीयाजी ,अवतार श्री कृष्णा ,छत्र मेघाडंबर ,गुरु दुर्वासा रतननाथ ,विरूप उतर भड किवाड़ ,छ्त्राला यादव ,अभिवादन जय श्री कृष्णा ,व्रत एकादशी ।

उत्तर भड़ किंवाड़
काक नदी की पतली धारा किनारों से विरक्त सी होकर धीरे धीरे सरक रही थी | आसमान ऊपर चुपचाप पहरा दे रहा था और नीचे लुद्रवा देश की धरती , जिसे आजकल जैसलमेर कहा जाता है , प्रभात काल में खूंटी तानकर सो रही थी | नदी के किनारे से कुछ दूरी पर लुद्रवे का प्राचीन दुर्ग गुमसुम सा खड़ा रावल देवराज का नाम स्मरण कर रहा था | ‘कैसा पराक्रमी वीर था ! अकेला होकर जिसने बाप का बैर लिया | पंवारों की धार पर आक्रमण कर आया और यहाँ युक्ति , साहस और शौर्य से मुझ पर भी अधिकार कर लिया | साहसी अकेला भी हुआ तो क्या हुआ ? हाँ ! अकेला भी अथक परिश्रम ,साहस और सत्य निष्ठा से संसार को अपने वश में कर लेता है ….|
उसका विचार -प्रवाह टूट गया | वृद्ध राजमाता रावल भोजदेव को पूछ रही है –
‘ बेटा गजनी के बादशाह की फौजे अब कितनी दूर होंगी ?’
‘ यहाँ से कोस भर दूर मेढ़ों के माल में |’
‘ और तू चुपचाप बैठा है ?’
‘ तो क्या करूँ ? मैंने बादशाह को वायदा किया कि उसके आक्रमण की खबर आबू नहीं पहुंचाउंगा और बदले में बादशाह ने भी वायदा किया है कि वह लुद्रवे की धरती पर लूटमार अथवा आक्रमण नहीं करेगा |’
राजमाता पंवार जी अपने १५-१६ वर्षीय इकलौते पुत्र को हतप्रद सी होकर एकटक देखने लगी , जैसे उसकी दृष्टि पूछ रही थी ‘ क्या तुम विजयराज लांजा के पुत्र हो ? क्या तुमने मेरा दूध पिया है ? क्या तुम्ही ने इस छोटी अवस्था में पचास लड़ाइयाँ जीती है ? ‘ नहीं ! या तो सत्य झुंट हो गया या फिर झुंट सत्य का अभिनय कर रहा था |
परन्तु राजमाता की दृष्टि इतने प्रश्नों को टटोलने के बाद अपने पुत्र भोजदेव से लौट कर अपने वैधव्य पर आकर अटक गयी | लुद्रवे का भाग्य पलट गया है अन्यथा मुझे वैधव्य क्यों देखना पड़ता ? क्या मै सती होने से इसलिए रोकी गई कि इस पुत्र को प्रसव करूँ | काश ! आज वे होते |’ सोचते-सोचते राजमाता पंवार जी के दुर्भाग्य से हरे हुए साहस ने निराश होकर एक निश्वास डाल दिया |
क्यों माँ, तुम चुप क्यों हो ? क्या मेरी संधि तुम्हे पसंद नहीं आई ? मैंने लुद्रवे को लुट से बचा लिया , हजारों देश वासियों की जान बच गई |’
‘ आज तक तो बेटा , आन और बात के लिए जान देना पसंद करना पड़ता था | तुम्हारे पिताजी को यह पसंद था इसलिए मुझे भी पसंद करना पड़ता था और अब वचन चलें जाय पर प्राण नहीं जाय यह बात तुमने पसंद की है इसलिए तुम्हारी माँ होने के कारण मुझे भी यह पसंद करना पड़ेगा | हम स्त्रियों को तो कोई जहाँ रखे , खुश होकर रहना ही पड़ता है |’

आगे राजमाता कुछ कहना ही चाहती थी किन्तु भोजराज ने बाधा देकर पूछा – ” किसकी बात और किसकी आन जा रही है | मुझे कुछ भी मालूम नहीं है | कुछ बताओ तो सही माँ ! ”
‘ बेटा ! जब तुम्हारे पिता रावलजी मेरा पाणिग्रहण करने आबू गए थे तब मेरी माँ ने उनके ललाट पर दही का तिलक लगाते हुए कहा था – ” जवांई राजा , आप तो उत्तर के भड़ किंवाड़ भाटी रहना |” तब तुम्हारे पिता ने यह बात स्वीकारी थी | आज तुम्हारे पिता की चिता जलकर शांत ही नहीं हुई कि उसकी उसकी राख को कुचलता हुआ बादशाह उसी आबू पर आक्रमण करने जा रहा है और उत्तर का भड़-किंवाड़ चरमरा कर टुटा नहीं , प्राण बचाने की राजनीती में छला जाकर अपने आप खुल गया | इसी दरवाजे से निकलती हुई फौजे अब आबू पर आक्रमण करेंगी तब मेरी माँ सोचेगी कि मेरे जवांई को १०० वर्ष तो पहले ही पहुँच गए पर मेरा छोटा सा मासूम दोहिता भी इस विशाल सेना से युद्ध करता हुआ काम आया होगा वरना किसकी मजाल है जो भाटियों के रहते इस दिशा से चढ़कर आ जावे | परन्तु जब तुम्हारा विवाह होगा और आबू में निमंत्रण के पीले चावल पहुंचेंगे , तब उन्हें कितना आश्चर्य होगा कि हमारा दोहिता तो अभी जिन्दा है |”
बस बंद करो माँ ! यह पहले ही कह दिया होता कि पिताजी ने ऐसा वचन दिया है | पर कोई बात नहीं , भोजदेव प्राण देकर भी अपनी भूल सुधारने की क्षमता रखता है | पिता का वचन मै हर कीमत चुका कर पूरा करूँगा |” ” नहीं बेटा ! तुम्हारे पिता ने तो मेरी माता को वचन दिया था परन्तु इस धरती से तुम्हारा जन्म हुआ है और तुम्हारा जन्म ही उसकी आन रखने का वचन है | इस नीलाकाश के नीचे तुम बड़े हुए हो और तुम्हारा बड़ा होना ही इस गगन से स्वतंत्र्य और स्वच्छ वायु बहाने का वचन है | तुमने इस सिंहासन पर बैठकर राज्य सुख और वैभव का भोग भोग है और यह सिंहासन ही इस देश की आजादी का , इस देश की शान का , इस देश की स्त्रियों के सुहाग ,सम्मान और सतीत्व की सुरक्षा का जीता जागता जवलंत वचन है | क्या तुम ……………………|
‘ क्षम करो माँ ! मैं शर्मिंदा हूँ | शत्रु समीप है | तूफानों से अड़ने के लिए मुझे स्वस्थ रहने दो | मैं भोला हूँ – भूल गया पर इस जिन्दगी को विधाता की भूल नहीं बनाना चाहता |’
झन न न न !
रावल भोजदेव ने घंटा बजाकर अपने चाचा जैसल को बुलाया |
‘ चाचा जी ! समय कम है | रणक्षेत्र के लुए में जिन्दगी और वर्चस्व की बाजी लगानी पड़ेगी | आप बादशाह से मिल जाईये और मैं आक्रमण करता हूँ | कमजोर शत्रु पर अवसर पाकर आघात कर , हो सके तो लुद्रवा का पाट छीन लें अन्यथा बादशाह से मेरा तो बैर ले ही लेंगे |
जैसल ने इंकार किया , युक्तियाँ भी दी , किन्तु भतीजे की युक्ति , साहस और प्रत्युत्पन्न मति के सामने हथियार डाल दिए | इधर जैसल ने बादशाह को भोजदेव के आक्रमण का भेद दिया और उधर कुछ ही दुरी पर लुद्रवे का नक्कारा सुनाई दिया |
मुसलमानों ने देखा १५ वर्ष का का एक छोटा सा बालक बरसात की घटा की तरह चारों और छा गया है | मदमत्त और उन्मुक्त -सा होकर वह तलवार चला रहा था और उसके आगे नर मुंड दौड़ रहे थे | सोई हुई धरती जाग उठी , काक नदी की सुखी हुई धारा सजल हो गई , गम सुम खड़े दुर्ग ने आँखे फाड़ फाड़ कर देखा – उमड़ता हुआ साकार यौवन अधखिले हुए अरमानों को मसलता हुआ जा रहा है | देवराज और विजयराज की आत्माओं ने अंगडाई लेकर उठते हुए देखा – इतिहास की धरती पर मिटते हुए उनके चरण चिन्ह एक बार फिर उभर उभर आए है और उनके मुंह से बरबस निकल पड़ा – वाह रे भोज , वाह !
दो दिन घडी चढ़ते चढ़ते बादशाह की पन्द्रह हजार फ़ौज में त्राहि त्राहि मच गई | उस त्राहि त्राहि के बीच रणक्षेत्र में भोजदेव का बिना सिर का शरीर लड़ते लड़ते थक कर सो गया – देश का एक कर्तव्य निष्ठ सतर्क प्रहरी सदा के लिए सो गया | भोजदेव सो गया , उसकी उठती हुई जवानी के उमड़ते हुए अरमान सो गए , उसकी वह शानदार जिन्दगी सो गई किन्तु आन नहीं सोई | वह अब भी जाग रही है |
जैसल ने भी कर्तव्य की शेष कृति को पूरा किया | बादशाह को धोखा हुआ | उसने दुतरफी और करारी मात खाई | आबू लुटने के उसके अरमान धूल धूसरित हो गए | सजधज कर दुबारा तैयारी के साथ आकर जैसल से बदला लेने के लिए वह अपने देश लौट पड़ा और जैसल ने भी उसके स्वागत के लिए एक नए और सुद्रढ़ दुर्ग को खड़ा कर दिया जिसका नाम दिया – जैसलमेर ! इस दुर्ग को याद है कि इस पर और कई लोग चढ़कर आये है पर वह कभी लौटकर नहीं आया जिसे जैसल और भोजदेव ने हराया | आज भी यह दुर्ग खड़ा हुआ मन ही मन ” उत्तर भड़ किंवाड़ भाटी ” के मन्त्र का जाप कर रहा है |

:: जैसलमेर का आधा शाका ::
काबुल कंधार का अमीर अली खां राज्च्युत होने पर 1550 ईस्वी में जैसलमेर के रावल लूणकरण भाटी की सरण आया | महारावल ने उसका बड़ा आदर सम्मान किया | कुछ दिनों बाद अली खां के दिल में बेईमानी आ गयी | और उसने जैसलमेर का राज्य हडपने का विचार किया | ऐक दिन लूणकरण को कहलाया की मेरी बेगमे | आपकी रानियों से मिलना चाहती हे | लूणकरण ने बात स्वीकार कर ली विक्रमी संवत 1607 बैसाख सुदी 14 तारिख २९ अप्रैल 1550 ईस्वी को सुबह अली खां ने बेगमों के स्थान पर मुसलमान सेनिकों को बिठाकर किले में भेज दिया और स्वयं 500 सैनिकों के साथ सुसज्जित होकर किले के बहार खड़ा हो गया | जब डोलियाँ अंतपुर के द्वार पर पहुंची तो सारा भेद खुल गया | राजपूतों व् मुसलमानों में घमासान युद्ध हो चला राजपूतों को इस षड़यंत्र का पहले पता नहीं था | किले के दरवाजे खुले थे | अली खां सेना सहित किले में घुस गया | अन्नतपुर के द्वार पालों ने देखा की मुस्लिम सेना का जोर ज्यादा हे | तो उन्होंने रानियों के सतीत्व की रक्षा के लिए उन्हें तलवार से क़त्ल कर दिया | इस युद्ध में महारावल के भाई मंडलीक जी , प्रताप सिंह , राजसिंह और कुंवर हीरजी और कुंवर हरदास , दुरजनसाल और सूरजमल पुत्रों सहित ऐक हजार शेनिकों के साथ शहीद हुए | उस वक्त कुंवर मालदेव बाडी से आये और खिड़की से होकर किले चढ़कर अली खां को मारा 500 लोग अली खां का काम आया | ३०० किले ऊपर और 200 बाहर मारे गए |
:: कुंडलिया :::
रावल लूणकरण जी पाट बिराजे राज
पनरे सो पिच्यासिये आय हुआ महाराज
आय हुआ महाराज कोठार कराया भारी
उदेपुर बीकानेर परणीज्या करके तेयारी
नवाब अली खां आप दगो कर दीनो कावल
मारे मुसला सर्व अर्ध साके में रावल

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)