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“મહારાવલ જયદીપસિંહ સૌભાગસિંહજી બારિયા”

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મહારાવલ જયદીપસિંહ સૌભાગસિંહજી બારિયા
ખિચી ચૌહાણ રાજવંશ (૨૪ જૂન ૧૯૨૯ ઈ. સ. થી ૨૦ નવેમ્બર ૧૯૮૭ ઈ. સ.) દેવગઢ બારીયા રાજ્ય, અત્યારે જિ. દાહોદ.

આજે તારીખ ૨૪ જુન મહારાવલ જયદીપસિંહ સૌભાગસિંહજી બારિયાનો જન્મ દિવસ છે, આ મહાનવ્યક્તિત્વ અબે પ્રજાવત્સલ રાજવી વિષે જાણી ચોક્કસ ગર્વ થશે.

બારીયા રાજ્યનો ઈતિહાસ ટૂંકમાં :-
ચાંપાનેરના અંતિમ રાજવી રાવલ પતાઈજીના પુત્ર રાયસિંહજીના બે પૌત્ર એ અલગ અલગ રાજ્યોની સ્થાપના કરી જેમાં મોટા પૌત્ર રાવલ પૃથ્વીરાજજીએ છોટાઉદેપુર સંસ્થાન વસાવ્યું અને નાના ડુંગરજી એ
ઈ. સ.1524 માં બારીયા રાજ્યનો પાયો નાખ્યો જે આજે દેવગઢ બારીયા તરીકે ઓળખાય છે, આમ બારીયા રાજ્યના 16માં અને અંતિમ રાજવી મહારાવલ રણજીતસિંહજી માનસિંહજીએ તેમના પૌત્ર જયદીપસિંહજી સૌભાગસિંહજીના હસ્તે પોતાનું 09ગન સેલ્યુટ ધરાવતું રાજ્ય માં ભારતીના ચરણોમાં 10 જૂન 1948ના રોજ સમર્પિત કર્યું હતું. એ મહારાવલ જયદીપસિંહજીએ અજમેરની મેયો કોલેજ અને બાદમાં કેમ્બ્રિજ યુનિ. માં અભ્યાસ કર્યો હતો. મહારાવલ જયદીપસિંહજીના પિતા સૌભાગસિંહજીનું યુવરાજ પદ પર જ અવસાન થયેલ આથી તેઓ આઝાદી સમયે બારીયા રાજના યુવરાજ હતા. ગુજરાતના પ્રજાવત્સલ રાજવીઓમાં શિર્ષસ્થાન ધરાવતા હતા.

મહારાવલ જયદીપસિંહજીની કારકિર્દી અને કીર્તિ :-

મહારાવલ જયદીપસિંહજી આઝાદી બાદ બારિયા નગરપંચાયતના પ્રમુખ બન્યા, દેવગઢ બારિયા મત વિસ્તારના ધારાસભ્ય, આઠમી લોકસભાના સાંસદ, ત્રીજી વિધાનસભાના વિરોધ પક્ષના નેતા ,ખેતીવાડી અને આરોગ્ય ખાતાના માન મંત્રીશ્રી, ગુજરાત ટુરીઝમના ચેરમેન તરીકે ટુરિઝમનો પણ વિકાસ કર્યો હતો. તેઓએ પોતાની રાજકીય કારકિર્દી દરમિયાન ડૉ. સામ પિત્રોડાની સ્કીલને પારખી તેમની મુલાકાત પોતાના દિલ્હી ખાતેના બંગલે ઈન્દીરા ગાંધી અને રાજીવ ગાંધી સાથે કરાવેલ, તેમણે ડૉ. સામની ભલામણ કરી જેને કારણે ભારતે ટેલિકોમ્યુનિકેશન ક્ષેત્રે ખૂબ મોટી હરણફાળ ભરી હતી. રમત ગમત (સ્પોર્ટ્સ) જયદીપસિંહજી બારીયાનું ગુજરાત જ નહીં સમગ્ર રાષ્ટ્રક્ષેત્રે અમૂલ્ય યોગદાન રહ્યું, પોતે આધુનિક પોલોની રમતના ખ્યાતનામ ખેલાડી હતા, સાથે અન્ય રમતો જેવીકે લૉનટેનિસ, ક્રિકેટ, ચેસ, તીરંદાજી, એથ્લેટીક્સ વગેરે રમતોના શ્રેષ્ઠ ખેલાડીઓ દેશને આપવા બારીયામાં ઉતરુષ્ઠ મેદાનો, શ્રેષ્ઠ કોચ તેઓએ નીમ્યા હતા, મહારાવલ રણજીતસિંહજી જીમખાના તેમણે ગુજરાત સરકાર(જ્યાં અત્યારે જયદીપસિંહ બારીયા સ્પોર્ટ્સ કોમ્પલેક્ષ ગુજરાત સરકાર દ્વારા નિર્માણ પામ્યું છે)ને ડોનેટ કરી દેવગઢ બારીયાને ગુજરાતના સ્પોર્ટ્સ કેપિટલ તરીકે વિકસાવ્યું હતું.
રમત ગમત ક્ષેત્રે પોતાની સ્કિલ અને પ્રેમના લીધે ઓલિમ્પિક અને એશિયાડ રમતોમાં તેઓએ ભારત સરકારનું પ્રતિનિધિત્વ પણ કર્યું હતું. જયદીપસિંહજી બારિયા એથલેટીક્સ ફેડરેશન ઓફ ઇન્ડિયાના ચૂંટાયેલા પ્રમુખ પણ રહ્યા હતા. દેવગઢ બારિયામાં પોતાનો જૂનો મહેલ દાન કરી યુવરાજ સૌભાગસિંહજી કોલેજ શરુ કરી તેમણે ઉચ્ચ શિક્ષણનો પાયો નાંખ્યો હતો. તેઓ શ્વાનપ્રેમી પણ હતા, તેમની પાસે સારા જાતવાન અનેક શ્વાન હતા. તેથી ઓસ્ટ્રલીયામાં યોજાયેલા વર્લ્ડ ડોગ શો માં તેઓ નિર્ણાયક પણ રહ્યા હતા.
આમ તેમના રમત ગમત ક્ષેત્રના અમુલ્ય યોગદાનની કદર કરતા ગુજરાત સરકારના રમત ગમત, યુવા અને સાંસ્કૃતિક પ્રવૃત્તિઓ વિભાગના કમિશનરશ્રી યુવકસેવા અને સાંસ્કૃતિક પ્રવૃત્તિઓ દ્વારા રાજ્ય કક્ષા અને રાષ્ટ્રીયકક્ષાએ ખુલ્લા વિભાગમાં વિજેતા થનાર ખેલાડીઓને યોજનાની સ્કીમ અનુસાર 100ગુણ મેળવે તેને જયદીપસિંહજી બારીયા સીનિયર તથા જુનિયર એવોર્ડ દર વર્ષે એનાયત કરવામાં આવે છે, જેમાં જુનિયરમાં 10,000/- રોકડ પુરસ્કાર અને એવોર્ડ, તથા સીનીયરમાં 20,000/- રોકડ પુરસ્કાર અને આપવામાં આવે છે, ૨૦ નવેમ્બર ૧૯૮૭ના રોજ દિલ્હીમાં તેમનું અવસાન થયું, હતું . મારી ઉંમર જેટલો સમય તેમના સ્વર્ગવાસને થયો છતાં દેવગઢ બારીયાના પ્રજા જનોના હૃદયમાં આ રમતપ્રિય અને પ્રજા વત્સલ રાજવીનું સ્થાન ચિરંજીવ છે..
લેખન/સંપાદન : ધર્મરાજસિંહ જે. વાઘેલા (છબાસર)

​🚩॥नारायण नमण॥🚩

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सम्वत् 2074 आषाढ सुदी एकादशी अर्थात देवशयन एकादशी से चतुर्मास प्रारंभ ईश्वर आराधना विशै काव्य

  

     🍀-: दोहा :-🍀
एको ईसर एक है,अवर न कोई अलेप।

रोम रोम सब घट रमे,नारायण निर्लेप॥1
सो नारायण सांईया,पालक जग पतख्ख।

किम”काळू”कूड़ा कथौं,लिवना लगनी लख्ख॥2

  🌺 छंद चर्चरी🌺

          
           ( 1 )
      

अवल एक ही आधार,अलख नाम ओऽमकार।

सुमरण तत्त सार-सार,परथम पैलां।

राम-राम रणुंकार,शिव,शिव,शिव हर संभार।

परमात्तम कूं पुकार,हरदम हैला।

आखिर अवतार एक,अनंत रूप में अनेक।

वरतों कर-कर विवेक,ठावा ठामी।

वंदन जुग वार-वार,हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार,नारण नांमीं॥1
             ( 2 )
विरंची विष्णु विशैस,शंकर सुरसत सुरेश।

गवरी सुत नित गणेश,सुरगण सारे।

ध्यावत नारद धनेश,अरुण वरुण यम अहेश।

खोजत धावत खगेश,हद हद हारे।

पावत कोई न पार ईसर महिमा अपार।

तूंहीं इक तारणार संतन सांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार,नारण नांमीं॥
           ( 3 )
गंधर्व नित करत गान,बरनत चारन बखान।

ध्यानी मुनि धरत ध्यान,ईश अराधे।

योगी जन सो यज्ञान,विरले कर कर विधान,

साधक जिम समाधान,साधन साधे।

परमतत्व तुझ पिछान,मौलिक रीति महान।

जानूं किम हूँ अजान,केवल कांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार,नारण नांमीं॥3 
           ( 4 )
कारण कर्ता कहात,हरपल तूंहीं हैयात।

विश्वनाथ है विख्यात,त्रिकम त्राता।

परतख न जात पांत,नाहीं को गोत्र नात।

संतन जमात साथ,भक्तन भ्राता।

सत्तचित्त आनंद सरूप,अविनाशी हे अनूप।

भूपन के महा भूप गारुड़ गांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार,नारण नामी॥4 
              ( 5 )
शक्ति स्वरूप श्याम,र रे म मे राम राम।

कलाकार पूर्ण काम,केशव काळा।

तूंहीं जाणे तमाम,माधव तेरा मुकाम।

ठाकर सु नाम ठाम,बंशी वाळा।

देखत न लेत दाम,आपे सबकूं अवाम।

सार वार सुबै शाम,जाजम जांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार नारण नामी॥5
              ( 6 )
कीड़ी कूं देत कन्न,महंगळ कूं देत मन्न।

चाहत पंखिन्न चुन्न,भोजन भारी।

अजगर न लेत अन्न,जीवे किम कर जतन्न।

वाह रे वाह रे विशन्न,थापन थारी।

जळ थळ सारे जहान,सरबस रहता समान।

मालिक तूं मेहरबांन,खलत न खांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार नारण नांमीं॥6
             ( 7 )
सात वार कर सलाम,निर्मल मन जपूं नाम।

धरा गगन परे धाम,विरला वासी।

कपटी को नहीं काम,आरत को आठूंयाम।

मिलता ताही मुकाम,दरदी दासी।

चावो चर्चरी छंद,प्रभू करीये पसंद।

“काळू” आनंद कंद,हरखे हांमीं।

वंदन जुग वार वार हाथ जोड़ी ने हजार।

नमस्कार निराकार नारण नांमीं॥7

चरण रज 

काळूसिंह गंगासरा🌺🌺🌺🙏🙏🙏
7 जुलाई 2017

गुजरात में चंपानेर के खींची चौहान राजपूतो का मुस्लिम सल्तनत से गौरवशाली संघर्ष

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गुजरात में चंपानेर के खींची चौहान राजपूतो का मुस्लिम सल्तनत से गौरवशाली संघर्ष

मित्रो आज आपको भारतीय इतिहास के एक ऐसे गौरवशाली संघर्ष से परिचय कराएंगे जो क्षत्रियों के अपने धर्म के प्रति प्रतिबद्धता और स्वतंत्रता के प्रति लगाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। चंपानेर के खिंची चौहान वंश ने अपने से कहीँ ज्यादा ताकतवर गुजरात की मुस्लिम सल्तनत से संघर्ष करते हुए उसके बिलकुल जड़ में एक सदी तक स्वतंत्र शाशन किया लेकिन कभी झुकना या धर्म परिवर्तन स्वीकार नही किया।
गुजरात पर उस समय मुस्लिम सल्तनत का परचम लहरा रहा था। अहमदाबाद उसकी राजधानी थी। तब चांपानेर मे खींची चौहानो का राज अपनी वीरता और वैभव के लिए मशहूर था। चांपानेर के संस्थापक गुजरात नरेश वनराजसिंह चावडा थे। 1300 ई. में चौहानों ने चांपानेर पर अधिकार कर लिया था।
एक और चौहानो के शौर्य का रस मुस्लिम सेना चख रही थी तो दुसरी और गुजरात का सुलतान आकुल व्याकुल हो रहा था। बात यह थी की अहमदाबाद के पास ही चांपानेर मे चौहान राजपूतो का छोटा सा राज्य था और कभी उन्होने मुस्लिम सुल्तानों के आधिपत्य को स्वीकार नही किया था। इस बात से गुजरात के सुलतान चांपानेर पर धावा बोलने की योजनाए बनाते ,
पर चौहानो की तेज तलवारो की कल्पना मात्र से ही वे अपना मन बदल लेते। एक सदी तक चांपानेर के खिंची राजपूतो से सल्तनत की लड़ाई चलती रही, लेकिन सल्तनत उन्हें झुका या हरा नही पाई।
जब गुजरात की गद्दी पर मुहम्मद शाह आया तब उसने चांपानेर पर आक्रमण करने की कई योजनाए बनाई लेकिन किसी ना किसी कारण वश वो सफल नही हो पाता था, 1449 ई. मे आखिर उसने आक्रमण कर ही दिया।
चांपानेर पर तब कनकदास चौहान उर्फ गंगदास चौहान का राज था। सुलतान के आक्रमण की खबर सुनते ही उन्होने अपनी सेना को सुसज्जित किया। मालवा के महमूद शाह खिलजी ने भी अपनी सेना सहायता हेतु भेजी। चांपानेर की सेना ने मुहम्मदशाह की सेना का ना सिर्फ सामना किया बल्कि औंधे मुह घर लौंटने को मजबूर कर दिया |
1451 ई. मे अहमदाबाद वापिस लौटते समय मुहम्मदशाह बीमार पड गया और रास्ते मे ही उसकी मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कुतुब-उद-दिन अहमदशाह || (1451-1458) गद्दी पर आया और उसके बाद Abu-al Fath Mahmud Shah अबु-अल फाथ महमुद शाह को गद्दी पर बिठाया गया जो महमुद ‘बेगडा’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
बेगडा छोटी उम्र मे ही सुलतान बन गया था लेकिन उसकी महत्वकांक्षाए बहुत बडी थी। वो एक धर्मांध और जूनुनी शासक था। चांपानेर की स्वतंत्रता उसे कांटे की तरह चुभ रही थी। अपने विरोधीयो और दुश्मनो को खत्म करके मजबुत सत्ता जमाने मे कामयाब हो गया था। अब उसकी नजर एक सदी तक उसके बाप दादाओ को अपने स्वतंत्र अस्तित्व से चिढ़ाते आ रहे चांपानेर पर थी।
उस वक्त चांपानेर मे कनकदास/गंगदास के पुत्र रावल जयसिंह चौहान (पावा पति अथवा पत्तई रावल के नाम से प्रसिद्ध) की सत्ता थी | ( कई जगह जयसिंह को उदय सिंह का पुत्र लिखा हुआ है)
1482 ई.मे महमुद बेगडा को चांपानेर पर आक्रमण करने का मौका मिला। रसुलाबाद जो की चांपानेर से 14 मील की दुरी पर था, वहां महमूद का सूबेदार मलिक था, उसने चांपानेर के प्रदेश मे घूसखोरी और लूटपाट करी। जब इसका पता जयसिंह को चला उन्होने रसुलाबाद पर धावा बोल दिया, सारा लूट का माल वापिस ले लिया, दो हाथी भी ले लिये और रसूलाबाद को तबाह कर दिया ||
इस घटना का पता चलने पर महमुद ने चांपानेर को जीतने का इरादा बनाया। उसने अपनी सेना के एक जत्थे को बडौदा की और भेजा ताकी उस ओर से चांपानेर आ रहे साधन सामग्री और खाने पीने की चीजो पर रोक लगा सके, और खुद 4 दिसंबर, 1482 को ढाई से तीन लाख की सेना के साथ चांपानेर पर उसने हमला किया लेकिन जयसिंह ने भी बडी बहादुरी से उसका सामना किया। चांपानेर के बाद उसके ऊपर पहाड़ी पर स्थित पावागढ़ के दुर्ग पर मोर्चा जमाया गया। करीब दो साल तक चले घेरे मे मुस्लिमो ने कई मंदिरो और तीर्थस्थलो को तहस-नहस कर दिया, पावागढ के महाकाली के मंदिर का गर्भगृह भी टूट गया था, लेकिन पावागढ का दुर्ग दो साल बाद भी महमूद के लिये बडी चुनौती बना हुआ था। आखिर उसने जयसिंह के कुछ दरबारियो को लालच देकर अपने साथ मिला लिया और 21, नवंबर, 1484 के दिन किले के दरवाजे खुलवा लिये।
जयसिंह की सेना की संख्या मुस्लिम सेना से काफी कम थी लेकिन फिर भी उन्होने विधर्मियो को काटना जारी रखा। 700 राजपुतो ने शाका किया और बेगडा के 20,000 मुस्लिम सैनिको को दोजख मे पहुचा दिया था। दूसरी ओर महारानी चंपादेवी और दुसरी राजपुत स्त्रीयो ने जौहर कर विधर्मीयो के हाथो से खुद को बचा लिया। सुरंग मार्ग से जयसिंह के पुत्र को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। रावल जयसिंह लडते लडते दुश्मनो के हाथो लग गये और उन्हे उनके मंत्री सूरी के साथ बंदी बना लिया गया।
बन्दी बनाकर जब रावल जयसिंह और सूरी को बेगड़ा के सामने लाया गया तो उसने पूछा कि किसकी प्रेरणा से तुम्हारी हिम्मत हुई अपनी छोटी सी सेना लेकर मेरी इतनी विशालकाय और ताकतवर सेना से लड़ने की???
वो दोनों क्षत्रिय घायल अवस्था में बेगड़ा की गिरफ्त में थे, उनके परिवार जौहर की अग्नि में विलीन हो गए थे, चांपानेर और पावागढ़ के दुर्ग तबाह हो गए थे, इस सब के बाद भी रावल जयसिंह ने पूरी दृढ़ता से बेगड़ा को जवाब दिया– “इस भूमी पर मेरा वंशानुगत अधिकार है, यह मेरे पूर्वजो द्वारा अर्जित है और इतने महान और कुलीन पूर्वजो की श्रृंखला का वंशज होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि जिस गौरवशाली नाम को उन्होंने मुझे दिया है उसकी इज्जत मरते दम तक बनाए रखू।”
बेगड़ा रावल जय सिंह के इस वीरोचित उत्तर से बहुत प्रभावित हुआ और दोनों क्षत्रियों को इस्लाम धर्म स्वीकार करने पर ना केवल जीवनदान बल्कि राज्य वापिस करने का प्रलोभन दिया, लेकिन उनके इनकार करने पर करीब पांच महिनो तक रावल जय सिंह और उनके मंत्री सूरी को घोर यातनाए देकर इस्लाम कबुल करने का दबाव डाला गया लेकिन वे टस से मस न हुए, उसके बाद उनके अंग और शिरछेद कर हत्या कर दी गई।
रावल जयसिंह और उनके मंत्री सूरी का यह बलिदान असंख्य क्षत्रिय वीरो के देश, धर्म और कुल के मान सम्मान के लिये अपना सर्वस्व बलिदान करने की परंपरा का एक अप्रतिम उदाहरण है। आज भी गुजरात में रावल जयसिंह को पतई रावल(पावा पती रावल जय सिंह) नाम से याद किया जाता है और उनके बारे में अनेको लोक कहानिया प्रचलित हैँ। चंपानेर और पावागढ़ के दुर्ग के अवशेष जहाँ मन्दिरो के शिखर तोड़ कर मस्जिद की गुम्बदे बना दी गई, आज भी इस गौरवशाली संघर्ष की मूक गवाही देते है।
जयसिंह के पुत्र रायसिंह के पुत्र त्र्यंबकसिंह हुए जिनके दो पुत्र थे, 1. पृथ्वीराजजी जिन्होने छोटा उदैपुर रियासत की स्थापना की, 2. डुंगरसिंहजी जिन्होने बारिया रियासत की नींव रखी। ये दोनों रियासत आज भी मौजूद हैँ। जबकि बेगड़ा के वंश का नामो निशान 4 सदी पहले ही समाप्त हो गया।
दुर्भाग्य से इस गौरवशाली संघर्ष को इतिहास के पृष्ठों पर जो सम्मान मिलना चाहिये, वो नही मिल पाया और जनसामान्य में बहुत कम लोगो को इसकी जानकारी है।
सन्दर्भ : व्हाट्सएप्प

भूपत सिंह चौहाण – इंडियन रॉबिन हुड – जिसे कभी पुलिस पकड़ नहीं पायी, Bhupatsinh Chauhan Indian Robinhud

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भूपत सिंह चौहाण – इंडियन रॉबिन हुड – जिसे कभी पुलिस पकड़ नहीं पायी
यह बात आजादी के पहले की है। इस समय देश में राजा-रजवाड़ों का शासन चलता था। भारत की संपत्ति व संपदा लूटने में अंग्रेज कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। इतना ही नहीं, अपने स्वार्थ के लिए देश के कई राजा-रजवाडे भी अंग्रेजों के साथ मिलकर देश को लूट रहे थे और जनता अनकों तरह की यातनाएं भुगतते हुए भूखी-प्यासी मर रही थी। इस समय देश में चारों ओर सिर्फ लूटपाट का ही नगाड़ा बज रहा था।

इसी समय वडोदरा के शासक गायकवाड परिवार को एक चिट्ठी मिलती है, जिसमें पूरे परिवार को धमकी लिखी थी..‘महल में काम करने वाले सभी 42 नौकरों को उनकी सेवानिवृत्ति के समय पांच-पांच वीघा जमीन दी जाए और इसकी जाहिर सूचना पूरे शहर में भी दी जाए। अगर आपने ऐसा नहीं किया तो परिवार के सभी सदस्यों की एक-एक कर हत्या कर दी जाएगी।’ इस धमकी भरे पत्र के नीचे नाम लिखा था.. भूपत सिंह चौहाण। यह वही भूपतसिंह था, जिसने वडोदरा से लेकर दिल्ली की सरकार तक के नाक में दम कर रखा था।

इंग्लैंड के रॉबिनहुड या हिंदी फिल्मों की तरह लगने वाली यह कथा एक सच्ची घटना है। भूपतसिंह के कहर से जहां राजा-रजवाड़े और अंग्रेज कांपा करते थे, वहीं गरीबों के दिल में उसके लिए सर्वोच्च स्थान था।

गुजरात के कठियावाड की बहादुर धरती का पानी ही कुछ ऐसा है कि पूरे एशिया में सिर्फ यहीं एशियाटिक लायंस पैदा होते हैं। मात्र प्राणियों में ही नहीं, कठियावाडी लोगों की रगों में भी ¨सहों का शौर्य दौड़ता है। उनकी आवाज में भी उनकी शूरवीरता छलकती है। कठियावाड के इतिहास पर नजर डालें तो यहां से लोगों की वीरगाथा का एक लंबा इतिहास है। इन्हीं में एक नाम आता है भूपत सिंह चौहाण का।

कठियावाड में एक समय आया था, जब भूपत सिंह पूरे देश के राजा-रजवाड़ों और अंग्रजों के लिए सिरदर्द बन गया था। अंतिम समय तक भूपत सिंह को न तो किसी राजा की सेना पकड़ सकी और न ही ब्रितानी फौजें। अंतत: कई अंग्रेजों को मौत की नींद सुला देने वाले भूपत सिंह के बिना ही अंग्रेजों को वापस इंग्लैंड लौटना पड़ा। अंग्रेजी शासन के अंत के बाद इधर भारत सरकार भी भूपत को कभी पकड़ नहीं सकी।

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कठियावाड में जन्मा भूपत सिंह बचपन से ही बहादुर था। तेज भागने घोड़ों पर सवार होकर हवा से बात करने की कला तो जैसे उसे वरदान में ही मिली थी। भूपत को जानने वाले लोग बताते हैं कि वह इतनी तेज दौड़ा करता था कि अगर उस समय ओलंपिक में भाग लेता तो कोई उसे हरा नहीं सकता था। लेकिन उसके भाग्य में कुछ और ही लिखा था। तेज भागना उसकी आदत थी, इसलिए वह ताउम्र भागता ही रहा।

भूपत के शिकार बने कई लोगों का परिवार अब भी कठियावाड और आसपास के क्षेत्रों में रहते हैं। भूपत की कई क्रूरता भरी कहानियां हैं तो कई उसकी शौर्यगाथाओं और गरीबों के प्रति उसके प्रेम का गुणगान करती हुई भी हैं।

यह 1920 का समय था और भारत पर अब पूरी तरह ब्रिटिश सरकार का शासन था। कुछ राजा-रजवाड़ा बचे भी तो वे अंग्रेजी सरकार के कठमुल्ले मात्र ही थे। इस समय अमरेली जिला के वरवाला गांव में भूपत का जन्म हुआ। उसका पूरा नाम भूपत सिंह बूब था। लेकिन उसने अपने लिए भूपत सिंह चौहाण नाम ही पसंद किया और वह इसी नाम से पहचाना गया। दरअसल भूपत के इस नाम के पीछे का मूल कारण यह था कि उसके वंशज चौहाणवंशी क्षत्रियों से ही संबंध रखते थे।

भूपत का बचपन वाघणिया में बीता। वह बचपन से ही बहुत बुद्धिशाली था। उसकी तर्क-वितर्क और निर्णय की शक्ति इतनी पैनी थी कि जवानी की दहलीज पर कदम रखते हुए ही उसकी नियुकित वाघणिया के राजा के दरबार में हो गई थी। इसके अलावा भूपत को तरह-तरह के खेलों का भी बहुत शौक था। उसकी यह प्रतिभा भी ज्यादा दिन छुपी नहीं कर सकी। जब भी राजा के दरबार में दौड़, घुड़दौड़, गोला फेंक जैसी स्पर्धाएं आयोजित होती तो वह अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए कई अवार्ड भी राजा की झोली में डाल दिया करता था। बताया जाता है कि दरबार में नियुक्ति के बाद राज्य में आयोजित पहली स्पर्धा में ही वह सात खेलों में दूसरे नंबर पर रहा था। इसकी वजह से उसका दूर-दूर तक नाम प्रसिद्ध हो गया था।
Karoly Takacs – जिसने अपनी इच्छाशक्ति से बनाया था इतिहास
लेकिन भूपत का जीवन शायद आलीशान महल में रहने के लिए नहीं था। इसलिए उसकी जिंदगी में एक साथ दो-दो ऐसी घटनाएं हुई कि उसने हथिया उठा लिए। दरअसल भूपत के जिगरी दोस्त और पारिवारिक रिश्ते से भाई राणा की बहन के साथ उन लोगों ने बलात्कार किया, जिनसे राणा की पुरानी दुश्मनी थी। जब इनसे बदला लेने राणा पहुंचा तो उन लोगों ने राणा पर भी हमला कर दिया। भूपत ने किसी तरह राणा को बचा लिया, लेकिन झूठी शिकायतों के चलते वह खुद इस मामले में फंस गया और उसे कालकोठरी में डाल दिया गया। बस, यहीं से खिलाड़ी भूपत मर गया और डाकू भूपत पैदा हो गया।

भूपत ने जेल से फरार होते ही पहली हत्या की। इस समय उसकी टोली में सिर्फ तीन ही व्यक्ति थे। लेकिन जैसे-जैसे वह अपराध की दुनिया में कदम बढ़ाता चला गया, उसके साथियों की संख्या भी बढ़ती चली गई। अपराध की चरम सीमा पर पहुंचने तक उसके 42 साथी थे और सब एक से बढ़कर एक बहादुर और क्रूर भी। भूपत उस समय का पहला ऐसा डाकू था, जिसने अपने 21-21 साथियों की दो टोलियां बना रखी थीं। इसमें भी खास बात यह है कि इन दोनों टोलियों के लिए सरदार नियुक्त थे, लेकिन हुक्म सिर्फ भूपत का ही चलता था। इसके अलावा दोनों टोलियां जंगल में अलग-अलग ही पड़ाव डाला करती थीं।

भूपत से गद्दारी करते हुए उसका खबरी या उसके साथी पकड़े जाते तो वह उन्हें जान से नहीं मारता था, बल्कि उनकी नाक व कान काट दिया करता था। भूपत की इस क्रूर सजा का शिकार हुए लोगों की संख्या 40 से अधिक है। इसमें चार व्यक्ति तो अब भी सुरेंद्रनजर जिला में रहते हैं। इनमें से एक व्यक्ति के बताए अनुसार भूपत का मानना था कि हत्या करने की बजाय जीवन भर के लिए सजा देना अन्य लोगों को भी डराता रहता है। इसके अलावा भूपत उसे धमकी भी दिया करता था कि अगर उसने आत्महत्या की तो फिर उसके बाकी बचे परिवार की हत्या कर दी जाएगी। इस तरह से वे नाक-कान कटे लोगों को मरने भी नहीं देता था।
भूपत सिंह को खौफनाक हैवान कहा जाता था। उसे अतिशय विकृत मानसिकता का व्यक्ति करार दिया गया था, लेकिन महिलाओं के मामले में उसकी तारीफ भी की जाती थी। क्योंकि डाकू और लुटेरे बनने के बाद भी उसके दिल में महिलाओं के लिए बहुत सम्मान था। उसने अपनी पूरी उम्र किसी भी महिला पर कभी हाथ नहीं उठाया। उसके अलावा उसके साथियों को भी निर्देश था कि कोई भी स्थिति हो, महिलाओं को सम्मान की ही नजर से देखा जाए।

1947 की आजादी के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। इस दौरान भूपत और उसके साथियों ने अपनी दम पर सैकड़ों महिलाओं की आबरू बचाई। भूपत की इन्हीं अच्छाईयों की वजह से उसके क्रूर इतिहास को भुला दिया जाता था। इसके अलावा गरीब उसे अपना मसीहा भी मानते थे।

भूपत सिंह की इसी नेकनियती के कारण वह अनेकों बार पुलिस से बचा लिया गया। गुजरात में उसे कई बार पुलिस ने घेरा, लेकिन उसे बचने के लिए किसी न किसी का साथ मिल ही जाता था। कई बार तो उसे महिलाओं ने ही बचाया था। एक बार तो गिर के जंगल के पास के एक गांव की कई महिलाओं को इस आरोप में गिरफ्तार भी कर लिया गया था कि उन्होंने भूपत को भगाने में मदद की। लेकिन अखबारों में इसकी खबर आने और विवाद मचने के बाद सभी महिलाओं को मुक्त कर दिया गया था।
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भूपत सिंह ने सैकड़ों बार पुलिस को चकमा दिया। देश आजाद होने के बाद 1948 में भूपत के कारनामे चरम पर पहुंच गए थे और पुलिस भूपत को रोकने और पकड़ने में पूरी तरह नाकाम हो गई थी। इस बात से सौराष्ट्र के गृहमंत्री रसिक लाल इस कदर गुस्सा थे कि उन्होंने पुलिस प्रशासन को यह आदेश दे दिया था कि.. जब तक भूपत पकड़ा नहीं जाता, तब तक के लिए पुलिस को 25 प्रतिशत कम सैलरी मिलेगी। महीनों तक पुलिस को 25 प्रतिशत कम सैलरी मिली, लेमिन भूपत पकड़ा नहीं गया। इसके बाद भूपत ने रसिकलाल को ही धमकी दे दी थी कि वे तुरंत पुलिस को पूरी सैलरी देने का आदेश सुनाए। और भूपत की इसी धमकी की वजह से ही पुलिस को पूरा वेतन मिलना शुरू हो गया था। यह भूपत के नाम की धाक ही थी।
इसके अलावा भूपत सिंह को पशु-पक्षियों की आवाजें निकालना व पहचानने की कला भी आती थी। यह हुनर उसने जंगल में ही आदिवासियों से सीखा था। इसका उसे भरपूर फायदा भी मिला। गिर जैसे खतरनाक जंगल में इसी कला की वजह से वह जीवित रह सका। एक बार पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में यह बात लिखी भी थी कि भूपत को पशु-पक्षियों की आवाज निकालने व पहचानने का हुनर आता है, इसलिए जब भी पुलिस जंगल में उसे घेरने घुसती है तो वह बच जाता है और उल्टे पुलिस की टीम ही मुश्किल में पड़ जाती है। इसलिए उसे जंगल में जाकर पकड़ना बहुत मुश्किल है।

एक बार जब भारी पुलिस दल ने भूपत को जंगल में चारों ओर से घेर लिया तो वह शेर की गुफा में छिप गया। लगभग दो दिनों तक भूपत गुफा से बाहर नहीं निकला। जबकि इस गुफा में सिंह का एक पूरा परिवार था। पुलिस इस गुफा तक पहुंच भी गई थी, लेकिन शेरों को देखकर उनकी हिम्मत गुफा में दाखिल होने की नहीं हुई। इसके अलावा उन्होंने यह भी सोचा कि कम से कम वह शेर की गुफा में तो नहीं छुपा होगा, वरना शेर उसे मारकर खा जाएंगे। जबकि पुलिस का यह अंदेशा था, पुलिस यह भूल गई थी कि वह कई सालों से उन्हीं शेरों के साथ रह रहा था। पुलिस के वापस जाने के बाद भूपत ने अपने साथियों तक अपने यह संदेशा पहुंचाया कि वह पुलिस के चंगुल से अब भी बाहर है। भूपत की यह अदा उसकी दिलेरी की कहानी खुद-ब-खुद बयां करती है।

60 के दशक में डाकू भूपत सिंह अपने तीन खास साथियों के साथ देश छोड़कर गुजरात के सरहदी रास्ते कच्छ से पाकिस्तान पहुंच गया। हालांकि पाकिस्तान जाने के पीछे उसका कोई खास मकसद नहीं था। उसे मौत का खौफ भी नहीं था कि वह देश छोड़कर भागता। लेकिन कुछेक घटनाएं ऐसी हुईं कि भूपत कुछ समय के लिए पाकिस्तान चला गया। कुछ समय बाद उसने वापस भारत आने का इरादा किया, लेकिन भारत-पाक पर मचे घमासान के चलते उसके लिए यह मुमकिन नहीं हुआ।
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पाकिस्तानी सेना ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उसे घुसपैठ के आरोप में जेल भेज दिया गया। उसे एक साल की सजा सुनाई गई। लेकिन सजा पूरी होने के बाद भूपत वापस भारत नहीं आया और वहीं स्थायी हो गया। पाकिस्तान में उसने मुस्लिम धर्म अंगीकार कर लिया और अब उसका अमीन युसुफ हो गया। धर्म परिवर्तन के बाद उसने मुस्लिम लड़की से निकाह किया। उसके चार बेटे और दो बेटियां हुईं। हालांकि उसने व उसके अन्य साथियों ने भारत आने की कई कोशिशें की, लेकिन उसकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी और पाकिस्तान की धरती पर ही 2006 में उसने दुनिया से विदा ले ली।

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अग्निवंश Agnivansh

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प्रतिहार, परमार, चौहान एवं चालुक्य
राजपूत आपके राज में, धक-धक धरती होय। जित-जित घोड़ा मुख करे, तित-तित फत्ते होय।

कहा जाता है की  यज्ञ की अग्नि से चार योद्धाओं- प्रतिहार, परमार, चौहान एवं चालुक्य की उत्पत्ति हुई जबकि हकीकत ये है की महर्षि और ब्राह्मणों ने उन्हें यज्ञ करवाया था ताकि वो आम जन की रक्षा मलेछो मुस्लिमो से कर सके साथ।

#प्रतिहार वंश 👑
ये वंश अब परिहार नाम से जाना जाता है जिसमे इंदा जैसे प्रमुख गोत्र आते है प्रतिहार मतलब पहरी इसका
राज्य मंडोर तक रहा 12 वी शतब्दी में जब कन्नौज से राव सिन्हा राठौड
जब मारवाड़ आये तब परिहारों ने बहुत मदद की और मंडोर में आज भी इनकी 1000 साल पुराणी छत्रिया मौजूद है

कुछ प्रशिद्ध शाशक
नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.)
वत्सराज (783 – 795 ई.)
नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.)
मिहिरभोज (भोज प्रथम) (836 – 889 ई.)
महेन्द्र पाल (890 – 910 ई.)
महिपाल (914 – 944 ई.)
भोज द्वितीयविनायकपालमहेन्द्रपाल (940 – 955 ई.)

प्रतिहारों के अभिलेखों में उन्हें श्रीराम के अनुज लक्ष्मण का वंशज बताया गया है, जो श्रीराम के लिए प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य करता था हूणों के साथ गुर्जर बहुत ज्यादा आये थे और गुजरात राजस्थान के एक हिस्से में फ़ैल गए थे इन पर राज करने से प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार कहा गया

#चौहान वंश 👑

‘चौहान’ नाडोल जालोर ,सांभर झील,पुष्कर, आमेर और वर्तमान जयपुर (राजस्थान) में होते हुए उत्तर भारत में फैले चुके हैं।

प्रसिद्ध शासक

चौहान वंश की अनेक शाखाओं में ‘शाकंभरी चौहान’ (सांभर-अजमेर के आस-पास का क्षेत्र) की स्थापना लगभग 7वीं शताब्दी में वासुदेव ने की। वासुदेव के बाद पूर्णतल्ल, जयराज, विग्रहराज प्रथम, चन्द्रराज, गोपराज जैसे अनेक सामंतों ने शासन किया। शासक अजयदेव ने ‘अजमेर’ नगर की स्थापना की और साथ ही यहाँ पर सुन्दर महल एवं मन्दिर का निर्माण करवाया। ‘चौहान वंश’ के मुख्य शासक इस प्रकार थे-

अजयदेव चौहानअर्णोराज (लगभग 1133 से 1153 ई.)विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव (लगभग 1153 से 1163 ई.)पृथ्वीराज तृतीय (1168-1198)

#परमार वंश👑

परमार वंश का आरम्भ नवीं शताब्दी के प्रारम्भ मेंनर्मदा नदी के उत्तर मालवा (प्राचीन अवन्ती) क्षेत्र में उपेन्द्र अथवा कृष्णराज द्वारा हुआ था। 
आज ये पाकिस्तान से लेकर हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र तक है इन्ही में सोढा राजपूत आते है वही भायल सांखला ये पंवार नाम से भी जाने जाते है

वंश शासक
उपेन्द् वैरसिंह प्रथम, सीयक प्रथम, वाक्पति प्रथम एवं वैरसिंह द्वितीय थे।

परमारों की प्रारम्भिक राजधानी उज्जैन में थी पर कालान्तर में राजधानी ‘धार’, मध्य प्रदेश में स्थानान्तरित कर ली गई परमार वंश में आठ राजा हुए, जिनमें सातवाँवाक्पति मुंज (973 से 995 ई.) और आठवाँ मुंज का भतीजा भोज (1018 से 1060 ई.) सबसे प्रतापी थी।मुंज अनेक वर्षों तक कल्याणी के चालुक्यराजाओं से युद्ध करता रहा और 995 ई. में युद्ध में ही मारा गया। उसका उत्तराधिकारी भोज (1018-1060 ई.) गुजरात तथा चेदि के राजाओं की संयुक्त सेनाओं के साथ युद्ध में मारा गया। उसकी मृत्यु के साथ ही परमार वंश का प्रताप नष्ट हो गया। यद्यपि स्थानीय राजाओं के रूप में परमार राजा तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ तक राज्य करते रहे, अंत में तोमरों ने उनका उच्छेद कर दिया।परमार राजा विशेष रूप से वाक्पति मुंज और भोज, बड़े विद्वान थे और विद्वानों एवं कवियों के आश्रयदाता थे।

#चालुक्य वंश / सोलंकी 👑

‘विक्रमांकदेवचरित’ में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद्  ‘एफ. फ्लीट’ तथा ‘के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री’ ने इस वंश का नाम ‘चलक्य’ बताया है। ‘आर.जी. भण्डारकरे’ ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम ‘चालुक्य’ का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है।

लगभग आधे भारत पर राज किया  सोलंकी चालुक्य राजाओ ने केरल से लेकर नेपाल तक विजय यात्रा की
दक्षिण और गुजरात के अधिकतर क्षेत्रो पर हुकूमत की वर्त्तमान ये सोलंकी नाम से जाने जाते है

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हम्मीरदेव चौहान रणथंभोर Hamirdev Chauhan Ranthambhor

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हम्मीरदेव चौहान रणथंभोर

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एक राजपूत जिसने चार मुस्लिम शरणार्थी परिवारो की खातिर अपना सब कुछ लूटा दिया अपना राज्य अपना परिवार अपना सब कुछ …..

अलाउद्दीन खिलजी की सेना गुजरात विजय से लौट रही थी रास्ते में गुजरात से लूटे धन के बंटवारे को लेकर उसके सेनानायिकों में विवाद हो गया | विवाद के चलते अलाउद्दीन का एक सेनानायिक पीर मुहम्मद शाह अपने भाइयों सहित बागी होकर रणथंभोर के इतिहास प्रसिद्ध शासक हम्मीरदेव के पास शरण हेतु चला गया | शरणागत की रक्षा करना क्षत्रिय का कर्तव्य होता है इसी कर्तव्य को निभाने हेतु हम्मीरदेव ने उन मुसलमान भाइयों को शरण दे दी | अपने बागी सेनानायिकों को हम्मीरदेव द्वारा शरण देना अलाउद्दीन खिलजी को नागवार गुजरा सो उसने एक विशाल सेना उलुगखां व निसुरतखां के नेतृत्व में हम्मीर के खिलाफ रणथंभोर भेज दी | उलुगखां ने हम्मीर को सन्देश भिजवाया कि- ” वह उसके चार बागी मुसलमान सैनिको को उसे सौंप दे वह सेना लेकर वापस चला जायेगा पर हठी हम्मीर ने तो कह दिया कि –
“शरण में आये किसी भी व्यक्ति की रक्षा करना उसका कर्तव्य है इसलिए बेशक तुमसे युद्ध करना पड़े पर शरणागत को वापस नहीं करूँगा |”

इसके बाद दोनों और से एक दुसरे पर हमले हुए,हम्मीर के चौहान सैनिक अलाउद्दीन की सेना पर भारी पड़ रहे थे उन्हें जीतना आसान न था सो अलाउद्दीन खुद युद्ध के मैदान में आ डटा |
युद्ध में हम्मीर को परास्त करना बहुत मुश्किल था सो अलाउद्दीन ने कूटनीति चली उसने हम्मीर से संधि करने उसके आदमी भेजने को कहा और हम्मीर ने अपने जिस सेनापति को संधि के लिए भेजा अलाउद्दीन ने उसे रणथंभोर का राज्य देने का लालच दे अपनी और मिला लिया | किले के चारों और कई महीनों से घेरा पड़ा होने के चलते किले में राशन की भी कमी हो गयी थी उधर हम्मीर को अपने कई व्यक्तियों के शत्रु से मिलने की खबर से बड़ी खिन्नता हुई | चारों तरफ से धोखेबाजी की आशंका के चलते हम्मीर ने शाका करने का निर्णय लिया व मुहम्मदशाह को बुलाकर कहा –
” आप विदेशी है,आपत्ति के समय आपका यहाँ रहना उचित नहीं अत: आप जहाँ जाना चाहें स्वतंत्र है जा सकते है मैं आपको सुरक्षित जगह पहुंचा दूंगा |”
मुहम्मदशाह हम्मीरदेव के इन वचनों से बहुत मर्मविद्ध हुआ उसे लगा कि -कई लोगों से धोखा खाने के चलते कहीं हम्मीरदेव मुझ पर भी शंका तो नहीं करने लग गए | वह उसी वक्त अपने घर गया और अपने पुरे कुटुंब का क़त्ल कर दिया फिर आकर उसने हम्मीर से कहा –
“मेरे परिवार ने जाने की तैयारी करली है पर आपकी भाभी चाहती है कि जिसकी कृपा से इतने दिन आनंद से रहे उसके एक बार दर्शन तो करलें | सो महाराज एक बार मेरे घर चल कर मेरी पत्नी को दर्शन तो दे दीजिये |”

महाराज हम्मीरदेव मुहम्मदशाह के घर पहुंचे तो वहां का दृश्य देख हक्के बक्के रह गए,घर में चारों और खून बह रहा था मुहम्मदशाह की स्त्री व बच्चों के कटे अंग पड़े थे | हम्मीरदेव समझ गए कि ये सब किस वजह से हुआ है उन्हें मुहम्मदशाह को जाने वाली बात कहने का अब बहुत पश्चताप हुआ पर अब हो ही क्या सकता था |
आखिर वो दिन आ ही गया जिस दिन हम्मीरदेव ने केसरिया वस्त्र धारण कर किले के द्वार खोल शाका किया | उस युद्ध में मुहम्मदशाह और उसके भाइयों ने बड़ी वीरता के साथ युद्ध किया | मुहम्मदशाह को कई गोलियां लगी वह घायल होकर मूर्छित हो गया | स्वजातीय को न मारने की नीति के तहत उसे पकड़ कर अलाउद्दीन के पास ले जाया गया | अलाउद्दीन ने उस घायल मुहम्मदशाह से कहा –
” मैं तुम्हारे घावों की मरहम पट्टी करवाकर तुम्हे स्वस्थ करवा दूंगा पर ये बताओ कि स्वस्थ होने के बाद तुम मेरे साथ क्या सलूक करोगे ?”
” वही जो तुमने हम्मीरदेव के साथ किया | मैं तुम्हे मारकर तुम्हारी जगह हम्मीरदेव के पुत्र का राज्याभिषेक करवा दूंगा |” घायल मुहम्मदशाह ने फुफकारते हुए कहा | ऐसे शब्द कहने वाले मुहम्मदशाह की समानता तो कोई विरला वीर ही कर सकता है |

अलाउद्दीन खिलजी मुहम्मदशाह द्वारा इस तरह के वचन सुनकर बहुत क्रोधित हुआ और उसने मुहम्मदशाह को हाथी के पैरों से कुचलवाकर मारने का हुक्म दे दिया | उसके सैनिको ने मुहम्मदशाह को हाथियों के पैरों तले रोंदवा कर मार डाला |
बाद में जब अलाउदीन खिलजी को अहसास हुआ कि ” मुहम्मदशाह अपने शरणदाता के प्रति कितना सच्चा वफादार व नमक हलाल निकला तो उसके मन में उस वीर के प्रति श्रद्धा के भाव उमड़ पड़े और उसने मुहम्मद शाह के शव को ससम्मान विधिवत दफ़नाने की आज्ञा दी |

एक और हम्मीरदेव चौहान ने अपने शरणागत की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व लुटाकर भी क्षात्र धर्म के शरणागत की रक्षा करने
के नियम का पालन किया वहीँ मुहम्मदशाह ने अपने शरणदाता के लिए अपना कुछ दांव पर लगाकर वीरगति प्राप्त की |

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पृथ्वीराज चौहान के काका श्री *कन्ह*के युद्ध वर्णन का कवित्त 💥

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पृथ्वीराज चौहान के काका श्री *कन्ह*के युद्ध वर्णन का कवित्त 💥
कालंजर इक लख्ख,
सार सिंधुरह गुड़ावै !
मार मार मुख चवै,
सिंघ सिंघा मुख धावै!!
दौरि *कन्ह* नर नाह,
पटी छुट्टी अंखिन पर!
हथ्थ लाइ किरवार ,
रूंडमाला निन्निय हर!!
विहु बाह लख्ख लौहे परिय ,
छानि करिब्बर दाह किय !
उच्छारि पारि धरि उप्परें ,
कलह कियौ कि उघान किय !!–

(चंदवरदाई रचित “पृथ्वीराज रासौ”से अवतरित *घग्घर नदी का युद्ध* में पृथ्वीराज चौहान के काका श्री *कन्ह*के युद्ध वर्णन का यह कवित्त है! कहते है कि यह कन्ह महारथी तथा अति वचन पालने वाला राजपूत था!

इनका प्रण था कि मेरे सामने यदि किसी ने अपनी मूंछ पर हाथ भी रखा तो फिर चाहे वो कोई भी व्यक्ति क्यों न हो?मैं उसका सिर छैंदन कर दूंगा या स्वंय मर मिटूंगा!इसलिऐ पृथ्वी राज चौहान के पिता सामैश्वर चौहान ने अपनी शपथ दैकर कन्ह की ऑखौं पर सदैव पट्टी बांधकर रखने को राजी
किया!
इस युद्ध में ही पृथ्वीराज चौहान के विशेष आग्रह पर पट्टी उतार दी गई तथा गौरी के प्रमुख सैनानायक ने जब मूंछों पर हाथ रखा तो उसकों हाथी पर सवार ही नही होने दिया तथा शिख से नख तक चीर कर दो भाग कर दिये!)
संकलन्:-रिड़मल दान दैथा , सात
साभार: Kathiyawad Glory

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चांपानेर पताई रावल चौहान का बेगड़ा से युद्ध Khichi Chauhan Rajputs Of Chapaner

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         चहुदिश आन चक्रवर्ती चौहान
भारतीय इतिहास के एक ऐसे गौरवशाली संघर्ष से परिचय कराएंगे जो राजपूतो के अपने धर्म के प्रति प्रतिबद्धता और स्वतंत्रता के प्रति लगाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। चंपानेर के खिंची चौहान वंश ने अपने से कहीँ ज्यादा ताकतवर गुजरात की मुस्लिम सल्तनत से संघर्ष करते हुए उसके बिलकुल जड़ में एक सदी तक स्वतंत्र शाशन किया लेकिन कभी झुकना या धर्म परिवर्तन स्वीकार नही किया।

गुजरात पर उस समय मुस्लिम सल्तनत का परचम लहरा रहा था। अहमदाबाद उसकी राजधानी थी। तब चांपानेर मे खींची चौहानो का राज अपनी वीरता और वैभव के लिए मशहूर था। चांपानेर के संस्थापक गुजरात नरेश वनराजसिंह चावडा थे। 1300 ई. में चौहानों ने चांपानेर पर अधिकार कर लिया था।

एक और चौहानो के शौर्य का रस मुस्लिम सेना चख रही थी तो दुसरी और गुजरात का सुलतान आकुल व्याकुल हो रहा था। बात यह थी की अहमदाबाद के पास ही चांपानेर मे चौहान राजपूतो का छोटा सा राज्य था और कभी उन्होने मुस्लिम सुल्तानों के आधिपत्य को स्वीकार नही किया था। इस बात से गुजरात के सुलतान चांपानेर पर धावा बोलने की योजनाए बनाते ,
पर चौहानो की तेज तलवारो की कल्पना मात्र से ही वे अपना मन बदल लेते। एक सदी तक चांपानेर के खिंची राजपूतो से सल्तनत की लड़ाई चलती रही, लेकिन सल्तनत उन्हें झुका या हरा नही पाई।

जब गुजरात की गद्दी पर मुहम्मद शाह आया तब उसने चांपानेर पर आक्रमण करने की कई योजनाए बनाई लेकिन किसी ना किसी कारण वश वो सफल नही हो पाता था, 1449 ई. मे आखिर उसने आक्रमण कर ही दिया।

चांपानेर पर तब कनकदास चौहान उर्फ गंगदास चौहान का राज था। सुलतान के आक्रमण की खबर सुनते ही उन्होने अपनी सेना को सुसज्जित किया। मालवा के महमूद शाह खिलजी ने भी अपनी सेना सहायता हेतु भेजी। चांपानेर की सेना ने मुहम्मदशाह की सेना का ना सिर्फ सामना किया बल्कि औंधे मुह घर लौंटने को मजबुर कर दिया |

1451 ई. मे अहमदाबाद वापिस लौटते समय मुहम्मदशाह बीमार पड गया और रास्ते मे ही उसकी मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कुतुब-उद-दिन अहमदशाह || (1451-1458) गद्दी पर आया और उसके बाद Abu-al Fath Mahmud Shah अबु-अल फाथ महमुद शाह को गद्दी पर बिठाया गया जो महमुद ‘बेगडा’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

बेगडा छोटी उम्र मे ही सुलतान बन गया था लेकिन उसकी महत्वकांक्षाए बहुत बडी थी। वो एक धर्मांध और जूनुनी शासक था। चांपानेर की स्वतंत्रता उसे कांटे की तरह चुभ रही थी। अपने विरोधीयो और दुश्मनो को खत्म करके मजबुत सत्ता जमाने मे कामयाब हो गया था। अब उसकी नजर एक सदी तक उसके बाप दादाओ को अपने स्वतंत्र अस्तित्व से चिढ़ाते आ रहे चांपानेर पर थी।

उस वक्त चांपानेर मे कनकदास/गंगदास के पुत्र जयसिंह चौहान (पत्तई रावल के नाम से प्रसिद्ध) की सत्ता थी | ( कई जगह जयसिंह को उदय सिंह का पुत्र लिखा हुआ है)

1482 ई.मे महमुद बेगडा को चांपानेर पर आक्रमण करने का मौका मिला। रसुलाबाद जो की चांपानेर से 14 मील की दुरी पर था, वहां महमूद का सूबेदार मलिक था, उसने चांपानेर के प्रदेश मे घूसखोरी और लूटपाट करी। जब इसका पता जयसिंह को चला उन्होने रसुलाबाद पर धावा बोल दिया, सारा लूट का माल वापिस ले लिया, दो हाथी भी ले लिये और रसूलाबाद को तबाह कर दिया ||

इस घटना का पता चलने पर महमुद ने चांपानेर को जीतने का इरादा बनाया। उसने अपनी सेना के एक जत्थे को बडौदा की और भेजा ताकी उस ओर से चांपानेर आ रहे साधन सामग्री और खाने पीने की चीजो पर रोक लगा सके, और खुद 4 दिसंबर, 1482 को ढाई से तीन लाख की सेना के साथ चांपानेर पर उसने हमला किया लेकिन जयसिंह ने भी बडी बहादुरी से उसका सामना किया। करीब दो साल तक चले घेरे मे मुस्लिमो ने कई मंदिरो और तीर्थस्थलो को तहस-नहस कर दिया, पावागढ के महाकाली के मंदिर का गर्भगृह भी टूट गया था, लेकिन पावागढ का दुर्ग महमूद के लिये बडी चुनौती बना हुआ था। आखिर उसने जयसिंह के कुछ दरबारियो को लालच देकर अपने साथ मिला लिया और 21, नवंबर, 1484 के दिन किले के दरवाजे खुलवा लिये।

जयसिंह की सेना की संख्या मुस्लिम सेना से काफी कम थी लेकिन फिर भी उन्होने विधर्मियो को काटना जारी रखा। 700 राजपुतो ने शाका किया और बेगडा के 20,000 मुस्लिम सैनिको को दोजख मे पहुचा दिया था। दूसरी ओर महारानी चंपादेवी और दुसरी राजपुत स्त्रीयो ने जौहर कर विधर्मीयो के हाथो से खुद को बचा लिया। सुरंग मार्ग से जयसिंह के पुत्र को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। राजा जयसिंह लडते लडते दुश्मनो के हाथो लग गये और उन्हे उनके मंत्री सूरी के साथ बंदी बना लिया गया।

बन्दी बनाकर जब राजा जयसिंह और सूरी को बेगड़ा के सामने लाया गया तो उसने पूछा कि किसकी प्रेरणा से तुम्हारी हिम्मत हुई अपनी छोटी सी सेना लेकर मेरी इतनी विशालकाय और ताकतवर सेना से लड़ने की???

वो दोनों राजपूत घायल अवस्था में बेगड़ा की गिरफ्त में थे, उनके परिवार जौहर की अग्नि में विलीन हो गए थे, चांपानेर और पावागढ़ के दुर्ग तबाह हो गए थे, इस सब के बाद भी राजा जयसिंह ने पूरी दृढ़ता से बेगड़ा को जवाब दिया– इस भूमी पर मेरा वंशानुगत अधिकार है, यह मेरे पूर्वजो द्वारा अर्जित है और इतने महान और कुलीन पूर्वजो की श्रृंखला का वंशज होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि जिस गौरवशाली नाम को उन्होंने मुझे दिया है उसकी इज्जत मरते दम तक बनाए रखू।”

बेगड़ा राजा जय सिंह के इस वीरोचित उत्तर से बहुत प्रभावित हुआ और दोनों राजपूतो को इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिये मनाया लेकिन उनके इनकार करने पर करीब पांच महिनो तक राजा जय सिंह और उनके मंत्री सूरी को घोर यातनाए देकर ईस्लाम कबुल करने का दबाव डाला गया लेकिन वे टस से मस न हुए, उसके बाद उनका शिरछेद कर हत्या कर दी गई।

राजा जयसिंह और उनके मंत्री सूरी का यह बलिदान असंख्य राजपूत वीरो के देश, धर्म और कुल के मान सम्मान के लिये अपना सर्वस्व बलिदान करने की परंपरा का एक अप्रतिम उदाहरण है। आज भी गुजरात में राजा जयसिंह को पतई रावल नाम से याद किया जाता है और उनके बारे में अनेको लोक कहानिया प्रचलित हैँ।

जयसिंह के पुत्र रायसिंह के पुत्र त्र्यंबकसिंह हुए जिनके दो पुत्र थे, 1. पृथ्वीराजजी जिन्होने छोटा उदैपुर रियासत की स्थापना की, 2. डुंगरसिंहजी जिन्होने बारिया रियासत की नींव रखी। ये दोनों रियासत आज भी मौजूद हैँ।

राजपुताना सोच और क्षत्रिय इतिहास

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)

चौहान राजपूत राजवंश Chauhan Rajput Rajvansh

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•°• चौहाण राजपुत राजवंश •°•

जब भारतवर्ष में चारों तरफ मार-काट मची थी, अशांति फैली हुई थी, कानून का कोई राज नहीं था, कोई चक्रवर्ती राजा नहीं बचा था, तब महर्षि वशिष्ठ नें महायज्ञ किया था। अग्नि की स्तुति करके सबसे पहले देवराज इंद्र की पूजा की। यज्ञ करते समय अग्नि में से तलवार लियें एक पराक्रमी निकला। वो परमार वंश का संस्थापक बना। उसके बाद भगवान विष्णु का आह्ववाहन किया गया तो उसमें से चौहान वंश का संस्थापक निकला। इसी तरह से भगवान शिव से सोलंकी और ब्रह्मा से प्रतिहारों की उत्पत्ति हुई।
इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। आधुनिक इतिहासकार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल यज्ञ के बाद से तो मानते हैं लेकिन इस बात पर यकीन नहीं करते कि चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार अग्नि से उत्पन्न हुए हैं। इतिहासकार इस यज्ञ को एक तरह के शुद्धिकरण की तौर पर देखते है। पहली बात तो अगर हजारों साल पहले भगवान राम के समय में भी वशिष्ठ मुनि थे, तो वे क्या सैकड़ो साल तक वे जिंदा रहें इस यज्ञ को करने के लिये। इसका जबाब शायद ये है कि ऋषि मुनियों में गुरु-शिष्य पंरपरा चलती थी। एक ऋषि की मौत के बाद उसका एक शिष्य गुरु की गद्दी पर आसीन होता था और उसे भी अपनी गुरु की भांति वही नाम मिल जाता था। इतिहासकार, महर्षि वशिष्ठ के यज्ञ को मध्ययुग के नवी-दसवी काल में देखते है। ये वो समय था जब भारत में अरबों ने आक्रमण करना शुरु कर दिया था। गुप्तवंश के राजाओं और हर्षवर्धन के बाद पूरे देश में कोई पराक्रमी राजा ना बचा था। ये वही वक्त था जब महमूद गजनी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत को लूटता हुआ पश्चिमी मुहाने पर बने प्राचीन सोमनाथ मंदिर तक पहुंच गया था। उसने वहां लूटपाट और तबाही का वो मंजर खेला था कि आज भी लोग सुनकर सिहर उठते हैं। हिंदु समाज में लोगो की रक्षा करने वाले क्षत्रियों का पतन तेजी से हो रहा था। पहले वैश्य राजा (गुप्त वंश) और फिर हुण और शक राजाओं (उन्हें नीची जाति का माना जाता था) के हाथों सत्ता चले जाने से ब्राहमण और क्षत्रिय समाज परेशान था। शायद इसका ही नतीजा था अग्निकुल यज्ञ। इस यज्ञ के बाद पूरे उत्तर भारत में चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार वंश का ही राज हो गया।

चह्वान (चतुर्भुज)
अग्निवंश के सम्मेलन कर्ता ऋषि
१.वत्सम ऋषि,२.भार्गव ऋषि,३.अत्रि ऋषि,४.विश्वामित्र,५.चमन ऋषि
विभिन्न ऋषियों ने प्रकट होकर अग्नि में आहुति दी तो विभिन्न चार वंशों की उत्पत्ति हुयी जो इस इस प्रकार से है-
१.पाराशर ऋषि ने प्रकट होकर आहुति दी तो परिहार की उत्पत्ति हुयी (पाराशर गोत्र)
२.वशिष्ठ ऋषि की आहुति से परमार की उत्पत्ति हुयी (वशिष्ठ गोत्र)
३.भारद्वाज ऋषि ने आहुति दी तो सोलंकी की उत्पत्ति हुयी (भारद्वाज गोत्र)
४.वत्स ऋषि ने आहुति दी तो चतुर्भुज चौहान की उत्पत्ति हुयी (वत्स गोत्र)
चौहानों की उत्पत्ति आबू शिखर मे हुयी
दोहा-
चौहान को वंश उजागर है,जिन जन्म लियो धरि के भुज चारी,
बौद्ध मतों को विनास कियो और विप्रन को दिये वेद सुचारी॥
चौहान की कई पीढियों के बाद अजय पाल जी महाराज पैदा हुये
जिन्होने आबू पर्वत छोड कर अजमेर शहर बसाया
अजमेर मे पृथ्वी तल से १५ मील ऊंचा तारागढ किला बनाया जिसकी वर्तमान में १० मील ऊंचाई है,महाराज अजयपाल जी चक्रवर्ती सम्राट हुये.
इसी में कई वंश बाद माणिकदेवजू हुये,जिन्होने सांभर झील बनवाई थी।
सांभर बिन अलोना खाय,माटी बिके यह भेद कहाय”
इनकी बहुत पीढियों के बाद माणिकदेवजू उर्फ़ लाखनदेवजू हुये
इनके चौबीस पुत्र हुये और इन्ही नामो से २४ शाखायें चलीं
चौबीस शाखायें इस प्रकार से है-
१. मुहुकर्ण जी उजपारिया या उजपालिया चौहान पृथ्वीराज का वंश
२.लालशाह उर्फ़ लालसिंह मदरेचा चौहान जो मद्रास में बसे हैं
३. हरि सिंह जी धधेडा चौहान बुन्देलखंड और सिद्धगढ में बसे है
४. सारदूलजी सोनगरा चौहान जालोर झन्डी ईसानगर मे बसे है
५. भगतराजजी निर्वाण चौहान खंडेला से बिखराव
६. अष्टपाल जी हाडा चौहान कोटा बूंदी गद्दी सरकार से सम्मानित २१ तोपों की सलामी
७.चन्द्रपाल जी भदौरिया चौहान चन्द्रवार भदौरा गांव नौगांव जिला आगरा
८.चौहिल जी चौहिल चौहान नाडौल मारवाड बिखराव हो गया
९. शूरसेन जी देवडा चौहान सिरोही (सम्मानित)
१०.सामन्त जी साचौरा चौहान सन्चौर का राज्य टूट गया
११.मौहिल जी मौहिल चौहान मोहिल गढ का राज्य टूट गया
१२.खेवराज जी उर्फ़ अंड जी वालेगा चौहान पटल गढ का राज्य टूट गया बिखराव
१३. पोहपसेन जी पवैया चौहान पवैया गढ गुजरात
१४. मानपाल जी मोरी चौहान चान्दौर गढ की गद्दी
१५. राजकुमारजी राजकुमार चौहान बालोरघाट जिला सुल्तानपुर में
१६.जसराजजी जैनवार चौहान पटना बिहार गद्दी टूट गयी
१७.सहसमल जी वालेसा चौहान मारवाड गद्दी
१८.बच्छराजजी बच्छगोत्री चौहान अवध में गद्दी टूटगयी.
१९.चन्द्रराजजी चन्द्राणा चौहान अब यह कुल खत्म हो गया है
२०. खनगराजजी कायमखानी चौहान झुन्झुनू मे है लेकिन गद्दी टूट गयी है,मुसलमान बन गये है
२१. हर्राजजी जावला चौहान जोहरगढ की गद्दी थे लेकिन टूट गयी.
२२.धुजपाल जी गोखा चौहान गढददरेश मे जाकर रहे.
२३.किल्लनजी किशाना चौहान किशाना गोत्र के गूजर हुये जो बांदनवाडा अजमेर मे है
२४.कनकपाल जी कटैया चौहान सिद्धगढ मे गद्दी (पंजाब)
उपरोक्त प्रशाखाओं में अब करीब १२५ हैं
बाद में आनादेवजू पैदा हुये
आनादेवजू के सूरसेन जी और दत्तकदेवजू पैदा हुये
सूरसेन जी के ढोडेदेवजी हुये जो ढूढाड प्रान्त में था,यह नरमांस भक्षी भी थे.
ढोडेदेवजी के चौरंगी-—सोमेश्वरजी–—कान्हदेवजी हुये
सोम्श्वरजी को चन्द्रवंश में उत्पन्न अनंगपाल की पुत्री कमला ब्याही गयीं थीं
सोमेश्वरजी के पृथ्वीराजजी हुये
पृथ्वीराजजी के-
रेनसी कुमार जो कन्नौज की लडाई मे मारे गये
अक्षयकुमारजी जो महमूदगजनवी के साथ लडाई मे मारे गये
बलभद्र जी गजनी की लडाई में मारे गये
इन्द्रसी कुमार जो चन्गेज खां की लडाई में मारे गये
पृथ्वीराज ने अपने चाचा कान्हादेवजी का लडका गोद लिया जिसका नाम राव हम्मीरदेवजू था
हम्मीरदेवजू के-दो पुत्र हुये रावरतन जी और खानवालेसी जी
रावरतन सिंह जी ने नौ विवाह किये थे और जिनके अठारह संताने थीं,
सत्रह पुत्र मारे गये
एक पुत्र चन्द्रसेनजी रहे
चार पुत्र बांदियों के रहे
खानवालेसी जी हुये जो नेपाल चले गये और सिसौदिया चौहान कहलाये.
रावरतन देवजी के पुत्र संकट देवजी हुये
संकटदेव जी के छ: पुत्र हुये
१. धिराज जू जो रिजोर एटा में जाकर बसे इन्हे राजा रामपुर की लडकी ब्याही गयी थी
२. रणसुम्मेरदेवजी जो इटावा खास में जाकर बसे और बाद में प्रतापनेर में बसे
३. प्रतापरुद्रजी जो मैनपुरी में बसे
४. चन्द्रसेन जी जो चकरनकर में जाकर बसे
५. चन्द्रशेव जी जो चन्द्रकोणा आसाम में जाकर बसे इनकी आगे की संतति में सबल सिंह चौहान हुये जिन्होने महाभारत पुराण की टीका लिखी.
मैनपुरी में बसे राजा प्रतापरुद्रजी के दो पुत्र हुये
१.राजा विरसिंह जू देव जो मैनपुरी में बसे
२. धारक देवजू जो पतारा क्षेत्र मे जाकर बस
मैनपुरी के राजा विरसिंह जू देव के चार पुत्र हुये
१. महाराजा धीरशाह जी इनसे मैनपुरी के आसपास के गांव बसे
२.राव गणेशजी जो एटा में गंज डुडवारा में जाकर बसे इनके २७ गांव पटियाली आदि हैं
३. कुंअर अशोकमल जी के गांव उझैया अशोकपुर फ़कीरपुर आदि हैं
४.पूर्णमल जी जिनके सौरिख सकरावा जसमेडी आदि गांव हैं
महाराजा धीरशाह जी के तीन पुत्र हुये
१. भाव सिंह जी जो मैनपुरी में बसे
२. भारतीचन्द जी जिनके नोनेर कांकन सकरा उमरैन दौलतपुर आदि गांव बसे
२. खानदेवजू जिनके सतनी नगलाजुला पंचवटी के गांव हैं
खानदेव जी के भाव सिंह जी हुये
भावसिंह जी के देवराज जी हुये
देवराज जी के धर्मांगद जी हुये
धर्मांगद जी के तीन पुत्र हुये
१. जगतमल जी जो मैनपुरी मे बसे
२. कीरत सिंह जी जिनकी संतति किशनी के आसपास है
३. पहाड सिंह जी जो सिमरई सहारा औरन्ध आदि गावों के आसपास हैं

– Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarada)
Jay Mataji

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)